ब्रेजोस से साबरमती : भारत, अमेरिका सम्बन्धों के नए सफर पर

भास्कर

“मैं यहां एक मित्र के रूप में आया हूँ और भारत के 18 करोड़ मित्रों की ओर से बोल रहा हूँ। कई वर्षों की अपनी कामना को साकार करते हुए में व्यक्तिगत रूप से भारतीय जनता के प्रति अमरीका का अभिवादन प्रस्तुत करता हूँ और भारतीय संस्कृति, उनकी प्रगति, उनकी शक्ति का अभिवादन करता हूँ। सम्पूर्ण मानवता इस राष्ट्र की ऋणी है”

10 सितंबर 1956 भारत की संसद को संबोधित करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहॉवर के शब्द

साबरमती नदी के किनारे बसे अहमदाबाद के मोटेरा में विशाल और खचाखच भरे क्रिकेट स्टेडियम में राष्ट्रपति ट्रम्प ने भी कुछ इसी अंदाज में भारतीयों के प्रति अपनी मन की बातों को सामने रखा।

स्वन्त्रता पश्चात इन अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत का दौरा किया है जिसमें आइजनहावर (1959), रिचर्ड निक्सन (1969), जिमी कार्टर (1978) के बाद करीब दो दशक के बाद क्लिंटन, जॉर्ज बुश, बराक ओबामा और फिर डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत की राजकीय यात्रा की। अमेरिका की अर्थव्यवस्था करीब 21 ट्रिलियन डॉलर है, जो कि भारत से करीब सात गुना अधिक है। इस भीमकाय अर्थव्यवस्था वाले अमेरिकी मुखिया का सपरिवार भारत के सफल दौरे को कूटनीतिक और रणनीतिक गालियारों में भू:आर्थिक, सामरिक और रणनीतिक दृष्टि से अतिमहत्वपूर्ण घटना के रूप में देखा जा रहा है।

पाइवोट ऑफ एशिया 2.0, इंडो पैसेफिक और क्वाड की त्रिकोणीय संकल्पना, चीन-पाकिस्तान, मलेशिया और तुर्की के भारत के प्रति कुटिल चतुष्कोणीय गठजोड़, जो हिन्द महासागर के गहरे समुद्र में गुपचुप गस्त लगते चीनी स्टील्थ पनडुब्बी, व्यापार और विश्व मंचो पर जहर उगलते एर्डोगन के बयान के बीच #नमस्ते ट्रम्प ” गाहे बगाहे ही सब कुछ कह सुन कर वापस जाने में सफल रहे। कोरोना वायरस के जद में आये दक्षिण पूर्वी एशिया में राष्ट्रपति ट्रम्प ने भारत आकर भारत के प्रति अपनी लगाव को जग-जाहिर कर दिया। 2019 में ब्रेजोस नदी पर बसे ह्यूस्टन के एनआरजी स्टेडियम में बीते 24 सितम्बर को भव्य हॉउडी मोदी कार्यक्रम के बाद दोनों देशों के प्रमुखों के बीच पहली उच्चस्तरीय वार्ता थी।

अमेरिका फर्स्ट के अगुवा ट्रम्प बेबाक और बेलाग हैं। चीन से हुए ट्रेड वॉर और उससे हुई अमेरीकी ट्रेजरी के नुकसान, लगातार अस्थिर होते निवेश बाजार, स्टील और एल्युमीनियम और भारत के साथ टैरिफ वारफेयर, जीएसपी मसले पर भारत से रार, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में तेजी से बदलते राजनीतिक सुर सामरिक हालात और फ्रीडम ऑफ नेविगेशन मसले पर चीन की आक्रमक रवैये ने दुनिया के इस पुलिसमैन को जॉन फॉस्टर डलेस की नीति “जो हमारे साथ नहीं वह हमारे विरुद्ध है” सिद्धान्त के विपरीत इस वक़्त विभिन्न मोर्चे पर भारत के साथ काम करने को प्रेरित किया है।

