‘एनडीए की प्रचंड जीत, चमकी बुखार और मुश्किल में फंसे नीतीश की रहस्यमयी चुप्पी’ – मनोज मुकुल

लोकसभा चुनाव में बिहार में एनडीए को प्रचंड जीत मिली। भाजपा को भी उम्मीद नहीं थी कि जीत में जद यू की भी इतनी बड़ी हिस्सेदारी होगी। तभी से जदयू और भाजपा के बीच कुछ ठीक नहीं है। इसका प्रदर्शन पहले शपथ ग्रहण के दिन हुआ जब नीतीश के नेतृत्व वाली जद यू केंद्र की मोदी सरकार का हिस्सा नहीं बनीं और अगले ही पल बिहार में मंत्रिमंडल विस्तार से भाजपा को दूर रखा। इस बीच मुजफ्फरपुर में चमकी का कहर और जद यू भाजपा के बीच रहस्यमयी चुप्पी। इस चुप्पी के क्या मायने हैं बता रहे हैं मनोज मुकुल।

नीतीश कुमार के लिए सबसे मुश्किल वक़्त चल रहा है। मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार से मौत कई सालों से हो रही है। लेकिन इस साल मौत ज्यादा हुई और उसे मीडिया में ज्यादा जगह भी मिली। ये महज संयोग नहीं है कि ये सब उस समय हुआ जब मोदी मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलने की वजह से नीतीश नाराज थे।

जरा घटनाओं को सिलसिलेवार तरीके से समझ लीजिए।

30 मई को सरकार में जगह नहीं बना पाने के बाद नीतीश की नाराजगी की खबर सार्वजनिक हुई। नीतीश कहते रहे कि सिम्बोलिक प्रतिनिधित्व नहीं चाहिए। उन्होंने अपनी नाराजगी मीडिया के जरिए सार्वजनिक की। नाराजगी में ही बिहार मंत्रिमंडल का विस्तार किया। बीजेपी के किसी प्रतिनिधि को जगह नहीं देकर विवाद को गर्म रखा।

फिर इसके बाद गिरिराज सिंह जब पटना पहुंचे तो उनके सामने ‘बिहार का सीएम कैसा हो’ जैसे नारे लगे। इस तरह के नारे बिहार में जब से बीजेपी का जदयू से गठबंधन है तब से नहीं लगा था। ये पहला मौका था जब गिरिराज के लिए नारे लगे जिन्हें नीतीश पसंद नहीं करते।

इसी राजनीति के बीच ममता बनर्जी ने प्रशांत किशोर को चुनावी रणनीतिकार बना लिया। जदयू के प्रवक्ता अजय आलोक ने इसपर आपत्ति जताई तो जदयू की मीटिंग में नीतीश ने साफ कर दिया कि प्रशांत किशोर की कंपनी के काम से जदयू का कोई लेना नहीं है। ये कहते वक़्त नीतीश ने बगल में प्रशांत किशोर को बिठा रखा था। संदेश साफ गया कि ममता के लिए प्रशांत ने जो ठेका लिया है उसमें नीतीश की सहमति है।

नीतीश और ममता की नजदीकियों की तस्दीक उस वक़्त और मजबूत हो गई जब नीतीश ने अपने प्रवक्ता आलोक का इस्तीफा ले लिया। आलोक ने ममता के राज को मिनी पाकिस्तान कहा था। ममता ने इस दौरान एक फरमान जारी किया की बंगाल में वही रहेगा जो बंगला बोलेगा। ये सीधा अटैक हिंदी बोलने वालों पर था। लेकिन नीतीश ने ममता के इस तालिबानी अंदाज पर मुंह नहीं खोला। कारण समझिए। बंगाल में ममता की दुश्मन नंबर वन बीजेपी है । और इस वक़्त बीजेपी के साथ नीतीश हैं भी लेकिन भारी मन से। नीतीश ममता के साथ जाकर बीजेपी को एक तरीके से आंख दिखा रहे हैं।

