भारत की हिन्द महासागरीय रणनीति

कर्ण भास्कर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल सम्भालने के महज सप्ताह भर बाद कूटनीतिक गहमागहमी की शुरुआत इस दफ़े हिन्द महासागर के गर्म होते पानी और देर से आते मानसून के बीच मालदीव और श्रीलंका की अत्यधिक व्यस्तता भरी राजकीय यात्रा से हुई। इससे पहले उन्होंने अपने पहले कार्यकाल 2014 के जून में दो भूआवेष्ठित देश हिमालयी देश भूटान और नेपाल की यात्रा से शुरू की थी। पहले कार्यकाल में हिमालय और फिर दूसरे में हिन्द महासागरीय देशों कि यात्रा से आख़िर मोदी विश्व को क्या संकेत देना चाह रहे है ?

अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में भूगोल की सदैव महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यह भूगोल ही जो 1200 से ज्यादा बेतरतीब फैले कोरल द्वीपसमूह और महज पांच लाख से कम जनसंख्या वाले मालदीव को अत्यधिक रणनीतिक महत्व प्रदान करता है। यह देश विश्व के व्यस्ततम पूर्वी पश्चिमी समुद्री नौवहन मार्ग पर अवस्थित है। जब हम बेतरतीब फैलाव वाले आबादी रहित द्वीपों की बात करते हैं तो यहां प्रशासन चलाना टेढ़ी खीर हो सकती है लेकिन सामरिक, रणनीतिक और लॉजिस्टिक के लिहाज से ये कटे छंटे द्वीप समूह बेहद महत्वपूर्ण और मुफ़ीद माने जाते है।

भारत और श्रीलंका के सांस्कृतिक, धार्मिक, भाषाई और विद्वता के सम्बंध करीब 2500 वर्ष पुराने है। श्रीलंका को हम यूं नही “गेटवे ऑफ एशिया” कहते है। अपनी अनूठे भौगोलिक स्थिति लिए इस देश को मोतियों को देश भी कहा जाता है।

प्रधानमंत्री की हालिया आतंकी हमलों से त्रस्त श्रीलंका की निडर और बेख़ौफ़ यात्रा ने अत्यधिक सुकुमार और संवेदनशील उन पश्चिमी देशों के मुंह पर करारा तमाचा मारा है जिन्हें दक्षिण एशिया में थोड़ी सी हल्ला हंगामा या आतंकी घटना के बीच फौरन अपने नागरिकों को उस देश या विशेष क्षेत्र में अपने नागरिकों को न जाने की लंबी लम्बी “एडवाइजरी ” जारी करता है। जिससे सम्बंधित देश का पर्यटन और सेवा क्षेत्र ख़ासा प्रभावित होता है। प्रधानमंत्री के यात्रा की इस सफल मेजबानी के बाद श्रीलंका ने देश मे कानून और व्यवस्था की स्थिति पर उठ रहे सारे सवाल को दरकिनार कर दिया। इस यात्रा के बाद निश्चित रूप से अन्य देश श्रीलंका पर लगाये गए अपनी-अपनी ट्रेवल एडवाइजरी” वापस लेंगे जिससे श्रीलंका के पर्यटन और सेवा क्षेत्र में उछाल आएगा।

मालदीव के ये बिखरे द्वीप अपनी भौगोलिक स्थलाकृतियों के कारण बेहतरीन सबमरीन हाईड आउट्स हो सकते है। इन बिखरे द्वीपों पर खास तौर पर विशेषीकृत और उच्च सैन्य प्रयोगशाला, केमिकल बायोलॉजिकल और न्यूक्लियर हथियारों का जखीरा स्थल, विशेष बलों के सेफ हाउस और डिटेंशन सेंटर, सैटेलाइट लिसनिंग स्टेशन, लम्बी दूरी के निगरानी के लिए राडार केंद्र, रणनीतिक मौसम पूर्वानुमान राडार केंद्र, मिसाइल लांच पैड्स , मिसाइल बैटरी और डिपो, आपातकालीन कॉलिंग ऑन पोर्ट, विशेषीकृत आसूचना केंद्र, एन्टी पायरेसी अभियान को अंजाम देने वाले विशेष बलों का ठिकाना, कोस्टल रडार सर्विलेंस सिस्टम का बेस, गुप्त और एन्ड टू एन्ड एन्क्रिप्टेड संचार के लिए समर्पित केंद्र आदि स्थापित किए जा सकते है।

