रक्षा मंत्री की पहली विदेश यात्रा और भारतीय राजनय में अफ्रीका का बढ़ता महत्व

कर्ण भास्कर की कलम से

कर्ण भास्कर

वर्तमान भू-आर्थिकी के निरंतर बदलते घटनाक्रम में मोजाम्बिक के साथ के साथ भारत के संबंधों को और मजबूत बनाना वक़्त का तक़ाज़ा बन गया है क्योंकि चीन अपने पश्चिम एशिया और पूर्वी तटीय अफ्रीकी देशों के साथ अपनी नीतियों में आक्रमक रवैया अख़्तियार किये हुए है। ये वही क्षेत्र है जहां से चीन की ऊर्जा और संसाधन के शिपमेंट की शुरुआत होती है। केन्या, सूडान, तंज़ानिया और मोज़ाम्बिक के बंदरगाह अवसंरचना को को अपने परित्यक्त “पीसफुल राइज” नीतियों को इन विकासात्मक कार्यो में झोंक रहा है। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी पश्चिमी हिन्द महासागर में भी अपना प्रभाव बढ़ा रही है। भारत को बदलते भू-रणनीतिक पहलुओं पर गंभीरता से ध्यान देते जरूरत है। जिसमें मोज़ाम्बिक भारत का एक बेहतर साझीदार देश बन सकता है।

रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने अपनी पहली विदेश यात्रा की शुरुआत भू-सामरिक और भू-आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण दक्षिण पूर्वी अफ़्रीकी देश मोज़ाम्बिक से की।

रक्षामंत्री की तीन दिवसीय राजकीय यात्रा में उनके साथ रक्षा और विदेश मंत्रालय का उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल के शामिल रहा। यहां मोज़ाम्बिक के शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात करने के साथ ही उन्होंने प्रवासी भारतीयों को भी संबोधित किया। इसी यात्रा के मध्य दोनो देशो के मध्य तीन समझौतों पर भी हस्ताक्षर किये गए।

हिन्द महासागर के दक्षिण पश्चिम किनारे पर अवस्थित मोज़ाम्बिक को 1498 में वास्को डि गामा द्वारा खोजा गए और 1505 में इसे पुर्तगाली औपनिवेश बना लिया गया। 1975 में इसे आज़ादी मिली । स्वेज नहर के शुरू होने से पहले वैश्विक समुद्री व्यापार में मोज़ाबिक का मोज़ांबिक चैनल की वजह से अहम स्थान था। वर्तमान में असीमित ऊर्जा स्रोतों (मुख्यतः एलएनजी और प्राकृतिक गैस है) के पता चलने और सी लाइन ऑफ कम्युनिकेशन ,समुद्री सुरक्षा एवं व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टि से यह वैश्विक तप्त स्थल बन चुका है। यही वजह है कि ऊर्जा सुरक्षा के ललायित विश्व के तमाम देश मोज़ाम्बिक की ओर ताक रहे है।

भारत और मोज़ाम्बिक के सम्बंध सदियों से कायम है। पश्चिमी भारतीय राज्यों के मोज़ाम्बिक के साथ संबंधों के प्रमाण इतिहास के पन्नो में दर्ज है जो उसके स्वतन्त्रता के साथ भी राजनयिक, आर्थिक,राजनैतिक और सामरिक सम्बन्धों के जरिए स्थापित हुए और मधुर रहे हैं। इसी कड़ी में रक्षा मंत्री की पहली विदेश यात्रा के लिए मोज़ाम्बिक को चुना जाना दोनो देशो के रिश्तों की गर्माहट को बयां करता है।

इससे पहले अप्रैल1982 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और जुलाई 2016 में निवर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मोज़ाम्बिक की यात्रा कर दोनों देशों के सम्बंध को नए प्रतिमान पर पहुंचाया। इससे पहले मोज़ाम्बिक के आज़ादी के बाद इनके सभी चार राष्ट्रपति भारत की यात्रा पर आ चुके है। इसकी शुरुआत सर्वप्रथम अप्रैल 1982 में राष्ट्रपति सामोरा मचैल, 1988 और 2003 में जोआक्विम चिसानो, 2010 में अर्मेन्डो गएबूज़ा और बीते अगस्त 2015 में राष्ट्रपति फिलिप न्यूसी ने भारत की यात्रा की ।