इन सब के बीच आ गया चमकी बुखार। जैसा कि नीतीश हर चीज को हल्के में लेने के माहिर हैं उन्होंने इसे भी हल्के में लिया। नीतीश के मुजफ्फरपुर पहुंचने से पहले दिल्ली से स्वास्थ्य मंत्री हर्ष वर्धन पहुंच गए।

ऐसा नहीं है कि नीतीश को ये मालूम नहीं रहा होगा। लेकिन बीजेपी ने नीतीश को यहां एक तरीके से एक्सपोज करने की कोशिश की थी। कोशिश फ्लॉप हो गई अश्विनी चौबे की नींद और मंगल पाण्डेय के स्कोर कांड की वजह से। इन दोनों घटनाओं की वजह से मीडिया का ध्यान नीतीश कि तरफ नहीं पहुंच पाया। और जब पहुंचा तब नीतीश मुजफ्फरपुर पहुंच गए।

नीतीश के खिलाफ अस्पताल के बाहर नारे लगे। नीतीश ने किसी से बात नहीं की। नीतीश की रहस्यमई चुप्पी ने कई सवाल खड़े किए। लेकिन नीतीश ने मुंह नहीं खोला। दिल्ली से लेकर पटना तक नीतीश से कैमरे का सामना तीन चार बार हुआ लेकिन वो चुप रहें।

सवाल इस चुप्पी पर है। नीतीश चुप रहकर किसको बचा रहे हैं या बदनाम करवा रहे हैं। जरा नीतीश मंत्रिमंडल का हिसाब समझिए। नीतीश की जब 2005 में सरकार बनी तब से स्वास्थ्य विभाग बीजेपी के पास रहा। 2005 से 2013 तक चंद्र मोहन राय, नंद किशोर यादव और अश्विनी चौबे मंत्री रहे । 2015 में लालू के बेटे तेज प्रताप को ये विभाग मिला। जब बीजेपी के साथ पलटी वाली सरकार बनी तब से मंगल पांडेय मंत्री हैं। मंगल पांडे मंत्रालय के लिए कम बीजेपी के संगठन के लिए ज्यादा चर्चा में रहते हैं।

कायदे से देखें तो मंगल पांडेय से लेकर बीजेपी के पुराने लोग यानी बीजेपी बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था को बर्बाद करने के लिए जिम्मेदार हैं।

मंगल पाण्डेय बिहार में सुशील मोदी के खास हैं। और सुशील मोदी नीतीश कुमार के खास। नीतीश और सुशील मोदी दोनों अगर इस पर बोलते हैं तो फिर हिसाब मंत्री और पंद्रह साल के विभाग का भी पूछा जाएगा। और ऐसा हुआ तो जवाबदेही किसकी बनेगी आप समझ लीजिए।

नीतीश की चुप्पी का मतलब या तो वो मंगल पांडेय को हटाना चाहते हैं और उन पर नहीं हटाने का दवाब है। या फिर वो चुप रहकर बीजेपी को फैसला लेने को मजबूर करना चाहते हैं। अनुमान लगाने को कुछ भी लगाया जा सकता है।

इन सबमें जो बात शीशे की तरह साफ है वो ये कि पंद्रह साल के राज में नीतीश स्वास्थ्य सेवा को इस तरह का नहीं बना पाए कि उन्हें इस क्षेत्र में सुशासन बाबू कहा जाय। नीतीश जी जिम्मेदारी तो बनती है। चाहे आप लीजिए या मंगल पाण्डेय को दीजिए। नहीं लेंगे देंगे तो चुनाव सामने है। पुराने नेता किसी काम के नहीं रह गए तो जनता को किसी को भी नेता बनाने में ज्यादा समय लगता नहीं है।

(एबीपी न्यूज से संबंद्ध मनोज मुकुल वरिष्ठ टीवी पत्रकार हैं और बिहार से जुड़ी राजनीतिक घटनाओं पर अपने खास दिलचस्पी के लिए जाने जाते हैं।)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *