कैरियर डिप्लोमेट से विदेश मंत्री तक का सफर… आगे रास्ता उबड़-खाबड़ है !

कर्ण भास्कर

वर्तमान भारतीय राजनय के नक्षत्रमण्डल में जयशंकर एक पर्याय की तरह लगते हैं। एनडीए 2.0 मंत्रिमंडल में विश्वव्यापी प्रशंसा अगर किसी एक फैसले ने बटोरी तो वह थी सुब्रमण्यम जयशंकर को भारतीय राजनय का कमान सौंपना। इस फैसले को विश्वव्यापी मीडिया कवरेज मिला।

जयशंकर के समक्ष पहली चुनौती उस विरासत को संभालने और आगे बढ़ाने कि है जिसे उनके पूर्वर्ती विदेश मंत्री और उनके विदेश सचिव के कार्यकाल में “बॉस” रही सुषमा स्वराज ने सीमित संसाधन के वावजूद बहुत ही “स्नेहिल और प्रभावी” तरीके से वैश्विक कूटनीति के मंच पर उस प्रतिमान तक पहुंचाया जो विगत कई दशक से लंबित था। श्रीमती स्वराज ने पारंपरिक, गैर पारंपरिक और क्वासी डिप्लोमेसी , शिखर और शेरपा कूटनीति के साथ साथ सूचना और संचार तकनीक और सोशल मीडिया प्लेटफार्म का प्रभावी प्रयोग स्वयं भी किया और उनके मातहत रहे विकास स्वरूप, फिर सैयद अकबरुद्दीन और रवीश कुमार ने जिस स्फूर्ति और तत्परता के साथ आम भारतीय को विदेश मंत्रालय के साथ जुड़ाव मोबाइल के माध्यम सर्व सुलभ कर दिया, जिसकी कल्पना शायद किसी ने न की थी।

जयशंकर के आगे की राह चुनौती भरी

डॉ सुब्रमण्यम जयशंकर की नियुक्ति रायसीना कि पथरीली पहाड़ी की पगडंडी में कांटे बिछे राह पर हुई है। यहां एक ओर अमेरिकी खेमा आपको आर्थिक और सामरिक मोर्चे पर आंखे तरेर रहा है, चीन की मनहूसियत भरी चुप्पी आपको चैन से बैठने नहीं दे रही है, आपके गर्भनाल से निकले और चिपके अन्य पड़ोसी देश में व्यापक बैचेनी का आलम व्याप्त है, अपने को सर्वाधिक सभ्य समझने वाले यूरोपीय देश प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापस हुई सरकार के साथ जिस ठंडे तरीके से सरकार का स्वागत किया, ये कोई शुभ संकेत नहीं है।

लगभग चार दशकों के विभिन्न्न क्षमताओं वाले उच्चस्तरीय राजनयिक कार्यानुभव और विश्वव्यापी बेदाग छवि के मालिक जयशंकर के लिए ये चुनौतियां परेशान तो कर सकती है पर पराजित नहीं, शायद इसी लक्ष्य के साथ उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है।

इनकी क्षमता के बारे में आप महज इस बात से अंदाजा लगा सकते है कि उनके चीनी स्टेट काउंसिलर और इनके समक्ष वांग ई ने इन्हें विशेष सन्देश भेजा तो इन्हें जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में परास्नातक कक्षाओं में पढ़ाने वाले मूर्धन्य विद्वान डॉ पुष्पेश पंत ने भी इन्हें बधाई संदेश भेज कर उनकी विद्वता को रेखांकित किया।

राजनायिक गलियारों में ऐसा होना एक दुर्लभतम घटना मानी जाती है, जब आपके बारे में आपके गुरुजन , विपक्ष, सत्तापक्ष और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति बिरादरी समवेत स्वर में आपकी प्रशंसा करे और यह कहे कि जयशंकर विदेश मंत्री के रूप में इस सरकार का सबसे बेहतरीन और उत्कृष्ट चुनाव है। इन तमाम सकारात्मक कार्यों के बीच भारतीय विदेश नीति फ़िलहाल सरकार के “अत्यधिक स्थायित्व” प्राप्त करने की एक नई चुनौती का सामना कर रही है।

