शपथ ग्रहण के लिए बिम्सटेक देशों को न्यौता: मोदी डिप्लोमेसी का एक और मास्टर स्ट्रोक

इमरान खान के “डायलिंग डिप्लोमेसी” के बीच अपने शपथग्रहण समारोह में शांत, संपन्न और स्थिर बंगाल की खाड़ी क्षेत्र’ के संगठन “बिम्सटेक” (बे ऑफ़ बंगाल इनिशिएटिव फ़ॉर मल्टी-सेक्टरल टेक्निकल एंड इकनॉमिक कोऑपरेशन) (BIMSTEC)’ देशों के राज्यप्रमुखों के साथ साथ पारंपरिक मित्र देश मॉरीशस और मध्य एशिया के रणनीतिक और सामरिक साझेदार किर्गिज़स्तान के राज्यप्रमुख को मुख्य अतिथि के रूप में न्योता देते हुए प्रधानमंत्री “नियुक्त” नरेंद्र मोदी ने तेजी से बदलते हालिया घटनाक्रम में एक शानदार मास्टर स्ट्रोक खेलते हुए पाकिस्तान को हतप्रभ और चौकन्ने चीन को अचंभित कर पूरे एशिया औऱ इंडो पैसेफिक क्षेत्र को प्रतिसंतुलित कर दिया

भास्कर की कलम से

सत्रहवें आम चनाव के अंतिम परिणाम के मुताबिक नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में राजग गठबंधन ने शानदार और ऐतिहासिक जीत हासिल की है। अकेले भाजपा ने 303 सीट जीतकर 272 के जादुई आंकड़े से कहीं आगे निकलते हुए जीत का कीर्तिमान स्थापित किया। 2014 के नतीजों से आगे बढ़ते हुए बीजेपी ने प्रचंड बहुमत के साथ कामयाबी का परचम लहराया है और पूरे देश में पार्टी के वोट शेयर में ज़बरदस्त उछाल के साथ भाजपा ने बड़े ही आराम से बहुमत का आंकड़ा पार करते हुए देश को “टीमो” (देयर इज मोदी ओनली) फैक्टर से अवगत कराया। इससे पहले देश सिर्फ “टीना” (देयर इज नो अल्टरनेटिव टू इंदिरा गांधी) को ही समझा जाता था।

सरकार गठन से ठीक पहले वैश्विक नेताओं से मिले बधाई संदेश और अपने पाकिस्तानी समकक्ष इमरान खान के “डायलिंग डिप्लोमेसी” के बीच अपने शपथग्रहण समारोह में शांत, संपन्न और स्थिर बंगाल की खाड़ी क्षेत्र’ के संगठन “बिम्सटेक” (बे ऑफ़ बंगाल इनिशिएटिव फ़ॉर मल्टी-सेक्टरल टेक्निकल एंड इकनॉमिक कोऑपरेशन) (BIMSTEC)’ देशों के राज्यप्रमुखों के साथ साथ पारंपरिक मित्र देश मॉरीशस और मध्य एशिया के रणनीतिक और सामरिक साझेदार किर्गिज़स्तान के राज्यप्रमुख को मुख्य अतिथि के रूप में न्योता देते हुए प्रधानमंत्री “नियुक्त” नरेंद्र मोदी ने तेजी से बदलते हालिया घटनाक्रम में एक शानदार मास्टर स्ट्रोक खेलते हुए पाकिस्तान को हतप्रभ और चौकन्ने चीन को अचंभित कर पूरे एशिया औऱ इंडो पैसेफिक क्षेत्र को प्रतिसंतुलित कर दिया ।

भू:राजनीति और सामरिकी में बदलते हुए पैमानों पर आज भू:आर्थिकी और ऊर्जा सुरक्षा को तरज़ीह दी जा रही है लेकिन भूगोल का महत्व किसी भी कीमत पर कम नहीं हुआ है जिसका उदाहरण बिम्सटेक देशों के राज्य प्रमुखों शपथग्रहण में आमन्त्रण देकर, पकिस्तान और चीन की “सदाबहार दोस्ती ” की धुरी पर भारत ने एक तरह से वर्तमान वैश्विक परिस्थिति में मैदान मार लिया। शांति की राह पर चलने को व्याकुल पाकिस्तान को शपथ ग्रहण समारोह में न बुलाया जाना अपने आप में बहुत बड़ी कूटनयिक जीत मानी जा रही है। भारतीय राजनय के गलियारों में “भूगोल” को व्यापक तरजीह मिल रही है जो पिछले तीन दशकों से अमूमन देखने को नहीं मिल रही थी।

