अवसाद एक रोग है, खुद को दोषी मत मानिए

रिमझिम वर्मा

“राहुल!!!.. कॉलेज नहीं जाना क्या! 9 बज गये हैं!”, राहुल की माँ सुमित्रा ने सीढ़ियों पर चढ़ते हुए आवाज़ लगायी, जैसे ही वो कमरे में घुसी उसने देखा उसका 22 साल का जवान बेटा मृत अवस्था में पंखे पर लगे फाँसी के फंदे पर लटका हुआ है। सुमित्रा के आंखों के सामने अंधेरा छा गया। इस खौफनाक मंजर को सहन न कर पायी सुमित्रा, वहीं लड़खड़ा कर गिर पड़ी।

एक घंटे के भीतर घर में पुलिस, मीडिया और पड़ोसियों का ताँता लग चुका था। सबकी ज़ुबान पर बस एक ही सवाल था कि ऐसा हुआ कैसे? राहुल के बाप का रो- रो कर बुरा हाल था, उनके मुँह से बस यही शब्द निकल रहे थे कि “क्यों भगवान ने मेरे बच्चे को चुना ? कितना सीधा था! दिन रात बस पढ़ाई करता था बातचीत की फुर्सत भी नहीं मिलती थी उसे, कोई गन्दी आदत भी नहीं थी…फिर भी! हे भगवान तू इतना निर्दयी कैसे हो सकता है?” तभी पड़ोस के शर्मा जी बोले, “भाई साहब होनी को कौन टाल सकता है! हौंसला रखें सब सही होगा। कहीं ऐसा तो नहीं राहुल का कोई लड़की- वड़की का चक्कर हो जो आपकी जानकारी के परे हो!”

तभी इन्स्पेक्टर गोपालचन्द राहुल के कमरे की सीढ़ियों से उतरते हुए बोले-‘‘शर्मा, ज्यादा दिमाग न लगाओ पुलिस का काम पुलिस को करने दो ! राहुल के बाथरूम में लगे गीजर के ऊपर से सुसाइड नोट बरामद कर लिया गया है जिसमें सुसाइड का कारण कुछ और ही लिखा है! उसने इसमें लिखा है कि ‘आई.ए.एस. की परीक्षा में प्रथम प्रयास में सफलता न मिलने पर मैं अन्दर तक टूट चुका हूँ, अब मेरे जीवन में कुछ भी नहीं बचा है । इतने स्ट्रैस और डिप्रैशन के साथ मैं अब और नहीं जी सकता! मुझे मरना ही पड़ेगा।” यह सुनते ही घर में एकदम सन्नाटा छा गया , सबकी नजरें नीची हो गयी।

दिन बीतने लगे, राहुल की मौत को अब 10 दिन बीत चुके थे। मोहल्ले में सिर्फ एक ही बात की चर्चा थी कि ‘बताओ कैसे माँ-बाप थे ! जवान बेटा मानसिक रोगी था और इन्हें होश ही नहीं था।’ यही होता आया है न हमारे समाज में, कि डिप्रेशन (अवसाद) जो कि एक मनोदशा है लोग इसे बीमारी मानते आयें हैं । अवसाद में व्यक्ति स्वयं को अकेला व परेशान समझता है, उसे लगता है कि उसकी समस्याओं का कोई हल नहीं निकल सकता और उसकी मदद के लिये कोई भी नहीं है । न जाने राहुल जैसे कितने लोग हर दिन तनाव के चलते मौत को गले लगा लेते हैं।

अवसाद एक भ्राँति के समान होता है। व्यक्ति को लगता है कि मेरी बात को समझने वाला कोई नहीं है किसी को मेरी परवाह है ही नहीं और परिणामस्वरूप उसके मन में विचारों के चक्रवात घूमते रहते हैं। जो कि कभी-कभी घातक भी साबित हो जाते हैं।

उदाहरण के तौर पर हम अपने आस पास देखते हैं कि किशोरावस्था में अवसाद व तनाव किस प्रकार से लगभग सभी किशोर-किशोरियों के मस्तिष्क पर हावी सा हो जाता है। बचपने की जिद और बड़े होने का जुनून, नियन्त्रण लाने ही नहीं देता है । उन्हें लगता है मानो जैसे मुँह में लगाम लगायी जा रही है। यहीं से शुरू होती है गलतफहमी जो उन्हें तनाव व अवसाद से ग्रसित कर देती है ।