प्रसिद्ध राजनीति विज्ञानी स्टेंली हॉफमैन का मानना था कि “सभी प्रमुख देशों में से भारत ही एक मात्र ऐसा देश है जिसके साथ संयुक्त राज्य के संबंध उलझन पैदा करने वाले रहे हैं”। मौजूदा दौर में भी गाहे बगाहे उनकी बात सत्य हो ही जाती है। अमेरिकी शीर्ष नेतृत्व को चाहिए कि हॉफमैन की बातों को खारिज़ करें।

प्रसिद्ध राजनीति विज्ञानी स्टेंली हॉफमैन का मानना था कि “सभी प्रमुख देशों में से भारत ही एक मात्र ऐसा देश है जिसके साथ संयुक्त राज्य के संबंध उलझन पैदा करने वाले रहे हैं”। मौजूदा दौर में भी गाहे बगाहे उनकी बात सत्य हो ही जाती है। अमेरिकी शीर्ष नेतृत्व को चाहिए कि हॉफमैन की बातों को खारिज़ करें।

भारतीय विदेश नीति : पंचशील से पंचामृत तक अनवरत सफर

2014 के मई में भारतीय राजनीति में तकरीबन तीन दशक के बाद एक स्थायी सरकार ने मूर्त स्वरूप लिया। परम्परागत भारतीय विदेश नीति जवाहर लाल नेहरू की पंचशील और गुटनिरपेक्षता की नीति से कहीं आगे निकलते हुए अपने यथार्थवादी स्वरूप “पंचामृत” (सम्मान, संवाद, समृद्धि, सुरक्षा और संस्कृति एवं सभ्यता) को प्राप्त कर रही है जो भारतीय विदेश नीति के नए आधार स्तंभ होंगे।

भारतीय मनीषी परम्परा में पंचामृत का अर्थ है पांच अमृत। दूध, दही, घी, शक्कर और शहद से मिलकर तैयार होता है पंचामृत जो मंदिरों पर विशेष अवसरों पर चढ़ाया जाता है और इसका प्रसाद स्वरूप वितरण किया जाता है। इसी कड़ी में भारत के महाशक्तियों के साथ सम्बन्ध, “नेबरहुड फर्स्ट” इंडो पैसिफिक डॉक्ट्रिन, आतंकवाद पर जीरो टॉलरेन्स की नीति, छोटे और द्वीपीय देशों के साथ आत्मीय संबंध, अफ्रीका के लिए संवेदनशील नीति, पर्यावरण और संपोषणीय विकास और संघर्षों में शामिल देशों के लिए सॉफ्ट पॉवर डिप्लोमेसी के जरिये भारत की छवि अंतरराष्ट्रीय मंचो पर एक जिम्मेदार राष्ट्र की बनी है।

वर्तमान सरकार की विदेश नीति की प्राथमिकता आर्थिक विकास और भू-आर्थिकी और ऊर्जा सुरक्षा के त्रिकोणीय क्षेत्र को प्राथमिकता दे रही है को गति देते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा में सुधार करना जिससे भविष्य में भारत की स्थितिगत और क्षेत्रगत स्थिति में वृद्धि हो। इस सरकार की विदेश नीति में साइबर सुरक्षा ऊर्जा समुद्री सुरक्षा, पड़ोसी देशों के साथ सहयोग, क्षेत्रीय सहयोग, महत्वपूर्ण हैं।

भारत अमेरिका के बीच उभरते व्यापारिक साझेदारी के अतिरिक्त रणनीतिक साझेदारी का एक महत्वपूर्ण बिंदु है, दोनो देश के बीच आतंकवाद निरोधक सहयोग का बढ़ना। दोनो देश नागरिक केन्द्रित पहलू को प्राथमिकता देते हुए उनकी रक्षा और सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं। क्षमता निर्माण और आसूचनागत तथ्यों का आदान प्रदान इसी कड़ी का हिस्सा है।

अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मंचो पर पहले पाकिस्तान की छवि झूठे, चालबाज़ और मक्कार के रूप में थी जो वर्तमान में बदलकर बेहया, बेशर्म, पतित और निर्लज्ज हो चुकी है। भारत को चाहिए कि पाकिस्तान के साथ उसके सहयोगी देशों जैसे तुर्की, मलेशिया को भी विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचो पर उसकी क्रियाकलापों को पूरी निष्ठुरता के साथ जवाब दें और उनपर “अन्य सभी कार्रवायी” के विकल्प हरदम खुले रखें। साथ ही अमेरिका को चाहिए कि पाकिस्तान और उसके सहयोगी देशों द्वारा भारत के खिलाफ अनर्गल, बेबुनियाद और तथ्यों से परे आरोपों और भारत में आतंकवाद के मसले पर “घोड़े गधे और खच्चर” के बीच फ़र्क़ महसूस करे अन्यथा उसकी कही तमाम बातें महज कोरी की कोरी रह जाएंगी।

ड्रैगन फैक्टर: तीन अरब डॉलर का रक्षा सौदा

अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी का मानना था कि “भारत और चीन का संघर्ष केवल सीमा संघर्ष नहीं हैं, अपितु यह तो एशिया के नेतृत्व का संघर्ष है, बल्कि साम्यवाद और प्रजातांत्रिक समाजवाद के बीच संघर्ष है, इसलिए इस संघर्ष में भारत में भारत की पूरी सहायता करनी चाहिए। ” ट्रम्प को भी केनेडी की बात का ध्यान रखना चाहिए और भारत के साथ उसके “हितों के अनुरूप” रक्षा उपकरण सौदे को मूर्त रूप देना चाहिए।

फिलहाल तीन अरब डॉलर के रक्षा सौदे के तहत भारत एडवांस मिलिट्री इक्विपमेंट सिस्टम के साथ छह अपाचे और 24 एमएच-60 रोमियो हेलीकॉप्टर अमेरिका से खरीदेगा। जिसे नौसेना के पुराने पड़ चुके सी किंग हेलीकॉप्टर के साथ प्रतिस्थापित किया जाएगा। एन्टी सबमरीन वारफेयर में महारत हासिल किए इस हेलीकाप्टर के जरिये गहरे हिंद महासागर के गर्भ में या तटीय क्षेत्र में कैट फिश की माफ़िक़ छुपे हुए चीनी पनडुब्बी के दुस्साहस को सदा के लिए समाप्त किया जा सकेगा। यह युद्ध अथवा सीमित युद्ध के दौरान “गेम चेंजर “की भूमिका निभाएगा। इस बात पर बल इसलिए दिया जा रहा है क्योंकि भारत ने अमेरिका के साथ पहले चिनूक जैसे हैवी लिफ्ट हेलीकाप्टर फिर अटैक हेलीकॉप्टर अपाचे के बाद नौसेना के लिए बेहद जरूरी एमएच-60 रोमियो को अमेरिका से ख़रीददारी को मंजूरी दी है। ट्रम्प ने अपने सफल दौरे में भारत को अत्याधुनिक अमेरिकी हथियारों जिसमें एयर डिफेंस सिस्टम, मिसाइल, रॉकेट से लेकर नौसैनिक जहाज आदि को भारत को देने का भी एलान किया है। हालांकि इसकी पूरी सूची अभी तक विस्तृत रूप से सार्वजनिक नहीं की है। दूसरी तरफ चीन के बढ़ते आकांक्षा ने ट्रम्प को भयाक्रांत करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है।

अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी का मानना था कि “भारत और चीन का संघर्ष केवल सीमा संघर्ष नहीं हैं, अपितु यह तो एशिया के नेतृत्व का संघर्ष है, बल्कि साम्यवाद और प्रजातांत्रिक समाजवाद के बीच संघर्ष है, इसलिए इस संघर्ष में भारत में भारत की पूरी सहायता करनी चाहिए।

