बिहार: समाज दुरावस्था में है… लेकिन पग-पग पर महान गौरव गाथा के चरण चिन्ह दबे हैं

  • अंधरा ठाड़ी, मधुबनी से वाचस्पति मिश्र और भामती की प्रेरक कथा
  • आदि शंकराचार्य के ‘ब्रह्मसूत्र’ के सर्वमान्य भाष्य ‘भामती’ की कथा

✍अनुपम के सिंह
📷 राकेश कुमार झा,ग्राम-अंधरा ठाढ़ी , मधुबनी

“देवी, आप कौन हैं?”- सतत अध्ययन व लेखन में रत मैथिल ब्राह्मण ने जैसे ही अपने घर में एक महिला को देखा, वो चौंक गए।

“मैं भामती हूँ, देव।”- सुशील नारी ने जल्दी-जल्दी बुझे हुए दीए में तेल डालते हुए बताया। वो अचानक से हड़बड़ा गई थी।

“भामती? कौन भामती?”- मधुबनी के विद्वान ब्राह्मण ने महिला से पूछा।

आसपास लगे पुस्तकों, पन्नों और दस्तावेजों के ढेर को निहारते हुए भामती ने कहा- “मैं.. आपकी पत्नी हूँ देव। आज से 36 वर्ष पूर्व हमारा विवाह हुआ था।” उसे लगातार ये चिंता सता रही थी कि आज उससे ऐसी क्या चूक हो गई कि इस तपस्वी की कार्य में बाधा पड़ गई, दीपक कैसे बुझ गया और उसका ध्यान भी नहीं पड़ा!

इधर लेखक को भी याद आ गया गया कि उसकी भी कोई अपनी कहानी है, एक जीवन है। “अच्छा भामती…अरे बचपन में ही तो हो गया था न हमारा विवाह। क्षमा करना, याद नहीं रहा।” लेखक को अपने पतिधर्म की विफलता से उपजी व्यथा सताने लगी। उनकी आंखों में आँसू आ गए। 36 सालों से उनकी नज़रें पुस्तकों से हटी ही नहीं और कोई है जो इस दौरान उनकी सेवा करता रहा, अनवरत।

“आप तो जनकल्याण में लगे हैं देव। आपने योगाभ्यास और सांख्यकारिका से लेकर न्यायसूत्र और वेदांत तक पर अगणित टीकाएँ व भाष्य लिखे हैं। जग के लिए सोचने वाला अगर किसी एक को समय न भी दे पाया हो तो इसमें समस्या कहाँ है?”- भामती भलीभाँति जानती थी कि उनके पति को सम्बल कैसे देना है।

एक महान विद्वान भला उस महिला के मन को कैसे न भाँप पाता? ये एक ऐसा रिश्ता था, जो परिचय तक का मोहताज नहीं रहा। लेकिन चला, दशकों चला। एक के कठोर तप और दूसरे के निःस्वार्थ त्याग की बदौलत चला। अंधराठाढ़ी गाँव की उस धरती को पुरस्कृत करते हुए वाचस्पति मिश्र ने तत्क्षण ऐलान किया:

“मैं सालों से जगद्गुरु रचित ब्रह्मसूत्र के इस भाष्य को तैयार करने में लगा हूँ। इस बृहद अध्ययन के परिणाम का समय आ पहुँचा है देवी।”

इतना कह कर वाचस्पति मिश्र ने अपनी उस पुस्तक का नामकरण करते हुए उसके ऊपर लिखा:

“भामती”

एक की कृति और दूसरे की कीर्ति- दोनों ही अमर हो गई। आदि शंकराचार्य के ‘ब्रह्मसूत्र’ का सर्वमान्य टीका वही हो गया। सदा के लिए। इधर दीपक जल उठा… ब्राह्मण फिर व्यस्त हो गए… न जाने कब तक के लिए…

पुनश्चः-

अभी फरवरी के प्रथम सप्ताह में संयोगवश ऐसे महान ग्रंथों के रचियता की जन्म स्थली अंधरा ठाड़ी जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। 36 वर्षों तक अनवरत साधना कर श्री मिश्र ने तत्त्ववैशारदी, तत्त्वकौमुदी , न्यायसूची निबन्ध , न्यायवार्तिकतात्पर्यटीका , न्याय कणिका , भामती , तत्त्वसमीक्षा , ब्रह्मसिद्धि और शब्दतत्त्व तथा शब्दबोध पर आधारित लघु ग्रन्थ तत्वबिन्दु जैसे महान ग्रंथों की रचना की। 😢आज उस स्थली पर कोई एक दीपक जलाने वाला नहीं है। सरकार ने जरूर भवन तथा स्मारक बनाकर नेक कार्य किया है । उनकी जन्म जयंती पर कुछ छोटे-मोटे कार्यक्रम भी हो जाते हैं। लेकिन हर कुछ सरकार के कंधों पर डालकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेने वाला समाज शायद स्वार्थों में इतना लिप्त हो चुका है कि उसे अपनी गौरव गाथा का बिल्कुल भी कोई भान नहीं है। शेष चित्रों से आप स्वयं दुरावस्था समझ सकते हैं।

(साभार: संस्कार भारती, बिहार)

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