ब्लैक फ्राइडे की जद में आया ईरान, गल्फ वॉर 3.0 के मुहाने पर खड़ा विश्व

भास्कर

चाणक्य कृत “अर्थशास्त्र” के नवें अध्याय के शुरुआत में ही इस वक्तव्य से हम परिचित होते हैं…

“A single assassin can achieve, with weapons, fire or poison, more than a fully mobilized army”{9.6.54.;55}”

अमेरिका की बीते तीन जनवरी की कार्रवाई कुछ इसी श्रेणी की कार्यवाही थी, जिसने पूरे पश्चिम एशिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था में भूचाल ला दिया। इराक की राजधानी बगदाद में अमेरिकी बलों ने तयशुदा विशेषीकृत और सटीक MQ-9 रीपर ड्रोन हमले में ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर के क़ुद्स फ़ोर्स के प्रमुख और अमेरिका की आंखों में लगभग चार दशकों से किरकिरी बनते आ रहे मेजर जनरल कासिम सुलेमानी की “हत्या” कर दी। अमेरिका की इस कार्रवाई के बाद सम्पूर्ण पश्चिम एशिया क्षेत्र में हड़कम्प मच गया, कच्चे तेल की कीमत घण्टे भर में चार प्रतिशत तक बढ़ गयी जिसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में देखने को मिला और ईरान के कच्चे तेल पर निर्भर रहने वाले देशों का आयात बिल और चालू खाता घाटा लगातार बढ़ने की प्रबल संभावना है।

बेहतरीन आसूचनागत अभियान

अमेरिकी बलों का यह अभियान निश्चित रूप से आसूचनागत और प्रति आसूचना के लिहाज से अब तक का सबसे सफलतम अभियानों में एक माना जा रहा है। अमेरिका, इजरायल और सऊदी अरब सुलेमानी के तमाम गतिविधियों पर सूक्ष्मता के साथ नजर बनाये हुए थे। इसमें Human Intelligence (HUMINT); Signals Intelligence (SIGINT), Imagery/Geospatial Intelligence (IMINT/GEOINT), Measurement and Signature Intelligence (MASINT), Open-Source Intelligence (OSINT) और Electronic Intelligence (ELINT) के जरिये नजर रखी जा रही थी। आसूचना के इतिहास में यह एक बेहद सफल और रियल टाइम कार्रवाई रही है। इससे पहले अल कायदा के इराक में नेता अबू मुसाइब अल जरकावी,अल कायदा का संस्थापक ओसामा बिन लादेन,और इस्लामिक स्टेट के मुखिया अबू बकर अल बगदादी को भी इसी तरह के अभियानों के जरिए मार गिराया गया था

ईरान ने इस हमले की कड़ी निंदा करते हुए अमेरिका को गंभीर नतीजे भुगतने की चेतावनी दी।

इस पर किसी टिप्प्णी करने से पहले यह देखना दिलचस्प होगा कि साल के शुरुआत में यूएई के राजकुमार नाह्यान पाकिस्तान का एक दिवसीय दौरा करते हैं और प्रधानमंत्री इमरान खान से मुलाक़ात करते है, तीन जनवरी को ही ताइवान के आर्मी प्रमुख अति सुरक्षित समझे जाने वाले ब्लैक हॉक लड़ाकू हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मारे जाते हैं, जनरल सुलेमानी की हत्या के बाद अमेरिकी प्रशासन पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व से वार्तालाप करता है, इस्रायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू अपना यूनान दौरा बीच मे ही छोड़कर स्वदेश वापसी करते है और पूर्ण युद्ध जैसी तैयारियों को अंजाम देते है।अमेरिका के इस हमले के बाद पूरे पश्चिम एशिया की सिक्युरिटी आर्किटेक्चर व्यस्त हो चुका है।

