‘भारत-जापान संबंध और एशिया प्रशान्त में शक्ति संतुलन’ – डॉ सुधीर सिंह

आलेख

डॉ. सुधीर सिंह

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कुछ दिनों पहले ही जापान के दो दिवसीय दौरे पर थे। 75 बिलियन डॉलर मुद्रा समझौते सहित कई महत्वपूर्ण सहमति दोनों देशों के बीच बनी। इस यात्रा के और कई निहितार्थ हैं। आर्थिक संबंध के लिहाज से भारत-जापान के बीच 17 विलियन के पास ही द्विपक्षीय व्यापार है। लेकिन भारत-जापान के आर्थिक संबंधों से ज्यादा रणनीतिक संबंध महत्त्वपूर्ण है। जापान एशिया का ही नहीं बल्कि विश्व परिप्रेक्ष्य का एक अति महत्त्वपूर्ण देश है। जापान एशिया का ऐसा देश है जिस पर कोई भी औपनिवेशिक देश कब्जा नहीं जमा पाया। 1905 में जापान ने सर्वशक्तिमान रूस को हरा दिया था। द्वितीय विश्व युद्ध के पहले तक जापान ने कई बार चीन पर हमला किया और लाखों चीनी इन हमलों में मारे गये। द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की अहम भूमिका रही। सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिंद फौज का जापान ने साथ दिया था। इससे भारत में एक सकारात्मक माहौल बना और अंग्रेज भारत को छोड़ने को विवश हुए। जापान में बौद्ध धर्म का प्रभुत्व है और यह भारत से ही वहाँ पहुँचा। शीत-युद्धकाल में हमारे नेताओं की अदूरदर्शिता के कारण हमारा संबंध हितों की समानता के बावजूद जापान के साथ परवान नहीं चढ़ पाया। 1998 में पोखरण विस्फोट के उपरोक्त जापान ने भारत पर अनेकों प्रतिबंध लगा दिये थे। अगले ही वर्षों में इन प्रतिबंधें को हटा लिया गया। तब से अभी तक द्विपक्षीय संबंध लगातार परवान चढ़ रहा है।

दरअसल भारत-जापान संबंध सन 2000 के बाद लगातार परवान चढ़ रहा है। चीन का बढ़ता-प्रभुत्व एवं अमेरिका का कमजोर होता आभामंडल इसके प्रधान कारण हैं।

चीन आज 11 ट्रीलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था है और इसका विदेशी मुद्रा भंडार 3 ट्रीलियन डॉलर है। इस अकूत संपत्ति को चीन अपने विस्तारवादी एजेंडे को पूरा करने में लगाना चाहता है। इसके निष्पादन के लिए चीन ने कई महत्वाकांक्षी योजनाओं को लागू किया है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में इन योजनाओं को और भी तेजी से लागू किया जा रहा है। इस नवअर्जित आर्थिक शक्ति के कारण चीन अपनी विस्तारवादी नीतिओं को लागू करना चाहता है। पूर्वी चीन सागर में चीन जापान अधिकृत द्वीपों पर इन्हीं कारणों से कब्जा करना चाहता है। चीन चाहता है कि एशिया पर उसका कब्जा हो जाए और शेष दुनिया में वह अमेरिका के साथ शक्ति का बंटवारा करे। भारत और जापान इसके विपरीत बहुध्रुवीय एशियाई व्यवस्था चाहते हैं। आसियान देशों सहित दक्षिण कोरिया आदि देश भी ऐसा ही चाहते हैं। अमेरिका अपनी शक्ति में ह्रास के बावजूद आज भी दुनिया की बड़ी ताकत है। पिछले दशक में भारत-अमेरिका-जापान संबंध काफी मजबूत हुए हैं। इसके मूल में चीन का प्रतिरोध है। चीन की विस्तारवादी योजनाओं को रोकना इन देशों की प्राथमिकता है। जुलाई 2018 से चीन और अमेरिका में व्यापार युद्ध जारी है।

भारत-जापान-अमेरिका-ऑस्ट्रेलिया 2007 से ही संयुक्त नौ सेना अभ्यास कर रहे हैं। इस तरह के त्रिपक्षीय सहयोग भविष्य में और भी बढ़ने की संभावना है। जापानी प्रधानमंत्री जो 2012 से लगातार अपने पद पर हैं और 2021 तक निश्चित तौर पर रहेंगे इनसे स्थिरता की पूरी संभावना है। क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्व के बाद ही जापान में अस्थिर सरकारें रही हैं। प्रधानमंत्री शिंजो अबे को संसद के दोनों सदनों में भी बहुमत है और विदेश संबंधों से संबंधित संविधान संशोधन करने में अब वो सक्षम हैं।

अमेरिका भी चाहता है कि भारत-जापान संबंध अपनी पराकाष्ठा तक पहुँचे। एशिया में चीन के प्रभुत्व को रोकना अमेरिका की सर्वोच्च प्राथमिकता में से एक है। प्रधानमंत्री मोदी और अबे में व्यक्तिगत संबंध बहुत ही अच्छे हैं। भारत-चीन सीमा पर जापान सड़कों का जाल बिछा रहा है। तकनीक के मामले में भी जापान काफी आगे हैं और भारत-जापान अपने संयुक्त प्रयास से तीसरे देशों में भी संयुक्त उद्यम लगाने जा रहे हैं। अफ्रीका और एशिया के अल्प विकसित देशों में इन प्रयासों से चीन के प्रभाव को बड़े पैमाने पर कुंठित करने में मदद मिलेगी। भारत-जापान का संबंध पिछले 18 वर्षों से तेजी से बढ़ा है पिछले 5 वर्षों में प्रधनमंत्रा मोदी अपने जापानी समकक्ष से 12 बार मिल चुके हैं। औद्योगिक क्रांति के बाद युरोप का 250 वर्षों तक विश्व-परिदृश्य पर प्रभुत्व रहा। द्वितीय विश्वयुद्व के बाद से अभी तक अमेरिका का प्रभुत्व है लेकिन अब एशिया तेजी से बढ़ रहा है। इसलिए एशिया पर जिस देश का 21वीं सदी में प्रभुत्व होगा वही देश वैश्विक परिदृश्य पर प्रभुत्व बना कर रखेगा। भारत और जापान एशिया के महत्वपूर्ण देश हैं यह दोनों देश सम विचार वाले देशों के साथ मिलकर एशिया के बहुधु्रवीय स्वरूप को सुनिश्चित कर सकते हैं। चीन भी इससे नियंत्रित रहेगा और एशिया का भी संतुलन सकारात्मक रहेगा। विदेश नीति के क्षेत्र में मोदी सरकार ने आश्चर्यजनक सपफलता पायी है। भारत-जापान संबंध इसका जीता जागता उदाहरण है।

भारत-जापान संबंध दोनों देशों के लिए सकारात्मक है ही साथ ही इससे एशिया में भी सकारात्मक संतुलन रहेगा। प्रधानमंत्री मोदी की वर्तमान जापान यात्रा ने इस प्रक्रिया को और भी मजबूत बनाया और भारत की कूटनीतिक गुणवत्ता को साबित किया है।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के दयाल सिंह कॉलेज में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक हैं)

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