भारत ने इस फैसले से कई हितों और लक्ष्यों को जहां साधने की कोशिश की तो पूरी दुनिया को अपनी शक्ति से परिचय का संदेश भी दिया। इस फैसले के कई संभावित आयाम है जिस पर बारीक नजर डाल कर ही हम भारत के इस फैसले के भूराजनीतिक महत्व को समझ सकते हैं:

श्रीलंका में गत माह ईस्टर के मौक़े पर सिलसिलेवार हुए आत्मघाती बम हमले और इससे पूरे क्षेत्र में उपजी अस्थिरता का वातावरण।

राजनीति पर नियंत्रण, लेकिन इस्लामी चरमपंथ और कूटनीति से जूझता बांग्लादेश।

श्रीलंका में ईस्टर आत्मघाती बॉम्बिंग की घटना के बाद बांग्लादेश में गहराती सुरक्षा की स्थिति, जिसके बाद देश में सुरक्षा बलों द्वारा आतंकवादियों के खिलाफ़ अभियान चलाए जा रहे है।

पहले चीन के प्रभाव में आता नेपाल और अब राजनीतिक उथल पुथल से जूझता नेपाल , बीते सप्ताह बम हमलों के चपेट में चार लोगों की मौत।

भूटान में नयी सरकार के गठन के बाद बीजिंग की फिर से चुम्बी घाटी समेत अन्य क्षेत्रों में उसकी “हथियाने की पुरानी कोशिश” जारी है।

म्यांमार में शांति का सीधा अर्थ हमारे सम्पूर्ण उत्तरपूर्वी राज्यों की शांति तथा आर्थिक समृद्धि और खुशहाली से है। म्यांमार हमारे लिए भावी ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी अत्यधिक संवेदनशील है, जो भारत और चीन के बदलते रिश्तों में किसी तरह के बदलाव के लिये जिम्मेदार है।

काउंटर टेररिज़म के जद में श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार और भारत में आतंकवाद है।

बांग्लादेश और म्यांमार के बीच रोहिंग्या का मसला और बांग्लादेश में म्यांमार से सटे इलाके में नशीली दवाइयां से जूझना और रोहिंग्या के समस्या ने स्थिति और भी गंभीर बना दिया है।

वहीं पारंपरिक मित्र देशों में मॉरीशस एफडीआई सहित अन्य आर्थिक मोर्चे पर हमारा पुराना साथी रहा है, जो इस वक्त चागोस और डिएगो गार्सिया द्वीपों पर कानूनी कब्जे को लेकर ब्रिटेन तथा अमेरिका से उलझा पड़ा है और भारत इसमे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

उधर किर्गिज़स्तान की बात करें तो यह देश हमारे लिए मध्य एशिया का गेटवे है। शंघाई सहयोग संगठन की अध्यक्षता संभाल रहे इस भू:सामरिक और रणनीतिक महत्व के देश की अहमियत अमेरिका और रूस भी मानते है।

आज इन सभी देशों के साथ भारत के सम्बंध काफी बेहतर है, वहीं दूसरी तरफ इन देशो में चीनी चुनौती बरकरार है जिसे तोड़ना भारत के लिए एक गम्भीर समस्या की तरह है, क्योंकि म्यामांर, श्रीलंका, नेपाल , बांग्लादेश, के साथ साथ थाईलैंड में भी विशाल चीनी अवसंरचनात्मक और रणनीतिक निवेश भारत के लिए चिंता का सबब बन कर उभर रहा है, जिसकी ताज़ा कड़ी में बांग्लादेश में कॉक्स बाजार में चीनी पनडुब्बियों के लिए अवसंरचना तैयार होने की खबर निश्चित रूप से हमे परेशान करने और चीन की मोतियों की मालाओं की रणनीति/स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स का आखिरी पड़ाव के रूप में पूरा होने के रूप में देखा जाता है।

उपरोक्त घटनाक्रम पर रायसीना हिल्स की सक्रियता और प्रोएक्टिव कदम आज की स्थिर और स्थायित्व प्राप्त भारतीय राजनीति की ओर से राजनय की दृष्टि से बहुत बेहतर कदम माना जा रहा है और यही इसकी राजनयिक परिपक्वता और इस क्षेत्र में अपनी जिम्मेदारियों को दर्शाता है।

‘बे ऑफ़ बंगाल इनिशिएटिव फ़ॉर मल्टी-सेक्टरल टेक्निकल एंड इकनॉमिक कोऑपरेशन (BIMSTEC).