आखिर कौन हैं मेजर जनरल क़सीम सुलेमानी

दो खूबसूरत बेटियों और तीन बेटों के कड़क लेकिन प्यारे पिता थे दिवंगत 62 वर्षीय मेजर जनरल क़सीम सुलेमानी। वे अपने परिवार के साथ राजधानी तेहरान में रहते थे। 22वर्ष की उम्र में उन्होंने रिवोल्यूशनरी गार्ड्स में प्रवेश पाया, 1979 के इराक-ईरान युद्ध मे अपने जौहर दिखाए, 1998 में वे इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर के क़ुद्स फोर्स (पवित्र बल) के प्रमुख नियुक्त किये गए थे, ईरान के विशेष बल इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी की यह शाखा का मुख्य कार्य “अनकन्वेंशनल वारफेयर”,”एक्स्ट्रा टेरीटोरियल ऑपरेशन” को अंजाम देने और “इंटेलिजेंस और काउंटर इंटेलिजेंस गैदरिंग” के लिए जाना जाता है। यह विशेष शाखा सीधे ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खोमैनी को रिपोर्ट करती है। यूं तो कहने के लिए ईरान का विदेश मंत्रालय है पर वास्तविक रूप से सम्पूर्ण विदेश नीति के निर्माण तथा क्रियान्वयन के लिए क़ुद्स फ़ोर्स की भूमिका सर्वोच्च होती है। सुलेमानी कोअयातुल्ला खोमैनी के बाद दूसरे नम्बर का सबसे महत्वपूर्ण नेता माना जाता था। इन्हें निर्भीक, निडर और बलशाली सुलेमानी कहा जाता था। इनसे जुड़ा एक महत्वपूर्ण वाकया है जब इन्होंने 2008 में अमेरिकी जनरल डेविड पैट्रियस, जो इराक में बहु देशीय सैन्य कमान के प्रमुख थे, उन्हें मोबाइल पर यह एक टेक्स्ट मैसेज भेजा …

” General Pattaeus,you should know that I, Qassem Soleimani, control the policy for Iran with respect to Iraq, Lennon, Gaza and Afghanistan and indeed, the ambassador in Baghdad is a Quds Force member. The individual who’s going to replace him a Quds Force member”

मेजर जनरल सुलेमानी ईरानी सेना के सिर्फ़ एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी ही नहीं, वे ईरान और पूरे पश्चिम एशिया की राजनीति में “पावर , स्ट्रेंथ और इम्पैक्ट ” के अल्टीमेट प्रतीक थे जो लेबनान, इराक, सीरिया, यमन और ईरान में अति प्रभावी रहे । वे ईरान की पश्चिम एशिया के तमाम विदेशी सैन्य अभियानों के प्रमुख रचनाकार और मुख्य रणनीतिकर्ता थे जिन्हें सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद का भी सबसे करीबी सलाहकार माना जाता है। इन्होंने ही रूसी विशेष बलों और सीरियाई सेना तथा स्थानीय मिलिशिया ईरानी समर्थन देते हुए इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों को मार भगाया था । इनकी लोकप्रियता का सहज अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि इनकी मौत पर इन्हें सर्वोच्च शहीद का दर्जा देते हुए तीन दिनों की राष्ट्रीय शोक की घोषणा की गई और उनके अंतिम जनाजे में इराकी राष्ट्रपति ने भी शिरकत किया। अयातुल्ला खोमैनी ने इस शहादत को व्यर्थ न जाने देने की बात कही है। इस क्षेत्र में ईरान की शक्ति जग जाहिर और ईरान निश्चित रूप से दूसरा इराक, लेबनान या यमन बनना नहीं चाहता है इसलिए वह इस हत्या का बदला लेने की पुरजोर कोशिश करेगा।

आखिर अमरीका ने इतना दुस्साहसिक और खतरनाक कदम क्यों उठाया??

