आएगा तो मोदी ही !

विनोद मिश्र की कलम से

‘आयेगा तो मोदी ही’ , इस आत्मविश्वास के पीछे वज़ह क्या है ? रसिक लाल का गला भर आता है जब वह बताता है कि एक झोपड़ी में उसने जीवन गुजार दिया, आज मोदी ने पक्का मकान बनवा दिया है । घर मे शौचालय बना दिया । देबरिया के रामसेवक प्रजापति कहते हैं, ‘कोई जात पात नहीं सिर्फ मोदी । मोदी नहीं तो और कौन’ ? कुछ उत्साही नौजवान कहते हैं, ‘मोदी ने पाकिस्तान को धूल चटा दी । आज कहीं आतंकवाद है ? हर घर मे बिजली पहुंची है, 22 घंटे लाइट होती है । ये इसलिए क्योंकि मोदी है तो मुमकीन है’।

2019 के चुनाव में “मोदी “सबसे प्रभावी नारा बन गए हैं। कई मामले में 2014 से भी ज्यादा । 2014 का चुनाव एन्टी इनकम्बेंसी के खिलाफ एक लहर थी । यह चुनाव प्रो इनकम्बेंसी के समर्थन में आमलोगों के बीच भरोसे और मोदी के खिलाफ प्रचार के बीच लड़ा जा रहा है। ओपोजिशन के पास अर्थमैटिक्स का मजबूत हथियार है जबकि भाजपा के पास सिर्फ मोदी केमिस्ट्री और विकास का मॉडल । रौशन कुमार कहते हैं “यह चुनाव जात समीकरण पर लड़ा जाने वाला आखिरी चुनाव होगा । इस बार कोई जाति समीकरण काम नहीं कर रहा है और विपक्ष के पास मुद्दे नहीं है सिर्फ मोदी विरोध है। गरीबी की बात करने वाले नेता जानते हैं क्या है गरीबी ? मोदी ने इसे जिया है , वह गरीबों का दर्द समझता है। यानी जिस नैरेटिव से मोदी को परास्त करने की योजना थी उसे अधिकांश मतदाताओं ने लगभग रिजेक्ट कर दिया है।

फाइल : पटना हुंकार रैली 2014

2014 में मोदी लहर के वाबजूद भाजपा को 31 फीसद वोट मिले थे लेकिन उसने 282 सीट जीतकर पुर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। महज 13 राज्यों में गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी का यह करिश्मा चला था और मोदी 30 वर्षों के बाद पूर्ण बहुमत वाली सरकार दिल्ली में बनाने में कामयाब हुए थे । 2019 में मोदी देश के एक मजबूत प्रधानमंत्री के रूप में जनता के सामने हैं और दायरा 13 से बढ़कर 26 राज्यों को पार कर गया है। नफा नुकसान का अंदाज़ा जनता को भी है इसलीए भी लोग कहते हैं “आएगा तो मोदी ही “।

2014 के जीत हार का अंतर देखें तो अधिकांश सीटों पर बीजेपी ने 2 लाख से ज्यादा मतों से जीत दर्ज की थी। आज अलग अलग राज्यों में लड़ रही अलग अलग पार्टियां क्या मोदी के खिलाफ लहर पैदा कर इस अंतर को भर पाएगी ? जबकि इस बार हर कैंडीडेट के साथ मोदी वैल्यू एडिशन है जो उसे दूसरे कैंडिडेट के मुकाबले अपेक्षाकृत मजबूत बनाता है।

फाइल : प्रधानमंत्री की केरल यात्रा

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए अपील बढ़ा है लेकिन लोगों का उनके प्रति विश्वास उतना मजबूत नहीं हो पाया है। कांग्रेस अगर यू पी और बिहार में अपनी स्थिति मजबूत नहीं कर पाई तो यह पार्टी के प्रति भरोसे को डीगाता है। प्रियंका गांधी का सक्रिय राजनीति में आना एक मत्वपूर्ण फैसला था लेकिन पूर्वांचल की इंचार्ज प्रियंका जिन्हें 40 सीट की जिम्मेदारी थी पूर्वांचल से ही गायब रहीं और कांग्रेस के प्रचार में दिल्ली से केरल तक पहुंच गई। यू पी और बिहार में गठबंधन के साथ कांग्रेस का मिकी माउस का गेम भी लोगों को रास नहीं आया ।

मोदी अबतक देश मे 200 से ज्यादा रैली कर चुके हैं । रैली और रोड शो करने में कांग्रेस भी भी पीछे नहीं है लेकिन कांग्रेस संभवतः लोगों से संवाद बनाने में असरदार साबित नहीं हुई है । हालांकि कई जगहों पर भाजपा अति उत्साह में है , ज़मीनी कार्यकताओं को शायद यह एहसास है कि बगैर कुछ किये भी लोग वोट देने आएंगे और मोदी को जिताएंगे । यह अति आत्मविश्वास चुनाव में कई जगहों पर धोखे का सबब भी बन सकता है ।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, फिलहाल डीडी न्यूज़ से संबंद्ध हैं)

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