भारत-नेपाल संबंधों में “कालापानी” का पेंच

भास्कर

नेपाल हिमालय की वादियों में भारत और चीन के तिब्बत के बीच स्थित एक भू-आवेष्टित (लैंडलॉक) और बफर देश है। तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद इसका राजनीतिक, सामरिक और रणनीतिक महत्व काफी बढ़ गया है। नेपाल भारत के पांच राज्यों के साथ 1880 किलोमीटर लंबी और खुली सीमा साझा करता है। जिससे दोनों देशों के नागरिक बिना किसी वीजा पासपोर्ट के एक दूसरे के क्षेत्र में बेरोकटोक आते जाते रहते हैं।

भारत और नेपाल के आपसी सम्बन्धों को म्यूचअल कमिटमेंट टू पीसफुल को-एग्जिस्टेंस, मल्टीडायमेंशनल और कॉर्डियल रिलेशनशिप के रूप में देखा जाता रहा है। दोनो देशों के सम्बन्धो को राजनैतिक, आर्थिक, वैवाहिक सामरिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आधार पर देखे जाते रहें हैं। इनके बीच औपचारिक रूप से राजनय की शुरुआत 17 जून 1947 को हुई थी।

भारतीय उपमहाद्वीप में नेपाल की अवस्थिति भारत के गर्भनाल से जुड़ा “नेशनल ट्रीटमेंट” प्राप्त और भू-आवेष्टित (लैंडलॉक) देश की है जो नेपाल को बेहद खास बनाती है।

विगत दशकों से नेपाल का झुकाव चीन की तरफ बढ़ता जा रहा है जो वर्तमान नेपाली प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली के सरकार में कुछ और तेज हुआ है। नेपाल की ओली सरकार भारत विरोधी सुर और चीन के साथ सदाबहार मित्रता करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही है।

हालिया सीमा संबंधी विवाद भी इसी कड़ी का नतीजा है। नेपाल की ओर से अपरिपक्व राजनय का प्रदर्शन उस वक़्त किया गया जब भारत की अगुवाई में पूरा विश्व कोविड-19 को मात देने की लड़ाई लड़ रहा है। दूसरी तरफ इस महामारी में चीन की संदिग्ध भूमिका पर वैश्विक सवाल खड़े हो रहे हैं। इस बीच नक्शा सम्बन्धी विवाद को उछाल कर सस्ती लोकप्रियता और उग्र-राष्ट्रवाद और ग्रेटर नेपाल की संकल्पना के जरिये मामले को गम्भीर स्तर तक वेवजह पहुंचाने के चीनी नेपाली मन्शा को समझने की जरूरत है और इनके गठजोड़ को समय रहते समाप्त करने की जरूरत है नहीं तो ये कोविड-19 महामारी की तरह फैलती जाएगी।

बीते 06 मई को जब रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने सीमा सड़क संगठन BRO द्वारा लिपुलेख में 80 किलोमीटर लंबी बारहमासी कैलाश मानसरोवर लिंक की शुरुआत एक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए किया। मानो नेपाल इस घड़ी का अरसे से इंतज़ार कर रहा था। नेपाल ने लिपुलेख, कालापानी, लिम्पियाधुरा और सुस्ता क्षेत्र पर भारत को आक्रांता देश बताते हुए मसले का अंतरराष्ट्रीयकरण करना शुरू कर दिया।

यहां गौर करने वाली बात है कि चीन, नेपाल और पाकिस्तान की तिकड़ी ने भारत पर एक साथ मोर्चा खोला है। चीन और नेपाल सीमा और सीमांत सम्बन्धी विवाद में भारत को उलझा कर रखे है तो पाकिस्तान नियंत्रण रेखा पर भारी सैन्य जमावड़ा कर किसी बड़े हमले के फिराक़ में है।

नेपाल के साथ वर्तमान सीमा विवाद की शुरुआत जिन क्षेत्रों को लेकर हुई ,यहां उसकी संक्षिप्त चर्चा की जा रही है…

1. लिपुलेख

लिपुलेख का सामरिक महत्व है। भारत, नेपाल और चीन के बीच का सीमान्त क्षेत्र, जिसे त्रि-जंक्शन क्षेत्र कहा जाता है। यह एक हिमालयी दर्रा है जिससे होकर सिल्क रोड के समय से तिब्बत और भारत के बीच का व्यापारिक मार्ग, हिंदुओं, बौद्ध और जैन धर्मबलम्बियों के पवित्र स्थल कैलाश मानसरोवर जाने के लिये भारत के ओर से रास्ता था। इस मार्ग में कई हिमालयी दर्रे हैं जो गंगा के मैदान को तिब्बत के पठार से जोड़ने वाला सबसे सुगम मार्ग में एक हैं। दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात अगर किसी वजह से चीन के साथ किसी तरह का संघर्ष हुआ तो यह भारत की राजधानी नई दिल्ली से बेहद करीब है जिस पर बीजिंग की निगाहें कब से लगी हुई है।