इसके उत्तर में विगत एक सप्ताह के भीतर इराक में हुए नाटकीय घटनाक्रम पर गौर करने की जरूरत है। भू राजनीति का सबसे आसान सिद्धान्त है कि कोई भी घटना अचानक से नहीं होती। हर घटना परत दर परत एक दूसरे से जुड़ी रहती है और जनसमुदाय को लगता है कि “अचानक से घटना घट गयी “। इराक में भी कुछ ऐसा ही हुआ था। 27 दिसंबर 2019 को इराक के कुर्दिश बहुल क्षेत्र किरकुक शहर में सबसे शक्तिशाली माने जाने वाले मिलिशिया संगठन कतैयब हिज़्बुल्लाह (Kataib Hizbullah) ने इराकी सैन्य आधार शिविर पर अप्रत्याशित रूप से रॉकेटों से अन्धाधुन्ध हमले किये जिसमे एक अमेरिकी कॉन्ट्रेक्टर मारा गया जबकि अन्य अमेरकी सेना से संबद्ध कुछ लोग घायल हुए। अमेरिकी को यह हमला नागवार गुजरा।

इराकी मिलिशिया संगठन कतैयब हिज़्बुल्लाह(Kataib Hizbullah) पीपुल्स मोबलाइजेशन फ्रंट PMF का सबसे शक्तिशाली धड़ा है जिसे ईरानी रिवोलुशनरी गार्ड के क़ुद्स फ़ोर्स का सभी स्तरों पर व्यापक समर्थन हासिल है। अमेरिका ने PMF के हमले को अति गंभीरता के साथ लिया और इस हमले का करारा जवाब देने का निश्चय किया। प्रतिउत्तर में बीते 29 दिसम्बर को अमेरिकी विशेष बल/वायुसेना की कार्रवाई में संगठन के 25 लड़ाके मारे गए और 55 अन्य घायल हुए।अमेरिका ने अपनी करवाई को अमेरिकी कॉन्ट्रैक्टर की मौत का बदला बताया। अमेरिका की इस कार्रवाई के जवाब में PMF ने तेहरान और बेंगाजी की तर्ज़ पर बगदाद के टिगरिस नदी के किनारे अतिसुरक्षित स्थान पर अवस्थित , दुनिया के सबसे बड़े अमेरिकी दूतावास को निशाना बनाया, PMF के मिलीशिया ने इराक में स्थित अमेरिकी विरोधी समूहों के साथ मिलकर तमाम सुरक्षा व्यवस्था को धता बताते हुए 31 दिसंबर को बगदाद के अमेरिकी दूतावास के इर्द जमा हुए और अमेरिकी विरोधी नारेबाजी के बीच अतिसुरक्षित और किला मानिंद माने जाने वाले अमेरीकी दूतावास में घुसने मे सफ़ल हुए और उसके पूरे रिसेप्शन एरिया को पहले तहस नहस किया फिर आग के हवाले कर दिया।

अमेरिका ने अपने दूतावास पर हुए हमले पर कड़ा संज्ञान लिया और इराक पर आरोप लगाया कि वह उसके दूतावास की सुरक्षा में नाकाम रहा इसलिये वह कार्रवाई करेगा और राष्ट्रपति ट्रम्प ने इन प्रदर्शनकरियों को नए साल के उपहार देने की घोषणा की और 03जनवरी 2020 को जनरल आटोमिक्स द्वारा निर्मित MQ9 रीपर से लेज़र गाइडेड हेली फायर मिसाइल के एक अचूक ड्रोन हमले में मेजर जनरल सुलेमानी और उनके इराक में पीपुल्स मोबलाइजेशन फ़ोर्स के मुखिया अबू महदी अल मुँहदिस समेत 06 सदस्यों को मार गिराया। अमेरिका यहीं नहीं रुका 04 जनवरी को भी फिर हमला किया और छह लड़ाके मारे गए।