इंडो पैसिफिक : कैलिफोर्निया से किलिमंजारो तक

भारत-प्रशांत क्षेत्र हमेशा की तरह अमेरिकी राष्ट्रपति की प्राथमिकता में रहा। ट्रंप ने चार देशों-अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और भारत या क्वैड की साझा संकल्पना को बढ़ाने को रेखांकित किया जिससे आतंकवाद पर लगाम लगाने के साथ भारत की विस्तृत समुद्री सुरक्षा और निर्बाध नौवहन को सुनिश्चित किया जा सके। भारत-प्रशांत क्षेत्र को परिभाषित करने को लेकर शुरुआती हिचक के बाद ट्रंप प्रशासन अब इसे लेकर स्पष्ट नजर आ रहा है कि भारत के पश्चिमी छोर से लेकर अफ्रीका के पूर्वी छोर तक का समुद्री इलाक़ा भारत-प्रशांत क्षेत्र है। क्षेत्रीय सहयोग आधारित परियोजनाओं को गति देने पर जोर चूंकि भारत और अमेरिका, दोनों चीन की बेल्ट रोड परियोजना को लेकर संशकित हैं इसलिए क्षेत्रीय सहयोग आधारित परियोजनाओं को गति देने पर जोर दिया जा रहा है। इसमें ब्लू डॉट नेटवर्क भी शामिल है। इसमें ऐसी परियोजनाएं शामिल होंगी जो पारदर्शी, समावेशी और आर्थिक एवं सामाजिक रूप से उपयोगी तथा पर्यावरण हितैषी होंगे। ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में भारत अमेरिकी कच्चे तेल का चौथा सबसे बड़ा खरीदार बन गया। वहीं चीन के साथ 400 अरब डॉलर व्यापार घाटा की तुलना में भारत का अमेरिका के साथ व्यापार घाट महज 30 अरब डॉलर का है। भारत दौरे के दौरान ट्रंप यह बताने को उत्सुक थे कि जबसे उन्होंने अपना कार्यकाल संभाला है तब से भारत को अमेरिकी निर्यात में 60 फीसद की बढ़ोतरी हुई है। ऊर्जा उत्पादों के निर्यात में यह वृद्धि 500 फीसद रही है। भारत अमेरिकी कच्चे तेल का चौथा और एलएनजी का पांचवां सबसे बड़ा ख़रीदार बन गया है। भारत को एलएनजी के आयात में कोई दिक्कत पेश न आए, इसके लिए एक्सॉन मोबिल और इंडियन ऑयल के साथ एक करार भी हुआ है।

अगर प्रधानमंत्री के संयुक्त बयान पर गौर करें “यह सम्बन्ध सिर्फ दो सरकारों के बीच नहीं है, बल्कि लोक केंद्रित है”। वहीं राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा कि ” ये समझौते हमारी संयुक्त रक्षा क्षमताओं को बेहतर बनाएंगे।” भारत और अमेरिकी रक्षा सम्बन्ध महज एक रात में विकसित नहीं हुआ है। भारत ने अमेरिका को 1954 से शीतयुद्ध काल तक अपने विरुद्ध और पाकिस्तान के खेमे में खूब जाते देखा है। 1972 की अमेरिकी चीनी गठजोड़ से भी रु-ब-रु हुए हैं। भारत के साथ लगभग ठंडे पर चुके रिश्तों को गर्माहट को तत्कालीन अमेरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भुनाया और बदलते दक्षिण पूर्व-एशिया में भारत के महत्व को सही मायने में समझा तथा उनके उत्तराधिकारियों ने इसे आगे बढ़ाया। आज अमेरिका, भारत को अपना प्रमुख रक्षा साझीदार मानता है। यह जानते हुए भी की करीब 60 फीसद रूसी सैन्य अवसंरचनात्मक प्लेटफॉर्म पर आधारित भारतीय सैन्य हार्डवेयर रसियन रोमांस से ओतप्रोत है। ट्रम्प पक्के देशभक्त संरक्षणवादी व्यवसायी राष्ट्रपति है जिनके लिए व्यापार और “अमेरिका” सबसे ऊपर है। भारत आज सभी विकसित देशों के लिए उम्मीद की किरण बना हुआ है क्योंकि यहां विस्तृत बाज़ार, विशाल युवा जनसंख्या, लाभांश, मजबूत सैन्यबल और संतुलन और अवरोध के लिए पाकिस्तान और चीन है।

