किसानों के नारद ‘ कवि घाघ’

उदय शंकर झा ‘चंचल’

कवि घाघ को कृषि की भविष्यवाणियों के लिए जाना जाता है। पंडित घाघ के अलावे भड्डरी (घाघ के शिष्य), खोना जैसे कुछ नाम ज्ञात हैं जिन्होंने कृषि पर भविष्यवाणी किए। घाघ और भड्डरी तो अब हिंदी भाषी क्षेत्रों के मान्य कवि स्थापित हैं और खोना (वराहमिहिर की बहू) बंगाल, असम और उड़ीसा की।

कहते हैं घाघ कन्नौज के पास चौधरी सराय में पैदा हुए। अकबर ने इनकी प्रसिद्धि से खुश होकर सराय घाघ बसाने की आज्ञा दी थी जो कन्नौज से 1 मील दक्षिण में है लेकिन ‘अकबरनामा’ इस बात का ज़िक्र कहीं नहीं करता है। हालांकि कन्नौज सिटी ब्लॉक अंदर सराय घाघ नामक एक गाँव आज भी है जो कन्नौज नगरपालिका के अंदर आता है।

कुछ लोग इनको कानपुर का निवासी बताते हैं।

सन 1891 में प्रकाशित पुस्तक ‘बिहार प्रोवर्ब्स, क्लासिफ़ाइड एंड एरेंज्ड अकॉर्डिंग टू देयर सबजेक्ट-मैटर’ के लेखक जॉन क्रिश्चन का मानना है कि घाघ शाहाबाद (अब हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले में) के निवासी थे।

भागलपुर के कुछ विद्वानों का मानना है कि पंडित घाघ भागलपुर के घोघा नामक स्थान में पैदा हुए। लेकिन इस आलोक में कोई प्राचीन प्रमाण नहीं मिलता। हाँ, इनकी कविताओं में आर (मेंड़), सत्तू, गार (गाली) जैसे शब्द इन बातों को पुख्ता जरूर करते हैं। सन 1926 में प्रकाशित पुस्तक ‘एग्रीकल्चरल सेईंग्स ऑफ यूनाइटेड प्रोविंस’ में लेखक वी. एन. मेहता ने घाघ के कुछ दोहों के ज़िक्र किए हैं। इस संकलन से लिए गए कुछ दोहे देखिए –

थोड़ जोताई बहुत हेंगाई, ऊंचे बाँधिए आर ।
उपजे तो उपजे नहीं तो, घाघे देवे गार* ॥

सूथाना पहिने हल जोते, अव पहिला पहिर निरावे ।
घाघ कहे ये तीनों भकुआ**, सर बोझा औ गावे ॥

माघ के उखाम***, जेठ के जाड़, पहिले बरखा भरिगे गाड़ ।
कहे घाघ हम होब बियोगी, कुआं खोद के धोइहें धोबी ॥

{* ‘गार’ मैथिली में प्रयुक्त शब्द है।
** ‘भकुआ’ से ‘भकुआना’ बना है जिसे जिसे अंगिका भाषा में अभी भी प्रयोग किया जाता है। इसका मतलब होता है ‘मूर्खता साबित करना।
*** ‘उखाम’ का उपयोग अभी भी अंगिका में रेयर ही सही मगर प्रयुक्त है। इसका प्रयोग ‘अति’ (बहुत ज्यादा : अति सर्वत्र वर्जयेत।) के लिए होता है।}

कवि घाघ के संकलित दोहों की भाषा से ऐसा महसूस जरूर होता है कि वे हरियाणा के तो नहीं रहे लेकिन कन्नौज, कानपुर या भागलपुर में से किन्हीं एक जगह पैदा हुए लेकिन अपने दोहों में क्षेत्रीय पुट डालने के लिए उन्होंने आज के कई सूबों में बंटे संपूर्ण मध्य भारत का दौरा किया था। एक संभावना यह भी बनती है कि घाघ और भड्डरी के दोहों में समय-समय पर अपडेट किए गए और माकूल क्षेत्रीय भाषाओं का समावेश हुआ जिससे उनमें क्षेत्रीयता का पुट कायम रहे।

‘नेचर वॉच’ नामक पुस्तक में खुशवंत सिंह और शुद्धासत्व बसु लिखते हैं कि घाघ 17वीं सदी में पैदा हुए। (?) डॉ. रामदेव झा ‘एक खीरा तीन फांक’ (Three D Crossovers, Translated by Ganesh Kumar Jha) में लिखते हैं कि घाघ पुरातन कवि थे। (?) यह ‘पुरातन’ कितना पुराना है इसका स्वयं सिद्ध प्रमाण कहीं नहीं मिलता है।