इन द्वीपों की यही खासियत चीन समेत अन्य देशों को लुभाती है जिसके लिए वे हरवक्त तत्पर दिखते हैं। आज भी करीब करीब सभी महाशक्तियों के “ओवरसीज टेरिटरी’ को आज भी देखा जा सकता है,जिसका बेहतरीन उदाहरण मालदीव के समीपस्थ हिन्द महासागर में अवस्थित ब्रिटिश अमेरिकी एयरफोर्स और नेवी का बेस डिएगो गार्शिया है।

मालदीव के बिखरे हुए द्वीप और श्रीलंका के तटीय क्षेत्र दोनों देशों के पर्यटन और सेवा क्षेत्र में अहम भूमिका निभाते हैं तो दूसरी ओर दूसरे देशों को अपनी ठोस रणनीतिक स्थिति बनाने में मदद करते हैं। चीन भी इसी कारण से मालदीव के पूर्ववर्ती सरकार से वहां के कई द्वीप पर्यटन विकसित करने के झांसे में खरीद चुका या सौदे को अंतिम रूप दे चुका है। अगर ऐसा हुआ तो उन द्वीपों पर पर्यटन को छोड़कर बाकी वह सब कुछ होगा जिसकी हम कल्पना नहीं कर सकते है।

यही हाल श्रीलंका की कोलम्बो हम्बनटोटा और अन्य तटीय क्षेत्रों में अवसंरचनात्मक क्षेत्रों में भारी चीनी निवेश और बंदरगाहों का उन्नयन का भी है। चीन ने हम्बनटोटा बन्दरगाह को 99 वर्ष के पट्टे पर ले रखा है। यह अलहदा है कि भारतीय और अंतरराष्ट्रीय दवाब के कारण श्रीलंका की नौसेना ने अपना दक्षिणी कमान को हम्बनटोटा में ले जाने का निर्णय किया और चीन को ”सामरिक महत्व” के किसी तरह के कार्यों से दूर रहने का “अनुरोध”किया है । वैसे हम चीन के कारनामों को पहले भी दक्षिणी चरण सागर में स्पार्टले द्वीप समूह पर पर देख चुके हैं ।

यहां गौर करने वाली बात यह है कि उनकी यह यात्रा ठीक ऐसे समय हो रही है जब चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग रूस के दौरे पर हैं और अपने समकक्ष व्लादिमीर पुतिन के साथ निश्चित रूप से बैठकर “मस्कोवस्कया ओसोबया” (Moskovskaya Osobaya) का तो स्वाद नही ही चख रहे होंगें न ही “पांडा” का आदान प्रदान कर रहे होंगे । यह विगत छह वर्षो ने चीनी राष्ट्रपति ही आठवीं रूसी यात्रा है।

दोनों देश अपने राजनयिक रिश्तों की 70वीं वर्षगांठ मना रहे है। जब दुनिया आर्थिक अंधराष्ट्रवाद, एकपक्षीयवाद और संरक्षणवाद के मसले का सामना कर रही है तो चीन और रुस बहुपक्षीय बातचीत कर रहे हैं। इस बातचीत के अलग ही मायने है।

आज ये तीनों राजनेता अलग अलग मसलों पर बात कर रहे हैं लेकिन आगामी 13-14जून के बीच ये तीनो नेता किर्गिज़स्तान बाकी राजधानी बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन में साथ होंगे और फिर नये मसले पर चर्चा करेंगे।

प्रचंड जनादेश के साथ सत्ता वापसी के बाद वैश्विक स्तर पर चर्चा के केंद्रबिंदु रहे प्रधानमंत्री मोदी की यह दोनों द्वीपीय देशों की यात्रा गाहे बगाहे विशेषज्ञों को अनेको प्रश्नों और संभावनाओं वहीं विरोधियों के लिए आशंकाओं को जन्म देती है। चूंकि कूटनीति में नकारात्मक से सकारात्मक की तरफ आना एक “सेफ जोन” माना जाता है।