बिम्सटेक की स्थापना 1997 में हुई थी। एक उपक्षेत्रीय आर्थिक सहयोग संगठन के रूप में इसका गठन 6 जून, 1997 को बैंकाक घोषणा के बाद किया गया। इसमें भारत के अलावा नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार, भूटान और थाईलैंड शामिल हैं। दुनिया की 22 फीसदी आबादी बिम्सटेक देशों में रहती है। बिम्सटेक के सदस्य देशों की कुल जीडीपी 2.8 ट्रिलियन डॉलर है। बिम्सटेक देश आर्थिक और रणनीतिक रूप में काफी अहम हैं।

जहां एक तरफ हॉरमुज़ क्राइसिस, तेज़ होती व्यापार युद्ध की तपिश, अमेरिका में ट्रंप का विरोध और शिनपिंग का समर्थन, चीन-अमेरिका ट्रेड वॉर में नित आते नए मोड़, दक्षिणी चीन सागर में बढ़ता तनाव और हिंद और प्रशांत महासागर से लगे हुए चार लोकतंत्र जिनकी सोच एक जैसी मानी जाती है, जो एक भू-राजनैतिक इलाक़े का निर्माण करते हैं जिसे इंडो-पैसिफ़ि‍क कहते हैं। इंडो पसिफ़िक देशों में अमेरिका, जापान, भारत और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। जिनके साथ मिलकर आगे बढने पर चीन कि अक्सर विपरीत प्रतिक्रिया आती रहती है। लेकिन इस दफ़े भारत की ओर से दिए गए इस सधे हुए जवाब ने ड्रैगन को तिलमिला कर रख दिया है।

भारत ने पाकिस्तान को शपथग्रहण में न बुलाकर उसे आईना दिखाया गया जिसका वह सही मायने में हक़दार था। साथ ही यह भी संदेश गया कि आतंकवाद और बातचीत साथ साथ नहीं चल सकती है, वहीं दूसरी तरफ गेंद पाकिस्तान के पाले में डालते हुए भारत ने स्पष्ट किया कि बात करनी है तो बातचीत का माहौल और पिच खुद पाकिस्तान तैयार करे “और आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति जारी रहेगी , आतंकवादी निरोधी अभियान अपने पूरे शबाब पर यहां तक कि रमजान में भी जारी रहेगा।

प्रभावकारी चीनी पक्ष और चुनौती

गत वर्ष चीन का प्रभावकारी स्वरूप उस वक्त सामने आया जब नेपाल ने पुणे में आयोजित बिम्सटेक के साझा सैन्य अभ्यास में शामिल होने से मना कर दिया और चीन के साथ सागरमाथा श्रृंखला के सैन्य अभ्यास में शामिल होना ज़्यादा पसन्द किया। यह महज बानगी भर है। ऐसे कई मौके देखे गए है जब इस क्षेत्र में चीनी प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुए हैं। हिंद-प्रशांत में भारत स्वायत्तता और सामंजस्य के बीच एक तालमेल बनाना चाहता है वहीं बीआरआई/ओबीओआर मसले पर भारत के स्पष्ट नकारात्मक रूख ने (लगातार दूसरे दफ़े बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव फोरम के बहिष्कार से) चीन को कई महत्वपूर्ण सन्देश दिए हैं।

राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने जहां एक “न्यू एज ” और “चीनी राष्ट्र के महान कायाकल्प” की घोषणा भी की थी। लेकिन उनका यह संकल्प भारत के बिना अधूरा है, और यह बात चीनी हुक्मरान अच्छे से जानते हैं। डोकला/डोकलाम तो महज ट्रेलर था तो मसूद अजहर प्रकरण सिनेमा का इंटरवल। वैसे जल थल और नभ में सिनेमा अभी जारी है और रहेगा।

