सेहत का मारा ‘बाबा’ की पतंजलि

रानी मिश्रा
देहरादून

दुनिया में आयुर्वेद को अकाट्य इलाजी आयामों के रूप में स्थापित करने का दम भरने वाले बाबा रामदेव की पतंजलि की आर्थिक सेहत उस बीमारू उद्योग की तरह है जिसे आर्थिक मकड़जाल से निकालने के लिए सरकार से लेकर न्यायालय तक को मशक्कत करनी पड़ती है।

यह बात कोई और नहीं बल्कि देश की नामी गिरामी रेटिंग एजेंसियां कह रही हैं। अगर इन पर भरोसा किया जाए तो लगता है कि पतंजलि आर्थिक रूप से उसी कोमा की मार झेल रही है जिस तरह विरोधियों थपेरे को केंद्र सरकार देश की आर्थिक सेहत को लेकर झेल रही है।

देश की एक स्थापित रेटिंग एजेंसी ‘केयर’ अपनी रिपोर्ट में लिखता है, ‘एक ब्रांड के रूप में पतंजलि दो व्यक्तियों स्वामी रामदेव व आचार्य बालकृष्ण की छवि पर निर्भर है। हालांकि 2012 के दौरान केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने तो बालकृष्ण के खिलाफ एक मामला दर्ज कर इस ब्रांड पर ही ग्रहण लगा दिया था। अभी तक इस मामले की जांच में उनके खिलाफ कोई नकारात्मक तथ्य सामने नहीं आए हैं लेकिन इस मामले से कंपनी की साख को तो बट्टा लग ही गया क्योंकि कंपनी के सर्वेसर्वा में से एक खिलाफ मामला दर्ज होने से बाजार में कंपनी प्रतिष्ठा को प्रत्यक्ष आंच से रूबरू होना पड़ा है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि पतंजलि में नीति को तय करने वाले ही तय नहीं कर पा रहे हैं कि कंपनी के आर्थिक हालात को सुधारने के लिए अपनाए जाने वाले नियामकों को तय किसे करना है। नहीं तो शायद 2017 के दौरान नेपाल सरकार को को इसके 6 उत्पादों को बाहर का रास्ता नहीं दिखा देती। इतना ही नहीं, इसी अवधि के दौरान सूचना अधिकार अधिनियम के तहत दिए गए आवेदन के जवाब में जानकारी नहीं मिलती कि पतंजलि सहित 40 फीसदी आयुर्वेद उत्पादों को हरिद्वार स्थित आयुर्वेद व यूनानी कार्यालय ने मानक से नीचे पाया है। इस क्रम में यह भी जानकारी मिली थी कि पतंजलि उत्पादित दिव्य आंवला जूस व शिवलिंगी भी मानक पर खरे नहीं उतरे। इतना ही नहीं, आंवला जूस के अ-मानकीकरण के बाद सेना के कैंटीन स्टोर ने भी इस उत्पाद की बिक्री को अपने यहां निलंबित कर दिया था।

हालांकि पतंजलि की साख, बाजार में इनके उत्पादों के स्थायित्व व इसके गड़बड़झाले की तह में जाने के लिए रेटिंग एजेंसी ‘केयर’ द्वारा इस कंपनी के बारे में दी गई जानकारी पर गौर करने की जरूरत है। एजेंसी की ओर से पिछले 04 अक्टूबर जारी रेटिंग रिपोर्ट में कंपनी की रेटिंग ए-निगेटिव दिखाया गया है। हालांकि इसके पूर्व के रिपोर्टों में इसकी रेटिंग कमोबेश ए-पॉजिटिव थी। पतंजलि की रेटिंग पॉजिटिव से एकाएक निगेटिव तक आने की पटकथा के पीछे पतंजलि द्वारा इंदौर स्थित उद्योग सोया इंडस्ट्रीज लिमिटेड के अधिग्रहण की कहानी है जिसने पतंजलि की आर्थिक साख को बाजार में हिलाकर रख दिया। इसमें पतंजलि की अकूत पूंजी को अधिग्रहण में झोंक दिया गया।

केयर की उक्त रिपोर्ट में कहा गया है कि रेटिंग में समीक्षा की जरूरत इसलिए है कि अब पतंजलि समूह की सबसे बड़ी कंपनी पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड से पूंजी का प्रवाह अब पतंजलि कंसोर्टियम अधिग्रहण प्राइवेट लिमिटेड की तरफ होगा क्योंकि कंसोर्टियम का गठन ही सोया इंडस्ट्रीज के अधिग्रहण के उद्येश्य से किया गया है। साथ ही एनसीएलटी के आदेशानुसार इस अधिग्रहण पर 4350 करोड़ रुपये का निवेश करना पड़ेगा जबकि पिछले 31 मार्च को पतंजलि की खुद का सामर्थ्य महज 2873 करोड़ रुपये का था। रेटिंग रिपोर्ट यह भी कह रहा है कि सोया इंडस्ट्रीज के महाअधिग्रहण एक विशालकाय पहाड़ की तरह है क्योंकि इस महाअधिग्रहण में पतंजलि की देनदारी इसकी खुद की क्षमता का 151 फीसदी है। रिपोर्ट के मुताबिक इस हिसाब से पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड इस अधिग्रहण को गारंटी देने की स्थिति में नहीं है। फिर इसी रेटिंग एजेंसी की ओर से पिछले 17 अक्टूबर को जारी रिपोर्ट के मुताबिक पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड रेटिंग वही ए-निगेटिव है। इस रेटिंग को समर्थन देने वाले कारकों में रुचि सोया के अधिग्रहण व कंपनी के प्रमोटर आचार्य बालकृष्ण की छवि को ही दर्शाया गया है।