प्रधानमंत्री की यात्रा और मालदीव के सांसद “पीपुल्स मजलिस” में और कोलंबो के इंडिया हाउस में उनके वक्तव्यों पर अगर ध्यान केंद्रित किया जाय तो हम पाते हैं कि… इस यात्रा से उन्होंने मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति और वर्तमान मालदीव संसद के अध्यक्ष मोहम्मद नशीद अन्नी की कालजयी कल्पना “इंडिया फर्स्ट”नीति को सम्पूर्णता और वैधता प्रदान किया। उन्होंने क्रोधित ड्रैगन की अंगारे बरसाती आंखों और निगलने को लपलपाती जीभ से मालदीव को लोकतन्त्र की दुहाई देकर बचा लिया। हलांकि यह कदम उन्हें अपने पहले कार्यकाल में हीं उठाना चाहिए था, लेकिन ” देर आये पर दुरुस्त आए” की यह नीति उतनी भी बुरी नहीं हैं।

आज इन चीनी ऋणग्रस्त देशों को एहसास हो रहा है कि अपनी संप्रभुता के साथ तात्कालिक समझौता कर , उच्च वृद्धि दर के हसीन सपनों को हासिल करने के चक्कर मे उन्होंने न सिर्फ अपने कोमल पैर पर स्वयं से कुल्हाड़ी का तेज प्रहार किया बल्कि क्षेत्र की पूरी “सुरक्षा आर्किटेक्चर” को बिगाड़ कर रख दिया है।

चूंकि भारत अपने निकट पड़ोस में घटित हो रहे इन तमाम घटनाओं पर धृतराष्ट्र कि भाँति आंख मूंदे नहीं रह सकता सकता तब जबकि उसकी सीता और द्रौपदी का सामूहिक चीरहरण होता रहे। नेपाल, भूटान, बंगलादेश, मालदीव और श्रीलंका सही मायने में हमारी विदेश नीति की “राष्ट्रीय अस्मिता, इज्जत और सम्मान” हैं। इनपर किसी तरह की धीमी से धीमी आंच और हल्का सा खरोंच हमें बर्दाश्त से बाहर होना चाहिए। इनपर खरोंच का सीधा मतलब हमारी एकता और अखंडता के साथ क्षेत्रीय संप्रभुता पर खतरे से है, और अपनी संप्रभुता की रक्षा करना आपका नैसर्गिक अधिकार है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मालदीव का सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान देकर मालदीव ने अपने पूर्ववर्ती के शासन में उत्पन्न हुए भारत विरोधी बयार को मन्द करने की दिशा में परिपक्व राजनय का परिचय दिया है। वहीं श्रीलंका में नरेंद्र मोदी का तेज मानसूनी हवाओं और झमाझम बारिश ने किया। प्रोटोकॉल तोड़ते हुए श्रीलंका के राष्ट्रपति ने जिस कदर स्वयं प्रधानमंत्री को भींगने से बचाने के लिए खुद छाता खोलकर, बाकी रही सही सम्भावनाओं को भी निर्मूल साबित कर दिया।

भारत के संकल्प पर गौर किया जाय, तो “भारत मालदीव के साथ अपने संबंधों को सबसे अधिक महत्व देता है। हम एक दूसरे के साथ एक गहरी और मजबूत साझेदारी चाहते हैं। एक समृद्ध, लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण मालदीव पूरे क्षेत्र के हित में है। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया “मैं यह दोहराना चाहता हूं कि भारत मालदीव की “हर संभव “सहायता करने के लिए हमेशा प्रतिबद्ध है। “हमारे दोनों देशों को ‘हिन्द महासागर “की लहरों ने हजारों साल से घनिष्ठ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों में बांधा है। यह अटूट मित्रता मुश्किल समय में भी हमारी मार्गदर्शक बनी है। मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि भारत अपनी शक्ति और क्षमताओं का उपयोग केवल अपनी समृद्धि और सुरक्षा के लिए ही नहीं करेगा बल्कि इस क्षेत्र के अन्य देशों की क्षमता के विकास में, आपदाओं में उनकी सहायता के लिए, तथा सभी देशों की साझा सुरक्षा, संपन्नता और उज्ज्वल भविष्य के लिए करेगा।”

