विंध्य पर्वत श्रृंखला पर विराजती हैं माता विंध्यवासिनी अर्थात कज्जला देवी

विन्ध्याचल उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले का एक धार्मिक दृष्टिकोण से प्रसिद्ध शहर है। यहां मां विन्ध्यवासिनी देवी का मंदिर है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, मां विन्ध्यवासिनी ने महिषासुर का वध करने के लिए अवतार लिया था। जैसा कि नाम से ही प्रतीत होता है देवी विन्ध्यवासिनी उत्तर प्रदेश के इस मिर्जापुर जिले के विन्ध्याचल स्थान की संरक्षक मानी जाती है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार वे देवी दुर्गा की अवतार हैं। उनके आसन को हिन्दु भक्तों के द्वारा सबसे पवित्र शक्तिपीठ माना जाता है। यह नगर गंगा के किनारे स्थित है। भारतीय मानक समय की रेखा विन्ध्याचल के रेलवे स्टेशन से होकर जाती है। विन्ध्यवासिनी देवी को स्थानीय लोगों द्वारा लोकप्रिय रुप से कज्जला देवी के नाम से भी जाना जाता है और उन्हें प्रेम और करूणा का प्रतीक माना जाता है।

विन्ध्याचल देवी मन्दिर एक विशाल संरचना है जो विन्ध्याचल शहर के व्यस्त बाजार के बीचोंबीच स्थित है। इस तीर्थस्थल में देवी की प्रतिमा एक शेर पर स्थित है। मन्दिर परिसर में कई शिवलिंगों के अलावा धामध्वजा देवी, बारह भुजा देवी और महाकाली के भी मन्दिर स्थित हैं। एक छत्र जिसे सप्तशती मण्डप भी कहते हैं उस पर देवी दुर्गा की प्रार्थना वाली पवित्र पुस्तक दुर्गा सप्तशती के श्लोक लिखे हैं। अप्रैल या चैत्र और आश्विन या अक्टूबर के महीनों में पड़ने वाले नवरात्रों में इस मन्दिर में श्रद्धालु बड़ी भारी संख्या में आते हैं। ‘विंध्य’ शब्द की व्युतपत्ति ‘विध’ धातु से कही जाती है। भूमि को बेधकर यह पर्वतमाला भारत के मध्य में स्थित है। यही मूल कल्पना इस नाम में निहित जान पड़ती है। विंध्य की गणना सप्तकुल पर्वतों में है। विंध्य का नाम पूर्व वैदिक साहित्य में नहीं है।

पौराणिक उल्लेख:

वाल्मीकि रामायण, किष्किंधा काण्ड में विंध्य का उल्लेख ‘संपाति’ नामक गिद्धराज ने इस प्रकार किया है :

अस्य विंधस्य शिखरे पतितोस्मि पुरानदय सूर्यतापपरीतांगो निदग्ध: सूर्यरश्मिभि:, ततस्तु सागराशैलान्नदी: सर्वा: सरांसि च।
वनानि च प्रदेशांश्च निरीक्ष्य मतिरागता ह्रष्टपक्षिगणाकीर्ण: कंदरादरकूटवान् दक्षिणस्योद्धेस्तीरे विंध्योयमिति निश्चित:।।

महाभारत, भीष्मपर्व में विंध्य को कुलपर्वतों की श्रेणी में परिगणित किया गया है। ‘श्रीमद्भागवत’ में भी विंध्य का नामोल्लेख है:

वारिधारो विंध्या: शुक्तिमानृक्षगिरि पारियात्रो द्रोणश्चित्रकूटो गोवर्धनो रैवतक:

कालीदास ने कुश की राजधानी कुशावती को विंध्य के दक्षिण में बताया है। कुशावती को छोड़कर अयोध्या वापस आते समय कुश ने विंध्य को पार किया था :

व्यलंड्घद्विन्ध्यमुपायनानि पश्यन्मुलिन्दैरुपपादितानि

विष्णुपुराण में नर्मदा और सुरसा आदि नदियों को विंध्य पर्वत से उद्भुत बताया गया है:

नर्मदा सुरसाद्याश्च नद्यो विंध्याद्विनिर्गता:

पुराणों के प्रसिद्ध अध्येता पार्जिटर के अनुसार मार्कण्डेय पुराण में जिन नदियों और पर्वतों के नाम हैं, उनके परीक्षण से सूचित होता है कि प्राचीन काल में विंध्य, वर्तमान विंध्याचल के पूर्वी भाग का ही नाम था, जिसका विस्तार नर्मदा के उत्तर की ओर बोपाल से लेकर दक्षिण बिहार तक था। इसके पश्चिमी भाग और अरावली की पहाड़ियों का संयुक्त नाम पारिपात्र था। पौराणिक कथाओं से सूचित होता है कि विंध्याचल को पार करके अगस्त्य ऋषि सर्वप्रथम दक्षिण दिशा गए थे और वहां जाकर उन्होंने आर्य संस्कृति का प्रचार किया था।

भौगोलिक स्थिति:

विन्ध्याचल पर्वतश्रृंखला भारत के पश्चिम-मध्य में स्थित प्राचीन गोलाकार पर्वतों की श्रृंखला है, जो भारत उपखंड को उत्तरी भारत व दक्षिणी भारत में बांटती है। विंध्याचल पर्वत या विंध्यन पर्वतश्रेणी पहाड़ियों की टूटी-फूटी श्रृंखला है, जो भारत की मध्यवर्ती उच्च भूमि का दक्षिणी कगार बनाती है। पश्चिम में गुजरात से लगभग 1,086 किमी. तक विस्तृत यह श्रेणी मध्य प्रदेश को पार कर वाराणसी की गंगा नदी घाटी से मिलती है। विंध्याचल पर्वत मालवा पठार का दक्षिणी छोर बनाते हैं और इसके बाद दो शाखाओं में बंट जाते हैं – कैमूर श्रेणी, जो सोन नदी के उत्तर से पश्चिमी बिहार राज्य तक फैली है तथा दक्षिणी शाखा, जो सोन और नर्मदा नदी के ऊपरी क्षेत्र के बीच मैकल श्रेणी (या अमरकंटक पठार) में सतपुड़ा पर्वतश्रेणी से मिलती है। मालवा पठार के दक्षिण से आरम्भ होकर यह श्रेणी पूर्व की ओर मध्य प्रदेश तक विस्तृत है। यह भारत को दक्षिण भारत से अलग करती है। 450 मीटर से 1100 मीटर ऊंचाई पर विंध्य श्रेणी से गंगा-यमुना प्रणाली की मुख्य दक्षिणी सहायक नदियां निकलती हैं, जिनमें चंबल, बेतवा, केन और टोन्स शामिल हैं। अपनी समतलीय बलुआ पत्थर संरचना के कारण ये पर्वत समतल शिखर युक्त और पठार जैसे लगते हैं। दूसरी शताब्दी में यूनानी भूगोलवेत्ता टॉल्मी ने इस श्रेणी को उत्तरी और प्राय:द्वीप भारत के बीच सीमा माना था। इसके अधिकांश पर्वत चूना-पत्थर से निर्मित हैं। इन श्रेणियों में बहुमूल्य हीरे युक्त एक भ्रंशीय पर्वत भी है।

त्रिकोण परिक्रमा : कालीखोह व अष्टभुजा देवी मंदिर

त्रिकोण परिक्रमा:

माँ विन्ध्यवासिनी के अतिरिक्त यहां दो अन्य कालीखोह व अष्टभुजा देवियों के मंदिर हैं। भौगोलिक दृष्टि से यह तीनों मंदिर आपस में एक त्रिकोण बनाती हैं। इस प्रकार श्रद्धालु इन तीनों मंदिरों का दर्शन करते हुए त्रिकोण परिक्रमा पूर्ण करते हैं।

कालीखोह मंदिर:

विन्ध्य पहाड़ियों की चोटी पर विन्ध्याचल देवी मन्दिर से दो किलोमीटर की दूरी पर एक गुफा में स्थित कालीकोह मन्दिर उत्तर भारत का एक महत्वपूर्ण पर्यटन एवं तीर्थस्थल है। यह प्राचीन मंदिर देवी काली को समर्पित है जिनकी मूर्ति इसमें स्थापित है। घने जंगलों की शांत धाराओं के बीच स्थित होने के कारण यह अपने आप में अनोखा है। चमत्कारिक पहाड़ियों की पृष्ठभूमि की अनोखी स्थिति के कारण यह वर्ष भर भारी संख्या में भक्तों को आकर्षित करता है। यह मन्दिर कई तान्त्रिकों का घर है जो भक्तों की मनोकामनाओं की पूर्ति तथा रोगमुक्ति के लिए विभिन्न प्रकार के अनुष्ठान करवाते हैं। अष्टभुजा और विंध्यवासिनी को समर्पित दो और तीर्थ मंदिर के निकट स्थित हैं। ये तीनों मंदिर त्रिलोक के रुप में माने जाते हैं और भक्त इसके चारों ओर पैदल चलने को धार्मिक रुप से महत्वपूर्ण मानते हैं। इस पवित्र कार्य को त्रिलोक परिक्रमा कहा जाता है।

अष्टभुजा देवी:

जैसा कि नाम से ही प्रतीत होता है अष्टभुजा मंदिर देवी अष्टभुजा को समर्पित है जो कि भगवान कृष्ण को पालने वाली माता यशोदा की पुत्री थीं। लोककथाओं के अनुसार वे मथुरा के राक्षस राजा कंस के क्रूर हाथों से चमत्कारिक रुप से छूटकर विंध्याचल की पहाड़ियों पर आकर बसीं। यह जादुई मंदिर विंध्याचल पहाड़ी के उपर स्थित है। अष्टभुजा मंदिर को भी इसी क्रम में बनाया गया था। यह विंध्यवासिनी देवी को समर्पित मंदिर से तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। मंदिर चमत्कारिक पहाड़ियों की पृष्ठभूमि में स्थित है और अपने शांत और सुंदर दृश्यों के कारण भक्तों के साथ-साथ पर्यटकों के बीच भी लोकप्रिय है। प्राचीन काल में यह राजाओं का पसंदीदा स्थान था जो शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने और अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए तांत्रिकों की मदद से गुप्त पुजाओं, यज्ञों और अनुष्ठानों के लिए यहां आते थे।

रामेश्वर महादेव & माँ विंध्यवासिनी : मिर्जापुर

रामेश्वर मंदिर:

रामेश्वर महादेव मंदिर विंध्याचल में विंध्यवासिनी देवी मंदिर से एक किमी तथा मीरजापुर से आठ किमी की दूरी पर राम गया घाट पर स्थित है। मंदिर का नाम उस पू्जा या श्राद्ध के नाम से प्राप्त होता है जिसे भगवान राम ने भगवान शिव के सम्मान में अपने पूर्वजों को प्रसन्न करने के लिए की थी। माना जाता है कि ऐसा भगवान राम ने अपने गुरू वशिष्ठ मुनि के कहने पर किया था। उन्होंने उनकी याद में शिवलिंग की भी स्थापना की थी। यह मंदिर विंध्यवासिनी देवी और अष्टभुजा देवियों को समर्पित मंदिरों के बीच स्थित है। ये तीनों मंदिर महात्रिकोण – महान त्रिकोण की रचना करते हैं। भक्त इन तीनों मंदिरों के चारों ओर परिक्रमा करने को शुभ मानते हैं और इसे त्रिलोक परिक्रमा का नाम देते हैं। लोककथा के अनुसार भगवान राम अपने पूर्वजों के लिए पूजा या श्राद्ध करने के बाद देवी विंध्यवासिनी के मंदिर में प्रार्थना करने के लिए गए थे। भगवान राम के उदाहरण के अनुरुप उनके भाई लक्ष्मण ने भी लक्ष्मणेश्वर महादेव मन्दिर की स्थापना की थी जो निकट ही स्थित है।

सीताकुंड :

विंध्याचल में विंध्य कुण्ड और मणिपर्वत के निकट छोटी सी पहाड़ी पर सीताकुण्ड भी स्थित है। इसकी उत्पत्ति रामायण काल की है जब राम, सीता और लक्ष्मण लंका से अपनी विजय के बाद लौट रहे थे तब माता सीता को प्यास लगी किन्तु आसपास कोई पानी का स्त्रोत नहीं था। तब लक्ष्मण जी ने धरती में एक तीर मारा और उसी स्थान से पानी की एक धारा फूट पड़ी। सीता कुंड एक सदाबहार स्त्रोत है। सीता का नाम जुड़ा होने के कारण यह स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ साथ पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है। मनमोहक पहाड़ियों की पृष्ठभूमि में स्थित कुण्ड को भक्तों द्वारा पवित्र माना जाता है जो यहां से पवित्र जल लेने के लिए आते हैं। सोते तक पहुंचने के लिए 48 खड़ी सीढ़ियों के द्वारा जाना पड़ता है। पास ही की पहाड़ी पर हनुमान, राम-जानकी और दुर्गा देवी को समर्पित तीन अन्य मंदिर हैं। चौरासी परिक्रमा, श्रावण और रामनवमी पर्वों पर भक्त भारी संख्या में इन मंदिरों में आते हैं।

(गंगा महासभा की मासिक पत्रिका ‘भागीरथी के स्वर’ से साभार)

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