‘कांग्रेस की कुदृष्टि हिन्दू मंदिरों के स्वर्ण भंडार पर’

स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती
राष्ट्रीय महामंत्री
अखिल भारतीय संत समिति
गंगा महासभा

आचार्य चाणक्य का मानना था कि किसी धर्म को समाप्त करना हो तो उसके आश्रय स्थल मठ-मंदिर आदि को समाप्त कर दो। इसी नीति का पालन करते हुए भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने शिक्षा तंत्र को मैकाले तंत्र के आधार पर पढ़े-लिखे लोगों के हाथों में देकर कानून द्वारा हिन्दू मठ-मंदिरों को अपने अधीन कर लिया। आज भारत में लगभग नौ लाख मंदिर हैं जिसमें से चार लाख मंदिर सरकार के पास हैं। संवैधाानिक रूप से पंथ निरपेक्ष राज्य का मुखिया क्या मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा आदि का संचालन कर सकता है ?

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने मंदिरों में पड़े सोने को अधिगृहित करने की बात कहकर भारतीय राजनीति में धर्म आधारित एक नए ध्रुवीकरण की पूर्व पीठिका तैयार कर दी है। पृथ्वीराज चव्हाण के तर्क है कि ‘वर्ल्ड गोल्ड कौंसिल’ के अनुसार देश के मंदिरों में अनुमानित रूप से एक ट्रिलियन डॉलर (76 लाख करोड़ रुपये) का सोना है। देश की अर्थव्यवस्था बचाने की आड़ में हिन्दू मंदिरों पर गिद्ध दृष्टि लगाए बैठे कांग्रेस के नेताओं का चरित्र गोरी, गजनी, बख्तियार खिलजी जैसा होता चला जा रहा है।

यह कोई नई घटना नहीं है। अभी एक महीने पूर्व सोशल मीडिया में वामपंथी लॉबी द्वारा ट्वीटर पर ‘#हिन्दुओं मंदिर से सोना निकालो’ हैशटैग चला कर ट्रेंड कराया गया। और आश्चर्य तो यह है कि ऐसा करने वाले वामपंथी अरबन नक्सली एवं कांग्रेस के स्वनामधन्य बड़े-बड़े चेहरे हैं जिनकी हिन्दू मंदिरों में कोई आस्था नहीं है। सनातन हिन्दू धर्म एवं उसके पूजा पद्धतियों से कोई लेना-देना नहीं है फिर भी ट्रेंड कराने में वे सबसे आगे थे।

हिन्दू मंदिरों के प्रति दुर्भावना एवं षड्यंत्र कांग्रेस के पूर्वाग्रह का मूल है। श्रीमती इंदिरा गांधी को जगन्नाथ मंदिर में तत्कालीन गोवर्धन पीठाधीश्वर जगद्गरु शंकराचार्य स्वामी निरंजन देव तीर्थ द्वारा दर्शन से रोका जाना हो अथवा श्रीमती को सोनिया गांधी को गैर हिन्दू के कारण पशुपति नाथ मंदिर (काठमांडू-नेपाल) में रोका जाना हो या राहुल गांधी द्वारा सोमनाथ मंदिर में तीसरे कॉलम (गैर हिन्दू) में हस्ताक्षर करने जैसी घटनाएं कहीं न कहीं मंदिर एवं हिन्दू संन्यासियों के प्रति उनके प्रतिशोध का कारण है। भारतीय जनमानस के स्मृतियों से गुजरात विधानसभा चुनाव का वह दृश्य ओझल नहीं हुआ है जिसमें कांग्रेस के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष हिन्दू मंदिरों में घूम-घूमकर कीर्तन-भजन गाते हुए देखें गए। अब भारत के सनातन धर्मावलम्बी हिन्दुओं को यह लगने लगा है कि कांग्रेस के नेताओं का हिन्दू मंदिरों में पर्यटन कहीं मंदिरों के सोना का आंकलन करने के लिए तो नहीं था ?

वस्तुतः हिन्दू मंदिरों पर बलात कब्जा एवं मंदिरों के अंदर अकूत सम्पत्तियों को देखकर लालच कोई नई बात नहीं है। चाहे सोमनाथ का मंदिर महमूद गजनवी द्वारा तोड़ जाने का विषय रहा हो अथवा अयोध्या, मथुरा, काशी समेत हिन्दुस्तान के सभी प्रसिद्ध मंदिरों को तोड़कर उसके सोने को लूट ले जाने का विषय रहा हो। इसके बाद भी दक्षिण भारत में मुगल आक्रमण के पर्याप्त पदचिन्ह न होने के कारण दक्षिण के मठ, मंदिर एवं उनकी वास्तुशैली बची रह गई। जिस कारण चाहे केरल का पद्मनाभ मंदिर हो अथवा कांचीमठ हो, कर्नाटक के लिंगायत एवं वीरशैव सम्प्रदाय के मंदिरों में भी सोने की चकाचौंध पिछले कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस नेताओं के आंखों में चुभी है।

भारत में अंग्रेजों के आगमन के बाद ही यह सोचा जाने लगा था कि मुगलों से जो कुछ बचा है उसे अंग्रेज तो लुटेंगे ही परन्तु प्रतिरोध होता देख और धर्म के लिए किसी भी हद तक जाकर संघर्ष के कारण हिन्दू समाज से सीधे टकराव लेने की जगह ‘विभक्त करो और शासन करो’ की नीति अपनाकर धीरे-धीरे कुछ नए प्रकार के कानून ब्रिटिश पार्लियामेंट से पास कराकर उसकी आड़ में भारतीय मंदिरों की सम्पत्ति पर येन-केन-प्रकारेण कब्जा करने की कोशिश छल द्वारा प्रारम्भ हो गई।

इसकी प्रथम कड़ी में मद्रास हिन्दू टेम्पल एक्ट 1843 अंग्रेज लेकर आए। धीरे-धीरे इस कानून की आड़ में मंदिरों पर कब्जा और उसकी अकूत सम्पत्तियों को लंदन भेजा जाने लगा। लेकिन 1857 के विद्रोह ने इनके मंसूबों पर पानी फेर दिया। बिना किसी धार्मिक छेड़छाड़ के सामाजिक गतिविधियों का कैसे नियंत्रित किया जाए इस पर बहुत गम्भीरता से अंग्रेजों ने काम किया। इसके अंतर्गत सोसायटी एक्ट की धारा 1860, पुलिस एक्ट 1860, ट्रस्ट एक्ट 1860 जैसे कानून लेकर आए परन्तु समाज के प्रबल प्रतिरोध के कारण अंग्रेज असफल हुए। पुनः मद्रास हिन्दू टेम्पल एण्ड रिलीजियस प्लेस अमेंडमेंट एक्ट 1923 लेकर आए, इसकी आड़ में तब तक कई प्रसिद्ध हिन्दू मंदिरों को उसके धन से सरकारी मौज-मस्ती प्रारम्भ हो गई। फिर 1920 से लेकर 1947 तक भारत के लाखों हेक्टयेर भूमि चर्चों को चैरिटेबल ट्रस्ट के नाम पर लीज कर दी गई।

पुनः 1947 में आजादी के बाद अंग्रेजों के दिखाए राह पर कांग्रेस आगे बढ़ी और व्यक्तिगत तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जी की रुचि के कारण मद्रास हिन्दू टेम्पल एक्ट की जगह ‘द हिन्दू रिलीजियस एण्ड चेरिटेबल एंडाउमेंट एक्ट 1951 (The Hindu Religious and Charitable Endowment Act of 1951) भारतीय संसद में बगैर चुनाव के ही कानून बना दिया गया क्योंकि भारत में पहला चुनाव ही वर्तमान संविधान के आधार पर 1952 में हुआ था। फिर हिन्दू मठ मंदिरों को अपने कब्जे में लेकर उसकी परिसम्पत्तियों से सरकारी मौज-मस्ती का नए नया दौर स्वतंत्र भारत ने देखा। क्योंकि संविधान के अंदर अनुच्छेद 29-30 में अल्पसंख्यकों के सारे धार्मिक अधिकार उनके मस्जिद, चर्च एवं शिक्षा की स्वतंत्र व्यवस्था करके हिन्दू मठों पर आश्रित धार्मिक शिक्षा जो भारत को उसकी जड़ों से जोड़कर रखे, इसको धीरे-धीरे समाप्त करना ही कांग्रेस का लक्ष्य था इसलिए भारत में प्रथम शिक्षामंत्री ऐसे व्यक्ति को बनाया गया जो अरबी और अंग्रेजी के विद्वान थे। नेहरु जी को एक बात पक्की पता थी कि भारत अगर अपनी जड़ों से जुड़ा रहा तो पुनः विश्व का नेतृत्व करने लगेगा। जड़ों से जुड़े रहने की शर्त यह थी कि भारत के मंदिर जिनके पास अपने ग्राम की लगभग 60 फिसदी भू-भाग होते थे जिस पर कृषि कर्म द्वारा हुई आय और मंदिर के चढ़ावे का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य, सम्पर्क और संस्कार के कार्यों के लिए किया जाता था। प्रत्येक मंदिर के साथ एक विद्यालय, चिकित्सालय, गांव तक आने की सड़क अर्थात् सम्पर्क मार्ग एवं गांव के हर सुख-दुख में सम्पन्न होने वाले संस्कारों के लिए मंदिर का बड़ा परिसर एवं उसकी ठाकुरबाड़ी का उपयोग होता रहा है। यही भारत की सामाजिक एकता का बड़ा मंत्र था जिसको नष्ट करने के लिए मंदिरों की आर्थिक शक्ति नष्ट करना तथा पुजारियों का चरित्र हनन आवश्यक तत्व था। इस दिशा में कांग्रेस ने देश की सत्ता में आते ही प्रयास प्रारम्भ कर दिया। होता भी क्यों नहीं जब देश के मुखिया का यह मानना था कि भोजन तो मुगलिया हो लेकिन पवित्रता के पैमाने पर हिन्दुओं की रसोई में बना हो और इसाईयों की तरह साफ-सुथरी कुर्सी-मेज पर खाने की व्यवस्था हो और हिन्दू तो दुर्घटनावश हो गए।

आचार्य चाणक्य का मानना था कि किसी धर्म को समाप्त करना हो तो उसके आश्रय स्थल मठ-मंदिर आदि को समाप्त कर दो। इसी नीति का पालन करते हुए भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने शिक्षा तंत्र को मैकाले तंत्र के आधार पर पढ़े-लिखे लोगों के हाथों में देकर कानून द्वारा हिन्दू मठ-मंदिरों को अपने अधीन कर लिया। आज भारत में लगभग नौ लाख मंदिर हैं जिसमें से चार लाख मंदिर सरकार के पास हैं। संवैधाानिक रूप से पंथ निरपेक्ष राज्य का मुखिया क्या मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा आदि का संचालन कर सकता है ? तो उत्तर है कि संविधान के अनुच्छेद 29-30 के अंतर्गत अल्पसंख्यकों के प्राप्त अधिकारों के हवाले जिस समाज ने धार्मिक रूप से अपनी सक्रियता दिखाई उसे अल्पसंख्यक का दर्जा देकर हिन्दू समाज से तोड़कर अलग कर दिया गया। संविधानेतर जाकर जिस प्रकार सिक्खों को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया गया और चंडीगढ़ हाइकोर्ट द्वारा यह कहे जाने पर पंजाब में सिक्ख अल्पसंख्यक कैसे हो सकता है। तो सुप्रीम कोर्ट द्वारा चंडीगढ़ हाइकोर्ट के आदेश को रोक दिया गया। इसी प्रकार जैन समाज के मंदिरों का प्रश्न जब खड़ा हुआ तो उन्हें भी अल्पसंख्यक का दर्जा देकर हिन्दू समाज से अलग कर दिया गया। पीछे के दिनों में कर्नाटक के अंदर लिंगायतों को अल्पसंख्यक का दर्जा देकर हिन्दू समाज से तोड़ने की बहुत ही गंदी राजनीति कांग्रेस ने की थी। हालांकि सामाजिक जागरूकता के कारण इस प्रयास में इन्हें मुंह की खानी पड़ी। कर्नाटक के अंदर लिंगायत मठों का बड़ा भारी प्रभाव है।

केरल में 2012-13 के अंदर ऐतिहासिक पद्मनाभ मंदिर जो सरकार के अधीन हैं, उसके स्वर्णाभूषणों की गणना एवं मूल्यांकन लगभग पांच लाख करोड़ का किया गया। आश्चर्य तो यह है कि यह मूल्यांकन का कार्य सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त व्यक्ति की देखरेख में होने के बावजूद ढाई सौ करोड़ का सोना चोरी हो गया जबकि पुजारी एवं इस मंदिर का निर्माण कराने वाले महाराज रवि बर्मन परिवार के देखरेख में हजारों वर्षों से दस ग्राम सोने के भी चोरी का समाचार भी नहीं प्राप्त हुआ है। हम विश्वास किसी पर करें, उस हजारों वर्षों की अपनी परम्परा पर या वर्तमान की संवैधानिक व्यवस्था पर?