गौरतलब यह भी है कि अगर घाघ 17वीं सदी के कवि थे तो उनके ‘कहे’ का कोई संकलन तो मिलता, मगर दुख की बात कि इनके दोहे भड्डरी और खोना के साथ मिक्स हो गए हैं और यह पता लगाना मुश्किल हो गया है कि किनकी मौलिकता किससे साबित है।

कवि घाघ के शिष्य थे भड्डरी। इस विषय को भी विवाद बनाया गया है। कहते हैं घाघ ब्राह्मण थे और भड्डरी अछूत लेकिन इनके प्रेम इनके दोहों से सिद्ध है जिनमें इस बात का सूत्र मिलता है कि घाघ और भड्डरी सदैव एकसाथ ही रहते थे।

उत्तर चमके बिजली पूरब बहे बाऊ ।
घाघ कहे भड्डर से बरदा भीतर लाऊ ॥

घाघ की कुछ कहावतें

सर्व तपै जो रोहिनी, सर्व तपै जो मूर।
परिवा तपै जो जेठ की, उपजै सातो तूर।।

अर्थात, यदि रोहिणी भर तपे और मूल भी पूरा तपे तथा जेठ की प्रतिपदा तपे तो सातों प्रकार के अन्न पैदा होंगे।

शुक्रवार की बादरी, रही सनीचर छाय।
तो यों भाखै भड्डरी, बिन बरसे ना जाए।।

यदि शुक्रवार के बादल शनिवार को छाए रह जाएं, तो भड्डरी कहते हैं कि वह बादल बिना पानी बरसे नहीं जाएगा।

भादों की छठ चांदनी, जो अनुराधा होय।
ऊबड़ खाबड़ बोय दे, अन्न घनेरा होय।।

यदि भादो सुदी छठ को अनुराधा नक्षत्र पड़े तो ऊबड़-खाबड़ जमीन में भी उस दिन अन्न बो देने से बहुत पैदावार होती है।

अद्रा भद्रा कृत्तिका, अद्र रेख जु मघाहि।
चंदा ऊगै दूज को सुख से नरा अघाहि।।

यदि द्वितीया का चन्द्रमा आर्द्रा नक्षत्र, कृत्तिका, श्लेषा या मघा में अथवा भद्रा में उगे तो मनुष्य सुखी रहेंगे।

सोम सुक्र सुरगुरु दिवस, पौष अमावस होय।
घर घर बजे बधावनो, दुखी न दीखै कोय।।

यदि पूस की अमावस्या को सोमवार, शुक्रवार बृहस्पतिवार पड़े तो घर घर बधाई बजेगी-कोई दुखी न दिखाई पड़ेगा।

सावन पहिले पाख में, दसमी रोहिनी होय।
महंग नाज अरु स्वल्प जल, विरला विलसै कोय।।

यदि श्रावण कृष्ण पक्ष में दशमी तिथि को रोहिणी हो तो समझ लेना चाहिए अनाज महंगा होगा और वर्षा स्वल्प होगी, विरले ही लोग सुखी रहेंगे।

पूस मास दसमी अंधियारी।
बदली घोर होय अधिकारी।
सावन बदि दसमी के दिवसे।
भरे मेघ चारो दिसि बरसे।।

यदि पूस बदी दसमी को घनघोर घटा छायी हो तो सावन बदी दसमी को चारों दिशाओं में वर्षा होगी। कहीं कहीं इसे यों भी कहते हैं-‘काहे पंडित पढ़ि पढ़ि भरो, पूस अमावस की सुधि करो।

पूस उजेली सप्तमी, अष्टमी नौमी जाज।
मेघ होय तो जान लो, अब सुभ होइहै काज।।

यदि पूस सुदी सप्तमी, अष्टमी और नवमी को बदली और गर्जना हो तो सब काम सुफल होगा अर्थात् सुकाल होगा।

अखै तीज तिथि के दिना, गुरु होवे संजूत।
तो भाखैं यों भड्डरी, उपजै नाज बहूत।।

यदि वैशाख में अक्षम तृतीया को गुरुवार पड़े तो खूब अन्न पैदा होगा।

अकाल और सुकाल
सावन सुक्ला सप्तमी, जो गरजै अधिरात।
बरसै तो झुरा परै, नाहीं समौ सुकाल।।

यदि सावन सुदी सप्तमी को आधी रात के समय बादल गरजे और पानी बरसे तो झुरा पड़ेगा; न बरसे तो समय अच्छा बीतेगा।