2. कालापानी

भारत के उत्तराखंड राज्य के पिथौरागढ़ जिले में 16000 फुट की ऊंचाई पर लगभग 35 वर्ग किलोमीटर का इलाका है। यह महान हिमालय का भाग है, सामरिक दृष्टि से यह क्षेत्र ट्राई जंक्शन क्षेत्र है जहाँ भारत अपनी सीमा चीन और नेपाल के साथ साझा करता है। इसकी यही अवस्थिति इसे बेहद खास बनती है। सामरिक रूप से यह इलाका पूरे दक्षिण एशिया के राजनयिक सामरिक और कूटनीतिक दृष्टिकोण से अति महत्वपूर्ण बनाता है। यहां नेपाल भारत और चीन के बीच तिब्बत को बफर राष्ट्र के रूप में देखा जाता है।

इस क्षेत्र में 1962 से ही भारतीय सुरक्षा बलों की मौजूदगी रही है। सामरिक रूप से सेफ जोन माने जाने वाले इस क्षेत्र में भारतीय सुरक्षा बल करीब 20,276 फुट पर से चीन की हर एक गतिविधि पर अपनी पैनी निगाह रख सकते है और इफेक्टिव डिफेन्स के रूप में चीन के हर नापाक इरादों और मंसूबो पर पानी फेरते नजर आते रहें हैं।

3. महाकाली नदी

आंग्ल-नेपाल युद्ध (1814 -16) के पश्चात हुए सुगौली की संधि (1816) में यह तय हुआ की यह नदी ब्रिटिश भारत की पश्चिमी सीमा का जबकि तीस्ता पूर्वी सीमा का निर्धारण करेगी। स्वतंत्रता पश्चात इसी को मानते हुए भारत-नेपाल के बीच पश्चिमी सीमा के रूप में काली नदी की मान्यता रही है, लेकिन नेपाल में इस नदी के उद्गम को लेकर समस्या है। नेपाल का मानना है की काली नदी लिपुलेख से 16 किलोमीटर दूर उत्तर-पश्चिम में जांस्कर रेंज में अवस्थित लिम्पियाधुरा से शुरु हो कर दक्षिण-पश्चिम दिशा में बहती है। भारत का मानना है कि क़ाली नदी का उद्गम कालापानी के निकट पंखागडॉ के पास एक बरसाती झरने से होता है जो लिपुलेख दर्रे के ठीक नीचे है। यह नदी दक्षिणावर्त मार्ग के साथ थोड़ा पूर्व की और बहती है। इस नदी को ऊपरी भाग में काली, मध्यवर्ती भाग में महाकाली और तराई क्षेत्र में इसे सरयू-घाघरा के नाम से जाना जाता है।

भारत और नेपाल के बीच काली सम्बंधित सीमा विवाद काफी पुराना है। दरअसल इसकी शुरुआत वर्ष 1816 में सुगौली की संधि से ही हुई थी। इसके तहत काली/ महाकाली नदी के पूरब दिशा में पड़ने वाली सारी भूमि नेपाल के हिस्से में आती है। इस संधि के बाद, नेपाल का दावा है कि लिपुलेख, लिंपियाधुरा और और कालापानी उसके अधिकार क्षेत्र में आते हैं।

जबकि, वर्तमान हक़ीक़त ये है कि यह इलाके भारत की सीमा में मौजूद है जिसे नेपाल ने तीसरे देश की शह पर विवादित क्षेत्र बना दिया है। यह तीनो क्षेत्र यह तीनो क्षेत्र महाकाली नदी के उद्गम स्थल से दक्षिण पूर्व इलाक़े में पड़ते हैं।

4. सुस्ता क्षेत्र (Susta Territorial Region):

यह क्षेत्र भारत के उत्तर प्रदेश तथा बिहार की सीमा पर अवस्थित है। नेपाल ने बिहार के पश्चिमी चंपारण ज़िलों के पास अवस्थित ‘सुस्ता को भी अपने नए मानचित्र में शामिल किया है।

नेपाल का दावा है कि भारत ने इस क्षेत्र पर अतिक्रमण किया है तथा भारत को इस क्षेत्र को अविलम्ब खाली करना देना चाहिये।

