मंदार : देवोत्थान एकादशी और भगवान विष्णु का जागकर जल से बाहर आना

उदय शंकर

आज देवोत्थान एकादशी है और भगवान विष्णु जागकर जल से बाहर आने लगे हैं। 4 माह पहले देवशयनी एकादशी के दिन भगवान जल में प्रविष्ट हुए थे।

मंदार पर्वत के ऊपर सीता कुंड (पौराणिक नाम) के पानी से ऊपर अब भगवान विष्णु की प्रतिकृति आने लगी है। सीता कुंड का पानी अब कम होने लगा है। चातुर्मास पूर्व विष्णु अपनी भार्या लक्ष्मी, नाभि से निकले कमल पर विराजमान त्रिमुख ब्रह्मा व अपने गणों के साथ जल से ढँक गए थे। यह दृश्य बड़ा मनभावन होता है यहाँ।

देवोत्थान एकादशी को ‘देवउठनी एकादशी’, ‘तुलसी विवाह’ या ‘देव प्रबोधिनी’ के नाम से भी जानते हैं।

देवशयनी एकादशी से यहाँ डूबते हुए और देवोत्थान एकादशी को विष्णु को शनैः शनैः निकलते हुए देखना एक बहुत ही रोचक प्रक्रिया है। गजब बात यह कि ऐसी तीन मूर्तियाँ यहाँ अलग-अलग जल-लेवलों पर बनाई गई हैं।

आश्चर्य कि देवशयनी एकादशी से देवोत्थान एकादशी तक यह मूर्ति डूबी रहे इसके लिए शिल्पकार ने यहाँ रहकर अध्ययन किया होगा। इन मूर्तियों के मुकुट दक्षिण भारतीय शैली के हैं। इस मूर्ति में देव विष्णु शेषनाग पर सोये हुए हैं। देवी लक्ष्मी इनके पाँव दबा रही हैं। सामने जय-विजय खड़े हैं और देव की नाभि से निकले कमल पर देव प्रथम ब्रह्मा आसीन हैं। प्रस्तुत फोटो 1 माह पहले ली गई है जब सरोवर का पानी सूख गया था।

देवशयनी एकादशी को आरंभ हुए चातुर्मास की समाप्ति

इस बार देवशयनी एकादशी विगत 12 जुलाई को थी। इसे हरिशयनी एकादशी और ‘पद्मनाभा’ या पद्मा एकादशी भी कहते हैं। मान्यता के अनुसार इसी रात्रि से भगवान विष्णु का शयन काल आरंभ हो जाता है जिसे चातुर्मास या चौमासा का प्रारंभ भी कहते है। कहते हैं कि इन 4 महीनों में यज्ञोपवीत संस्कार, विवाह, दीक्षाग्रहण, यज्ञ, गृहप्रवेश, गोदान, प्रतिष्ठा एवं जितने भी शुभ कर्म है, वे सभी त्याज्य होते हैं।

हरिशयन का तात्पर्य

हरिशयन का तात्पर्य इन चार माह में बादल और वर्षा के कारण सूर्य-चन्द्रमा का तेज क्षीण हो जाना उनके शयन का ही द्योतक होता है। इस समय में पित्त स्वरूप अग्नि की गति शांत हो जाने के कारण शरीरगत शक्ति क्षीण या सो जाती है। आधुनिक युग में वैज्ञानिकों ने भी खोजा है कि कि चातुर्मास्य में (मुख्यतः वर्षा ऋतु में) विविध प्रकार के कीटाणु अर्थात सूक्ष्म रोग जंतु उत्पन्न हो जाते हैं। जल की बहुलता और सूर्य-तेज का भूमि पर अति अल्प प्राप्त होना ही इनका कारण है।

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