अगर मामले की सूक्ष्मता से अवलोकन करें तो यह यह स्पष्ट है की कहने को तो सीपीईसी पाकिस्तान और चीन की ‘सदाबहार/ऑल वेदर मित्रता’ के अंतर्गत चीनी निवेश के ज़रिये पाकिस्तान के विभिन्न क्षेत्रों, जैसे की कृषि, संचार आर्थिक बाजार का पुनः प्रवर्तन है पर इसका प्रमुख उद्देश्य चीन का सैन्य विस्तारीकरण है।

इसी कड़ी में बंगाल की खाड़ी का महत्व खासा बढ़ जाता है। हिन्द-प्रशांत के व्यापक क्षेत्र में बंगाल की खाड़ी फिर से केंद्रीय भूमिका में आने लगी है । भारत और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के विचारों में अपेक्षाकृत अधिक निकटता दृष्टिगोचर हो रही है और इन देशों के बीच इसकी खासी जरुरत महसूस होने लगी है कि अब वे और ज्यादा प्रभावी तरीके से एक दूसरे के साथ तालमेल और संपर्क बढ़ाएं।

इसका अंदाजा आप सहज लगा सकते हो जब समुद्र के रास्ते पूरी दुनिया में होने वाले व्यापार का एक-चौथाई हिस्सा बंगाल की खाड़ी से होकर गुज़रता हो और ऊर्जा सुरक्षा और उच्चतर जीडीपी के भूखे चीन की सम्पूर्ण ऊर्जा राजनय की नब्ज़ इसी क्षेत्र से गुजरती हो जिसे तकनीकी भाषा मे” सी लाइन ऑफ़ कम्युनिकेशन” (एसएलओसी) कहते है। पूरी चीनी ऊर्जा सुरक्षा , जिसकी नब्ज भारतीय प्रभुत्व वाले हिन्द महासागर से हो कर गुजरती है। चीनी भारत से इस कदर खौफ़जदा रहता है की वे आप के आयल टैंकरो को सुरक्षा प्रदान करते हुए अपने परमाणु पनडुब्बी को भी इस क्षेत्र मे भेजने से नहीं हिचकते है वही भारत इसे ” शांति का क्षेत्र” के रूप में वर्णित करता है, जो चीन को रास नही आता है।

भारत के उद्देश्य का एक सकारात्मक तर्क यह भी है कि हिंद-प्रशांत को एक सिलसिलेवार रणनीति के तौर पर देखा जाए न कि क्षेत्रीय आधार पर कुछ बंटे हुए लक्ष्यों, साझेदारियों और गठबंधनों के तौर पर। चार देशों का ये समूह, यानि क्वाड (QUAD), भारत को एक मौक़ा देता है कि वो इलाके के मध्य में होने के नाते दोनों छोर पर रणनीतिक आधार पर अपनी सुरक्षा ज़रूरतों को खाड़ी से लेकर मलक्का स्ट्रेट (मलक्का जलडमरूमध्य) तक पुख़्ता करे। दूसरी बात यह है कि भारत की लुक ईस्ट नीति है जो बदलकर पहले एक्ट ईस्ट और फिर “एक्सटेंडेड एक्ट ईस्ट” की दिशा में मुखर हो रही है । यह तमाम संभावित लक्ष्यों को नरेंद्र मोदी नीत सरकार ने महज एक तीर से भेध दिया है। भारतीय राजनयिक इतिहास में ऐसा पहले कभी देखा नहीं गया था।

भारत की एक्ट ईस्ट पालिसी और नेबरहुड फर्स्ट के संदर्भ में यह खासतौर पर अहम साबित हो सकता है| पाकिस्तान की गैर-मौजूदगी वाला यह संगठन दक्षिण एशिया के देशों को आपसी सहयोग के लिये सार्क से बेहतर और बड़ा वैकल्पिक मंच दे सकता है| बिम्सटेक के 14 मुख्य उद्देश्य है, जिसमें बंगाल की खाड़ी के किनारे दक्षिण एशियाई और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के बीच तकनीकी और आर्थिक सहयोग बढ़ाना भी शामिल है। साथ ही इसमें निवेश, टेक्नोलॉजी, टूरिज्म, ह्यूमन रिसोर्स डेवलेपमेंट, कृषि, मत्स्य पालन, परिवहन और संचार, कपड़ा, चमड़ा आदि अन्य विषय भी शामिल हैं।