अत्यधिक स्थायित्व प्राप्त सरकार की राजनयिक चुनौतियों और भी ज्यादा

तकनीकी तौर पर अत्यधिक स्थायित्व प्राप्त सरकार होने से सबसे अधिक परेशानी आपके पड़ोसी देशों को भीतर से होती है, वे अपनी सुरक्षा के लिए भयभीत और बैचेन रहते हैं और उन्हें अपने अस्तित्व पर संकट और संप्रभुता में अतिक्रमण और असुरक्षा का भाव नैसर्गिक रूप से सताता रहता है। भारतीय उपमहाद्वीप के देशों कि राजनीति के केंद्रबिंदु में भारत है और भूटान छोड़कर सभी पड़ोसी देश चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की एक ख़रब डॉलर (01 ट्रिलियन$) वाली मल्टी मॉडल अवसंरचनात्मक कार्यक्रम बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव कार्यक्रम का भारत के लाख न चाहने पर भी साझेदार बन चुके हैं।

भारतीय गर्भनाल से जुड़ा “नेशनल ट्रीटमेंट” प्राप्त और भू आवेष्टित (लैंडलॉक) देश नेपाल में चीन की प्रभावशीलता तो देखते ही बनती है। नेपाल का चीनी खेमा में जाने का अर्थ अपना विनाश के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। कमोबेश यही स्थिति बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव के साथ है। पाकिस्तान तो चीन का “सदाबहार दोस्त” मित्र देश है जिसके निशाने पर हर क्षण भारत है।

इसलिये जयशंकर की सबसे बड़ी चुनौती इन छोटे लेकिन सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इन
पड़ोसी देशों में जिंम्मेदार भारतीय राजनयिक विश्वास बहाल करते हुए उन्हें यह बताया जाय कि वे तथाकथित “बिग ब्रदर” सिंड्रोम से ऊपर उठते हुए समावेशी विकास के लिये साथ मिलकर कदम उठाएं। दक्षिण एशिया में चीनी प्रभाव पर अपनी धूमिल हो रही कूटनीतिक प्रतिष्ठा को वापस लाना इनकी पहली प्राथमिकता होगी।

सरकार का पहला संकेत ‘नेबरहुड फर्स्ट’

संभवतः इसी मंशा के साथ उन्होंने आगामी सात जून से प्रस्तावित उनकी पहली विदेश दौरे के रूप में भूटान को चुना है, वहीं प्रधानमंत्री ने मालदीव और श्रीलंका को अपनी “नेबरहुड फर्स्ट” नीति के तहत चुना है। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी का यह कथन “आप सब कुछ बदल सकते है लेकिन अपना पड़ोसी नहीं” आज भी चरितार्थ करती है।

मौजूदा धरातल पर भारत-अमेरिकी संबंधों को ‘री सेट’ करना बेहद जरूरी

सबसे बड़ी चनौती भारत और अमेरिका के सम्बन्ध को “री सेट” करना है। ट्रम्प प्रशासन की भृकुटि उस समय से तनी हुई है, उसकी दिमाग की नसें बुरी तरह दुख रही है जब से भारत ने अपने सबसे विश्वसनीय सामरिक साझेदार रूस के अत्याधुनिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम एस 400 सौदे को अमेरिकी कॉउंटरिंग अमेरिका एडवेरसरिज थ्रू सैनक्शन्स एक्ट (CAATSA) के प्रावधान को दरकिनार करते हुए अंतिम रूप दिया। यह अमेरिकी प्रावधान रूस ,ईरान और उत्तरी कोरिया के साथ सामरिक खरीददारी को प्रतिबंधित करता है। दूसरा भारत ने अमेरिकी प्रतिबंध से घिरे ईरान के साथ कच्चे तेल आयात को मई तक बरकरार रखा। लेकिन दोनों देशों के बीच सबसे बड़ी समस्या आपसी विश्वास को बहाली को लेकर है। डब्लूटीओ में अमेरिकी वर्चस्व में सुधार, भारत और अमेरिका के बीच कई फ़ोकस एरिया में से एक है जिसमे दोनों देशों की समान हित जुड़े हुए हैं। इसमे अफ़ग़ानिस्तान, इंडो पैसिफिक, श्रीलंका, दक्षिणी चीन सागर में निर्बाध नौवहन आदि प्रमुख हैं जिसमे दोनों देशों के बीच सहयोग की आवश्यकता है।