रूस और अमेरिका के लिए भारत सदैव detente 2.0 बना हुआ है और रहेगा। 1973 में ब्रेझनेव -निक्सन से शुरू हुई इस परंपरा को फिलहाल ट्रम्प-पुतिन बरकरार रखे हुए हैं। एस 400 मिसाइल डिफेन्स सिस्टम की खरीददारी से चिढ़े हुए ट्रम्प प्रशासन ने भारत पर caatsa जैसे प्रावधानो में शामिल करने की धमकी दे डाली और अपनी GSP के सूची से भारत को हटा भी दिया पर भारत के दृढ़तापूर्वक रूसी हथियार प्रणाली के ख़रीद के निर्णय ने ट्रम्प प्रशासन को “अच्छे संकेत” दे दिए। आज भारत को चीन, रूस और अमेरिका के बीच “संतुलन और अवरोध” के दृष्टि से सबसे बेहतरीन हृदयस्थल माना जा रहा है जिसका लाभ आने वाली कई पीढ़ियों को मिलने वाला है।

इस के साथ ही दोनों देशों के सशस्त्र बलों के बीच परस्पर संबंध को बेहतर बनाने के लिए उच्च-स्तरीय सैन्य प्लेटफॉर्मो के आदान-प्रदान के लिए समझौते को मूर्त रूप दिया गया जिसमें, सबसे पहले :

  • 2002 में सामान्य सुरक्षा सैन्य सूचना समझौता [General Security of Military Information Agreement(GSOMIA),
  • 2016 में लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज ऑफ मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट[Logistic Exchange Memorandum of Agreement(LEMOA) ]और
  • हालिया communication Compatibility and Security Agreement (COMCASA) शामिल है।

अंतिम समझौते के रूप के रूप में भू स्थानिक सहयोग हेतु बुनियादी विनिमय और सहयोग समझौता [Basic Exchange and Cooperation Agreement For Geo Spatial Cooperation(BECA)]के मसौदे पर बातचीत गंभीरता से जारी है। भारत को उम्मीद थी कि BECA को इसी दौरे पर अंतिम रूप दे दिया जाएगा, लेकिन सम्भव है कि दोनो पक्षों के बीच कुछ मसले पर रार अभी जारी है। इन समझौतों की बात इसलिए कि जा रही है क्योंकि आने वाले दिनों में युद्ध स्वरूप बदल जायेगा।

जिसे स्पेक्ट्रम वारफेयर के रूप में देखा जाएगा और सशस्त्र बलों के सफलता का दारोमदार इनके सुरक्षित और एन्क्रिप्टेड संचार उपकरण जिसे हाई एन्ड सिक्योर्ड एन्क्रिप्टेड कम्युनिकेशन इक्विपमेंट्स कहा जाता है, जो संवेदनशील सैन्य सूचनाओं को साझा करने का मार्ग प्रशस्त करता है और सैन्य सेवा कार्य के लिए सैन्य सुविधाओं पारस्परिक उपयोग की परिकल्पना साकार करता है। भारतीय सैन्य बलों द्वारा अमेरिका से प्राप्त इन संचार उपकरणों को अमेरिकी प्लेटफॉर्म पर लगाया जाएगा जिसमे C -130 J super Hercules, भीमकाय C-17 ग्लोबमास्टर, समुद्र में लंबी निगरानी करने और पनडुब्बी रोधी वारफेयर में अव्वल Poisiden8आई विमान, सुपर हैवी लिफ्टर हेलीकाप्टर चिनूक और अत्याधुनिक अपाचे, पंडुब्बीरोधी वारफेयर में माहिर हेलीकॉप्टर एमएच 60 रोमियो एन्टी सबमरीन वारफेयर हेलीकॉप्टर शामिल होंगे।

भारत के लिए जहां रूस ट्रस्टेड, टाइम टेस्टेड,ऑल टाइम फ़ेवरेट विपरीत परिस्थितियों का सच्चा साथी, रुपये:रूबल, ब्रह्मपुत्र-मस्कोवा की जोड़ी, बहु ध्रुवीय विश्व व्यवस्था के साथी है। भारत ने हमेशा रूस के महत्व को स्वीकार किया है और विभिन्न मंचो से स्पष्ट किया है कि रूस के साथ उसके सम्बन्ध , वे अपने पूर्व साथियों और भागीदारों के साथ संबंधों की कीमत पर नहीं है।