“भारत प्रशान्त क्षेत्र हमारी जीवन रेखा है और व्यापार का राजमार्ग भी है। यह हर मायने में हमारे साझा भविष्य की कुंजी है। इसलिए, मैंने जून 2018 में सिंगापुर में बोलते हुए Indo-Pacific Region में खुलेपन, एकीकरण एवं संतुलन कायम करने के लिए सबके साथ मिलकर काम करने पर ज़ोर दिया था”। प्रधानमंत्री ने कहा कि “समर्थ, सशक्त और समृद्ध “भारत दक्षिण एशिया और इंडो पैसिफ़िक (भारत-प्रशांत) में ही नहीं, पूरे विश्व में शांति, विकास और सुरक्षा का आधार स्तम्भ होगा। हम सामुद्रिक पड़ोसी हैं, हम मित्र हैं और दोस्तों में कोई छोटा और बड़ा, कमज़ोर और ताकतवर नहीं होता। शांत और समृद्ध पड़ौस की नींव भरोसे, सद्भावना और सहयोग पर टिकी होती है”।

यह बात भारत के बिग ब्रदर एटीट्यूड को नहीं बल्कि भारत के पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज प्रतिपादित “Elder Brother Atitude” कांसेप्ट को मूर्त रूप प्रदान करता है। वहीं श्रीलंका के दौरे पर उंन्होने स्पष्ट रूप से कहा कि भारत जरूरत के समय अपने दोस्तों को कभी नहीं भूलता” उनके इस वक्तव्य से चीनी कर्ज़े में डूबते श्रीलंका की स्थिति की विकरालता और गंभीरता का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। यहां भारत की जिम्मेदारी भी बनती है कि वह श्रीलंका की स्थिति की व्यापक तौर पर सुलझाए और विभिन्न मोर्चों पर दिल खोल कर आर्थिक मदद दे।

मालदीव के सदन “पीपुल्स मजलिस “में प्रधानमंत्री के संयुक्त सदन में संबोधन के अपने गहरे निहितार्थ हैं जो उन्होंने इस शांतिप्रिय क्षेत्र में भारतीय हितों और चिंता और अपनी परवाह को बेहद सरल शब्दों में पूरी स्पष्टता के साथ रखते हुए इस क्षेत्र में इंडिया फर्स्ट की अवधारणा को सत्यता प्रदान किया।

सबसे बड़ा सवाल

श्रीलंका और मालदीव अपने भौगोलिक अवस्थिति को लेकर हमारे लिए हिन्द महासागर के दो अनमोल मोती हैं जिन्हें बेल्ट एंड रोड और मेरीटाइम सिल्क रोड जैसे अत्यधिक लचीले , धारदार और बेहद मजबूत चीनी रेशम से चीन अपनी “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” रणनीति के जरिए पिरो चुका है। पाकिस्तान के “ग्वादर”, मालदीव के ‘मराओ” श्रीलंका के “हम्बनटोटा”, म्यामार के “कोको द्वीप समूह” और बांग्लादेश के “कॉक्सबाज़ार और चटगांव” को अगर नक्शे पर देखें तो चीनी रेशम ने इन सभी स्थानों को एक सूत्र में पिरो दिया है। इन सभी स्थानों पर चीन ने अत्यधिक अवसंरसनात्मक विकास के लिए अत्यधिक निवेश किया है और इन जगहों पर अपने सामरिक और लॉजिस्टिक क्षमता विकसित की है। अगर समय रहते इन मालाओं के रेशम को न काटा गया तो तो ये दक्षिण एशिया के राजनीति में चीनी पदार्पण होगा। हिन्द महासागर का नीला पानी पहले गर्म और फिर लाल होगा और ये मोतियों की माला हमारी गर्दन पर धीरे धीरे कसती जाएगी। फिर हमारा दम घुटेगा। यह समस्या सिर्फ समुद्र से ही नहीं स्थल खंड पर भी बरक़रार है। तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र से नेपाल की राजधानी काठमांडो तक प्रस्तावित सीधी रेल सेवा, भूटान के चुम्बी घाटी के जरिये सिलीगुड़ी कॉरिडोर या संकरी चिकेन नेक पर ड्रैगन की नजर जिसे वह कब्जा कर एक ही झटके में गर्दन दबाते हुए भारतीय मुख्य भूमि से उत्तरपूर्व के आठ राज्यों को काट अपने दक्षिणी तिब्बत में मिलाने की मंशा जाहिर कर चुका है।

