वर्षांत में वैश्विक नेताओं का सबसे बड़ा जमावड़ा और ब्रिक्स के आगे की राह

भास्कर

भारत में शरद ऋतु दस्तक दे चुकी है और कैस्पियन सागर की नमी लेते हुए पश्चिमी विक्षोभ अपने तयशुदा मार्ग के जरिये भारत में प्रवेश कर रहा है। इसी कड़ी में वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक हलकों में तमाम उठापटक के बीच संभवतः ब्रासिलिया में 11वें ब्रिक्स का यह सम्मेलन वर्षांत का सबसे बड़ा राजनीतिक जमावड़ा है। यह सम्मेलन इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि चीन अमेरिका के बीच चल रहे ट्रेड वॉर, अमेरिका द्वारा चीन को “करेंसी मैनीपुलेटर देश घोषित करना, और ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स रिपोर्ट के अनुसार अगर चीन और अमेरिकी के बीच हालात न सुधरे तो वैश्विक आर्थिक वृद्धि दर अपने सात वर्षों के 2.8 फीसद के निचले स्तर से गिर जाएगी जो आगे विश्वव्यापी मंदी कि राह खोलेगी।

इसी बीच अमेरिका का रूस के साथ इंटरमीडियट रेंज न्यूक्लियर फ़ोर्स (आईएनएफ़) संधि से एकतरफा बाहर होना, अफगानिस्तान में आसन्न सत्ता परिवर्तन, अफ़ग़ानिस्तान, सीरिया और इराक से अमेरिकी फौज की वापसी, ईरान के साथ अमेरिकी संबंधों में तकरार, हॉरमुज़ की खाड़ी में लगातार बढ़ता सऊदी ईरान और अमेरिकी विवाद, वेनेज़ुएला में घटता अमेरिकी प्रभुत्व, व्यापार और निवेश नीतियों पर बढ़ते विवाद के बीच अमेरिका द्वारा भारत को जनरलाइस्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंस से मिलने वाले लाभ से वंचित कर दिया, भारत द्वारा आरसीईपी में शामिल न होने का फैसला, वेनेज़ुएला पर अमेरिका की कमजोर पकड़ , सीरिया में रूसी टर्की फौज की वापसी, अमेजन के जंगल मे लगती बुझती आग, बोलीविया के कद्दावर नेता और पिंक टाइड सोशलिज्म के आखिरी समर्थक इवा मोराल्स को अर्जेंटीना में राजनीतिक शरण की खबरें और आलेख लिखे जाने तक गाज़ा पट्टी में इजरायली फौज के साथ भीषण मुठभेड़ और चिरपरिचित इस्रायली सैन्य करवाई के बीच ब्रिक्स के 11वें सम्मेलन पर सम्पूर्ण विश्व की निगाहें टिकी रहेंगी ।

वलादिवोस्टक में संपन्न ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम के बाद प्रधानमंत्री अपने रूसी समकक्ष राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ द्विपक्षीय वार्ता के साथ इस सम्मेलन में भारत का आगाज़ करेंगे, प्रधानमंत्री गत माह मामल्लपुरम के भारत चीन इनफॉर्मल मीट के बाद चीनी राष्ट्रपति शी शिंगपिंग से भी वार्ता करेंगे। रूस भारत का सबसे भरोसेमंद साझीदार और मित्र देश है।भारत को उम्मीद रखता है कि यह “रूसी साथ और रोमांस” जारी रहेगा।

11वें ब्रिक्स सम्मेलन में भाग लेने के लिए प्रधानमंत्री मोदी पहुंचे ब्राजीलिया

11वें ब्रिक्स सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ब्राजीलिया के खूबसूरत सैन टियागो के Itamraty Palace में अपने समकक्ष नेताओ के साथ द्विपक्षीय मुलाकात करेंगे और ब्रिक्स बिजनेस फोरम , लीडर्स डायलाग विथ ब्रिक्स बिजनेस कौंसिल और न्यू डेवलपमेंट बैंक की बैठकों में भारत का मजबूत पक्ष रखेंगे।