सुस्ता क्षेत्र बिहार में ‘वाल्मीकि टाइगर रिज़र्व (VTR) की उत्तरी सीमा पर अवस्थित एक गाँव है। यहाँ भारतीय सीमा की सुरक्षा के लिए सशस्त्र सीमा बल (SSB) की एक इकाई तैनात है।

तराई में विवाद का कारण:

इस क्षेत्र में भी विवाद का मूल कारण गंडक नदी के बदलते मार्ग को माना गया है। उल्लेखनीय है कि गंडक नदी नेपाल और बिहार (भारत) के बीच अंतर्राष्ट्रीय सीमा बनाती है। गंडक नदी को नेपाल में नारायणी नदी के रूप में जाना जाता है।

नेपाली पक्ष का मानना है कि पूर्व में सुस्ता क्षेत्र गंडक नदी के दाएँ किनारे अवस्थित था, जो नेपाल का हिस्सा था। लेकिन समय के साथ नदी के मार्ग बदलने के साथ यह क्षेत्र वर्तमान में गंडक के बाएँ किनारे पर अवस्थित हो गया है।

अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के अनुसार, यदि कोई नदी दो देशो के बीच सीना या सीमान्त का निर्धारण करती है तो , अगर नदी की प्रवित्ति अपने मार्ग परिवर्तन के लिया जाना जाता है, वैसी परिस्थिति में अगर किसी नदी के मार्ग में परिवर्तन होता है तो अंतर्राष्ट्रीय सीमा का निर्धारण नदी के मार्ग में बदलाव के स्वरूप के आधार पर किया जाता है अर्थात नदी मार्ग में आकस्मिक बदलाव (Avulsion) हो तो अंतर्राष्ट्रीय सीमा अपरिवर्तित रहती है, लेकिन यदि नदी मार्ग में बदलाव धीरे-धीरे हो (Accretion) तो सीमा उसके अनुसार परिवर्तित होती है।

नेपाली विदेश मंत्रालय के अनुसार, सुगौली संधि (वर्ष 1816) के तहत काली (महाकाली) नदी के पूर्व दिशा के सभी क्षेत्र, जिनमें लिम्पियाधुरा (Limpiyadhura), कालापानी (Kalapani) और लिपुलेख (Lipulekh) शामिल हैं, यह नेपाल का अभिन्न अंग हैं जबकि भारत के अनुसार, यह क्षेत्र उत्तराखंड के पिथौरागढ़ ज़िले का हिस्सा है जबकि नेपाल इस क्षेत्र को अपने सुदूर पश्चिमी अंचल दार्चुला ज़िले का हिस्सा मानता है।

हाल ही में नेपाल की संसद द्वारा एक विशेष सत्र का आयोजन कर आधिकारिक रूप से नेपाल का नवीन मानचित्र जारी किया गया, जिसमे उत्तराखंड के कालापानी (Kalapani) लिंपियाधुरा (Limpiyadhura),सुस्ता और लिपुलेख (Lipulekh) को अपने संप्रभु क्षेत्र का हिस्सा माना है। हालांकि इस नक्शे को अभी संसद में ओली को दो तिहाई बहुमत से पास कराने कि जरूरत होगी तभी तभी इसे नेपाल में संवैधानिकता मिल पाएगी। अगर भारत इसे रोकने में सफल रहा तो निश्चित रूप से इसे भारत की एक जबरदस्त कूटनयिक और राजनयिक विजय के रुप में देखा जाएगा और इससे सम्पूर्ण दक्षिण एशिया में भारत की प्रतिष्ठा में बढ़ोत्तरी होगी।

नेपाल ने जारी किया विवादित नक्शा जिसमें भारतीय इलाकों को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया है

वर्तमान में नेपाली रवैये पर भारत

नेपाल में तेजी से बदलते राजनीतिक घटनाक्रम पर पैनी नजर रख रहा है और भारत को रखना भी चाहिए क्योंकि नेपाल में थोड़ी बहुत भी राजनीतिक उथल-पुथल का सीधा प्रभाव भारत पर पड़ता है।

सेना के कमांडरों के साथ बैठक में सेना निश्चित रूप से चीन-नेपाल के नापाक गठजोड़ पर माइंड मैपिंग कर रही होगी।

नेपाल और चीन ने जिस तरह सीमा-विवाद को कोविड-19 के संकट काल में दो मोर्चे पर बेतुका हवा दी है वह निश्चित रूप से घोर निंदनीय है।

इसमे किसी देश को रत्ती भर संदेह नहीं होना चाहिए,अगर भारत के हितों को को नेपाली चीनी गठजोड़ से किसी तरह से खतरा महसूस हो रहा है तो ऐसे में भारत को चाहिए कि वह अपने हितों की रक्षा, संप्रभुता को अक्षुण्ण रखने के वे हर संभव उपाय उठाये जाय जिससे गुजराल डॉक्ट्रिन का दुरुपयोग कर रहे इन पड़ोसी देशों को इसके दीर्घकालिक नुकसान का अंदेशा सदा बरकरार रहे।