इसलिए समय रहते हुए भारत को चाहिए कि चीनी ड्रैगन के घातक जहर का तत्काल और प्रभावी और अचूक इलाज ढूंढेते हुए खुद के साथ इन् पड़ोसी देशों को भी बचाएं।

चीन अपने “फाइव फिंगर पालिसी” में कोई बदलाव नहीं करने जा रहा है तो ऐसी स्थिति में भारत को अपने पड़ोसी देशों के साथ “गुजराल डॉक्ट्रिन”, नेबरहुड फर्स्ट, एक्ट एंड एक्सटेंडेड, एशिया और सागर नीति को नए सिरे से और व्यावहारिक तौर पर हिन्द महासागर के भू रणनीतिक कैनवास पर उकेरना होगा। “बिग ब्रदर सिंड्रोम” और” बिग ब्रदर एटीट्यूड”से ग्रस्त इन पड़ोसी देशों को यह समझाये कि यह “बड़े भाई “का गलत अंग्रेजी अनुवाद है। सही अर्थों में भारत कि भूमिका “एल्डर ब्रदर”(elder brother) के रूप में रही है जो बिना किसी हेकड़ी के Helping (मददगार) caring (परवाह करने वाला) और sharing (साझीदार) की निःस्वार्थ भूमिका निभाता है और रहेगा।

भारत को चाहिए इन देशों को छोटी छोटी समस्या, जो हमारे लिए सामान्य लगे लेकिन उनके लिए संप्रभुता और राष्ट्रीय अस्मिता का खतरा बन जाती है, उन पर विशेष ध्यान दें । ट्रैक वन औऱ ट्रैक टू डिप्लोमेसी के अलावा विभिन्न पारम्परिक और गैर पारम्परिक राजनय के जरिये उनसे सदा जुड़ाव बनाये रखे।

भारतीय मीडिया संस्थानों के एयरकंडीशन स्टूडियो में बैठे एंकर और गेस्ट को चाहिए कि इन देशों के बारे में बात करने से पहले अपना सही से होम वर्क करे और रिपोर्टर चीखने और दौड़ने की बजाय उस देश के साथ भारत के विभिन्न सम्बंधो के साथ अपनी रिपोर्टिंग करे। क्योंकि हमारी थोड़ी सी चूक चाहे वह स्क्रॉल के फ़्लैश/टिकर या पैकेजिंग के स्लग में लिखी तथ्य/वर्तनी या संख्यात्मक रूप से तात्कालिक अशुद्ध ऑन एयर हो जाय जो फौरन शुद्ध कर लिया जाय लेकिन इन देशों की भारत विरोधी मीडिया को हमारी इन गलतियों से गाहे बगाहे एक चटपटा मसाला मिल जाता है जिसे अन्य भारत विरोधी शक्तियां सोशल मीडिया और अन्य साधनों के जरिये आग में घी डालते हुए माहौल बिगाड़ने में में कोई कोर कसर नहीं छोड़ती। अभी प्रधानमंत्री के शपथग्रहण समारोह में शिरकत करने आये भूटान के प्रधानमंत्री की “फोटोग्राफ” का ताज़ा विवाद हमारे सामने है।

प्रधानमंत्री ने आतंकवाद के विभन्न स्वरूपों के विभेदीकरण को एक बार सिरे से खारिज़ करते हुए उंन्होने पाकिस्तान और चीन की सदाबहार दोस्ती को आड़े लिया। प्रधानमंत्री जो कि श्रीलंका के इस्टर बम धमाके के बाद यहां पहुंचने वाले विश्व के पहले राजनेता है, उंन्होने आतंकवाद के विभिन्न स्वरूपों की एक बार फिर कड़ी निंदा की।

