अब रेमन मैगसेसे अवार्ड गर्व की बात है या फिर शर्म की… ये फैसला आप खुद करें

समरेंद्र सिंह

फोर्ड फाउंडेशन और रॉकफेलर फाउंडेशन के भारत समेत दुनिया के तमाम देशों में अमेरिका की जड़ें मजबूत करने का काम करते हैं। ये बुद्धिजीवियों, अफसरों और नेताओं को खरीद कर, उन्हें प्रभावित करके ऐसी नीतियां बनवाने का काम करते हैं जिनसे अमेरिका और विकसित देशों के हित सधते हों। इन संस्थाओं से लाभ उठाने वालों में हर विचारधारा के लोग शामिल हैं। यह सबकुछ मानवता और मानव अधिकारों के नाम पर किया जाता है। लेकिन इनका मूल मकसद दान आधारित एक भोकुस दलाल किस्म की व्यवस्था बनाना है। ऐसी व्यवस्था जहां सबकुछ नियंत्रित हो।

समरेंद्र सिंह

पिछली पोस्ट में मैंने आपको बताया था कि रेमन मैगसेसे अवार्ड किस कदर खून में सना हुआ है। उसकी बुनियाद में फिलीपींस के लाखों बेगुनाहों का लहू है और भारत जैसे तीसरी दुनिया के देश में बहुतेरे बुद्धिजीवी बेगुनाहों के लहू में सने उस अवार्ड को अपने मस्तक पर लगा कर बड़े गर्व से घूमते हैं। हमारे देश में ऐसा शुरू से रहा है। विदेशी सर्टिफिकेट मिलने के बाद लोगों की वैल्यू बढ़ती है। इसलिए हमारे यहां के बुद्धिजीवी विदेशी सर्टिफिकेट और तमगों के लिए शुरु से लालायित रहे हैं। उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता कि अवार्ड देने वाली संस्थाओं का चरित्र कैसा है? उन्हें बस अवार्ड से मतलब होता है, जिसे वो अपने माथे पर उठा कर घूम सकें। घर में सजा सकें। प्रोफाइल में जोड़ सकें। इस लिहाज से रवीश कुमार को मैगसेसे अवार्ड मिला तो उन्हें, उनके समर्थकों को और उनके संस्थान एनडीटीवी को पूरा हक हासिल है कि वो सभी इसका जश्न मनाएं।

लेकिन मसला सिर्फ यहीं तक सीमित होता तो कोई बात नहीं थी। इसे भारत जैसे गरीब मुल्क के कुछ लोगों की महत्वाकांक्षा समझ कर उन्हें माफ किया जा सकता था। इसे लंबे समय तक गुलाम रहे मुल्क के कुछ लोभी लोगों का स्वभाव समझ कर नजरअंदाज किया जा सकता था। लेकिन बात इससे आगे की है। बात उस राजनीति की है जो इन अवार्डों के जरिए होती है। बात उस क्रूर साजिश की है जिसमें विकसित मुल्क प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर अपनी पूंजी के जरिए विकासशील देशों की सियासत को नियंत्रित और संचालित करते हैं।

आगे बढ़ने से पहले मैं आपसे कुछ सवाल करता हूं…

  1. इंडिया इंटरनेशनल सेंटर भारत में लॉबिंग का सबसे बड़ा गढ़ है। यहां देश के प्रतिष्ठित प्रशासनिक अधिकारी और बुद्धिजीवी बैठ कर बौद्धिक विलास करते हैं। ये वही जगह है जहां बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को सदस्यता नहीं मिली थी। वो भी उस समय जब वो केंद्र में कैबिनेट मंत्री थे। क्योंकि यहां का सवर्ण बुद्धिजीवी पिछड़े और भदेस लालू यादव को अपने बीच पाकर शर्मिंदगी महसूस करता था। क्या आप जानते हैं कि दिल्ली के इस मशहूर इंडिया इंटरनेशनल सेंटर को किसने और क्यों बनवाया था?
  2. क्या आप जानते हैं कि लंबे समय तक इंडिया इंटरनेशनल सेंटर किसके फंड से संचालित होता रहा? विकिपीडिया के मुताबिक इंडिया इंटरनेशनल सेंटर आज भी उसी के फंड से संचालित होता है।
  3. इस देश में दर्जनों बड़ी शोध और बौद्धिक संस्थाओं को किसके फंड से बनाया और संचालित किया गया? सीएसडीएस समेत कई संस्थानों में काम करने वालों को तनख्वाह किनके फंड से मिलती है?
  4. क्या आप यह भी जानते हैं कि अरविंद केजरीवाल की संस्था को कौन फंडिंग करता था? अरविंद केजरीवाल को जो मैगसेसे अवार्ड मिला उससे उस फंडिंग करने वाले का क्या संबंध है?
    और
  5. क्या आपको मालूम है कि विदेशी पूंजी की एक राजनीति भी होती है? दान पर आधारित व्यवस्था बनाने का एक मकसद भी होता है? वह मकसद क्या है? दान देने वालों की राजनीति क्या है? क्या आप इस गणित को अच्छी तरह समझते हैं?

