आम चुनाव 2019 : पश्चिम बंगाल में लहराया भगवा, ममता की नींद उड़ी

नई दिल्ली:

अगर लोकसभा चुनाव परिणाम 2019 को एक संकेत की तौर पर देखा जाए तो भारतीय जनता पार्टी के चमकदार प्रदर्शन से पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की रातों की नींद उड़ सकती है।

लोकसभा में 12 सीटों का नुकसान हुआ तृणमूल कांग्रेस को

लोकसभा चुनाव परिणाम के आंकड़ों को एकबारगी देखते ही यह बात समझ में आ जाती है कि पश्चिम बंगाल में आने वाला समय तृणमूल कांग्रेस के लिए ढेरों कठिनाइयां लेकर आना वाला है। राज्य की 42 लोकसभा सीटों में तृणमूल कांग्रेस के खाते में 22 सीटें आई हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव से 12 सीटें कम। इसका मतलब बिल्कुल साफ है कि पार्टी 294 सदस्यीय विधानसभा में महज 150 विधानसभा सीटों पर अपना प्रदर्शन बचा कर रखने में कामयाब हो पाई है।

बंगाल में भाजपा का ऐतिहासिक प्रदर्शन

इसके वीपरीत भगवा धारी भारतीय जनता पार्टी के राज्य की 18 लोकसभा सीटों पर अपना झंडा गाड़ एतिहासिक प्रदर्शन कर पाने में कामयाब हुई। विधानसभा वार इस आंकड़े को अगर देखा जाए राज्य में 129 विधानसभा सीटों पर केशरिया लहरा गया है। दूसरे शब्दों में विधानसभा में बहुमत के जादुई आंकड़े 148 से महज 19 सीटों का फासला। आने वाले विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी तृणमूल कांग्रेस के सामने किस तरह की चुनौती पेश करने वाली है इसका अंदाज लोकसभा चुनाव के साथ साथ राज्य की आठ विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के परिणामों से भी दिखता है। भारतीय जनता पार्टी आठ में से चार सीट जीत कर राज्य विधानसभा में अपने विधायकों की संख्या सात करने में कामयाब रही।

साभार: निर्वाचन आयोग

2014 लोकसभा चुनाव में भाजपा को पश्चिम बंगाल में मिले 17.2 फीसदी वोट शेयर की तुलना में इस बार राष्ट्रवादियों की सेना राज्य की 40.25 वोट शेयर जुटा पाने में कामयाब रही। यानी राज्य की 2.17 करोड़ मतदाताओं ने भाजपा को वोट किए। यह आंकड़ा तृणमूल को मिले वोट से महज 17 लाख कम है। तृणमूल कांग्रेस को आने वाले समय में ज़ाहिर है इस तीन फीसदी वोट के अंतराल को बनाए रख पाना बहुत श्रमसाध्य कार्य होने वाला है।

साभार – निर्वाचन आयोग

उत्तरी बंगाल और राज्य के आदिवासी बहुल इलाकों में छा गई भाजपा

उत्तरी बंगाल के ग्रामीण इलाकों में तो भाजपा का जादू पश्चिम बंगाल के मतदाताओं के सिर चढ़कर बोला। उत्तरी बंगाल की आठ लोकसभा सीटों में से भाजपा ने दक्षिण मालदा छोड़कर तृणमूल कांग्रेस का सात सीटों से सफाया कर दिया। भाजपा न केवल दार्जिलिंग सीट जीतने में सफल रही बल्कि तृणमूल कांग्रेस से आदिवासी बहुल अलीपुरद्वार, जलपाइगुड़ी और बालुरघाट साथ ही मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से रायगंज छीनने में कामयाब रही। दार्जिलिंग का परिणाम एक बार फिर इस बात पर मोहर लगा गया कि गोरखाओं को लेकर ममता बनर्जी की कठोर नीति और गोरखा जनमुक्ति मोर्चा को तोड़ने की ममता की नीति तृणमूल के परिणामों पर भारी पड़ गया। मणिपुर में भी बिमल गुरूंग के समर्थन वाले प्रत्याशी राजू बिस्ट को साढ़े तीन लाख से भी अधिक वोटों से जीत मिली। पश्चिम बंगाल के अमेठी के रूप में प्रसिद्ध और कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे अब्दुल गनी खान चौधरी की पारंपरिक सीट माने जाने वाली मालदा उत्तर सीट पर भाजपा भगवा लहराने में कामयाब रही। मालदा उत्तर से भाजपा प्रत्याशी खगेन मुर्मू ने अब्दुल गनी खान चौधरी की सियासी वारिश मौसम नूर को तकरीबन 82 हजार वोटों से पटखनी दी। बंगाल में अपने प्रचंड सफलता के दौर में भी ममता बनर्जी मालदा की दोनों सीटों मालदा उत्तर औऱ दक्षिण से कांग्रेस का कब्जा नहीं तोड़ पाईं थीं।

