नदियों की पवित्रता और स्वच्छता से जुड़ी हमारी जीवन दृष्टि

प्रो. रामेश्वर प्रसाद मिश्र ‘पंकज’

किसी समाज की विश्वदृष्टि का एक लक्षण यह है कि वह अपने प्राकृतिक परिवेश को, उसके विभिन्न अवयवों को किस रुप में देखता-समझता है। यदि समाज और संस्कृति का अर्थ बोध और जीवन-व्यवहार है तो मानना होगा कि विश्वदृष्टि के मूलत: बदल जाने का अर्थ है राष्ट्रीय संस्कृति का बदल जाना, उसका रुपांतरण। भारतीय समाज अपनी नदियों को कैसे देखता रहा है और अब कैसे देखता है, इसका स्मरण इसी दृष्टि से सार्थक है।

सबसे पहले स्वयं के बोध की ही बात लें। दुनियां की अलग-अलग संस्कृतियों में बोध का स्त्रोत अलग-अलग माना जाता है। कहीं कोई विशेष देवदूत, पैगंबर, मसीहा, कहीं ऐतिहासिक-शक्तियां, उत्पादन का ढांचा, औद्योगिक विकास की दशा विशेष आदि। प्राचीनकाल में भारतीयों की मान्यता यह थी कि सम्पूर्ण सृष्टि में एक ही अखण्ड सत्ता सर्वत्र है किन्तु प्राणी को अखण्ड बोध का अस्फुट आभास मात्र रहता है क्योंकि सामान्यत: प्राणी अपनी ही लालसाओं-योजनाओं की तात्कालिक पूर्ति में व्यस्त रहते हैं। स्फुट यानी स्पष्ट बोध तो साधना से संभव होता है। यह साधना हर व्यक्ति कर सकता है। इस साधना के संकेत ही दिए जा सकते हैं, वास्तविक बोध तो स्वत: ही पाना होता है। इसी संकेत के संदर्भ में कहा गया है कि बोध की प्राप्ति हमारे पूर्वजों को पर्वतों की घाटियों और नदियों के संगम पर हुई – ‘उपह्नरे गिरीणां संगमे च नदीनाम् । धियो विप्रो अजायत । (ऋग्वेद 8/28)’ इस संकेत में यह निहित है कि जो भी व्यक्ति गिरी-आश्रम में या नदी के संगम के ध्यान, मनन और आवधारण करेगा, उसे बोध की, पवित्र घी (बुद्धि) की प्राप्ति होगी।

भारतीय विश्व-दृष्टि में नदियों के प्रति एक विशेष श्रद्धा-भाव है। वे पवित्र प्रवाह के रुप में देखी जाती रही है। विभिन्न कालखण्डों में इस पवित्र भावदृष्टि की अलग-अलग तरह से अभिव्यक्ति हुई है।

इस तरह भारतीय विश्व-दृष्टि में नदियों के प्रति एक विशेष श्रद्धा-भाव है। वे पवित्र प्रवाह के रुप में देखी जाती रही है। विभिन्न कालखण्डों में इस पवित्र भावदृष्टि की अलग-अलग तरह से अभिव्यक्ति हुई है। वैदिक और प्राग्वैदिक काल में भाषा की मूल दृष्टि ही भिन्न थी। वहां प्रत्येक शब्द, प्रत्येक पद, चेतना के रुप-विशेष के संकेत के लिए प्रयुक्त होता है। इसलिए वैदिक साहित्य में नदियों का वर्णन मुख्यत: आध्यात्मिक निरुपण होता है। वैदिक दृष्टि इस संसार का एक सतत् अभिनव सृजन मानती है। इस निरंतर सृष्टि-प्रक्रिया को ब्रह्म-यज्ञ कहा गया है। एक विराट चेतना-समुद्र है यह सृष्टि। नदियां इस चेतना की ही विविध प्रणालियों जैसी हैं। अत: वे ब्रह्मदेव हैं। गंगा को विशेष महत्व देने के कारण उसे तो बारंबार ब्रह्मदेव कहा ही गया है, अन्य नदियों को भी ब्रह्म देव कहा गया है।