दरअसल, रॉकफेलर फाउंडेशन और फोर्ड फाउंडेशन दोनों को पंडित नेहरू ने भारत आने का न्यौता दिया था। इंडिया इंटरनेशन सेंटर रॉकफेलर फाउंडेशन के पैसे से बनाया गया। रॉकफेलर फाउंडेशन की नेटवर्थ 4.1 बिलियन डॉलर यानी 410 करोड़ डॉलर यानी 28700 करोड़ रुपये है। ये हर साल 1200 करोड़ रुपये का ग्रांट देता है। लंबे समय तक रॉकफेलर फाउंडेशन के पैसे से ही इंडिया इंटरनेशनल सेंटर संचालित होता था।

फोर्ड फाउंडेशन की जड़ें और भी गहरी हैं। सीएसडीएस समेत दर्जनों संस्थाओं को फोर्ड फाउंडेशन से ग्रांट मिलती है। फोर्ड फाउंडेशन के दिल्ली ऑफिस ने 1952 से अब तक कुल 50.2 करोड़ डॉलर यानी 3514 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए हैं। इस रकम से 1200 संस्थाओं और संस्थानों को 3640 ग्रांट दिए गए। बीते हुए समय के हिसाब से इस पैसे का मूल्यांकन कर दिया जाए तो यह रकम बहुत बड़ी है।

फोर्ड फाउंडेशन और रॉकफेलर फाउंडेशन के भारत समेत दुनिया के तमाम देशों में अमेरिका की जड़ें मजबूत करने का काम करते हैं। ये बुद्धिजीवियों, अफसरों और नेताओं को खरीद कर, उन्हें प्रभावित करके ऐसी नीतियां बनवाने का काम करते हैं जिनसे अमेरिका और विकसित देशों के हित सधते हों। इन संस्थाओं से लाभ उठाने वालों में हर विचारधारा के लोग शामिल हैं। यह सबकुछ मानवता और मानव अधिकारों के नाम पर किया जाता है। लेकिन इनका मूल मकसद दान आधारित एक भोकुस दलाल किस्म की व्यवस्था बनाना है। ऐसी व्यवस्था जहां सबकुछ नियंत्रित हो। लोगों का गुस्सा भी नियंत्रित हो। मतलब जरूरत पड़ने पर आंदोलन खड़ा किया जाए मगर वह आंदोलन उतना ही आगे बढ़ना चाहिए जहां से वह व्यवस्था को कोई मूल चुनौती नहीं दे। यथास्थितिवाद को बनाए रखे। ऐसा होने से आक्रोश ठंडा हो जाता है। व्यवस्था में कुछ जरूरी सुधार हो जाते हैं और सबकी दुकानदारी चलती रहती है।

इसी फोर्ड फाउंडेशन ने कुछ समय पहले अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया की संस्था को फंडिंग दी थी। यही नहीं केजरीवाल को जो मैगसेसे अवार्ड मिला, उस मैगसेसे अवार्ड की फंडिंग भी फोर्ड फाउंडेशन ही करता है। मतलब ये अपना एजेंडा चलाने के मामले में क्रूर ही नहीं बल्कि बेशर्म भी हैं। जिसे पैसे देकर खड़ा करते हैं उसे अवार्ड भी दिलवाते हैं। इनके एजेंडे पर काम करने वाले भी इनकी ही तरह बेशर्म हैं। इन्हें सिर्फ पैसे, सम्मान और पॉवर से मतलब है। चाहे वो कैसे भी मिले। कोई भी दे, इन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता।

इन विदेशी फाउंडेशनों की ये दुकानदारी 2014 से पहले ठीक चल रही थी। लेकिन नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद दिक्कत बढ़ने लगी। खासकर तीस्ता सीतलवाड़ की संस्था को फंड देने की वजह से फोर्ड फाउंडेशन के खिलाफ सरकार का रवैया थोड़ा तल्ख था। खबरों के मुताबिक मशहूर वकील इंद्रा जयसिंह की संस्था को भी फोर्ड फाउंडेशन से फंड मिला था। यही वजह है कि सरकार फोर्ड फाउंडेशन को देश से बाहर करने की कोशिश में थी। लेकिन द वायर पर छपी एक खबर के मुताबिक नरेंद्र मोदी की सरकार को मैनेज कर लिया गया।

द वायर की इस रिपोर्ट में सारे घटनाक्रम का सिलसिलेवार ब्यौरा दिया गया है। फोर्ड फाउंडेशन में इंफोसिस वाले नारायण मूर्ति भी एक ट्रस्टी हैं। खबरों पर यकीन करें तो फोर्ट फाउंडेशन के प्रेसिडेंट डैरेन वॉकर, इंफोसिस के नारायण मूर्ति और फोर्ड फाउंडेशन की भारत प्रमुख कविता रामदास (इनके पिता एडमिरल लक्ष्मीनारायण रामदास को भी मैगसेसे अवार्ड मिल चुका है) ने प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव नृपेंद्र मिश्रा और तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली से मुलाकात की। फिर बाद में उस समय के विदेश सचिव और मौजूदा विदेश मंत्री एस जयशंकर को भी लूप में लिया गया। कई स्तर पर मनाने-समझाने की कोशिश के जरिए फोर्ड फाउंडेशन को इतनी कामयाबी मिल गई कि उसका नाम गृह मंत्रालय की निगरानी वाली सूची में नहीं डाला गया। फिर भी कुछ फांस रह गई थी। नकेल कस दी गई थी। इसकी वजह से इन विदेशी फंडिंग एजेंसियों की गतिविधियां सीमित हो गईं। ऐसे में रवीश कुमार को रेमन मैगसेसे अवार्ड क्यों दिया गया है इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

अब कंपनियों की तरफ से एक खास “मंशा” के तहत दिए जाने वाले इस सम्मान पर इतराया जाए या शर्म महसूस की जाए … यह फैसला मैं आप पर छोड़ता हूं।

कुल मिलाकर, फोर्ड फाउंडेशन और रॉकफेलर फाउंडेशन की ताकत बहुत ज्यादा है। इन्हें अमेरिकी सरकार का वरदहस्त हासिल है। ये अमेरिकी हितों के लिए काम करते हैं। इन्हीं हितों को संरक्षित करने के लिए ये तमाम तरह के प्रोजेक्ट के जरिए बुद्धिजीवियों और सरकारी अफसरों को सम्मानित और लाभान्वित करते हैं। अपनी जरूरत के हिसाब से सरकार पर दबाव बनाने के लिए या फिर सरकार को खुश करने के लिए ग्रांट और अवार्ड देते हैं। अपना एजेंडा चलाने के लिए व्यक्तियों, संस्थाओं और संस्थानों को ग्रांट और अवार्ड देते हैं। रेमन मैगसेसे अवार्ड भी रॉकफेलर फाउंडेशन और फोर्ड फाउंडेशन का साझा खेल है। इस खेल को शुरू तो रॉकफेलर फाउंडेशन ने किया था लेकिन बाद में फोर्ड फाउंडेशन भी इसमें शामिल हो गया। दोनों मिल कर अमेरिकी हितों को पोषित करते हैं। अब कंपनियों की तरफ से एक खास “मंशा” के तहत दिए जाने वाले इस सम्मान पर इतराया जाए या शर्म महसूस की जाए … यह फैसला मैं आप पर छोड़ता हूं।

यह भी पढ़ें : तो क्या ‘बेगुनाहों के लहू में सने अवार्ड’ से ‘बेजुबानों की जुबान’ बनेंगे रवीश कुमार?

(नोट – रवीश कुमार का कहना है कि ज्ञान ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचना चाहिए। रेमन मैगसेसे अवार्ड, रॉकफेलर ब्रदर्स, रॉकफेलर फाउंडेशन और फोर्ड फाउंडेशन के बारे में ये जानकारी रवीश कुमार आपको कभी नहीं देंगे। ना ही उनका चैनल एनडीटीवी आपको यह जानकारी देगा। लेकिन हम और आप ज्ञान को फैलाने के संदर्भ में सदी के इस महान पत्रकार की इच्छा पूरी कर सकते हैं। इसके लिए आपको एक छोटी सी कोशिश करनी है। अगर ठीक लगे तो आप इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक साझा कीजिए। ताकि देश के हर नागरिक को इस खेल/साजिश के बारे में पता चल सके। और लोग रवीश कुमार से गुजारिश करें कि वो लाखों लोगों के लहू में सने पुरस्कार को वापस लौटा दें। अमेरिकी कंपनियों की साजिश को नाकाम कर दें। ऐसा हुआ तो यह मानवता की जीत होगी।)

(वरिष्ठ पत्रकार समरेंद्र सिंह के फेसबुक पोस्ट से साभार)

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