11वें ब्रिक्स सम्मेलन की थीम : Economic Growth for an Innovative Future रखा गया है।

ब्रिक्स दुनिया की पाँच अग्रणी उभरती अर्थव्यवस्थाओं- ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के समूह के लिये एक संक्षिप्त शब्द (Acronym) है। BRICS की चर्चा वर्ष 2001 में वित्तीय संस्था गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) के प्रमुख अर्थशास्री जिम ओ’ नील द्वारा ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन की अर्थव्यवस्थाओं के लिये विकास की संभावनाओं पर एक आंतरिक रिपोर्ट में की गई थी।

ब्रिक्स की संरचना

ब्रिक्स कोई अंतर्राष्ट्रीय अंतर-सरकारी संगठन नहीं है, न ही यह किसी संधि के तहत स्थापित हुआ है। इसे पाँच देशों का एकीकृत प्लेटफॉर्म कहा जा सकता है। ब्रिक्स देशों के सर्वोच्च नेताओं का तथा अन्य मंत्रिस्तरीय सम्मेलन प्रतिवर्ष आयोजित किये जाते हैं। ब्रिक्स शिखर सम्मलेन की अध्यक्षता प्रतिवर्ष B-R-I-C-S क्रमानुसार सदस्य देशों के सर्वोच्च नेता द्वारा की जाती है।वैश्विक व्यापार में 30 फीसद हिस्सेदारी के साथ ब्रिक्स लगभग 42 प्रतिशत वैश्विक आबादी को जोड़ता है।

ब्रिक्स की बैठकों पर दुनिया के बाकी हिस्सों द्वारा बारीकी से नजर रखी जाती है और इसके निर्णय को गहरे वैश्विक और भू सामरिक प्रभाव पैदा करने की क्षमता है। जैसा कि वर्तमान विश्व में भू-सामरिक,आकृतिक,आर्थिक,रणनीतिक ऊर्जा सुरक्षा को लेकर परिवर्तन देखे जा रहे हैं जिसका सीधा संबंध वैश्विक शांति और सुरक्षा पर पड़ता है।

भारत का रुख

भारत शेष विश्व की तरह एशिया में एक नियम-आधारित प्रणाली का समर्थन करता है। लेकिन आतंकवाद, संघर्ष, अंतर-राष्ट्रीय अपराधों और समुद्री खतरों जैसी अपरिहार्य चुनौतियों का सामना करते ऊर्जा सुरक्षा की कमी, अपर्याप्त कुशल मानव संसाधन और एक तरफावाद सहित स्थायी विकास के ज्वलन्त मुद्दे पर भी अपना सक्रिय, जिम्मेदार और गम्भीर मत रखता है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के मौजूदा माहौल में और नियमों पर आधारित बहुपक्षीय व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण चुनौतियां – ब्रिक्स देशों को वैश्विक स्थिरता और विकास सुनिश्चित करने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी।

ओसाका संकल्प 2019 से आगे की राह

इस संदर्भ में, बीते जुलाई में ओसाका में हुए जी 20 शिखर सम्मेलन के दौरान अंतिम ब्रिक्स नेताओं की अनौपचारिक बैठक में, हमारे प्रधान मंत्री ने ब्रिक्स देशों के बीच अधिक तालमेल के लिए 5 प्रमुख सिफारिशें की थीं – अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों में ॑ सुधारित बहुपक्षवाद ’ को बढ़ावा देना; कम लागत पर ऊर्जा संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करना; एनडीबी (न्यू डेवलपमेंट बैंक) द्वारा बुनियादी ढाँचे और नवीकरणीय ऊर्जा संबंधी परियोजनाओं को अधिक प्राथमिकता देना; कुशल कर्मियों के आवागमन में आसानी और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के लिए ब्रिक्स की एक मजबूत प्रतिबद्धता है। प्रधानमंत्री के प्रमुख सिफारिशों पर संजीदगी से गौर किये जाने जी आवश्यकता है।

