“अपने यहां जनतंत्र एक ऐसा तमाशा है, जिसकी जान मदारी की भाषा है”

विनोद मिश्र

फ़िरोज़ खान का विरोध एक गैर-हिन्दू का ‘धर्म-विज्ञान संकाय’ में नियुक्ति का विरोध है। अगर यह नियुक्ति बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के ही किसी अन्य संकाय में संस्कृत अध्यापक के रूप में होती तो कभी विरोध नहीं होता लेकिन माहौल ऐसा बनाया जा रहा है मानो कुछ अति हिंदूवादियों ने एक मुस्लिम विद्वान का विरोध अपने संकीर्ण सोच को लेकर किया है।

बनारस के सुदामा पांडे धूमिल को शायद यह आभास था कि मजबूत लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ बना मीडिया जब महामना मदन मोहन मालवीय के बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय को बहस में लाएगा तो वो जम्बूरे और मदारी की भाषा में ही समझने और समझाने की कोशिश करेगा। बाबा विश्वनाथ की काशी , बी एच यू और यहाँ का जनजागरण चेतना सदियों से समाज को धर्म, अध्यात्म और मानव मूल्यों के प्रति सचेत करती रही है। बी एच यू में डॉ. फ़िरोज़ खान की नियुक्ति को लेकर छिड़ी बहस के बीच यह याद दिलाना जरुरी है कि कभी बी एच यु में एक नियुक्ति को लेकर बबाल हुआ तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने नव-नियुक्त वाईस चांसलर को बनारस पहुँचने ही नहीं दिया।

बनारस के प्रबुद्ध लोग बताते हैं कि काशी की आवाज तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा जी बहुत गम्भीरता से सुनती थीं। 1973 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में कुलपति के रूप में सुरेंद्र सिंह की नियुक्ति हुई थी, जो हिन्दू नाम धारी ईसाई थे, क्रास पहनते थे। उनकी नियुक्ति की घोषणा मात्र से बनारस में बवाल हो गया। विश्वविद्यालय के छात्र संघ, कर्मचारी संघ, अध्यापक संघ ने विरोध शुरू किया। विश्वविद्यालय बन्द हो गया। तर्क यह था कि मालवीयजी के आदर्शों के अनुसार कोई गैर हिन्दू विश्वविद्यालय का कुलपति नहीं हो सकता। कमला पति त्रिपाठी जी ने कहा था कि हम महामना के आदर्शों की रक्षा करेंगे। उन्होंने इंदिरा गांधी से मिलकर सारी बातें बताई। इंदिरा जी बहुत नाराज़ हुईं। उन्होंने सर्च कमेटी भंग कर दी। साम्प्रदायिकता फैलाने के लिये एफआईआर करवाया। जब पद ग्रहण करने के लिए सुरेन्द्र सिंह दिल्ली से काशी चले। श्रीमती गांधी ने उन्हें रास्ते में फोर्स भेज ट्रेन से उतरवा लिया था । वे कुलपति के रूप में पद भार ग्रहण नहीं कर पाये। यह भी बी एच यू का एक इतिहास है।

आज जब फ़िरोज़ खान की नियुक्ति धर्म विद्या संकाय में होने से छात्रों के आक्रोश पर मीडिया , प्रबुद्धजनो और सियासी लीडरों की प्रतिक्रिया आ रही है वह सिर्फ एक नैरेटिव है तथ्य नहीं है। संस्कृत शिक्षक के रूप में फ़िरोज़ खान की नियुक्ति को लेकर यहाँ किसी का कोई विरोध नहीं है। क्योंकि यह काशी है , यह कबीर की भी उतनी ही काशी है जितनी तुलसी की। उसे अपनी मर्यादा भी पता है और मानव मूल्यों का सम्मान भी। इसलिए जब कोई काशी को धर्म और संप्रदाय का ज्ञान देता है तो उसकी शब्दों में मूर्खता ज्यादा तर्क कम परिलक्षित होती है।

संसाधन-विहीन एक समाज सुधारक , चिंतक मदन मोहन मालवीय ने मुल्क के सबसे बड़े विश्वविद्यालय की नींव रखी। भीख मांगकर 40 हजार लोगों के पढ़ने और रहने की जगह बनाई। महाराज दरभंगा कामेश्वर सिंह को ट्रस्ट का अध्यक्ष बनाकर उन्होंने समाज के उच्च और अंतिम पायदान पर खड़े लोगों का भरोसा जीता। जब भारत में ब्रिटिश शासन अंग्रेजी मूल्यों वाली शिक्षा को मानक शिक्षा के तौर पर स्थापित कर रही थी तब उन्होंने ‘हिन्दू’ मूल्यों के संरक्षण के लिये एक आधुनिक विश्वविद्यालय की परिकल्पना की थी। महात्मा गांधी ने उनके महान कार्य के लिए उन्हें ‘महामना’ कहा यह उनके त्याग और दूर दृष्टि का सम्मान था।

मौजूदा दौर में एक ही विश्वविद्यालय में दो संस्कृत विभाग क्यों बना ? यह समझने की जरुरत न तो मौजूदा वाईस चांसलर को पड़ी न ही सर्च कमिटी ने 32 आरक्षित , अनारक्षित हिन्दू विद्वान उम्मीदवारों की सूचि पर गौर करना मुनासिब समझा। उनके सामने सेक्युलर एक सवाल था और उन्होंने संस्कृत भाषा के विद्वान फ़िरोज़ खान को धर्म संकाय की जिम्मेदारी सौंप दी।