गौरतलब है कि भूटान को छोड़ भारत के सभी पड़ोसी देश या तो चीन की “स्ट्रिंग आफ पर्ल्स” या फिर ‘वन बेल्ट वन रोड (ओबीओआर)’ नीति का भाग रहे हैं जो भारत को पहाड़ पठार और समुद्र के जरिये भारत को घेरने की पुरजोर कोशिश जारी है।

वासुकी बनाम ड्रेगन:

भारत के कदमों की काट ढूंढने के लिए ड्रैगन का तिलमिला कर हम पर पलट कर निश्चित रूप से वार/झगड़ा/फसाद या टकराव करेंगे। कहीँ भी यथा पश्चिमी हिमालय से पूर्वी सीमान्त हिमालय में सीमित टकराव या Dok la 2.0 जैसी हरकत वायु सीमा का अतिक्रमण अथवा हिन्द महासागर में या अंतरराष्ट्रीय मंचो पर,या सियांग नदी को मटमैला करने जैसी हरकत या फिर पारछू झील को इकोलॉजिकल बम के रूप में या एकाएक कहीं तेज बहाव से जनजीवन को भारी हानि या फिर कृत्रिम तेज वर्षा कराने, जंगलों में दावानल लाने जैसी हरकत करने से ये बाज नहीं आएंगे। चीनी हर वक़्त ऐसा कुछ भी करेंगे जिससे भारतीय हितों को चोट पहुंचे। ड्रेगन की चाल को भांपने के लिये हमें सीमान्त और सीमा पर बेहद चौकस, सतर्क और मजबूती के साथ यथास्थिति बनाये रखते हुए इसके हर कदम को निष्फल की जरूरत है।

आगे की राह:

कूटनीतिक स्तर पर बातचीत किसी भी समस्या का समाधान के लिए सबसे बेहतर विकल्प माना जाता है। नेपाल की भारत विरोधी कार्यवाई निश्चित रूप से चिंतित करती है। सामरिक एवं रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल के कालापानी सीमा पर विवाद फिर से खड़ा करने के पीछे चीन के गहरे भू-सामरिक लक्ष्य हो सकते हैं । वर्तमान में भारत को नेपाल की इस कृत्य को बेहद संजीदगी से लेने की जरूरत है। उसे एक सख्त कूटनयिक संदेश देते हुए खुद को महाशक्ति होने का परिचय देने की जरूरत है ताकि अन्य पड़ोसी देशों में एक स्पष्ट संदेश जाय कि भारत विरोधी कार्य किसी भी कीमत पर नहीं करना है।

चीन की डेब्ट ट्रैप डिप्लोमसी का हश्र नेपाल शायद जानना नहीं चाहता है या फिर अपनी आंखें मूंदे रहना चाहता है। नेपाल को चहिए की वह श्रीलंका, म्यांमार,मलेशिया और अन्य अफ्रीकी देशों में चीनी निवेश मॉडल के पश्चात वहां की सरकारों की विवशता के बारे में केस स्टडी का अध्ययन करे जहां चीनी ऋण के आगे ये सरकार अपनी संप्रभुता को ताक पर रख कर चीन के नए आर्थिक उपनिवेश और आधुनिक आर्थिक दासता का बेहतरीन उदाहरण बन गए है। नेपाल की आर्थिक और घरेलू राजनीति में चीन के बढ़ते प्रभावशीलता तो देखते ही बनती है जो निश्चित रूप से भारत के लिए अच्छे संकेत नहीं है। नेपाल का चीनी खेमा में जाने का अर्थ उसके विनाश के अतिरिक्त कुछ भी नहीं।

चीन द्वारा तीनों सेक्टरों में फेस ऑफ और स्टैंड ऑफ की समस्या से जूझ रहे भारत के लिए यह बेहद चुनौतीपूर्ण समय है जहां पाकिस्तान नियंत्रण रेखा पर घात लगाए हुए है। भारत द्वारा चीनी चुनौती का जिस तरीके से मुँहतोड़ जवाब दिया जा रहा है उसकी उम्मीद न तो नेपाल और न ही चीन ने की होगी।

भारत चीन के बीच सीमा विवाद को लेकर ट्रंप चौधरी बनना चाहते है।

उम्मीद है कि भारतीय पक्ष इतना सक्षम है कि डोनाल्ड ट्रम्प को शायद ही कभी चौधरी बनने का मौका मिले।

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