वैदिक साहित्य में सरस्वती का विशेष महत्व है। वहां सरस्वती एक चेतना-सरिता है जो पवित्र करती है, शक्ति देती है, समृद्धि देती है, चेतना को उदिप्त करती है, निरतंर प्रेरणा देती है। वो एक दिव्य केतु (झंडा) है, जो सतत् फहराती है। इस तरह वैदिक साहित्य में नदियां एक विराट चेतन-तत्व के वर्णन-विश्लेषण के माध्यम के रुप में काम आती हैं। वहां नदी की एक माध्यम है, संकेत है ब्रह्म-निरुपण का।

वेदों में सात नदियों का विशेष वर्णन है। ये सात चेतना-प्रवाह-रुप हैं। उन्हें ही ऊषा की गौएं, सूर्य के सात घोड़े तथा सात अग्नि-रुप कहा गया है। इस वर्णन में नदियां वर्ण्य नहीं हैं, पर वे वर्णन का माध्यम तो हैं ही और उस वर्णन में निहित सौंदर्य दृष्टि की पवित्रता नितांत स्पष्ट है। वैदिक साहित्य में सौंदर्य की धारणा ही बौद्धिक और धर्ममय है। इसलिए नदियों का सौंदर्य भी बौद्धिक प्रकाश और धर्मबोध का अंग है। (प्रसंगवश यहां भी स्मरण कर लें कि बौद्धिक से भिन्न किसी आध्यात्मिक तत्व को भारतीय दृष्टि अमान्य करती है) तब भी जिन नदियों का वर्णन है, उनकी सूचना का भी अपना महत्व है।

जिस तरह अलग-अलग संदर्भों में अलग-अलग देव-शक्तियां सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती हैं, उसी तरह अलग-अलग नदी शक्तियां भी। फलत: भिन्न-भिन्न संदर्भों में भिन्न-भिन्न नदियों की महत्ता विवेचित है। यह भी निर्विवाद है कि गंगा को अत्यधिक महिमामयी माना जाता रहा है। स्वयं आदिकवि वाल्मीकि, आद्य शंकराचार्य तथा हजारों भारतीय कवियों ने यह कहकर अपना गंगा प्रेम दिखाया है कि गंगा के तट पर पक्षी, मृग या सांस्कृतिक-राजनैतिक दृष्टि की अभिव्यक्ति है। इसलिए ही इन्हीं महान कवियों ने यमुना, नर्मदा, गोदावरी आदि की गंगा जैसी ही स्तुति की है। ऋृग्वेद, महाभारत के वनपर्व और अनुशासनपर्व, पद्मपुराण, विष्णु, कूर्म, वराह, ब्रह्मानंद, भविष्य, गरुढ़, नारदीय, स्कंदादि पुराणों में गंगा की महिमा का गान है। इसी तरह शतपथ ब्राह्मण, नवपर्व (महाभारत) तथा मत्स्य, कूर्म, पद्म,अग्नि, नारदीय वायु, स्कंध आदि पुराणों में नर्मदा की स्तुति है। मत्स्य और पद्म के अनुसार अमरकंटक से नर्मदा सागर तक 10 करोड़ तीर्थ हैं। अग्निपुराण के अनुसार ये तीर्थ 60 करोड़ हैं। नारदीयपुराय पुराण के अनुसार साढ़े तीन करोड़ हैं, जिनमें 400 मुख्य हैं। मत्स्य और कूर्म पुराण में इसकी लंबाई 100 योजन यानी लगभग 800 मील कही गई है, जो कि लगभग 1300 किलोमीटर होती है और यह बिल्कुल ठीक वर्णन है। स्कंद पुराण में एक पूरा खण्ड ही रेवा खण्ड के नाम से है। गोदावरी का भी वर्णन रामायण, महाभारत एवं पुराणों में वैसे ही आदर के साथ है। ब्रह्मपुराण के अनुसार विंध्य के दक्षिण में जो गंगा है, उसे गोमती यानी गोदावरी कहा जाता है और विंध्य के उत्तर में उसे भागीरथ कहते हैं। अनेक पुराणों में मत्स्य, वायु, मार्कण्डेय, ब्रह्म एवं ब्रह्मांड पुराण में गोदावरी के तटवर्ती प्रदेश को तीनों लोको में सबसे सुंदर कहा गया है। पुराणों के अनुसार गौतम ऋृषि ने भगवान शिव की जटा से गंगा को ब्रह्मगिरी पर उतारा। गणेश जी ने इसमें गौतम की सहायता की। यहीं गंगा गौतमी या गोदावरी के नाम से प्रख्यात है। ब्रह्मपुराण के अनुसार गोदावरी तट पर साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं। जब बृहस्पति सिंहस्थ होता है, उस समय का गोदावरी स्नान महापुण्यकारक है। इस समय का केवल एक बार का गोदावरी-स्नान उतना पुण्यफल देता है जितना कि गंगा जी (भागीरथी) में प्रतिदिन नहाते रहने पर आठ हजार वर्षों में स्नान में पुण्य मिलता है।