शिया बहुल ईरान का 2003 में सद्दाम हुसैन के तख्ता पलट के बाद इराक की राजनीति पर लगातार प्रभाव बढ़ता ही जा रहा है। 2013 के ISIL/ISIS उभरने और सुन्नी कट्टरपंथी आतंकवाद के मद्देनजर ईरानी हस्तक्षेप बढ़ता ही जा रहा है जो अमेरिका को नागवार गुजरता है। पश्चिम एशिया में सुन्नी बहुल सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, तुर्की और यहूदी इजरायल की आंखों में ईरान सबसे बड़ी किरकिरी बना हुआ है। एक मात्र शिया बहुल राष्ट्र के नाते इसकी स्वभाभिक नजदीकी में लेबनान के हिज़्बुल्लाह, इराक की शिया बहुल सरकार, सीरिया के बशर अल असद की सरकार आती है जो सुन्नी समर्थित राष्ट्रों को फूटी आंख नहीं सुहाती है।

अमेरिका की सीआईए और इस्रायली मोसाद के तमाम अभियान ईरान के परमाणु कार्यक्रम को असफल करने, उसके रक्षा,अभियांत्रिकी और परमाणु वैज्ञानिकों की संदेहास्पद हत्या के साथ उसके क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचाने के लिए किए जाते रहे हैं जिसमे stuxnut जैसे साइबर हमले भी शामिल हैं। अमेरिका के साथ सबसे बड़ी समस्या उसके राष्ट्रीय हितों का है, उसके हित जहां भी प्रभावित होते है वह इस तरह के हमलों से बाज़ नहीं आते। चूंकि अमेरिका की संप्रभुता, रूल ऑफ़ लॉ, संविधान, सैनिक, नागरिक, उनके इन्फ्रास्ट्रक्चर, वित्तीय व्यवस्था, मीडिया ही सबकुछ है दूसरे किसी देश मे उपरोक्त चीजें है ही नहीं , इसलिए उसे जब जहां जैसे कार्रवाई करने में नहीं हिचकता, बस कोई देश उसकी बातों को न माने। ईरान के साथ भी यही हुआ। ईरानियों ने अमेरिकी नीतियों को नहीं माना तो राष्ट्रपति ट्रम्प ने सबसे पहले अमेरिका को ईरान के साथ समझौते से एकतरफा अलग हो गए फिर उन्होंने रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स पर आतंकवादी का ठप्पा लगा दिया फिर ईरान पर आर्थिक और सैन्य प्रतिबंध लगा दिया जिससे ईरान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई। लेकिन ईरानियों ने अमेरिका से हाथ नहीं मिलाया।

ट्रम्प को मिल सकता है राजनीतिक लाभ

सीरिया, यमन, अफगानिस्तान, यूक्रेन में हाथ-मुंह जला चुके ट्रम्प के लिए फिलहाल ईरान से बेहतर कोई विकल्प नहीं था। उग्र तथा हिंसक राष्ट्रवाद के समर्थक, गन बोट डिप्लोमेसी 2.0 के प्रणेता व्हाइटमेन बर्डनशिप 4.0 के पुरोधा और प्रतिनिधि सभा मे महाभियोग का दंश झेल रहे ट्रम्प को कुछ ऐसा करने की दरकार थी जिससे वे चीख-चीख कर WE THE PEOPLE OF UNITED STATES OF AMERICA और अमेरिका फर्स्ट, हमने लाखों अमेरिकियों की जान बचाई, पूरे विश्व को आतंकवाद से मुक्ति दिलाई जैसे नारों के साथ इस साल होने वाले चुनावों में अपनी दावेदारी फिर से प्रस्तुत कर सके। गौरतलब है कि अमेरिका के डॉन महाभियोग झेल चुके राष्ट्रपति ने इराक पर बमबारी कर सत्ता में वापसी की है।

ईरान के संभावित कदम

बदले कि भावना लिए ईरान खड़ी में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना सकता है। इस्राएल उसके निशाने पर सदैव रहा है। वह भी संभावित हमले का शिकार हो सकता है क्योंकि कहा जाता है कि सुलेमानी की गतिविधियों पर मुख्य नजर इजरायल ने ही रखी थी और रियल टाइम इनपुट्स मुहैय्या कराया था। चूंकि रूस और चीन खुलकर ईरान के साथ आ गए है इसलिए अमेरिका को ईरान पर प्रत्यक्ष रूप से किसी तरह की सैन्य कार्रवाई करना संभव नहीं होगा। अगर ट्रम्प ऐसा करने की जुर्रत करते है हैं तो यह कदम उनके मानसिक दिवालियापन को इंगित करेगा,क्योंकि सीरिया में वे अपने हाथ रूस के समक्ष जला चुके हैं।