बिम्सटेक का मुख्य उद्देश्य बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में स्थित दक्षिण एशियाई और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के बीच तकनीकी और आर्थिक सहयोग स्थापित करना है। एक्ट ईस्ट पॉलिसी और नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी को लेकर बिम्सटेक भारत के लिए महत्वपूर्ण है।

बिम्सटेक की बढ़ती अहमियत

सात देशों का यह संगठन मुख्य रूप से एक “बहुपक्षीय सहयोगात्मक संगठन” है जिसमें 4T (ट्रेड, ट्रांसपोर्ट, टूरिज्म टेक्नोलॉजी) तथा, ऊर्जा, कृषि एवं सहायक क्षेत्र ,गरीबी उन्मूलन, आतंकवाद, संस्कृति, जनसंपर्क, सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन को भी शामिल किया गया। बिम्सटेक का मुख्यालय ढाका में है। बिम्सटेक के जनांकीय लाभांश के महत्व का अंदाज़ा महज इसी बात से लगाया जा सकता है कि दुनिया की लगभग 22 फीसदी आबादी बंगाल की खाड़ी के आस-पास स्थित इन सात देशों में रहती है जिनका संयुक्त सकल घरेलू उत्पाद 2.8 ट्रिलियन डॉलर के समीप है।

इन सभी देशों ने 2012 से 2016 के बीच अपनी औसत आर्थिक वार्षिक वृद्धि दर को 3.5 फीसदी से 7.2 फीसदी के मध्य बनाए रखने का जीवन्त लक्ष्य रखा है। इस बात से इसका रणनीतिक महत्व और भी बढ़ जाता है जब वैश्विक समुद्री व्यापार का एक-चौथाई हिस्सा बंगाल की खाड़ी से होकर गुज़रता हो।

बिम्सटेक के मुख्य उद्देश्य

बंगाल की खाड़ी के किनारे दक्षिण एशियाई और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के बीच तकनीकी और आर्थिक एवं रणनीतिक सहयोग समेत 14 अन्य सहयोगों में साझा मंच प्रदान करना शामिल है।

बिम्सटेक भारत के लिये इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है ?

बिम्सटेक के सात देश बंगाल की खाड़ी के आसपास स्थित हैं जो एकसमान क्षेत्रीय एकता को दर्शाते हैं। भारत ने शुरूआती दौर से ही इस संगठन को आगे बढ़ाने में आपनी सक्रिय भूमिका निभाई है| “गुजराल डाक्ट्रिन” के जद में यह क्षेत्र मृतप्राय पड़ गया था लेकिन क्षेत्र की बदलती भू:आर्थिकी ने इसे पुनर्जीवित कर दिया। बिम्सटेक , दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के बीच एक संपर्क सेतु की तरह काम करता है|

इस समूह में दो देश म्याँमार और थाईलैंड दक्षिण-पूर्व एशिया के हैं जो भारत को दक्षिण-पूर्वी इलाकों से जोड़ने के लिहाज़ से बेहद अहम हैं| इससे भारत के वाणिज्य और व्यापार को न केवल बढ़ावा मिलेगा बल्कि भारत और म्याँमार के बीच हाईवे प्रोजेक्ट भारत, कलादान मल्टी मॉडल ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट सहित अन्य प्रोजेक्ट को पूर्व एशिया नीति को मज़बूती प्रदान करेगा जिसमें भारत-म्याँमार के बीच परिवहन परियोजना, भारत-म्याँमार-थाईलैंड राजमार्ग परियोजना का विकास और भारत बांग्लादेश और नेपाल के बीच राजमार्ग परियोजना को तेजी से गति मिलेगी और वाणिज्य व्यापार के साथ साथ आपसी संपर्क और प्रगाढ़ होगें।