ऐसा तब हो रहा है भारत और पाकिस्तान आगामी 12-13 जून को किर्गिज़स्तान की राजधानी बिश्केक होने वाली शंघाई सहयोग संगठन के बैठक में आमने सामने होंगे। चीनी राष्ट्रपति से तो मोदी की एक औपचारिक/अनौपचारिक मुलाकात भी तय है, वहीं पाकिस्तान भी मोदी से बातचीत को लालायित है।

प्रधानमंत्री मोदी लोकतन्त्र की खूबसूरती और भारतीय लोकतंत्र की विशेषता को बताने के लिए जाने जाते है इसी कड़ी में मालदीव की मजलिस में उनका यह किसी अन्य देश की विधायिका में दिया गया 11वां संबोधन था। इससे पहले उंन्होने 2014 में भूटान, नेपाल, न्यूज़ीलैंड और फिजी की संसद को संबोधित किया, तो 2015 में मॉरिशस, श्रीलंका, मँगोलिया और अफ़ग़ानिस्तान की संसद में भारतीय गरिमा का मान बढ़ाया जबकि 2016 में संयुक्त राज्य अमेरिका, 2017 में अफ्रीकी देश युगांडा के संसद को संबोधित किया। प्रधानमंत्री मोदी को अब तक आठ देशों और संस्थाओ ने अपने सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार से सम्मानित किया है जिसमे रूस के सेंट एंड्रयू अवार्ड, संयुक्त अरब अमीरात का ज़ायेद मैडल, फिलिस्तीन का ग्रैंड कॉलर ऑफ द स्टेट ऑफ फिलिस्तीन, सऊदी अरब का किंग अब्दुल अजीज साश अफगानिस्तान का अमीर अमानुल्लाह खान अवार्ड, और हालिया मालदीव का निशान इज़्जुद्दीन सम्मान से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त संयुक्त राष्ट्र संघ नर चैंपियन ऑफ द अर्थ और दक्षिण कोरिया ने सिओल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया है।

भारत-मालदीव के बीच इन क्षेत्रों के उन्नयन हेतु समझौता हुआ है

  • विभिन्न द्वीपों पर पानी और सफाई की व्यवस्था;
  • छोटे और लघु उद्योगों के लिए पर्याप्त वित्त व्यवस्था;
  • बंदरगाहों का विकास;
  • कांफ्रेंस और कम्युनिटी सेंटर्स का निर्माण;
  • क्रिकेट स्टेडियम का निर्माण
  • आपातकालीन चिकित्सा सेवाएं;
  • एम्बुलेंस सेवा;
  • तटीय सुरक्षा सुनिश्चित करना;
  • आउटडोर फिटनेस उपकरण की व्यवस्था;
  • ड्रग डिटॉक्स सेंटर;
  • स्टूडेंट फेरी;
  • कृषि और मत्स्य पालन;
  • नवीकरणीय ऊर्जा और पर्यटन;
  • दोनों देशों के बीच सामरिक भागीदारी के तहत मालदीव के तटीय क्षेत्रों में राडार तन्त्र को और मजबूत करना। हमारे राडार और लिसनिंग पोस्ट पहले से भी इन इलाकों में मौजूद हैं। रक्षा बलों में क्षमता निर्माण और बेहतर समन्वय के लिए प्रशिक्षण केंद्र को रक्षा बलों को सौंपना।