ईरान स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज़ को बंद कर इलाके की तेल आपूर्ति को पूर्ण रूप से ठप्प कर दे सकता है। हालांकि ऐसा करना भी ईरान के लिए कठिन होगा। लेकिन प्यार और जंग में सब जायज़ है और यहां तो मसला और भी संगीन है।

इस्लामिक रिवॉल्युशनरी गार्ड कोर

सन 1979 की ईरानी क्रांति के बाद सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला खुमैनी के दिमाग की उपज थी रिवॉल्युशनरी गार्ड । रिवोल्यूशनरी गार्ड का गठन नई हुकूमत की हिफ़ाज़त और ईरानी सेना के साथ सत्ता संतुलन बनाना था। ईरान में शाह के पतन के बाद हुकूमत में आई सरकार को ये लगा कि उन्हें एक ऐसी फ़ौज की ज़रूरत है जो नए निजाम और क्रांति के मक़सद की हिफाज़त कर सके। ईरान के कानून में जिसमें नियमित सेना को देश की सरहद और आंतरिक सुरक्षा का जिम्मा दिया गया जबकि रिवॉल्यूशनरी गार्ड को निज़ाम की हिफाज़त का काम दिया गया।

उदाहरण के लिए रिवॉल्युशनरी गार्ड क़ानून और व्यवस्था लागू करने में भी सेना को मदद करती हैं और आर्मी, नौसेना और वायुसेना को लगातार उसका सहारा मिलता रहा है। वक़्त के साथ-साथ रिवॉल्युशनरी गार्ड ईरान की फ़ौजी, सियासी और आर्थिक ताक़त बन गई। रेवोल्यूशनरी गार्ड्स में ज़मीनी जंग लड़ने वाले सैनिक, नौसैना, हवाई दस्ते हैं और ईरान के रणनीतिक हथियारों की निगरानी का काम भी इन्हीं के जिम्मे हैं। रिवॉल्युशनरी गार्ड के मौजूदा कमांडर-इन-चीफ़ मोहम्मद अली जाफ़री ने हर उस काम को बख़ूबी अंजाम दिया है जो ईरानी के सुप्रीम लीडर ने उन्हें सौंपा है। रिवॉल्यूशनरी गार्ड की स्पेशल आर्मी है ‘बासिज फ़ोर्स’ जो क़ानून लागू करने का भी काम करता है और अपने कैडर को भी तैयार रखता है। वहीं क़ुड्स फ़ोर्स विदेशी ज़मीन पर संवेदनशील मिशन को अंजाम देता है। हिज़्बुल्लाह और इराक़ के शिया लड़ाकों जैसे ईरान के करीबी सशस्त्र गुटों हथियार और ट्रेनिंग देने का काम भी क़ुड्स फोर्स के ही जिम्मे है। क़ुड्स फोर्स के कमांडर जनरल क़सीम सुलेमानी को ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामनेई ने ‘अमर शहीद’ का खिताब दिया है। जनरल क़सीम सुलेमानी ने यमन से लेकर सीरिया तक और इराक़ से लेकर दूसरे मुल्कों तक रिश्तों का एक मज़बूत नेटवर्क तैयार किया है ताकि इन देशों में ईरान का असर बढ़ाया जा सके। सीरिया में शिया लड़ाकों ने मोर्चा खोल रखा है तो दूसरी तरफ इराक़ में वे इस्लामिक स्टेट (आईएस) के खिलाफ लड़ रहे हैं। रिवॉल्युशनरी गार्ड की कमान ईरान के सुप्रीम लीडर के हाथ में है। सुप्रीम लीडर देश के सशस्त्र बलों के सुप्रीम कमांडर भी हैं। ऐसा आकलन है कि रिवॉल्युशनरी गार्ड ईरान की अर्थव्यवस्था के एक तिहाई हिस्से को नियंत्रित करता है। अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रही कई चैरिटी संस्थानों और कंपनियों पर उसका नियंत्रण है। ईरानी तेल निगम और इमाम रज़ा की दरगाह के बाद रिवॉल्युशनरी गार्ड मुल्क का तीसरा सबसे धनी संगठन है।