एकल परिवारों का बढ़ता हुआ चलन, महत्वाकांक्षा और स्वावलंबन की असीम भूख एवं व्यक्ति की अपने जीवन को लेकर दोहरी मानसिकता उसे धृतराष्ट्र बना रही है। व्यक्ति दुनिया को यही दिखा रहा है कि उसकी प्राथमिकता उसका परिवार है उसी के भरण पोषण के लिये वो दिन रात मेहनत करता है लेकिन दरअसल वास्तविकता तो कुछ और ही है । परिवार के सदस्यों का ख्याल न रखकर वह सँसार की इस अनंत दौड़ में जीतने के लिये भागा जा रहा है जिसका विजय बिंदु कहाँ है उसे स्वयं नहीं पता!

काल्पनिक आधुनिकता की दिशा में ले जाते ये उथले बिंदु वो बीज है जो अवसाद और तनाव का अंकुरण करते आ रहे हैं ।

‘‘मानव एक सामाजिक प्राणी है।’’ लगभग सभी समाजशास्त्र की किताब के पहले अध्याय में यह वाक्य लिखा होता है। जीवविज्ञान (बायोलॉजी) में भी विद्यार्थी को पढ़ाया जाता है कि ‘मानव जाति’ समूह प्रधान होती है। तो फिर वर्तमान में ऐसी क्या जरूरत आन पड़ी कि सभी तथ्यों को दरकिनार करते हुये हम दो हँसों का जोड़ा बनने की ओर अग्रसर हो पड़े। और हँस की चाल चलने के बाद भी हम सुखी और सन्तुष्ट नहीं हैं। आधुनिकता का नाम देकर हम एक ऐसे युग का निर्माण कर रहे हैं जहाँ बचपन से लेकर बूढ़े तक सब तनाव से ग्रसित होते जा रहे हैं । हम माने या ना माने लेकिन ये तनाव भरी चिन्ताजनक जिन्दगी दीमक की तरह एक स्वस्थ व्यक्ति को खोखला करने में सक्षम होती नज़र आ रही है। जिससे मानसिक क्षति के साथ-साथ ढेरों शारीरिक रोग भी उत्पन्न हो रहें हैं।

प्रकृति, जो कि मात्र अपने रंग-रूप से ही हमारे मन को प्रफुल्लित कर सकारात्मकता देने का सामर्थ्य रखती है, हम उसे भी खत्म करते जा रहे हैं । सफल, सकारात्मक व सुखी व्यक्ति, जिससे मित्रता बढ़ानी चाहिये उससे हम द्वेष व ईर्ष्या पाले हुये हैं। कितने भी अच्छे चुटकुले को बार-बार दोहराने पर जैसे उसका हास्य गायब सा हो जाता है, वैसे ही जीवन में नकारात्मकता की पुनरावृत्ति के दौरान मन की स्थिरता, असली कला है । समाज में हर किसी का पालन-पोषण, संस्कार, परम्परा,विचार, उद्देश्य, क्षमता लगभग सभी कुछ अन्य लोगों से भिन्न होता है, ऐसे में औरों के आगे खुद को कमज़ोर आंकना मात्र एक गलतफहमी होती है जो छोटी सी निराशा को अवसाद, तनाव, चिन्ता जैसे भारी शब्दों तले दबा देती है।

दिल्ली की जानी मानी साइकोलॉजिस्ट डॉ निशा खन्ना बताती हैं, “एक व्यक्ति जब डिप्रेशन में आता है तो वह ‘लो सेल्फ एस्टीम’ का शिकार हो जाता है। जिसमें अक़्सर देखा जाता है कि व्यक्ति के आस-पास के लोग उसे डाउन फील कराते हैं कि वो ऐसा ही है, जिससे उसे लगता है उसकी जितनी भी प्रॉबलम्स हैं उसके लिए वह खुद ज़िम्मेदार है परिणामस्वरूप नेगेटिविटी व्यक्ति को डिप्रेशन की ओर धकेल देती है।”

डॉ निशा खन्ना, साइकोलॉजिस्ट, बाय टेंस क्लिनिक

डॉ खन्ना कहती हैं, “डिप्रेशन का प्रोसेस लगातार 21 दिनों तक होता है, अगर 21 दिनों तक आप निराशा, उदासीनता और नेगेटिविटी से उबर नहीं पा रहें हैं तो निश्चित रूप से आप डिप्रेशन के दौर से गुज़र रहे हैं।”

जानिये कहीं आपको तो नहीं है ‘डिप्रेशन’

●मन-मस्तिष्क पर नकारात्मकता हावी हो जाना।
●नींद न आना या फिर बहुत अधिक नींद आना।
●भूख अधिक लगने से वज़न बढ़ना या भूख कम लगने से वज़न गिरना।
●मनपसंद काम को करने में खुद को लाचार महसूस करना और जीवन को बोझिल समझना।
●बजाय हल निकालने के, परेशानियों पर ज़्यादा ध्यान देना।
●खुद को सभी परिस्थितियों में अकेला मानना।
●कामवासना के प्रति उदासीनता।
●निर्णय लेने में कठिनाई।
●लगातार भूलने की आदत।
●अविश्वास की भावना में बढ़ोत्तरी।
●स्वयं निर्धारित लक्ष्यों से भी असंतुष्टि।

अवसाद के कारणों के बारे में पूछने पर साइकोलॉजिस्ट डॉ निशा खन्ना ने कहती हैं “जो आपकी शख्सियत है अगर दबाव में आकर आप उसे बदलने की कोशिश कर रहें हैं तो पहले आपको ‘मूड स्विंगस’ होंगे जोकि बाद में अवसाद में परिवर्तित हो जायेंगे।” इस तथ्य पर अभिभावकों को ध्यान देने की आवश्यकता है। व्यक्ति यदि कोई काम बग़ैर इच्छा के काफी लम्बे समय तक कर रहा है तो उसको निश्चित रूप से मानसिक क्षति पहुँचेगी। आस-पास के लोगों द्वारा किया गया नैतिक या शारीरिक दुर्व्यवहार भी डिप्रेशन का कारण बन जाता है।

कुछ अन्य कारण भी अवसाद को हवा देते नज़र आते हैं

●जेनेटिक कारण (परिवार के बुज़ुर्गों से विरासत में प्राप्त)
●हार्मोनल बदलाव (मानव प्रकृति)
●परिवेश में हुई घटना-दुर्घटना (मृत्यु, विच्छेद, हानि, मन मुताबिक कार्य न होना)
●मनोवैज्ञानिक और सामाजिक दबाव

तमाम टोने टोटके के बावजूद भी अवसाद एक जटिल समस्या बनी हुयी है। उसका कारण है – हर कोई परेशानी को ‘किल’ करना चाहता है लेकिन सावधानी बरतना नहीं चाहता। अवसाद यानि ‘डिप्रेशन’, यह कोई बीमारी नहीं है बल्कि आम दिनों में होने वाले नकारात्मक भावों का ‘मैच्योरड ओवर रिएक्टेड वर्ज़न’ है जिस पर बहुत ही आसानी से काबू पाया जा सकता है। डॉ खन्ना के मुताबिक अवसाद से उबरने में इन बातों का ध्यान रखना चाहिए-

●मन की बातों को औरों के साथ साझा करें।
●परिवार और दोस्तों के साथ खुशी के पलों का आनंद उठायें।
●अपनी उपलब्धियों को उलट-पुलट कर देख लेना चाहिये।
●सकारात्मक और खुश लोगों के साथ अपना उठना बैठना रखिये।
●अपने परिवेश की सकारात्मकता को अपनायें और अपनी शिकायतों पर ताला लगा कर उसे दूर फेंक दें।

एक साइकोलॉजिस्ट समस्याओं और उसके समाधानों का पैकेज बना के भले ही हमारे सामने रख दे लेकिन असली प्रतिकिया अन्दर से ही विकसित करनी पड़ती है। आपकी पर्सनल ग्रोथ से लेकर प्रोफ़ेशनल ग्रोथ तक की लगाम आपके हाथ में ही होनी ज़रूरी है, जिसका घोड़ा सिर्फ और सिर्फ आपकी इच्छाशक्ति हो।

रिमझिम वर्मा

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