हिन्द महासागर क्षेत्र में अपने प्रभाव को उच्चस्तर पर बढ़ाये रखने और SAGAR (सिक्योरिटी ग्रोथ फ़ॉर ऑल इन दी रीजन) डॉक्ट्रिन को मजबूत करते हुए रक्षा मंत्री की इस पहली विदेश यात्रा को जोड़ कर देखा जा रहा है। अफ्रीका में चीन की बढ़ती असामान्य सैन्य और अवसंरचनात्मक निवेश और उसकी “डेब्ट ट्रैप डिप्लोमेसी ” को बढ़ते प्रभाव को कम करने की दिशा में इस यात्रा के गहरे रणनीतिक और सामरिक निहितार्थ हैं। भारत हिन्द महासागर क्षेत्र में नैसर्गिक रूप से”फर्स्ट रेस्पांडर” है।

भारत सम्पूर्ण हिन्द महासागर क्षेत्र को “जोन ऑफ पीस ” पहले ही घोषित कर चुका है और इसकी गरिमा बरकरार रखने को प्रतिबद्ध है। इसी कड़ी में हिन्द महासागर में मोज़ाम्बिक की भौगोलिक अवस्थिति उसे बेहद खास बनाती है, इसलिए तो इसे मलावी, ज़ाम्बिया, ज़िम्बाब्वे, बोत्सवाना, और लेसेथो जैसे उच्चस्तरीय खनिज और अनछुए प्राकृतिक संसाधन से धनी और भू आवेष्ठित देशों का द्वार कहा जाता है। साथ ही तंज़ानिया और दक्षिण अफ्रीका के साथ अपनी सीमा साझा करते हुए यह भू सामरिक ,सामुद्रिक और ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से बेहद अहम स्थान हो जाता है ।

(मैप स्रोत Lonely planet)

इन सभी देशों में चीन ने व्यापक पैमाने पर विभिन्न क्षेत्रों में निवेश किये है,जो उसके अरबों डॉलर की महत्वाकांक्षी मल्टी मॉडल मेरीटाइम सिल्क रोड का हिस्सा है। मोज़ाम्बिक के साथ बेहतर सम्बन्ध का सीधा असर इन लैंड लॉक्ड देशो के संबंध पर पड़ेगा जो पहले से बेहतर है। मोज़ाम्बिक के साथ ये देश भी भारत से वे तमाम सुविधायें हासिल कर सकते है। भारत मोज़ाम्बिक के विस्तृत तट की चौबीसों घंटे सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में मोज़ाम्बिक नौसेना को भारत के तरफ से फ़ास्ट अटैक इनटरसेप्टेर पोत भेंट करेंगे।

ग्वादर से जिबूती तक विस्तार कर रही चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी की हिन्द महासागर क्षेत्र में बढ़ती असामान्य गतिविधियां भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय है। चीन ने हालिया सुरक्षा पर जारी अपने नवीनतम श्वेत पत्र “नए युग में चीन की राष्ट्रीय सुरक्षा” शीर्षक में स्पष्ट किया है कि चीन विदेशों में अब और भी सैन्य अड्डे बनाएगा। जिबूती और अदन की खाड़ी में सक्रिय चीनी नौसेना की पहले से ही उपस्थिति निश्चित रूप से भारत के लिए चिंताजनक है।

वर्तमान भू-आर्थिकी के निरंतर बदलते घटनाक्रम में मोजाम्बिक के साथ के साथ भारत के संबंधों को और मजबूत बनाना वक़्त का तक़ाज़ा बन गया है क्योंकि चीन अपने पश्चिम एशिया और पूर्वी तटीय अफ्रीकी देशों के साथ अपनी नीतियों में आक्रमक रवैया अख़्तियार किये हुए है। ये वही क्षेत्र है जहां से चीन की ऊर्जा और संसाधन के शिपमेंट की शुरुआत होती है। केन्या, सूडान, तंज़ानिया और मोज़ाम्बिक के बंदरगाह अवसंरचना को को अपने परित्यक्त “पीसफुल राइज” नीतियों को इन विकासात्मक कार्यो में झोंक रहा है। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी पश्चिमी हिन्द महासागर में भी अपना प्रभाव बढ़ा रही है। भारत को बदलते भू-रणनीतिक पहलुओं पर गंभीरता से ध्यान देते जरूरत है। जिसमें मोज़ाम्बिक भारत का एक बेहतर साझीदार देश बन सकता है।

अपने इस यात्रा के दौरान रक्षा मंत्री क्षेत्र भारत की भूमिका को और जवाबदेह, जिम्मेदार, सशक्त और प्रभावी भूमिका को बरकरार रखने के क्रम में मोज़ाम्बिक के साथ तीन अहम समझौतों पर हस्ताक्षर किया है जिसमे

  1. अनन्य आर्थिक क्षेत्र पर निगरानी
  2. व्हाइट शिपिंग इन्फॉर्मेशन सूचना की साझेदारी और
  3. हाईड्रोग्राफी के क्षेत्र में समझौता शामिल हैं

इसके अतिरिक्त भारत मोज़ाम्बिक को नौसैन्य सहायता प्रदान करेगा। व्हाइट शिपिंग इन्फॉर्मेशन सूचना की साझेदारी के जरिये भारत को व्यव्यसायिक और गैर सैन्य व्यापारिक पोतों के बारे उनकी पहचान और मूवमेंट से जुड़ी आवश्यक और जरूरत की सूचना मिल सकेगी।

इन समझौतों के बाद जहां दोनो देशो के मध्य द्विपक्षीय संबंध मजबूत होंगे वहीं दूसरी तरफ इसके सामरिक आयाम भी नजर आएंगे । मोज़ाम्बिक के साथ इन समझौतों के साथ ही भारत चीनी हरकतों को प्रभावी रूप से मॉनिटरिंग कर सकेगा। भारत पहले भी मोज़ाम्बिक को अपने भारतीय आयात निर्यात निगम (इसीजीसी) के जरिये रियायती लाइन ऑफ क्रेडिट के रूप में सहायता मुहैया कराते रहा है जो 2010 में 500 मिलियन अमेरिकी डॉलर का था। वर्ष 2016 में मोज़ाम्बिक के व्यापार और उद्योग मंत्रालय को सूखे प्रभावित इलाकों में गेंहू खरीदने के लिए 10 मिलियन अमेरिकी डॉलर के रूप में विकासात्मक सहायता दी गई जबकि 100 टन दवाएं भी इन क्षेत्रों में भेजी गई।

समुद्री पायरेसी रोकथाम के नाम पर चीन की नौसेना द्वारा इस क्षेत्र में अपने निर्देशित मिसाइल विध्वंसक, पनडुब्बी, और फ्रिगेट्स के तैनाती के खबरों के बीच यह जरूरी है कि भारतीय नौसेना अपने “फ़ोर्स प्रोजेक्शन” और” ब्लू वाटर नेवी”की संकल्पना को मूर्त रूप प्रदान करते हुए इस क्षेत्र को ज़ोन ऑफ पीस में बरकरार रखे और अफ्रीका में चीन के ‘न्यू ग्रेट गेम” बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को भारत अपनी “कॉटन रोड अप्रोच” से प्रतिसन्तुलित कर सकता है।

अफ्रीका के पश्चिमी हिन्द महासागर क्षेत्र प्राकृतिक संसाधन ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से सम्पन्न है ।