ट्रंप ने जब से ईरान के साथ अंतरराष्ट्रीय परमाणु क़रार तोड़ा है तब से दोनों देशों के बीच तनाव काफी बढ़ा हुआ है लेकिन अमेरिका को समझना चाहिए कि उसका पाला ईरान से पड़ा है और वह इराक नहीं है। दूसरी बात विश्व व्यवस्था में अब रूस, चीन भी खासे मुखर हो गए है। और दोनों देशों से ईरान के संबंध काफी अच्छे हैं । सीरिया में ट्रम्प प्रशासन अपना हाथ जला चुका है, इसलिये यहां भी वेे कोई भी कदम फूंक फूंक कर ही रखेंगे। इस मसले पर भारत का शिया फैक्टर भी काफी अहम हो जाता है।

संभावित हॉरमुज़ क्राइसिस

यहां यह जानना आवश्यक है कि विश्व की आर्थिक ,राजनीति, भू :रणनीतिक, सामरिकी, संभारिकी, और तेल राजनय में हॉरमुज़ की खाड़ी का आखिर क्यों इतना महत्व है। जिसे ईरान भी इतना महत्व दे रहा है और अमेरिका की रणनीतिक प्रतिष्ठा दांव पर लगी दिख रही ।

स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज़ एक 21 मील या 33 किलोमीटर चौड़ी जलसंधि है जो ईरान को ओमान के मुख्य भूमि से अलग करती है जबकि ओमान की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ती है। लेकिन इसका नौवहन मार्ग मात्र दो मील या तीन किलोमीटर चौड़ा है।

  1. विश्व स्तर पर खपत होने वाले तेल का लगभग पांचवां हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर गुजरता है।
  2. होर्मुज की एक अंतरराष्ट्रीय पारगमन मार्ग है जहां विभिन्न एशियाई देशों के साथ साथ यूरोप सहित अन्य महाशक्तियों की निर्बाध ऊर्जा सुरक्षा को यह जलसंधि सुरक्षित करता है।

यहां दो बातें मुख्य रूपसे सामने आती है । ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए उच्च गुणवत्ता तथा क्षमता वाले ऑयल टैंकर अमूमन विकसित देशों के होते है और दूसरा चूंकि इन ऑयल टैंकर का  बीमा अत्यधिक महंगा होता है, जो साधारणतया अमेरिकी बहुराष्ट्रीय बीमा कंपनियां करती है, यानि हर हाल में ये वैश्विक महाशक्तियां अपने राष्ट्रीय, व्यापारिक एवं भू सामरिक हितों को सुरक्षित रखने के लिए किसी स्तर तक जा सकती है। इसलिए  हॉरमुज़ सहित अन्य कोई भी नौवहन मार्ग जहां से  यतायात सुनिश्चित होता है वहां किसी भी तरह की परेशानी अमेरिका के कान खड़े कर देती है और उनके रातों की नींद हराम हो जाती है । हॉरमुज़ जलसंधि का बन्द या आबाध नौवहन में थोड़ी सी भी रुकावट का सीधा मतलब है करोड़ो डॉलर का प्रतिदिन नुकसान जो ये बहुराष्ट्रीय कंपनियां कभी नहीं चाहेंगी। 