भारत और अमेरिका के बीच के रणनीतिक समझौते में सबसे पहले 2002 में सामान्य सुरक्षा सैन्य सूचना समझौता [General Security of Military Information Agreement (GSOMIA), 2016] में लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज ऑफ मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट [Logistic Exchange Memorandum of Agreement(LEMOA)] और हालिया communication Compatibility and Security Agreement (COMCASA) शामिल है।

अंतिम समझौते के रूप के भू-स्थानिक सहयोग हेतु बुनियादी विनिमय और सहयोग समझौता [Basic Exchange and Cooperation Agreement For Geo Spatial Cooperation(BECA) के मसौदे पर बातचीत जारी है जिसे पूर्ण कर सम्पूर्ण रणनीतिक साझेदारी को पूरा करने का अंतिम जिम्मा भी जयशंकर के कंधों पर ही होगा।

इन समझौतों की बात इसलिए कि जा रही है क्योंकि आने वाले दिनों में युद्ध स्वरूप बदल जायेगा जिसे स्पेक्ट्रम वारफेयर के रूप में देखा जाएगा और सशस्त्र बलों के लिए सारा दारोमदार इनके सुरक्षित और एन्क्रिप्टेड संचार उपकरण जिसे High End secured Encrypted communication Equipments कहा जाता है, पर होगी।

भारतीय सैन्य बलों द्वारा अमेरिका से प्राप्त इन संचार उपकरणों को अमेरिकी प्लेटफॉर्म पर लगाया जाएगा जिसमे C -130 J super Hercules, भीमकाय C-17 ग्लोबमास्टर, समुद्र में लंबी निगरानी करने और पनडुब्बी रोधी वारफेयर में अव्वल Poisiden 8 विमान, सुपर हैवी लिफ्टर हेलीकाप्टर चिनूक , और अत्याधुनिक अपाचे हेलीकॉप्टर शामिल होंगे।

रूस : एक टाइम टेस्टेड फ्रेंड

भारत के पारंपरिक, नैसर्गिक मित्र राष्ट्र रूस के साथ आने वाले समय मे सम्बन्ध सुधारना बेहद जरूरी है। बदले हुए पुतिन के रूस को आज महज “ग्लासनोस्त और पेरेस्त्रोइका” के चश्मे से देखना किसी भी देश के लिए निश्चित रूप से “माराडोना गोल” साबित होगा। कनेक्ट सेंट्रल एशिया पॉलिसी, अश्गाबात समझौता, चीनी बीआरआई कि काट आईएनएसटीसी समझौता, यूरेशियन इकनोमिक यूनियन के अतिरिक्त सामरिक, विज्ञान प्राद्योगिकी, अन्तरिक्ष और सैन्य क्षेत्र सहयोग के मामले में रुस देश हमारा सबसे विश्वसनीय और “टाइम टेस्टेड फ्रेंड” है। इसका विश्वास महज अमेरिकी आर्थिक दवाब में आकर नहीं तोड़ा जा सकता है।

अमेरिका ने काँउटरिंग अमेरिका एडवर्सिरीज थ्रू संक्शन्स एक्ट (CAATSA) के प्रावधानों के तहत रक्षा और आसूचना क्षेत्र की कमोबेश सभी महत्वपूर्ण 39 रूसी इकाइयों के अधिसूचित करते हुए भारत सहित किसी तीसरे पक्ष से सम्बन्धित किसी तरह के क्रय विक्रय को पूरी तरह प्रतिबंधित किया है। इनसे भी चुनौती पाना इनके लिए कठिन होगा और रूसी विश्वास को नहीं डिगने देने की पूरी जिम्मेदारी विदेशमंत्री और इनकी टीम की रहेगी।