भारत के अलावा बिम्सटेक के सदस्य देशों के लिये यह संगठन काफी महत्त्वपूर्ण है। बिम्सटेक देशों के बीच मज़बूत संबंध भारत के संपूर्ण पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास को गति प्रदान करता है। बिम्सटेक दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच एक पुल की तरह काम करता है। इसके सात में से पाँच देश सार्क के सदस्य हैं जबकि दो आसियान के सदस्य हैं| ऐसे में यह सार्क और आसियान देशों के बीच अंतर क्षेत्रीय सहयोग का भी एक महत्वपूर्ण मंच है।

बिम्सटेक के ज़रिये बांग्लादेश की तीव्र गति से बढ़ती अर्थव्यस्था की सीधी पहुंच भूटान, नेपाल और म्यांमार होते हुए सीधे थाईलैंड तक हो जाती है और बांग्लादेश की पहचान बंगाल की खाड़ी में खुद को मात्र एक छोटे से देश से ज़्यादा महत्त्व के रूप बढ़ जाती है । वहीं श्रीलंका इसे दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ने के अवसर के रूप में देखता है। इसके ज़रिये श्रीलंका की सीधी पहुंच हिन्द महासागर और प्रशांत महासागर में अपनी आर्थिक गतिविधि भी बढ़ाना चाहता है जबकि दूसरी तरफ भूमि आबद्ध (लैंड लॉक्ड) नेपाल और भूटान के लिये बिम्सटेक , बंगाल की खाड़ी से जुड़ने और अपनी भूमिगत भौगोलिक स्थिति से बचने की उम्मीद को आगे बढ़ाता है और चीन को कॉउंटर बैलेन्स करता है। म्याँमार और थाईलैंड को इसके ज़रिये बंगाल की खाड़ी से जुड़ने और भारत के साथ व्यापार करने के नए अवसर मिलता है। चीन ने भूटान और भारत को छोड़कर लगभग सभी बिम्सटेक देशों में भारी भरकम निवेश कर रखा है और ये तमाम देश उसकी “डेब्ट डिप्लोमेसी ” के चँगुल में बुरी तरह फंस गए है ,जिसका बेहतरीन उदाहरण श्रीलंका है। इन देशो को चीनी चँगुल से उबरने के लिए भी बिम्सटेक को नए विकल्प को ये देश देख रहें हैं।

थाईलैंड के लिए यह संगठन सबसे मुफ़ीद रहा है क्योंकि पूरे बंगाल की खाड़ी , अंडमान सागर और मलक्का जलडमरूमध्य के त्रिकोणात्मक महत्व और महत्वपूर्ण सी लाइन ऑफ कम्युनिकेशन जिसके जरिये अफ्रीका और फारस की खाड़ी से दक्षिणी चीन सागर की तरफ जाने वाले 90 फीसद से अधिक कच्चे तेल की आपूर्ति होती है या कहें 16 मिलियन बैरल कच्चे तेल की रोजाना आपूर्ति होती है जबकि कुल विश्व व्यापार का 25 फीसद हिस्सा लगभग 600 नॉटिकल मील संकड़े एनर्जी चॉक पॉइंट से होकर गुजरता है।

मलक्का जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ मलक्का) यह एक महत्वपूर्ण “चोक पॉइन्ट” के रूप में जाना जाता है जिसकी सामूहिक निगरानी 2004 में गठित “मलक्का चौकड़ी” (quad of Malacca) के नाम से मशहूर इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड और सिंगापुर मिलकर “मलक्का स्ट्रेट पैट्रॉल”(MSP) के जरिये करते है। भारत को भी इसमें शामिल करने की बात चल रही है और इस सिलसिले में थाईलैंड और सिंगापुर से हामी भी मिल गयी है जबकि मलेशिया और इंडोनेशिया से रजामंदी मिलनी बाकी है।