ब्रिक्स और आतंकवाद

ब्रिक्स नेताओं ने हमें क्रमागत ब्रिक्स शिखर सम्मेलनों में आतंकवाद पर एक मजबूत जनादेश दिया है ब्रिक्स देशों में भारत,पाकिस्तान प्रायोजित और समर्थित आतंकवाद से सर्वाधिक ग्रस्त रहा है, पाकिस्तान को विभिन्न मोर्चों पर सँरा सुरक्षा परिषद के एक सदस्य देश द्वारा नियमित रूप से पाकिस्तानी मामलों पर आंख मूंदकर अनेदखी करने अभयदान मिल जाता है।भारत ब्रिक्स के जोहान्सबर्ग शिखर सम्मेलन के तहत काउंटर टेररिज्म सहयोग के लिए उच्च महत्व देता है। भारत ने ज़ियामेन घोषणा और आतंकवाद से लड़ने के अपने मजबूत सामूहिक संकल्प को प्रतिबिंबित किया था। भारत आतंकवाद पर वैश्विक सम्मेलन के लिए इन देशों के समान समर्थन का अनुरोध करत है। इस तरह के एक वैश्विक सम्मेलन के लिए ब्रिक्स का समर्थन एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय कानूनी आधार पर आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण के लिए ब्रिक्स की आंतकवाद निरोधी सक्रिय और मजबूत वचनबद्धता और प्रतिबद्धता को रेखांकित करेगा ।

उल्लेखनीय है काउंटर टेररिज्म पर ब्रिक्स कार्य समूह की बैठकों में पिछले कुछ वर्षों में अच्छी प्रगति हुई है। तीसरी सीटीडब्ल्यूजी बैठक में, निम्नलिखित के लिए उप-कार्य समूहों की स्थापना पर विचार करने के लिए सहमति व्यक्त की गई थी जिसमे

(i) आतंकी वित्तपोषण को संबोधित करना.
(ii) आतंकी उद्देश्यों के लिए इंटरनेट के उपयोग का मुकाबला करना.
(iii) क्षमता निर्माण.
(iv) कट्टरता का मुकाबला करना.
(v) एफटीएफ का मुकाबला करना.और
(vi) करीबी आसूचना और कानून प्रवर्तन में आपसी सहयोग सहयोग।

इस संबंध में ब्रिक्स देशों इस प्रक्रिया में अपना समर्थन दोहराना होगा और आतंकवाद पर आम दृष्टिकोण को विकसित करना, आतंकवादी खतरे के समाधान में प्रयासों को समन्वित करना,सूचनाओं औऱ आसूचना को साझा करना शामिल है और इन उप-समूहों के कामकाज को ब्रासीलिया शिखर सम्मेलन के परिणामों में से एक के रूप में इस सम्मेलन में इसे जमीनी हक़ीक़त प्रदान करने की आवश्यकता है।

G-20 से आगे की राह आर्थिक अपराध पर वैश्विक प्रहार

आज बदलते विश्व मे ब्रिक्स देशों को आर्थिक अपराधियों और भगोड़ों के खिलाफ एक साथ काम करने की आवश्यकता है, क्योंकि यह दुनिया की आर्थिक स्थिरता के लिए एक गंभीर खतरा है। प्रधानमंत्री मोदी ने जी 20 ब्यूनस आयर्स समिट में भगोड़े आर्थिक अपराधियों और एसेट रिकवरी के खिलाफ कार्रवाई के लिए नौ-प्वाइंट एजेंडा का सुझाव दिया था। जिसपर ब्रिक्स देशों को भी अमली जामा पहनाने की आवयश्कता है ये नौ विंदू हैं :
प्रस्तावित एजेंडा में मजबूत और सक्रिय अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, कानूनी प्रक्रियाओं में सहयोग,
प्रत्यर्पण, सूचनाओं का आदान-प्रदान, भगोड़े आर्थिक अपराधियों के लिए प्रवेश और सुरक्षित आश्रय को रोकना आदि शामिल हैं। भारत,ब्रिक्स को अत्यधिक महत्व और तरजीह देता है। भारत ब्रिक्स देशो के साथ अपने संबंधों को आगे बढ़ाने और मजबूत करने के लिए : आपसी विश्वास, सम्मान और पारदर्शिता की भावना के साथ अपने ब्रिक्स भागीदारों के साथ मिलकर कार्य करने में यकीन करता है। इसके अलावा वित्तीय मुद्दों पर भी यह सहयोग निरन्तर विस्तारित हुआ है जिसे ब्रासीलिया 2019 में इसे और आगे ले जाने की दरकार है।