हिन्द महासागर और इसके आसपास के क्षेत्रों में कहें कि बढ़ती लालसा और दक्षिण चीन सागर में उच्च विकासदर की लालसा और अपनी ऊर्जा सुरक्षा और नवउपनिवेशक मानसिकता वाले चीन की आक्रामक नौसैनिक तैनाती और हिन्द महासागर में “पनडुब्बी टैक्टिस”, स्ट्रिंग आफ पर्ल्स और डेब्ट एंड चेकबुक डिप्लोमेसी के घातक त्रिकोणात्मक हथियार के साथ प्रवेश, जिसे किसी भी सूरत ए हाल में मंजूर नहीं किया जा सकता है, यह भारतीय संप्रभुता के लिए गंभीर चनौती है।

आर्थिक सामरिक दृष्टि से ईरान भी जरूरी

ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच जारी “हॉरमुज़ संकट “और उस पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों के बाद भारतीय ऊर्जा सुरक्षा तैयारियों को गंभीर झटका लगा है। ऊर्जा सुरक्षा किसी भी देश की आर्थिक आधार की मेरुदण्ड होती है। इसकी निर्बाध आपूर्ति किसी भी देश का मूलाधिकार है। ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध से भारत को व्यापक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। इसके अतिरिक्त पाकिस्तान को पूरी तरह अलग थलग करते हुए अफगानिस्तान तक सीधी और व्यापक पहुँच के लिए ईरान का चाबाहार बन्दरगाह भारत के लिए सामरिक, आर्थिक और भू राजनीतिक तौर पर बेहद अहम है।

खाड़ी सहयोग परिषद में पाकिस्तान की खुरपेंच

मध्य एशिया हमारे लिए बेहद अहम है। पाकिस्तान की कुटिल कूटनीति तो खाड़ी सहयोग परिषद में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के समक्ष एक नहीं चली, पर पाकिस्तानी ऐतिहासक रूप से निकृष्टतम और नकारात्मक कूटनीतिक के लिए जाने जाते है इसलिए वे चुप तो नहीं बैठेंगे इसलिए पाकिस्तानी मोर्चे को अरब और खाड़ी देशों में मात देना भी विदेश विभाग के जिम्मे ही होगा।

दक्षिण एशिया और अफ्रीका में फैल रहे चीन ड्रैगन के जहर की पक्की काट भी विदेशमंत्री के हाथों में होगी। सरकार की अतिमहत्वाकांक्षी “नेबरहुड फर्स्ट “और “एक्सटेंडेड नेबरहुड” की नीतियों को प्रभावी अमली जामा पहनाना ,”इंडो पैसिफिक क्षेत्र “बिम्सटेक और” क्वाड” की अवधारणा पर चीनी चुनैतियों को मूर्तरूप भी देना है ।

वहीं ब्रिक्स में जोहसन्सबर्ग घोषणा से आगे बढ़ना, इब्सा और आरआईसी के साथ व्यापक सहयोग को बढ़ाना जयशंकर के लिए चुनौतियों की फेहरिस्त में शामिल है।

जी 20 , शंघाई सहयोग संगठन जिसकी हालिया बैठक आगामी सप्तांहत में शुरू हो जाएगी, यह विदेशमंत्री तौर जयशंकर का पर पहला लिटमस टेस्ट होगा।

शंघाई सहयोग संगठन जो आठ सदस्यी यूरेशियन आर्थिक राजनीतिक और सामूहिक सुरक्षा संगठन है। इसमें विश्व की करीब 40 फीसद जनसंख्या और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का 20 फीसदी, इस क्षेत्र से आता है जो भौगोलिक वितरण और जनसंख्या के लिहाज से इसे विश्व का सबसे बड़ा क्षेत्रीय संगठन के रूप में ख्याति प्रदान करता है। इसके चार्टर में युक्त शब्द “शंघाई स्पिरिट ” के जद आते हुए भी पाकिस्तान को आमने सामने सामूहिक बैठकों के वावजूद अगर वे पाकिस्तान को “कूटनीतिक तौर” पर अलग थलग करने में सफल हुए तो भारतीय राजनय की बड़ी सफलता मानी जायेगी।

यूरोपीय यूनियन,पता नहीं क्यों थोड़ा मुर्झाया हुआ प्रतीत होता है, उसे भी सामरिक और आर्थिक मोर्चे पर विश्वास में लेना होगा।

‘जयशंकर एक मंझे हुए पेशेवर जिन्हें अपनी बात मनवाना आता है’