उम्मीद है की जोको विडोडो के दूसरे कार्यकाल में यह मसला भी सुलझ जाय जिससे भारतीय नौसेना मलक्का चौकड़ी के साथ इस क्षेत्र में अपनी गश्त बढ़ा सकेगी। भारत के साथ इन चारों देशो के साथ गहरे सांस्कृतिक,राजनयिक ,रणनीतिक और सामरिक संबंध है। जिसके तहत भारतीय सेना इंडोनेशिया के साथ “गरुड़ शक्ति”, जबकि थाईलैंड के साथ “मैत्रयी” और भारतीय वायुसेना “सियाम भारत” जैसे वायुसैनिक अभ्यास को सफलतापूर्वक अंजाम दे चुकी है। वहीं भारतीय नौसेना ने इंडोनेशिया के साथ,इंडिया-इंडोनेशिया कोऑर्डिनेटेड पैट्रॉल और इंडिया-इंडोनेशिया बाईलैटरल एक्सरसाइज। मलेशिया के साथ “टेबल टॉप” सिंगापुर के साथ सिंगापुर इंडिया मैरिटाइम बाईलेटरल एक्सरसाइज (सिम्बक्स) और थाईलैंड के साथ” इंडो थाई कोऑर्डिनेटेड पैट्रॉल” के जरिये इस क्षेत्र में नई रणनीतिक महत्व को संपुष्ट करते हुए नव उपनिवेषी और आक्रमक चीनी प्रभुत्व को लगातार चुनौती देती हुए इस क्षेत्र में “दवाब बना रहे ” को अमली जामा पहनाते रहती है।

चीन की सांस्कृतिक घुसपैठ और चेकबुक डिप्लोमेसी

हिन्द महासागर का गर्म होते पानी तक अपनी पहुंच की चीनी व्याकुलता को आप कालिदास के महाकाव्य मेघदूतम के नायक की अपनी प्रेयसी से मिलन की चाह, विरह और उसकी व्याकुलता से कर सकते हैं । हिन्द महासागर में प्रभुत्व का मतलब पूरी दुनिया के समुद्री व्यापार पर एकाधिकार, भला कौन नहीं चाहेगा इस पर अधिकार। चीनी चाहत को नियंत्रित, संतुलित, प्रतिउत्तरित करने के लिए बिम्सटेक एक महत्वपूर्ण उपकरण की भांति कार्य करता है, जो उसे बंगाल की खाड़ी तक पहुँच बनाने से बाधित और संतुलित करते हुए इस पूरे क्षेत्र को “शान्ति क्षेत्र “और “फ्रीडम ऑफ नेविगेशन” में तब्दील करते हुए चीन के अतिमहत्वाकांक्षी प्रवृत्ति पर जरूरी अंकुश लगाता है। और दूसरी तरफ भारत को हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी में अपनी पहुँच और प्रभुत्व को बरकरार रखने में मदद करता है ।

इस लिहाज़ से भी बिम्सटेक भारत के लिये काफी महत्त्वपूर्ण हो जाता है। पारिस्थितिकी रूप से बिम्सटेक न सिर्फ दक्षिण व दक्षिण-पूर्वी एशिया को जोड़ता है बल्कि हिमालय और बंगाल की खाड़ी की पारिस्थितिकी को भी शामिल करता है। यह भारत के लिये बिम्सटेक ‘नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी” और “पूर्व की और देखो’ की हमारी विदेश नीति की प्राथमिकताओं और प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिये एक स्वाभाविक मंच प्रदान करता है| वैश्विक परिदृश्य में हर देश में क्षेत्रीय सहयोग एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा रहा है जिसका मुख्य मकसद क्षेत्रीय और आर्थिक विकास, शांति, विकास और समृद्धि को बढ़ावा देना है| मौजूदा दौर में जो परिस्थितियाँ हैं उससे निपटने के लिये भी हमेशा आदर्श मंच की तलाश होती रहती है और यही वज़ह है कि बिम्सटेक का गठन हुआ। बिम्सटेक के ज़रिये जहां दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन के “सांस्कृतिक घुसपैठ” को रोकने में मदद मिली है जिससे यह क्षेत्र एक दूसरे से जुड़े हुए अपने ऐतिहासिक सांस्कृतिक साझा मूल्यों, अपने गौरवमयी इतिहास और समावेशी जीवनपद्धति के चलते शांति और विकास के लिये एक समान स्थिति का प्रतिनिधित्व करता है।

क्या बिम्सटेक सार्क का विकल्प बनकर उभरा है?

