‘किशोर दा ने गीत भी लिखे, लेकिन सिर्फ तीन गीत ही गाए गए’ – उदय शंकर

किशोर कुमार को एक गायक, अभिनेता और निर्देशक के तौर पर तो सभी जानते हैं मगर यह बहुत कम लोग जानते हैं कि वे गीत भी लिखते थे। गीत लिखना उनके लिए एक चुनौती का प्रत्युत्तर था, उत्तर नहीं।

उदय शंकर

किशोर कुमार को एक गायक, अभिनेता और निर्देशक के तौर पर तो सभी जानते हैं मगर यह बहुत कम लोग जानते हैं कि वे गीत भी लिखते थे। गीत लिखना उनके लिए एक चुनौती का प्रत्युत्तर था, उत्तर नहीं। उन्होंने लगभग 2 दर्जन से अधिक गीत लिखे लेकिन 3 गीत ही उनके लिखे हुए गाए गए।

साल 1949 की गर्मियों के दिन थे। सचिन देव बर्मन उस दिन अशोक कुमार से मिलने आए थे। मिलना तो था किशोर कुमार से और अशोक कुमार की आनेवाली फिल्म ‘मशाल’ (1950) के संबंध में वार्ता भी करनी थी।

किशोर को पता चल चुका था कि एसडी आए हैं। वे अंदर के कमरे में थे। आगंतुक के डर से उन्होंने गुनगुनाना बंद कर दिया था। अशोक कुमार ने आवाज़ लगाई- “कोथाई रे आभाष…” जवाब मिला – ‘आश्छि दादामुनि’।

दादामुनी ने किशोर को परिचय कराया कि ये त्रिपुरा स्टेट के राजकुमार वही सचिन दा हैं और तुमसे मिलने आए हैं। सहगल साहब को तुमसे सुनने आए हैं। दो-चार हो जाए।

एसडी ने किशोर को सुनने के बाद तारीफ की और नसीहत भी दी कि अपना स्टाइल विकसित करो। नकल से बचो। और… गीत की बारीकियों को समझाते हुए कहा कि गीत लिखना बहुत टेढ़ा काम है और गाना इससे भी महाटेढ़ा और धुन बनाना पागलों का काम। इस बात पर दादामुनी और एसडी ठहाके लगाकर हंसने लगे लेकिन किशोर के अंदर यह एक चुनौती बन गई। इसका उत्तर तो ‘टेढ़ा काम’ कहकर मिल चुका था लेकिन किशोर इसका प्रति-उत्तर देना चाहते थे।

तब 21 के किशोर को अभिनय का चक्कर छोडकर गीत लिखने का चस्का लगा और लगभग एक दर्जन गीत लिख डाले। कुछ योडलिंग वाले थे। इन्हें किशोर ठीक-ठाक गा लिया करते थे।

सन 1950 में ‘मशाल’ रीलीज़ हुई तो प्रिमियर पर किशोर भी बड़े भाई दादामुनी के साथ पहुंचे। वहाँ इनकी मुलाक़ात शमशाद बेग़म से हुई जो तब की बड़ी गायिका थीं। शमशाद बेगम ने इन्हें बहुत प्यार दिया। वे 31 वर्ष की थीं। किशोर ने एक अर्ज़ की और शमशाद बेग़म ने बात दे दी कि तुम्हारा लिखा गीत जरूर गाऊँगी।

कुछ दिनों बाद ही किशोर अपने लिखे गानों को लेकर पहुँच गए। शमशाद बेग़म ने उससे एक गीत चुना और गाया। किशोर बहुत खुश हुए और उनसे प्रभावित भी।


सन 1950 में ‘मशाल’ रीलीज़ हुई तो प्रिमियर पर किशोर भी बड़े भाई दादामुनी के साथ पहुंचे। वहाँ इनकी मुलाक़ात शमशाद बेग़म से हुई जो तब की बड़ी गायिका थीं। शमशाद बेगम ने इन्हें बहुत प्यार दिया। वे 31 वर्ष की थीं। किशोर ने एक अर्ज़ की और शमशाद बेग़म ने बात दे दी कि तुम्हारा लिखा गीत जरूर गाऊँगी।

देवेन्द्र गोयल ‘अदा’ नाम से एक फिल्म बना रहे थे और उसके गीतों की रिकॉर्डिंग हो रही थी। बेग़म ने कुछ मोहलत ली और मशहूर गीतकार प्रेम धवन से किशोर का लिखा नौसिखुवा गीत ‘जो तुम करो मैं कर सकता हूँ…’ सुधारने और इसे ‘युगल’ गीत में ढालने का अनुरोध किया। आख़िर, शमशाद बेग़म को इन्कार करने की ज़ुर्रत कहाँ किसी में थी! सुधार के बाद इस गीत को किशोर दा के साथ रिकॉर्ड किया गया। यह फिल्म 1951 में रीलीज़ हुई। फ़िल्म में इस गीत ने अलग ही नशा घोल दिया। मगर दादामुनी को पसंद नहीं आया और उन्होंने निर्देश दिया कि अभिनय और गायकी पर ध्यान दें।

सन 1964 में 6 साल की कोशिशों के बाद बतौर निर्देशक किशोर की फिल्म ‘दूर गगन की छांव में’ रीलीज़ हुई। इसमें इन्होंने अपनी प्रेमिका सुप्रिया चौधरी को बांग्ला सिनेमा से लाकर हिन्दी में स्थापित करने की कोशिश की और बेटे अमित कुमार को भी रखा। इस समय सुप्रिया 31 वर्ष की थीं और उनका 6 वर्ष पहले डाइवोर्स हो चुका था । इस फिल्म में अपना लिखा एक गीत ‘आ चल के तुझे, मैं ले के चलूँ…’ स्वयं गाया जो काफी चर्चित हुआ। इस फिल्म के पोस्टर पर किशोर ने अमित को ही रखा था। यह गीत दादामुनी को बहुत पसंद आया। तब वे इस गीत को बराबर गुनगुनाते थे।

सन 77 की बात है। किशोर को अभिनय करते और गीत गाते हुए अब लगभग दो दशक होने को थे। वे इस लाइफस्टाइल से ऊब गए थे। इस बीच बोनी कपूर ‘हम पाँच’ नाम से फिल्म बना रहे थे। गीत गाने के लिए उन्होंने किशोर दा से संपर्क किया तो उन्होंने अपनी जगह बेटे अमित से गवा लेने की पेशकश की और यह समझाया कि वो मेरी ट्रू-कॉपी है। बोनी इस आधार पर किशोर दा की बात मान गए कि अंतिम-अंतिम में भी किशोर दा का पागलपन जाग जाए और फिल्म के कम-से-कम एक भी गीत वो गा दें मगर गीत गाने की बजाय उन्होंने बोनी के अनुरोध पर अपना लिखा गीत ‘आती है पालकी सरकार की…’ दे दिया जिसे अंतिम वक़्त में महेंद्र कपूर ने गाया था, वो भी किशोर दा की पैरवी के बाद। बोनी ने इस गीत को आनंद बक्षी से सुधरवाया था। यह फिल्म 1980 में रीलीज़ हुई थी।

इसके बाद किशोर का लिखा हुआ कोई गीत फिल्मों में नहीं आया। उनकी इच्छा थी कि उनके लिखे गीतों को एक किताब मिले मगर हो न सका।

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