भारत को इन तटवर्ती देशो के लिए खासा सावधान रहने की आवश्यकता है। इस क्षेत्र में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती चीन है। जहां भारत मालदीव और श्रीलंका को तरजीह दे रहा है तो चीन , रूस की तरफ़ निगाहें जमा रखा है। वैसे भी जब जब चीन रूस के बीच गठजोड़ हुआ है, वह भारत के लिए अच्छा साबित नही हुआ है। यह दूसरी बात है ये तीनो देश जी 20, ब्रिक्स, एससीओ, आरआईसी में बराबरी के साझेदार हैं। लेकिन चीन इस क्षेत्र में अपनी प्रभाव को किसी भी रूप में कम होने देना नही चाहेगा। मालदीव और श्रीलंका चीन को “मलक्का डाइलेमा” से मुक्ति प्रदान करने और चीन की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में अहम पड़ाव माना जाता है। इस क्षेत्र में भारत की सक्रियता को चीन कभी भी हल्के से नहीं लेगा। इसलिए भारत को सभी मोर्चों पर अत्यधिक चौकन्ना रहने की जरूरत है। यह वही चीन है जिसके राष्ट्रपति अहमदाबाद में प्रधानमंत्री के साथ वार्तालाप में व्यस्त थे तब चीनी लद्दाख के एक भारतीय सेक्टर पर स्टैंड ऑफ मॉड में काफी दिनों तक खड़े थे। कड़ी कूटनीतिक मशक्कत के बाद इस मसले को सुलझाया जा सका था। आने वाले वर्षों में हिन्द महासागर का पानी और उबलेगा, जिसमे हमे अपनी नौसेना और वायुसेना को एक “फ़ोर्स मल्टीप्लायर” के रूप में विकसित करना होगा जिससे इस क्षेत्र में दबाव बरकार रहे। आज ब्लू ईकॉनमी और पर्ल इकोनॉमी के दौर में जरूरत इस बात की है कि भारतीय नौसेना को “ब्राउन वाटर नेवी ” से “ब्लू वाटर नेवी” में जल्द से जल्द तब्दील करें क्योंकि ये ही इस क्षेत्र में आगामी वर्षो में होने वाली कड़ी कूटनीतिक और रणनीतिक झड़पों को सफलतापूर्वक अंजाम देंगे।

हिन्द महसागर में चीनी नौसेना की बढ़ती मौजूदगी में भारत की भू राजनीतिक और सुरक्षा के निहितार्थ हैं। पूरे हिन्द महसागर क्षेत्र में प्रमुख शक्तियों के बीच किसी भी संघर्ष का प्रभाव भारतीय रणनीतिक हित को व्यापक रूप से प्रभावित करेगा।

अजहरुद्दीन टैक्टिस

दरअसल इस शब्द के जनक वर्तमान भारतीये विदेश मंत्री है। मैदान में मुसीबतों के समय पूर्व भारतीय क्रिकेट टीम के सभी खिलाड़ियों को घेरे में लेकर प्रतिद्वंद्वी टीम को बुरी तरह चौंकाने की कप्तान मो. अज़हरुद्दीन की अनोखी रणनीति को डॉ जयशंकर राजनय और कूटनीतिक बिसात पर इस्तेमाल करने से नहीं चूकते है और हम पूरी उम्मीद कर सकते हैं कि वे यहां भी नहीं चूकेंगे।

अभी दौर क्रिकेट विश्वकप का चल रहा है, हरफनमौला अंग्रेज बल्लेबाज जॉनी बेयरस्टो का मानना है कि, “जिस तरह क्रिकेट के बदलते स्वरूप में जिस तेजी से “बिग हिटर्स” उभरे हैं उतनी ही तेजी के साथ “बाउंडरी कैचिंग” और रिले कैचिंग की कला और भी अहम हो गई है साथ ही फील्डिंग पोजिशन पॉइंट भी अहम हो चुकी है। आज की जरूरत के हिसाब से कूटनीति चश्मे से इस पहलू की तरफ सूक्ष्मता से अवलोकन करें तो स्थिति बेहद साफ साफ दिखाई देती है। वैसे भी कूटनीति में फील्डिंग पोजीशन का का बदलते रहना एक गतिशील, जीवन्त और दीर्घायु राजनय का संकेत है

वैसे सिक्के के दूसरे पहलू और अन्तर्राष्ट्रीय संबंध में अस्थाई हित ही सर्वोच्च होते है। यहां न तो कोई स्थायी मित्र न कोई हित और न कोई शत्रु होता है और जरूरी नहीं कि जो आप देख रहें हो वह हक़ीक़त हो, चीनी इस सिद्धांत पर आंख मूंदकर भरोसा करते हुए अपनी पूरी तैयारी को इसी पर अंजाम देते है

प्रधानमंत्री का यह सफल विदेश दौरा निश्चित रूप से इस क्षेत्र में सुरक्षा की नई अवधारणा को जन्म दिया है। अपने दूसरे कार्यकाल में “हिन्द महासागर क्षेत्र “को अपने “रणनीतिक केन्द्रबिन्दू” में रखकर भारतीये कूटनीति ने जिस परिपक्वता का परिचय दिया है वह काबिल ए तारीफ है।

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