भारत और पाकिस्तान के आपसी खींचतान, सार्क में चीन के शामिल होने की मृगतृष्णा सी चाहत ने इस पूरे संगठन का बेड़ा गर्क किया है। चूंकि सार्क में सारे निर्णय सभी सदस्यों की रजामंदी से होता है इसलिए यहाँ चीन की दाल गल नहीं रही है वर्ना 2016 में तो पाकिस्तान नेपाल , श्रीलंका और बंगलादेश की चौकड़ी तो न जाने कब से चीन को अपना समर्थन देने को अकुलाए और छटपटाते फिर रहे थे। दूसरी तरफ अपनी आपने उद्देश्यों और उम्मीदों पर खरा नहीं उतर रहा सार्क दरअसल, पिछले 30 सालों से जिस स्थिति में सार्क रहा है, यह संगठन मात्र औपचारिकता बनकर रह गया है| केवल सम्मेलनों का नियमित रूप से आयोजित होना किसी संस्था के जीवित रहने का प्रमाण नहीं है।

जहाँ तक सार्क के ठोस कदम उठाने का सवाल है तो पाकिस्तान के असहयोग और राजनीतिक विभाजन की वज़ह से ऐसा नहीं हो पा रहा है| सदस्य देशों में कई बार आतंकवाद के खिलाफ जंग को लेकर भी सहमति बनी है लेकिन आतंकवाद के मुद्दे पर सार्क के सदस्य देश और भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान ने कभी साथ नहीं निभाया और यही सार्क की विफलता की एक बड़ी वज़ह बन गया जहां तक सार्क की सीमित उपलब्धियों का सवाल है, तो ऊर्जा और परिवहन के क्षेत्र में हुए कई समझौते बेहद महत्त्वपूर्ण रहे है।

चीन के साथ ग्लोबल पॉलिटक्स सार्क और बिम्सटेक।

सार्क में चीन के शामिल होने की लालसा और भारत का चीन को सार्क में शामिल करने से इंकार से एक संभावित परिणाम में परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (NSG) देशों के संगठन में भारत की एंट्री पर प्रतिबंध के रूप में देखा जाता रहा है। चीन NSG के माध्यम से भारत से इस क्षेत्र में समझौता करना चाहता है वहीं चीन के वन बेल्ट वन रोड में भारत का सहयोग न होने से चीन पूरी तरह ख़फ़ा चल रहा है। संभव है कि बीजिंग आप पर पलटवार करे जो किसी भी तरह का और कहीं भी और किसी भी स्वरूप में हो सकता है, क्योंकि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का विस्तृत संदेश जिस रफ़्तार से आया वो उसे अलग माहौल बनाता है, यह संयमित लेकिन स्नेह भरा संदेश था लेकिन हमे उनके स्नेहिल शब्दों कें झांसे में नहीं पड़ना है क्योंकिं चीन में चल रहे “सुअर वर्ष “में यह “बाघ का दुलार”है जिसमे आपको पता भी नहीं चलेगा कि आप कब रोमांस करते करते शहीद हो गए।

भारत की विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार उठाये गए इस रणनीति का ही नतीजा है कि पाकिस्तान के नए आक़ा चीन को ना-नुकुर के बाद भी आख़िरकार मसूद अज़हर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करने के संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का समर्थन करना पड़ा। वर्तमान के राजनीतिक परिदॄश्य में भारतीय कूटनीति की यह अग्रणी शुरुआत है, चूंकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अस्थाई हित ही सर्वप्रमुख होते हैं, यहां न तो कोई स्थाई मित्र होता है न, ही कोई स्थायी हित होते हैं और न ही दुश्मन। राष्ट्र का हित सर्वोपरि होता है।

आज के दौर में हम भारत कूटनीति से यह अपेक्षा कर सकते हैं क्योंकि आम जनमानस को प्रचंड जनादेशयुक्त स्थायित्व प्राप्त सरकार से निश्चय ही इस तरह की उम्मीद जगती है कि अपनी बहुआयामी, सुरक्षात्मक और आक्रमक कूटनीति का परिचय देते हुए हर मोर्चे पर देश की एकता अखंडता और संप्रभुता को बरकरार रखे।

कर्ण भास्कर

(रक्षा मामलों एवं भारतीय राजनय पर पैनी नज़र रखने वाले लेखक टीवी पत्रकार हैं और फिलहाल डीडी न्यूज़ से संबंद्ध हैं)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *