भारत के एकमात्र दोहरे नारियल पेड़ को बचाने की चुनौती….

अश्विनी कुमार निगम

दुर्लभ प्रजाति के 125 वर्ष पुराने देश के इकलौते ‘‘दोहरे नारियल‘‘ पेड़ को बचाने के लिए वनस्पति वैज्ञानिक लंबे समय से प्रयास कर रहे हैं। वनस्पतिशास्त्र में लोगों के लिए कौतुहूल का कारण यह नारियल पेड़ पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के नजदीक हावड़ा के 232 वर्ष पुराने आचार्य जगदीश चंद्र बोस भारतीय वनस्पति उद्यान में है।

यहां पर यह वृक्ष ब्रिटिश इंडिया के समय 1894 में अंग्रेजों द्वारा लगाया गया था। वैज्ञानिकों को डर सता रहा है कि मादा दोहरे नारियल प्रजाति का यह पेड़ अब मरने की कगार पर खड़ा है इसलिए इसकी देखभाल पर बहुत ध्यान दिया जा रहा है।

हाल के दशकों में वैज्ञानिकों ने इस नारियल पेड़ में फलन शुरू हो इसके लिए कई गंभीर प्रयास किए हैं, जिसके नतीजे में इससें फलन तो शुरू हुआ लेकिन लेकिन अभी तक इससे कोई भी परिपक्व फल प्राप्त नहीं किया जा सका।

आचार्य जगदीश चंद्र बोस भारतीय वनस्पति उद्यान के क्यूरेटर एस. एस. हामिद ने बताया, “यदि इस पेड़ के मरने से पहले इसका फल परिपक्व हो जाता है तो हम इसकी जगह दूसरा पेड़ तैयार कर सकते हैं। उस स्थिति में देश को एक और दोहरे नारियल वाला पेड़ मिलेगा। लेकिन अगर फल के परिपक्व होने से पहले ही इस पेड़ की मृत्यु हो जाती है, तो इसको बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने वर्षों से जो प्रयास किए हैं वह विफल हो जाएंगे और भारत में ऐसा कोई पेड़ नहीं बचेगा ‘‘

ऐसे नारियल के पेड़ केवल सेशेल्स के दो द्वीपों पर ही पाए जाते हैं। ये भारत, श्रीलंका और थाईलैंड जैसे देशों में अंग्रेजों द्वारा लगाए गए थे। ये पेड़ 1200 साल तक जीवित रह सकते हैं और वनस्पति जगत में सबसे बड़े फल (25 किलो तक वजन) और पत्तियों को सहन कर सकते हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार चूंकि भारत का यह दोहरे नारियल वाला पेड़ अलग इलाके और जलवायु में बढ़ रहा है इसलिए ऐसी स्थिति में यह पूरी तरह से अपना जीवन नहीं जी सकता है। पिछले एक वर्ष से इस पेड़ से कोई नया पत्ता नहीं निकला है और इसकी मौजूदा पत्तियां भी धीरे-धीरे पीली हो रही हैं। यह चिंता का विषय है।

आचार्य जगदीश चंद्र बोस भारतीय वनस्पति उद्यान के पूर्व निदेशक एच. एस. देबनाथ ने बताया, ‘‘ जब यह पेड़ 94 वर्ष का था, तब इसमें पहली बार फूल आया। जब हमे पता चला कि यह एक मादा पौधा है, तो हमने परागण के लिए एक नर की पौधे की खोज शुरू की। ऐसे में सबसे निकटम नर पौधा श्रीलंका के रॉयल वनस्पति उद्यान में पता चला। वर्श 2006 में नर फूल के पराग को पौधे को कृत्रिम रूप से परागित करने के लिए लाया गया था। लेकिन प्रयास विफल रहा।‘‘

उन्होंने बताया कि वर्ष 2013 में, हमने थाईलैंड के एक अन्य नर पौधे से परागण कराया गया। इस बार यह प्रयास सफल रहा और पेड़ ने फल देना शुरू किया। इसे परिपक्व होने में कम से कम अभी एक और साल लगेगा, जिसके बाद वैज्ञानिक इसका बीज निकाल पाएंगे।

उद्यान के वैज्ञानिक यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि दोहरे नारियल का यह पेड़ किसी रोग से ग्रसित न हो। इसको रोगों से बचाने के लिए नीम आधारित फफूंदनाशक का प्रयोग किया जा रहा है। पेड़ को उसके भारी फलों के बोझ से बचाने के लिए रस्सियों का उपयोग कर सहारा दिया जा रहा है।

भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण विभाग के वैज्ञानिकों के अनुसार दुर्भाग्य से दो तीन साल पहले इस दोहरे नारियल वाले पेड़ के मुकुट को एक फफूंदी हमले का सामना करना पड़ा। इससे उसके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा। इसका विकास लगभग बंद हो गया है। ऐसे में यह भरसक प्रयास किया जा रहा है कि फल के परिपक्व होने तक यह पेड़ जिंदा रहे।

लुप्त होने की कगार पर दोहरे नारियल पेड़…..

दोहरे नारियल (लोडोइसिया माल्डिविका या एल सेचिल्लैरिकम) एक बहुत ही रोचक पाम हैं। इन 30 मीटर ऊंचे पेड़ों की पंखेनुमा पत्तियां होती हैं और ये 1200 वर्ष तक जीवित रहते हैं। अपने प्राकृतिक रूप में ये पेड़ सेयचिल्लीज (भारतीय महासागर में ग्रेनाइट की पहाड़ियों पर स्थित द्वीप समूह) में पाये जाते हैं।

ये पेड़ लगभग लुप्त प्रजातियों की श्रेणी में हैं इसलिये कानून द्वारा इनको संरक्षण मिला है। नर और मादा पेड़ अलग-अलग होते हैं। मादा पेड़ों के फल हरे रंग के बड़े हृदय जैसे आकार के होते हैं। उनका भार 15-20 किलो होता है और उन्हें पकने में 5-8 साल लग जाते हैं। त्वचा के नीचे रेशों की एक परत होती है जो एक भूरे हड्डियों जैसा कवच होता है। इस कवच के अंदर दो खंडों वाला बीज होता है- जो वनस्पति जगत का सबसे बड़ा (50 सेमी) और सबसे भारी बीज होता है।

मरे बीज अक्सर तैरते हुये भारत के समुद्री तटों पर आ जाते हैं। लोग इन्हें उत्सुकता से इकट्ठा करते हैं। इन्हीं कवचों को भारत में साधु अपने कमंडल के लिये उपयोग करते हैं।

भारत के जानेमाने वनस्पतिशास्त्री प्रोफेसर एच वाय मोहन राम ने डबल नारियल के बारे में कई वैज्ञानिक लेख लिखे हैं। उनके अनुसार फ्रेंच जलसेना के कप्तान लजारे पिकौल्ट वो पहले इंसान थे जिन्होंने पहली बार डबल नारियल के पेड़ को खोजा था।

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