ब्रिक्स की तकनीकी उत्कृष्टता के संभावित क्षेत्र

प्रौद्योगिकी में प्रगति, डिजिटल क्रांति और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने उत्पादन प्रक्रिया, वैश्विक मूल्य श्रृंखला, कार्यबल की प्रवीणता, काम का भविष्य, डिजिटल बुनियादी ढांचे में निवेश आदि से संबंधित चुनौतियों के साथ-साथ अवसरों का सृजन में असीम संभावना है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी, नवाचार और डिजिटल अर्थव्यवस्था पर ध्यान केंद्रित करने से आई ब्रिक्स (iBRICS) नेटवर्क के निर्माण, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर सहयोग, आईसीटी में सहयोग, रिमोट सेंसिंग उपग्रहों का नक्षत्र जैसी नई पहलों के क्षेत्र में अपनी विषेज्ञता दर्शानी होगी। इस संबंध में, ब्रिक्स यह भी विचार कर सकता है कि जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने और एक खुले, स्वतंत्र, टिकाऊ, मानव-केंद्रित भविष्य के समाज के निर्माण में इन अवसरों का लाभ कैसे उठाया जाए।
साथ ही “ब्लू इकॉनोमी और इसके सहकारी क्षेत्र” और “बीच टूरिज्म” पर विशेष ध्यान देने की आवयश्कता है क्योंकि इन पांचों देशो की विशाल दंतुरित और खूबसूरत तट इस क्षेत्र में व्यापक भागीदारी की आवश्यकता है।

ब्रिक्स का उद्देश्य

ब्रिक्स का उद्देश्य अधिक स्थायी, न्यायसंगत और पारस्परिक रूप से लाभकारी विकास के लिये समूह के साथ-साथ, अलग-अलग देशों के बीच सहयोग को व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाना है जिसमे ब्रिक्स द्वारा अपने प्रत्येक सदस्य की आर्थिक स्थिति और विकास को ध्यान में रखा जाता है ताकि संबंधित देश की आर्थिक ताकत के आधार पर संबंध बनाए जाएँ और जहाँ तक संभव हो सके प्रतियोगिता से बचा जाए। ब्रिक्स विभिन्न वित्तीय उद्देश्यों के साथ एक नए और आशाजनक राजनीतिक-राजनयिक इकाई के रूप में उभर रहा है जो वैश्विक वित्तीय संस्थानों में सुधार के मूल उद्देश्य से परे है।

सहयोग के क्षेत्र

  1. आर्थिक सहयोग: ब्रिक्स देशों में कई क्षेत्रों में आर्थिक सहयोग की गतिविधियों के साथ-साथ व्यापार और निवेश तेज़ी से बढ़ रहा है। ब्रिक्स समझौतों से आर्थिक और व्यापारिक सहयोग, नवाचार सहयोग, सीमा शुल्क सहयोग, ब्रिक्स व्यापार परिषद, आकस्मिक रिज़र्व समझौते और न्यू डेवलपमेंट बैंक के बीच रणनीतिक सहयोग आदि सामने आए हैं।ये समझौते आर्थिक सहयोग को मज़बूत करने और एकीकृत व्यापार तथा निवेश बाज़ारों को बढ़ावा देने के साझा उद्देश्यों की प्राप्ति में योगदान देते हैं।
  2. पीपुल-टू-पीपुल एक्सचेंज
  3. राजनीतिक और सुरक्षा सहयोग सुर और बहुपक्षवाद दक्षिण-दक्षिण सहयोग शमिल हैं।
  4. वैश्विक संस्थागत सुधारों पर ब्रिक्स का प्रभाव