अगर विदेश मंत्री के राजनयिक कार्यकाल का सूक्ष्म अवलोकन किया जाय तो जयशंकर को अमेरिकी, रूसी और चीनी अधिकारियों के साथ कूटनीति पींग बढ़ाने में माहिर समझा जाता हैं, वे बेहद मंझे हुए पेशेवर की तरह की अपनी बात मनवाने के लिये जाने जाते है ।

अपने कैरियर की शुरुआती दौर में तत्कालीन सोवियत संघ (अब वर्तमान का रूस) में कार्य की शुरूआत करना ही इनकी प्रतिभा को दर्शाता है। किसी मूल रूसी की तरह धारा प्रवाह रूसी बोलना इनके कार्य के और बेहतर बना देता है।

कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के पहले चरण में “न्यूक्लियर डील” और लद्दाख के देपसांग में चीन के अतिक्रमण और राजग सरकार के बीते कार्यकाल में डोक ला (डोक लाम) स्टैंडऑफ़ विवाद को कूटनीतिक बिसात पर जिस चपलता के साथ इन्होंने शह-मात की कूटनीति खेली और विकराल होते हुए मसले को पूरी तत्परता के साथ सुलझाया, पूरी दुनिया उनके इस कार्य की कायल हो गयी। इस सुलझाव से उन्होंने 21वीं सदी में निश्चित तौर पर कूटतनीति को वह स्थान दिलाया जो विगत कुछ दशक पहले तक भू राजनीति/सामरिकी ने ले रखा था। जिसे कम से कम इन तीन मसलों पर विश्व ने देखा और महसूस किया।

शासन प्रशासन की समझ जयशंकर को पारिवारिक विरासत में मिली है। दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफंस कॉलेज से स्नातक जयशंकर ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति विज्ञान की स्नातकोत्तर और परमाणु कूटनीति में एम.फिल की उपाधि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से प्राप्त की। 1977 के भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी के रूप मे देश सेवा किया। उनके पिता के. सुब्रह्मण्यम को देश के अग्रणी रणनीतिक विश्लेषक और परमाणु कूटनीति के पुरोधा के रूप में ख्याति प्राप्त है उन्हें “परमाणु शक्ति और आयुध का प्रबंध करने” और “पहले उपयोग न करने की नीति “(No First Use) नीति को तैयार करने का श्रेय दिया जाता है।

चीनी भी हैं ‘सू जिइशेंग’ की प्रतिभा के कायल

चीनी जयशंकर के प्रतिभा के इस क़दर कायल हैं कि उनके चीनी समकक्ष उन्हें चीनी नाम सू जिइशेंग (जिसे जि शांग पढ़ा जाता है) से बुलाते है। मंदारिन में इसका अर्थ होता है “बेहतरीन विद्यार्थी” (एक्सीलेन्ट स्टूडेंट)। अब जब वे अपने चीनी समकक्ष के साथ आने वाले बैठक में शरीक होंगे तो उनका दर्ज़ा अधिकारी और राजनेता से आगे निकलते हुए राजनयिक राजनेता के रूप में अपनी बात से वांग ई को अवगत कराएंगे। ऐसा तब होगा जब जयशंकर चीनी नहीं बोलते। चीन में राजदूत रहे उनके पूर्ववर्ती अशोक कंठ, गौतम बम्बावले और वर्तमान विदेश सचिव विजय गोखले बेहतर मंदारिन भाषी रहे हैं। पर बीजिंग इस बात से भली भांति परिचित है कि यह “बेहतरीन विद्यार्थी” चीनी कूटनीति को बेहतर तरीके से समझता है । तभी तो अमेरिकी समाचारपत्र वाशिंगटन पोस्ट जयशंकर के विदेशमंत्री के रूप में शपथ लेने पर टिप्पणी करता है कि “अब भारत पहले से कहीं ज्यादा मजबूती के साथ अंतरराष्ट्रीय/वैश्विक मंचो पर अपनी मज़बूत और प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराएगा”

कर्ण भास्कर
(लेखक अंतर्राष्ट्रीय और रक्षा मामलों के जानकार हैं। संप्रति डीडी न्यूज़ से संबंद्ध हैं।)

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