भारत रूस सदा एक दूसरे के लिए

भारत के लिए जहां रूस ट्रस्टेड, टाइम टेस्टेड,ऑल टाइम फ़ेवरेट विपरीत परिस्थितियों का सच्चा साथी, रुपये:रूबल, ब्रह्मपुत्र-मस्कोवा की जोड़ी, बहु ध्रुवीय विश्व व्यवस्था के साथी है। भारत ने हमेशा रूस के महत्व को स्वीकार किया है और विभिन्न मंचो से स्पष्ट किया है कि रूस के साथ उसके सम्बन्ध , वे अपने पूर्व साथियों और भागीदारों के साथ संबंधों की कीमत पर नहीं है।

भारत और रूस के सम्बंध दोनो देशों को परस्पर सामरिक और रणनीतिक लाभ देते हैं।
वर्तमान सरकार की पश्चिम के लिए अपने दरवाजे खोलने की नीति के चलते रूस से सैन्य हार्डवेयर के भारतीय आयात में कमी आ सकती है क्योंकि भारतीय रक्षा बाजार में इस्राएल के अतिरिक्त अमेरिकी कम्पनियों के पैर तेजी से पसरते जा रहे हैं । अमेरिकी मंशा यह है कि वह सैन्य हार्डवेयर क्षेत्र में रूस को पीछे छोड़ते हुए भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बने। सिक्के का दूसरा पहलू और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अमेरिका, रूस की तरह “भारतीय जरूरत के उपयुक्त उपकरण” और “भारतीय हितों का ध्यान ” बना और रख सकेगा ???

स्थिरता और मित्रता भारत-रूस आपसी सम्बन्धों की पहचान रहे हैं। समय द्वारा परखी हुई इस भागीदारी ने सुरक्षा, आतंकवाद आदि के मुद्दे पर निरन्तरता सुनिश्चितता की है। भारत-रूस के बीच हितों का कोई टकराव नहीं है और इसलिये इनके सम्बन्धो में कोई क्रांतिकारी बदलाव भी नहीं है। फिर भी बदलते भू:आर्थिक परिस्थितियों के सन्दर्भ में दोनों देशों को अपने हित में दशकों पुराने सम्बन्ध को नए सिरे से नयी प्रतिमानों रचने की दरकार है जिसमे अमेरिकी फैक्टर का नामो निशान न हो।

संयुक्त कार्य करने के क्षेत्र

इंडो पैसेफिक क्षेत्र,चतुर्भुज सुरक्षा वार्ता (Quad) रोबोटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लैंग्वेज, डेटा और एक्चुरियल साइंस, सूचना प्रौद्योगिकी के उभरते आयाम, अंतरिक्ष तकनीक, अनुसंधान और उसके अनुप्रयोग, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और पर्यावरण विकास, संपोषणीय और धारणीय विकास के विभिन्न क्षेत्र, कार्बन-उत्सर्जन नियंत्रण तकनीक, फ्यूचर एंड स्पेक्ट्रम वारफेयर, साइबर एंड स्पेस कमांड जैसे आधुनिक सैन्य तकनीकी विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी का आदान प्रदान करते हुए एक दूसरे का सहयोग करना चाहिए।

भारतीय जनमानस द्वारा तीनो शहरों में सपत्नीक उनके अप्रितम स्वागत और सघन वन से निकली मृगनयनी और रूपसी इवांका के स्वागत में भारतीयों ने जनसंचार के क्षेत्र में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। सरदार वल्लभ भाई पटेल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से साबरमती आश्रम से विश्व के सबसे बड़े क्रिकेट स्टेडियम मोटेरा में जबरदस्त स्वागत के बाद नई दिल्ली में दुर्लभतम माने जाने वाले 21 तोपों की सलामी के साथ शानदार तीनो सेनाओं के संयुक्त सम्मान गारद, रेड कार्पेट स्वागत और ऐतिहासिक और शानदार हैदराबाद हाउस के गहरी हरीतिमा दूब पर स्वागत को ट्रम्प शायद ही कभी भूल पाएं। उम्मीद है कि भारत में बीतते सर्दियों के बाद भी दोनो देशों के बीच के सम्बन्धों में तेजी आएगी।

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