हालांकि 24 अक्टूबर को जारी केयर की रेटिंग रिपोर्ट में तो पूरा परिदृश्य ही बदल जाता है। यद्यपि एजेंसी रेटिंग को ए-निगेटिव पर ही रखती है लेकिन इस मुतलिक एजेंसी की टिप्पणी से स्पष्ट है कि कंपनी ने इस मामले में कोई खेल जरूर किया। रिपोर्ट के मुताबिक कंपनी की ओर से पिछले 22 अक्टूबर को एक ई-मेल कंपनी की तरफ से एजेंसी को भेजा गया जिसे एजेंसी ने अनापत्ति प्रमाण-पत्र की तरह माना। साथ ही एजेंसी ने इस रिपोर्ट में कहा है कि कंपनी के संदर्भ में एजेंसी अपनी ए-निगेटिव रिपोर्ट वापस ले ली है।

अब इस कहानी का पटाक्षेप पिछले 19 दिसम्बर को रुचि सोया इंडस्ट्रीज लिमिटेड की ओर से शेयर बाजार को दी गई जानकारी से हो जाता है जिसमें कहा जाता है कि नेशनल कंपनी लॉ ट्रायबुनल की ओर से पिछले 24 जुलाई व 4 सितम्बर को स्वीकृत समाधान प्रस्ताव के मुताबिक पिछले 18 दिसम्बर को रुचि सोया के अधिग्रहण की कार्रवाई पूरी कर ली गई है। इसके तहत पतंजलि कंसोर्टियम अधिग्रहण प्राइवेट लिमिटेड का सम्मिलन सोया इंडस्ट्रीज लिमिटेड के साथ हो गया है। अब सोया में पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड, दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट, पतंजलि परिवहन प्राइवेट लिमिटेड व पतंजलि ग्रामोद्योग न्यास रुचि सोया इंडस्ट्रीज में हिस्सेदार होंगी।

शेयर बाजार को दी गई उक्त जानकारी में यह भी कहा गया है कि रुचि सोया के निदेशक मंडल में भी बदलाव किया गया है। इसमें आचार्य बालकृष्ण तीन साल के लिए अध्यक्ष व प्रबंध निदेशक बनाया गया है। स्वामी रामदेव इसके अ-कार्यकारी निदेशक हैं। साथ ही इसमें मीडिया जगत से जुड़ी नामी गिरामी हस्ती व इंडिया टीवी के अध्यक्ष व मुख्य संपादक रजत शर्मा भी तीन सालों के लिए स्वतंत्र निदेशक बने रहेंगे। साथ ही शर्मा कंपनी के तीन कमेटियों नॉमिनेशन एंड रिन्यूमरेशन कमेटी, कॉरपोरेट सोशल रेस्पांसिबिलिटी कमेटी व स्टेकहोल्डर्स रिलेशनशिप कमेटी के अध्यक्ष व सदस्य बनाए गए हैं।

हालांकि इस मामले में पतंजलि की ओर से कोई कुछ बोलने के लिए तैयार नहीं है। कंपनी के प्रवक्ता एसके तिजोरीवाला कभी फोन ही नहीं उठाते लेकिन जब इस संवाददाता ने आचार्य बालकृष्ण के निजी सहायक गगन से बात की तो उन्होंने कहा कि वह इसके बारे में कुछ नहीं बोल सकते।

दूसरी तरफ इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता महमूद पराचा का कहना है कि पतंजलि मोदी सरकार की मुखौटा कंपनी है जिसे केन्द्र सरकार का खुला समर्थन है। पराचा ने बताया कि पतंजलि की कमाई को अरब देशों में भेजा जा रहा है जबकि पतंजलि के प्रमोटर आयुर्वेद व स्वदेशी की बात करते हैं लेकिन पतंजलि के उत्पादों में आयातित पदार्थों की बहुतायत है। पराचा ने यह भी बताया कि बाबा रामदेव से अच्छा योग तो प्रयागराज की श्रुति करती है। बाबा रामदेव तो केंद्र सरकार व आरएसएस के एजेंट हैं। पतंजलि के सभी नकली उत्पाद हैं। इनके उत्पादों में विदेशी आयातित पदार्थों का प्रयोग किया जाता है।

हालांकि इस कड़ी में एक और कहानी कहने की जरूरत है और वह है पतंजलि के कर्मियों व कुछ दलालों की ओर से किया जा रहा पतंजलि के विज्ञापन का खेल। इसमें कंपनी के कुछ पुराने कर्मी, मौजूदा कर्मी व कुछ दलालों के बीच मिलीभगत की आशंका है। हाल ही में पतंजलि का एक विज्ञापन एक मीडिया घराने के संवाददाता को मिली लेकिन बाद में पता चला कि वह विज्ञापन फर्जी था जब कंपनी से उस मीडिया घराने ने पूछा तो गोलमोल जवाब आया कि विज्ञापन फर्जी है। विज्ञापन देने वाले व्यक्ति कभी अपने को पतंजलि का वाइस प्रेसिडेंट बताता है तो कभी वह अपने को अनपढ बताता है।

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