BRICS देशों के बीच सहयोग शुरू करने का मुख्य कारण वर्ष 2008 का वित्तीय संकट था। इस वित्तीय संकट के कारण डॉलर के प्रभुत्व वाली मौद्रिक प्रणाली की स्थिरता पर संदेह उत्पन्न हुआ था। BRICS ने बहुपक्षीय संस्थानों के सुधार के क्रम में वैश्विक अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक परिवर्तन और तेज़ी से उभरते हुए बाज़ार (जो केंद्रीय भूमिका निभाते हैं) को दर्शाया है।

न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB):

शंघाइ स्थित न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) को वर्ष 2012 में नई दिल्ली में आयोजित चौथे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ-साथ विकासशील देशों में बुनियादी ढाँचा और सतत विकास परियोजनाओं के लिये एक की स्थापना पर विचार किया गया। सन 2014 के फोर्टालेजा घोषणा में कहा गया कि NDB ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग को मज़बूत करेगा और वैश्विक विकास के लिये बहुपक्षीय तथा क्षेत्रीय वित्तीय संस्थानों के प्रयासों को पूरा करके स्थायी और संतुलित विकास में योगदान देगा।

NDB के संचालन के प्रमुख क्षेत्र हैं- स्वच्छ ऊर्जा, परिवहन, अवसंरचना, सिंचाई, स्थायी शहरी विकास और सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग।
NDB सभी सदस्य देशों के समान अधिकारों के साथ ब्रिक्स सदस्यों के बीच एक परामर्श तंत्र पर काम करता है।
आकस्मिक रिज़र्व व्यवस्था(Contingent Reserve Arrangement)
अपनी प्रारंभिक क्षमता 100 बिलियन डॉलर के साथ शुरुआत किये इस कोष के नतीजे उत्साहवर्द्धक रहे है।
यह वैश्विक वित्तीय सुरक्षा नेट को मज़बूत करने और मौजूदा वित्तीय अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्थाओं को मज़बूत करने में योगदान देगा।
न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) पर इस सम्मेलन में विशेष सत्र का आयोजन किया जा रहा है,इससे इसके महत्व को समझा जा सकता है।

समावेशी विकास पर भारतीय दृष्टिकोण

भारत का मानना है कि विकास को वैश्विक व्यापार के लिए केंद्रीय रहना चाहिए और इसके लिए समान लाभ साझाकरण, रोजगार सृजन और समावेशी विकास अभिन्न होने चाहिए। भारत ने हमेशा ब्रिक्स को एक जन-केंद्रित उद्यम बनाने पर जोर दिया है और ब्रिक्स के भीतर गरीबी, भुखमरी, रोजगार सृजन और महिलाओं के सशक्तीकरण से निपटने के लिए सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को साकार करने और ऐसे किसी भी उपाय का समर्थन करने पर होना चाहिए,जो सामूहिक रूप से वैश्विक समुदाय द्वारा सहमत इन लक्ष्यों को प्राप्त करने में उपयोगी हो।

भारत और मल्टीलटेरिज्म की संकल्पना

भारत का मानना है कि ‘सुधारित बहुपक्षवाद’ इन समयों में आगे बढ़ने का मार्ग है – विशेषकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सुधार। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों पर विचार-विमर्श सदा के लिए एक अभ्यास नहीं हो सकता है जबकि सुरक्षा परिषद की विश्वसनीयता और वैधता का क्षरण लगातार जारी है।

भारत कमोबेश सभी मंचो से मुखर स्वर में यह सदैव कहता रहा है कि सभी को यह सुनिश्चित करने के लिए एक साथ काम करना चाहिए कि एक नियम-आधारित विश्व व्यवस्था बनाए रखी जाए जिससे संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन, यूएनएफसीसीसी, आईएमएफ, विश्व बैंक आदि जैसे बहुपक्षीय संस्थान प्रासंगिक बने रहें और समकालीन वैश्विक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करते रहे।

ब्रिक्स देशों को भी भारत कि इस संबंध में “न्यायिक मांग” को स्वीकार करते हुए अंतर्राष्ट्रीय शासन के इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में खुद को विभाजित करने के बजाय एक मजबूत,मुखर और समवेत स्वर में अपनी आवाज बुलन्द करनी चाहिये।

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