वेस्टर्न इंडियन मरीन साइंस एसोसिएशन(WIOMSA)के अनुसार इसमे कुल दस देश शामिल हैं। ये 10 देश … सोमालिया, केन्या, तंजानिया, मोज़ाम्बिक, दक्षिण अफ्रीका, कोमोरोस, मेडागास्कर, सेशेल्स, मॉरिशस और रीयूनियन जो ‘हॉर्न ऑफ अफ्रीका से दक्षिण अफ्रीका के तट तक विस्तारित है। यहां भारत के लिए मौका है कि वह मेरीटाइम सिक्योरिटी के क्षेत्र में व्यापक पहुंच बनाये। अफ्रीका के 54 देशों में 38 देश या तो तटीय या फिर द्वीपीय देश है जिनकी कुल तटीय सीमा 18950 नॉटिकल मील/30,497 किलोमीटर है। अफ्रीका का लगभग 90 फीसद व्यापार समुद्री मार्ग से होता है। भारत अफ्रीका के इन देशो के साथ “ब्लू इकॉनमी” के क्षेत्र में जिम्मेदार साझेदार बनने की प्रतिबद्धता जाहिर कर चुका है। प्रधानमंत्री मोदी भारतीय राष्ट्रध्वज के नीले चक्र को इस “ब्लू इकोनॉमी”के रूप में जोड़ चुके हैं। भारत का इन सभी देशों के साथ सैन्य और रणनीतिक संबंध है। इसी क्रम में बीते मार्च में पुणे स्थित औंध मिलिट्री स्टेशन में मोज़ाम्बिक सहित 16 अफ्रीकी देशो ने भारत के साथ (Africa India field training exercise) AFINDEX 19 को सफलतापूर्वक अंजाम दिया था।

भारत के लिए अफ्रीका का महत्व

भारत के लिए अफ्रीका कितना महत्वपूर्ण इसका सहज अनुमान 28 जुलाई से शुरू होने वाली राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद की सप्ताह भर की तीन देशों की यात्रा जिसमें बेनिन, गिनी कोनाकरे और गैम्बिया कि यात्रा और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की मोज़ाम्बिक यात्रा के कार्यक्रम से लगाया जा सकता है।

भारत इस क्षेत्र में न सिर्फ व्यापार, सैन्य सहायता, क्षमता निर्माण , प्रशिक्षण सहायता और सुरक्षा के लिए ही मौजूद है, बल्कि भारत की जिम्मेवारी इनसे कहीं व्यापक है जिसकी एक झलक पूरी दुनिया ने बीते 15 मार्च को कैटेगरी चार स्तर के विनाशकारी उष्णकटिबंधीय साइक्लोन “ईडाई’ के कहर से पूरी तरह तबाह हुए मोज़ाम्बिक के तटीय शहर’ “बेरिया”की सहायता के रुप में देखा जिसमें मोज़ाम्बिक सरकार के आग्रह पर भारतीय नौसेना ने त्वरित कार्रवाई करते हुए जान माल के नुकसान को सीमित किया। इस क्षेत्र से अपने प्रशिक्षण मिशन अंजाम देकर को वापस लौट रहे भारतीय नौसेना के तीन पोत आईएनएस “सुजाता”और “शार्दूल” और भारतीय तटरक्षक के पोत “सारथी’ ने फौरन पहुंचकर “मानवीय सहायता और आपदा बचाव “और “सर्च और रेस्क्यू”अभियान को पेशेवर और प्रभावी तरीके से अंजाम देते हुए माली नुकसान को काफी सीमित किया। इस क्षेत्र में समय रहते न पहुँचने पर स्थिति पूरी तरह हाथ से निकल सकती थी। भारतीय नौसेना ने समय पर पहुंच सामान्य स्थिति बहाल करने और मोज़ाम्बिक के जनमानस में अपनी उल्लेखनीय छवि का निर्माण किया और सरकार से अपनी प्रशंसनीय भूमिका निभाने के लिए भारत के ध्वज को शिरोधार्य रखा। इससे पहले 2015 में नई दिल्ली में आयोजित भारत अफ्रीका फोरम में इस महादेश के सभी 54 देशों ने शिरकत कर भारत के साथ अपने सुमधुर सम्बन्ध की मुहर पहले ही लगा चुके थे।

(News Chrome के नियमित स्तंभकार कर्ण भास्कर विदेश और रक्षा मामलों के अध्येता हैं। फिलहाल डीडी न्यूज़ से संबंद्ध हैं)

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