हिंदू धर्म दान एक्ट 1951 के जरिए कांग्रेस ने राज्यों को अधिकार दे दिया कि बिना कोई कारण बताए वो किसी भी मंदिर को सरकार के अधीन कर सकते हैं। इस एक्ट के बनने के बाद से आंध्र प्रदेश सरकार नें लगभग 34 हजार मंदिर को अपने अधीन ले लिया था। मध्य प्रदेश में 76 हजार मंदिर राज्य सरकार के अधीन हैं। कर्नाटक, महाराष्ट्र, ओडिशा, तमिलनाडु ने भी मंदिरों को अपने अधीन कर दिया था। इसके बाद शुरू हुआ मंदिरों के चढ़ावे में भ्रष्टाचार का खेल। उदाहरण के लिए तिरुपति बालाजी मंदिर की सालाना कमाई लगभग 3500 करोड़ रुपये हैं। मंदिर में रोज बैंक से दो गाड़ियां आती हैं और मंदिर को मिले चढ़ावे की रकम को ले जाती हैं। इतना फंड मिलने के बाद भी तिरुपति मंदिर को सिर्फ सात प्रतिशत फंड मंदिर के रख-रखाव के लिए वापस मिलता है। और मंदिर के बेशकीमती रत्न ब्रिटेन के बाजारों में बिकते हुए पाए गए। आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाई.एस.आर. रेड्डी ने तिरुपति की सात पहाड़ियों में से पांच को सरकार को देने का आदेश दिया था। इन पहाड़ियों पर चर्च का निर्माण किया जाना था। मंदिर को मिलने वाली चढ़ावे की रकम में से 80 प्रतिशत गैर हिन्दू कार्यों के लिए खर्च किया जाता है। मंदिरों के दान के धन में भ्रष्टाचार का स्तर है कि कर्नाटक के दो लाख मंदिरों में लगभग 50 हजार मंदिर रखरखाव के अभाव में बंद हो गए हैं। दुनिया के किसी भी लोकतंत्रिक देश में धार्मिक संस्थानों को सरकारों द्वारा नियंत्रित नहीं किया जाता है, लेकिन भारत में ऐसा हो रहा है। सरकारों ने मंदिरों को अपने कब्जे में इसलिए किया क्योंकि उन्हे पता है कि मंदिरों के चढ़ावे से सरकार को काफी फायदा हो सकता है। लेकिन, सिर्फ मंदिरों को ही कब्जे में लिया जा रहा है।

इस काले कानून के कारण हिन्दू समाज के सभी प्रतिष्ठित मंदिर सरकारी ट्रस्टों के अधीन हैं। उत्तर प्रदेश में अयोध्या, मथुरा, काशी सभी सरकार द्वारा ही निर्मित ट्रस्ट हैं। काशी विश्वनाथ के अधिग्रहण की कहानी कम रोचक नहीं है। तत्कालीन कांग्रेस नेता पंडित कमलापति त्रिपाठी का विश्वनाथ मंदिर के महंत परिवार से विवाद के कारण दो कांग्रेसी कार्यकर्ता जो कि तत्कालीन वाराणसी जिले के चकिया तहसील रघुनाथपुर गांव के निवासी मार्केंडेय सिंह, भगवती सिंह को उकसाकर श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर का सोना चोरी करवा दिया गया। बाद में हाहाकार मचने पर मीरजापुर जिले के अहिरौरा से सोने की बरामदगी और दोनों चोरों को तीन-तीन साल की सजा हुई। सजा काटने के बाद वापस लौटने पर वो अपने ग्रामसभा में प्रधानी का चुनाव जीतकर कांग्रेस के प्रतिष्ठित नेताओं में अपनी गिनती कराते रहे। काशी विश्वनाथ की तरह ही भारत के प्रत्येक प्रसिद्ध मंदिरों का इतिहास जिसके अधिग्रहण के पीछे 1951 के कानून के साथ कोई न कोई षड्यंत्र जुड़ा हुआ है।

प्रश्न यह नहीं है कि मंदिरों में रखा हुआ सोना आपातकाल में देश के काम आ सकता है कि नहीं बल्कि प्रश्न यह है कि यह सोना हिन्दू समाज की सम्पत्ति है न कि सरकार की ? और देश के लिए जितने भी त्याग और बलिदान की जरूरत पड़ेगी भारत का संत समाज, श्रद्धालु, सनातन धर्मावलम्बी, हिन्दू समाज करने के लिए तैयार है। लेकिन जिन लोगों को मठ-मंदिरों में पड़ा धन दिखा क्या उन्हें इस देश में चैरिटी के नाम पर आने वाले लाखों-करोड़ों के चंदे नहीं दिखें। और इस देश की चर्च मिशनरियां और जकात के पैसे चलने वाले धर्मार्थ कार्यों का डंका पीटने वाले लोग किसी गरीब हिन्दू को इस कोरोना काल में कहीं सहायता करते हुए मिल जाएं तो हमें भी बताइए। हां ये सूचना जरूर है कि इस महामारी के समय में भी सहायता के बदले धर्मांतरण का षड्यंत्र सफलतापूर्वक चल रहा है। और एक अंतिम प्रश्न भारत के संत समाज की ओर से कांग्रेस के नेताओं से जरूर है कि हमने तो अपने अधीन पांच लाख मठ-मंदिरों को क्वारंटाइन, आइसोलेशन सेंटर, हॉस्पिटल में बदलकर समाज से मिले दान का सदुपयोग करके दिखा दिया है लेकिन लगभग 50-55 वर्षों तक देश में एक क्षत्र शासन करने वाली पार्टी का क्या योगदान है उसे इस देश को बताना चाहिए।

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