जरा गौर कीजिये इस विभाग का दायित्व क्या है ? बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के धर्म विज्ञान संकाय में हिन्दू धर्म के कर्म काण्ड सिखाये जाते हैं। विश्वविद्यालय सहित विभिन्न मंदिरों की पूजा पद्धति तैयार की जाती है। यही संकाय विश्वनाथ मंदिर का संचालन करता है। यहां पंचांग का निर्माण होता है , जो हिंदूओं के धार्मिक क्रियाकलापों का निश्चय करता है। फिर भी अगर इस बहस को हिन्दू मुस्लिम के चश्मे से कोई देखे तो माना जायेगा कि एक साजिश के तहत महामना की आत्मा और आस्था के साथ खिलबाड़ किया जा रहा है।

फ़िरोज़ खान का विरोध एक गैर-हिन्दू का ‘धर्म-विज्ञान संकाय’ में नियुक्ति का विरोध है। अगर यह नियुक्ति बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के ही किसी अन्य संकाय में संस्कृत अध्यापक के रूप में होती तो कभी विरोध नहीं होता लेकिन माहौल ऐसा बनाया जा रहा है मानो कुछ अति हिंदूवादियों ने एक मुस्लिम विद्वान का विरोध अपने संकीर्ण सोच को लेकर किया है। बी एच यू के मौजूदा वी सी प्रो. भटनागर धर्म शास्त्र के विद्यार्थियों के विरोध को अनर्गल प्रलाप मानते हैं , लोगों का कहना है कि वी सी का तर्क है कि मालवीय जी ने विश्वविद्यालय के लिए क्या नियम बनाये हैं उससे ज्यादा व्यवहारिक प्रशासक अपनी समझ से विश्वविद्यालय का सञ्चालन करता है। उनका तर्क है कि महामना भी साधारण मनुष्य ही थे। मुझे प्रो भटनागर की सोच पर कोई खेद नहीं है क्योंकि वे जे एन यू के जिस वामपंथी कथित उदारवादी परम्परा के बाहक हैं उनके लिए सनातन और हिन्दू परम्परा वैज्ञानिक नहीं है। वामपंथी भटनागर जिस इतिहास को पढ़कर प्रशासक बने है उस इतिहास में मदन मोहन मालवीय की भूमिका नगण्य है।

गोरखपुर के पास चौरी चौरा में 1922 में जब आंदोलनकारियों ने एक पुलिस चौकी जला दी थी। 100 से ज्यादा आंदोलनकरियों की धरपकड़ हुई कइयों को ब्रिटिश सरकार ने फांसी की सजा सुनाई। गांधी जी ने इस काण्ड के विरोध में अपना आंदोलन वापस ले लिया था। कांग्रेस पार्टी ने चौरी चौरा काण्ड के अभियुक्तों के खिलाफ क़ानूनी लड़ाई से पल्ला झाड़ लिया था। लेकिन मालवीय जी सामने आये… उनका मानना था कि इन आंदोलनकारियों का विरोध गलत था लेकिन उनकी निष्ठां उनका ध्येय गलत नहीं था। उन्हें हर हाल में बचाना होगा वे भी स्वतंत्रता सेनानी हैं।

मदन मोहन मालवीय अपने ज़माने के नामी वकील थे और एक भी केस नहीं हारने का उनका रिकॉर्ड था। उन्होंने अभियुक्तों के लिए कोर्ट में जमकर पैरवी की और 20 लोगों को फांसी के फंदे से बचा लिया था। अंग्रेज जज ने उनकी तारीफ़ करते हुए कहा था कि मालवीय जी ने ब्रिटिश न्याय पद्धति को कलंकित होने से बचा लिया है बरना कई निर्दोषों को फांसी हो जाती । प्रो भटनागर शायद वामपंथी इतिहास में इस उद्धरण को नहीं पढ़ा होगा। जालियांबाला बाग काण्ड में पीड़ितों को न्याय दिलाने मालवीय जी ने 4 महीने लगाकर पंजाब के गांव गांव घूमकर जनरल डायर की फौज की गोली से मारे गए लोगों की सूचि बनाकर ब्रिटिश हुकूमत के समक्ष सबूत के तौर पर पेश किया था। यह मालवीय जी ही थे जिन्होंने अपने संकल्प और सहयोग से हरिद्वार को एक प्रमुख तीर्थ स्थान के रूप में दुनिया के सामने लाया। आज सभी समुदाय के हज़ारों लोग इस तीर्थस्थान से रोजी रोटी कमा रहे हैं। यह बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय महामना के उसी संकल्प का प्रतिविम्ब है… एकबार उन्होंने अपने मोक्ष को लेकर कहा था। उन्हें मोक्ष नहीं चाहिए मालवीय की आत्मा हमेशा बी एच यू यानी बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में घूमती नज़र आएगी। एक ऋषि की परम्परा और उनकी आत्मा का सम्मान होना चाहिए।

अंत में एक वाक्य जरुर कहना चाहुंगा कि हे प्रभु, महामना के बी एच यू को बकैती से बचाइए !

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