बंग्लादेश से सटे भारत के इलाकों में भाजपा को समर्थन

पश्चिम बंगाल में भाजपा की लहर राज्य के आदिवासी बहुल इलाकों पुरुलिया, बांकुड़ा, बिष्णुपुर, झारग्राम और मिदनापुर में भी देखने को मिला जहां भाजपा ने सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस से ये सभी पांच सीटें छीन लीं। यही नहीं एनआरसी पर हंगामा मचाने वाली ममता बनर्जी को लोकसभा चुनावों में भारत-बंग्लादेश सीमावर्ती इलाकों में भी पटखनी दी है। बंग्लादेश सीमा से सटे बोगांव और रानाघाट विधानसभा सीटों मटुआ आबादी जो कि इन विधानसभा सीटों पर तकरीबन 40 फीसदी है, अधिकांश ने भाजपा को अपना पसंद माना। बंग्लादेश सीमा पर बोगांव और रानाघाट विधानसभा सीटों पर भाजपा को मिली बढ़त से ये बात तो साफ हो गई कि नागरिकता संशोधन विधेयक और एनआरसी रजिस्टर पर विपक्ष के हंगामे से भाजपा की सेहत कमजोर तो नहीं हुई, मजबूत और हो गई।

लेफ्ट फ्रंट के वोट भाजपा को शिफ्ट होने से ममता की परेशानी और बढ़ी

पश्चिम बंगाल में भाजपा की सफलता के लिए जिम्मेदार अनेक वजहों में से सबसे बड़ी वजह जो आने वाले समय ममता बनर्जी को परेशान कर सकते हैं वो रहा राज्य में लेफ्ट फ्रंट के वोट शेयर में कमी और इस वोट शेयर का भाजपा के पक्ष में आ मिलना। पिछले लोकसभा चुनाव (2014) में वाम दलों के मिले 29 फीसदी वोट शेयर, इस बार कम होकर महज सात फीसदी पर जा टिका। भाजपा को 2014 में 17 फीसदी वोट पश्चिम बंगाल में मिले थे जो इस बार बढ़कर तकरीबन 41 फीसदी हो गए।

आगे-आगे देखिए होता है क्या : मुकूल रॉय

तृणमूल कांग्रेस से भाजपा में आने वाले मुकूल रॉय राज्य में दहाड़ कर आगे निकलती भाजपा के प्रदर्शन और सत्ताधारी तृणमूल के भविष्य के संकटों को बस एक पंक्ति में बयां करते हैं, “बंगाल की सत्ताधारी तृणमूल बहुत जल्द अतीत की वस्तु हो जाएगी”। मुकूल रॉय मुस्कुराते हुए आगे जोड़ते हैं, “इंतजार कीजिए और देखते रहिए।”

राज्य में भाजपा के कई वरिष्ठ नेता ये बताते हैं कि सत्ताधारी तृणमूल के कई विधायकों ने भाजपा के दरबाजे खटखटाने शुरू भी कर दिए हैं। राज्य में लोकसभा चुनाव के दौरान चुनाव प्रचार में गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपनी चुनावी रैली में इसके संकेत दिए थे।

भाजपा को राज्य में मिली अप्रत्याशित सफलता से सदमें में गई तृणमूल कांग्रेस में मची खलबली शुक्रवार को उस वक्त उजागर भी हो गई जिस वक्त मुकूल रॉय के लड़के शुभ्रांग्सु को छह साल के लिए पार्टी से निलंबित करने का आदेश सुनाया।

परिणाम आने से तृणमूल कांग्रेस की बेचैनी को इससे भी भली-भांति समझा जा सकता है कि परिणामों की घोषणा को दो दिन बीत चुके हैं और पार्टी की ओर से अब तक इन परिणामों पर प्रतिक्रिया देने के लिए कोई भी नेता सामने नहीं आया है।

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