उर्जा सुरक्षा किसी देश की सकल घरेलू उत्पाद और उसकी आर्थिक समृद्धि का मेरूदंड होता है जिसे कोई देश किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता। इसके लिए वह देश विभिन्न मोर्चों पर थोड़े बहुत समझौते भी करने से नहीं चूकता है। भारत , चीन सहित अन्य एशियाई देशों  की यही सबसे  बड़ी परेशानी है। ऊर्जा सुरक्षा निर्बाध गति से इन देशों को निरन्तर मुहैय्या होती रहे इसके लिए सभी राष्ट्रों की नौसेना अपने टैंकरों के साथ साथ इस पूरे “सी लाइन ऑफ कम्युनिकेशन” या SLOC की सुरक्षा और एंटी पायरेसी के आड़ लेकर समुद्र के भीतर और सतह पर पूरे क्षेत्र में गश्त लगाती और आपनी ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करती है।

इसमे अमरीकी सेना नियमित गश्त से गुजरने में अव्वल है। इसी क्रम में खाड़ी के कई हिस्सों में अमेरिका ने सैन्य अड्डे बना रखे हैं। इसमें सबसे अड्डा बड़ा कतर में है जहां पर उसके लगभग 10,000 हजार सैनिक हैं। क़तर के अल उदीद एयर बेस अमरीकी सैन्य बेस पर भी स्ट्रेटोस्फेरिक बमवर्षक बी-52 विराजते हैं । अतीत में अमेरिकी सेना ने संयुक्त अरब अमीरात में अल धफ्रा एयर बेस और अल उदीद दोनों में अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराते रही है।

अमेरिकी दिलचस्पी यूँ ही नहीं बढ़ी है इस क्षेत्र में, क्यूंकि खाड़ी देशो के अमेरिकी सहयोगी देशों  की पूरी ऊर्जा सुरक्षा इस मार्ग से ही होता है। इस क्षेत्र से सऊदी अरब, इराक, यूएई, कुवैत, कतर और ईरान के भी ज्यादातर तेल का निर्यात हॉर्मूज जलसंधि से होता है और यह आंकड़ा कम से कम 1.5 करोड़ बैरल्स प्रतिदिन है। चूंकि स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज़ पर प्रत्यक्ष रूप से ईरान की संप्रभुता है जो अमेरिका को फूटी आंख नहीं सुहाता है, जिसको लेकर दोनों देशों के बीच के संबंधों तनावपूर्ण रहे हैं जहां “अमेरिका फ्रीडम ऑफ नेवीगेशन”(आबाध और सुरक्षित नौवहन ) कि वक़ालत करता है वहीँ ईरान का मानना है कि हॉरमुज़ जलसंधि उसका अभिन्न अंग है इसलिए ईरानी नौसैनिक अधिकारियों का मानना है कि इसे ठप्प करना “बस एक गिलास पानी पीने जैसा होगा” ।

शिया बहुल राष्ट्र ईरान सुन्नी शासित खाड़ी मुल्कों के साथ तनाव के चलते अक्सर इस जलडमरू मध्य पर नाकेबंदी की धमकी देता है और अपनी शक्ति प्रदर्शन के लिए  हॉरमुज़ जलसंधि उसका पसंदीदा रणक्षेत्र बनता है। बीते मार्च के शुरूआती सप्ताह में आई मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ईरान ने ईरान की खाड़ी और हिंद महासागर के एक विशाल क्षेत्र में तीन दिवसीय वार्षिक नौसेना ड्रिल की शुरुआत की। ईरान के नौसेना के कमांडर रियर एडमिरल होसैन खानजादी के अनुसार यह ड्रिल हॉर्मुज जलसंधि मकरान तट, ओमान सागर और हिंद महासागर के उत्तर में जलडमरूमध्य में  संपन्न हुआ। वर्षांत में 29 दिसम्बर को ईरान ने रूस और चीन के साथ साझा नौसैनिक अभ्यास को सफ़लता पूर्वक सम्पन्न किया। ईरान का आरोप है कि अमेरिका और उसके सहयोगियों को यह अभ्यास रास नही आया और उन्होंने इस संयुक्त अभ्यास को बाधा पहुंचाने की पुरजोर कोशिश की जिसे चौकन्ने ईरानी सुरक्षा बलों ने विफल कर दिया। चूंकि मसला रूस और चीन का था इसलिए इसे अमेरिकी प्रभाव से ग्रस्त वैश्विक मीडिया ने खासा तवज्जो नहीं दिया

इस तरह के नौसैनिक अभ्यास से सबसे ज्यादा नींद हराम अमेरिकी प्रशासन की होती है। वर्तमान के हालात में अमेरिकी इस क़दर घबराये और आक्रोशित है कि उसने अपने मध्यपूर्व (भारत के लिए पश्चिम एशिया) में अपना “पेट्रियॉट मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम” बैटरी की तैनाती कर दी है दूसरी तरफ उसने खाड़ी में अपना विमानवाहक युद्धपोत यूएसएस अर्लिंगटन भेज दिया है जिसपर आधुनिक एंफीबियस वारफेयर में माहिर साजो सामान और लड़ाकू उपकरण और लड़ाकू जहाज हैं तैनात है । ये युद्धपोत यूएसएस अब्राहम लिंकन के साथ खाड़ी में तैनात रहेग। अमरीकी रक्षा विभाग पेंटागन का कहना है कि कतर के एक सैन्य ठिकाने पर बम बरसाने वाले US B-52 विमान भी भेजे जा चुके हैं। अमरीका ने ईरान को एक ‘स्पष्ट और सीधा’ संदेश देने के लिए मध्य पूर्व में अपना एक यद्धपोत तैनात किया है। हालिया स्थिति से निपटने के लिए अमेरिकी सेना ने अपने एयरबोर्न डिवीजन को इराक में उतारने का निश्चय किया है।

डोनाल्ड ट्रम्प ने ऐसे सैन्य अधिकारी को निशाना बनाया है जिसे उनके पूर्वर्ती बुश और ओबामा दोनो ने जानते हुए उसे नहीं छुआ था। अपने बड़बोलेपन और सनकी रवैए के लिए जाने वाले ट्रम्प ने अपने दुस्साहसिक कारगुजारी सर गाहे बगाहे सम्पूर्ण विश्व को युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है। संयुक्त राष्ट्र धृतराष्ट्र माफ़िक़ शांत खड़ा है जबकि अन्य संस्थाएं निर्लज्ज और पतित माफिक मुंह ताक रही है। आने वाले समय मे अगर खाड़ी में युद्ध सुलगा तो यह पूरे विश्व को निगल जाएगा जिसमे वैश्विक शांति की अवधारणा की संकल्पना पूरी तरह बेमानी होगी और इसका सीधा जिम्मेवार अमेरिका होगा।

अमेरिकी चिढ़ और उसकी दुखती रग

अमेरिका ईरान से यूँ ही नही चिढ़े रहता है। उसे लगातार वह 444 दिनों का तेहरान में अमेरिकी दूतावास का बंधक प्रकरण याद आता है जो अभी भी महाशक्तियों में सर्वश्रेष्ठ अमेरिका को सालता है। जब रोनाल्ड रीगन अमेरिका के राष्ट्रपति बने तभी बंधकों की रिहाई संभव हो पाई। उसे यह पूरा प्रकरण कचोटता है और उसकी दुखती रगों को हर साल दर्द देता है। उस पूरे बंधक प्रकरणों को आप आस्कर विजेता सिनेमा “आर्गो” में देख सकते हैं। संभवतः एक यह भी कारण है कि अमेरिका किसी भी सूरत में ईरान को या तो तबाह कर देना चाहता है या फिर वह चाहता है कि ईरान में सत्ता उसकी मनमर्जी से चले जबकि ईरान पर काबू पाने की चाहत का रणनीतिक कारण इजराइल और सऊदी अरब भी हैं जो अमेरिका के “ब्लू ऑय” (चहेते हैं) और ईरान उन्हें फूटी आंखों नहीं सुहाता है।

राष्ट्रपति ट्रम्प को रामधारी सिंह दिनकर कृत रश्मिरथी का अवश्य अध्ययन करना चाहिये। दिनकर ने ठीक ही लिखा है – नाश मनुज पर छाता है पहले विवेक मर जाता है।

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