असुनी नलिया अन्त विनासै।
गली रेवती जल को नासै।।
भरनी नासै तृनौ सहूतो।

कृतिका बरसै अन्त बहूतो।।

यदि चैत मास में अश्विनी नक्षत्र बरसे तो वर्षा ऋतु के अन्त में झुरा पड़ेगा; रेतवी नक्षत्र बरसे तो वर्षा नाममात्र की होगी; भरणी नक्षत्र बरसे तो घास भी सूख जाएगी और कृतिका नक्षत्र बरसे तो अच्छी वर्षा होगी।

आसाढ़ी पूनो दिना, गाज बीजु बरसंत।
नासे लच्छन काल का, आनंद मानो सत।।

आषाढ़ की पूणिमा को यदि बादल गरजे, बिजली चमके और पानी बरसे तो वह वर्ष बहुत सुखद बीतेगा।

वर्षा
रोहिनी बरसै मृग तपै, कुछ कुछ अद्रा जाय।
कहै घाघ सुने घाघिनी, स्वान भात नहीं खाय।।

यदि रोहिणी बरसे, मृगशिरा तपै और आर्द्रा में साधारण वर्षा हो जाए तो धान की पैदावार इतनी अच्छी होगी कि कुत्ते भी भात खाने से ऊब जाएंगे और नहीं खाएंगे।

उत्रा उत्तर दै गयी, हस्त गयो मुख मोरि।
भली विचारी चित्तरा, परजा लेइ बहोरि।।

उत्तर नक्षत्र ने जवाब दे दिया और हस्त भी मुंह मोड़कर चला गया। चित्रा नक्षत्र ही अच्छा है कि प्रजा को बसा लेता है। अर्थात् उत्तरा और हस्त में यदि पानी न बरसे और चित्रा में पानी बरस जाए तो उपज अच्छी होती है।

खनिके काटै घनै मोरावै।
तव बरदा के दाम सुलावै।।

ऊंख की जड़ से खोदकर काटने और खूब निचोड़कर पेरने से ही लाभ होता है। तभी बैलों का दाम भी वसूल होता है।

हस्त बरस चित्रा मंडराय।
घर बैठे किसान सुख पाए।।

हस्त में पानी बरसने और चित्रा में बादल मंडराने से (क्योंकि चित्रा की धूप बड़ी विषाक्त होती है) किसान घर बैठे सुख पाते हैं।

हथिया पोछि ढोलावै।
घर बैठे गेहूं पावै।।

यदि इस नक्षत्र में थोड़ा पानी भी गिर जाता है तो गेहूं की पैदावार अच्छी होती है।

जब बरखा चित्रा में होय।
सगरी खेती जावै खोय।।

चित्रा नक्षत्र की वर्षा प्राय: सारी खेती नष्ट कर देती है।

जो बरसे पुनर्वसु स्वाती।
चरखा चलै न बोलै तांती।

पुनर्वसु और स्वाती नक्षत्र की वर्षा से किसान सुखी रहते है कि उन्हें और तांत चलाकर जीवन निर्वाह करने की जरूरत नहीं पड़ती।

जो कहुं मग्घा बरसै जल।
सब नाजों में होगा फल।।

माघ में पानी बरसने से सब अनाज अच्छी तरह फलते हैं।

जब बरसेगा उत्तरा।
नाज न खावै कुत्तरा।।

यदि उत्तरा नक्षत्र बरसेगा तो अन्न इतना अधिक होगा कि उसे कुते भी नहीं खाएंगे।

दसै असाढ़ी कृष्ण की, मंगल रोहिनी होय।
सस्ता धान बिकाइ हैं, हाथ न छुइहै कोय।।

यदि असाढ़ कृष्ण पक्ष दशमी को मंगलवार और रोहिणी पड़े तो धान इतना सस्ता बिकेगा कि कोई हाथ से भी न छुएगा।

असाढ़ मास आठें अंधियारी।
जो निकले बादर जल धारी।।
चन्दा निकले बादर फोड़।
साढ़े तीन मास वर्षा का जोग।।

यदि असाढ़ बदी अष्टमी को अन्धकार छाया हुआ हो और चन्द्रमा बादलों को फोड़कर निकले तो बड़ी आनन्ददायिनी वर्षा होगी और पृथ्वी पर आनन्द की बाढ़-सी आ जाएगी।

असाढ़ मास पूनो दिवस, बादल घेरे चन्द्र।
तो भड्डरी जोसी कहैं, होवे परम अनन्द।।

यदि आसाढ़ी पूर्णिमा को चन्द्रमा बादलों से ढंका रहे तो भड्डरी ज्योतिषी कहते हैं कि उस वर्ष आनन्द ही आनन्द रहेगा।

पैदावार
रोहिनी जो बरसै नहीं, बरसे जेठा मूर।
एक बूंद स्वाती पड़ै, लागै तीनिउ नूर।।

यदि रोहिनी में वर्षा न हो पर ज्येष्ठा और मूल नक्षत्र बरस जाए तथा स्वाती नक्षत्र में भी कुछ बूंदे पड़ जाएं तो तीनों अन्न (जौ, गेहूं, और चना) अच्छा होगा।

जोत
गहिर न जोतै बोवै धान।
सो घर कोठिला भरै किसान।।

गहरा न जोतकर धान बोने से उसकी पैदावार खूब होती है।

गेहूं भवा काहें।
असाढ़ के दुइ बाहें।। गेहूं भवा काहें।
सोलह बाहें नौ गाहें।। गेहूं भवा काहें।
सोलह दायं बाहें।। गेहूं भवा काहें।
कातिक के चौबाहें।।

गेहूं पैदावार अच्छी कैसे होती है ? आषाढ़ महीने में दो बांह जोतने से; कुल सोलह बांह करने से और नौ बार हेंगाने से; कातिक में बोवाई करने से पहले चार बार जोतने से।

गेहूं बाहें।
धान बिदाहें।।

गेहूं की पैदावार अधिक बार जोतने से और धान की पैदावार विदाहने (धान का बीज बोने के अगले दिन जोतवा देने से,यदि धान के पौधों की रोपाई की जाती है तो विदाहने का काम नहीं करते, यह काम तभी किया जाता है जब आप खेत में सीधे धान का बीज बोते हैं) से अच्छी होती है।

गेहूं मटर सरसी।
औ जौ कुरसी।।

गेहूं और मटर बोआई सरस खेत में तथा जौ की बोआई कुरसौ में करने से पैदावार अच्छी होती है।

गेहूं गाहा, धान विदाहा।
ऊख गोड़ाई से है आहा।।

जौ-गेहूं कई बांह करने से धान बिदाहने से और ऊख कई बार गोड़ने से इनकी पैदावार अच्छी होती है।

गेहूं बाहें, चना दलाये।
धान गाहें, मक्का निराये।
ऊख कसाये।

खूब बांह करने से गेहूं, खोंटने से चना, बार-बार पानी मिलने से धान, निराने से मक्का और पानी में छोड़कर बाद में बोने से उसकी फसल अच्छी होती है।

पुरुवा रोपे पूर किसान।
आधा खखड़ी आधा धान।।

पूर्वा नक्षत्र में धान रोपने पर आधा धान और आधा पैया (छूछ) पैदा होता है।

पुरुवा में जिनि रोपो भैया।
एक धान में सोलह पैया।।

पूर्वा नक्षत्र में धान न रोपो नहीं तो धान के एक पेड़ में सोलह पैया पैदा होगा।

बोवाई
कन्या धान मीनै जौ।
जहां चाहै तहंवै लौ।।

कन्या की संक्रान्ति होने पर धान (कुमारी) और मीन की संक्रान्ति होने पर जौ की फसल काटनी चाहिए।

कुलिहर भदई बोओ यार।
तब चिउरा की होय बहार।।

कुलिहर (पूस-माघ में जोते हुए) खेत में भादों में पकने वाला धान बोने से चिउड़े का आनन्द आता है-अर्थात् वह धान उपजता है।

आंक से कोदो, नीम जवा।
गाड़र गेहूं बेर चना।।

यदि मदार खूब फूलता है तो कोदो की फसल अच्छी है। नीम के पेड़ में अधिक फूल-फल लगते है तो जौ की फसल, यदि गाड़र (एक घास जिसे खस भी कहते हैं) की वृद्धि होती है तो गेहूं बेर और चने की फसल अच्छी होती है।

आद्रा में जौ बोवै साठी।
दु:खै मारि निकारै लाठी।।

जो किसान आद्रा में धान बोता है वह दु:ख को लाठी मारकर भगा देता है।

आद्रा बरसे पुनर्वसुजाय,
दीन अन्न कोऊ न खाय।।

यदि आर्द्रा नक्षत्र में वर्षा हो और पुनर्वसु नक्षत्र में पानी न बरसे तो ऐसी फसल होगी कि कोई दिया हुआ अन्न भी नहीं खाएगा।

आस-पास रबी बीच खरीफ।
नोन-मिर्च डाल, खा गया हरीफ।।

खरीफ की फसल के बीच में रबी की फसल अच्छी नहीं होती।

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