नदियां तीर्थ हैं। इनके तट पर विशिष्ट तीर्थ हैं। स्कंदपुराण के काशीखण्ड के अनुसार तीर्थ दो प्रकार के हैं – मानस तीर्थ और भौम तीर्थ। मानस तीर्थ कहते हैं उन तपस्वी, ज्ञानी जनों को, जिनके मन शुद्ध हैं और आचरण ऊंचा है, जो समाज की भलाई के लिए ही काम करते हैं। भौम तीर्थ चार तरह के होते हैं – अर्थ तीर्थ , काम तीर्थ, धर्म तीर्थ और मुक्ति तीर्थ। नदियों के तट और संगम पर बने बड़े-बड़े व्यापारिक केंद्र ‘अर्थ तीर्थ’ कहे जाते हैं। कलाओं, सौंदर्य के साधना केंद्रों को ‘काम तीर्थ’ कहते हैं। जहां विद्या और धर्म के केंद्र हों, वे ‘धर्म तीर्थ’ होते हैं। जहां मुख्यत: पराविद्या एवं साधना के, मोक्ष-साधना के केन्द्र हों, वो मोक्ष तीर्थ होते हैं। जहां चारों का संगम हो वह है महापुरी। भारतीय राजधानी को अर्थ, काम एवं धर्म तीर्थ बनना चाहिए। तभी वह सच्चे अर्थों में भारत राष्ट्र की राजधानी होगी।

सभी नदियों के तट पर अर्थ, काम, धर्म और मोक्ष तीर्थ रहे हैं। हरिद्वार, प्रयाग, बनारस, उज्जैन, नासिक जैसे तीर्थ महापुरियां रहे हैं। इसी तरह समुद्र तटवर्ती जगन्नाथपुर, द्वारिका, रामेश्वरम आदि भी हैं। प्रयाग, काशी और गया को त्रिस्थली कहा गया है। प्रथम दो गंगा तट और अंतिम फल्गु नदी के तट पर है। यदि सिर्फ प्रख्यात धर्मशास्त्रों तक ही दृष्टि रखें तब भी भारत के प्राय: हर क्षेत्र की मुख्य नदियां तीर्थ में हैं। काबुल और कश्मीर की सुवास्तु , गौरी, कुहू, कुभा (काबुल नदी), कमु (कुर्रम), वर्णु नदियां तथा कश्मीर-पंजाब की सिंधु , अस्किनी (चिनाव), परुषणी (रावी), विपासा (व्यास), अश्मन्वती, शताद्रु या शतुद्री (सतलज), दृषद्वती, वितस्ता (झेलम) नदियां तो वैदिक साहित्य में गरिमामंडित हैं ही; बाद में धर्मशास्त्रों में सुपूजित हैं। धर्मशास्त्रों, पुराणों में बाद में चिनाव का चंद्रभागा और रावी को इरावती कहा गया है। इसके साथ ही अचला, देविका, आपगा, कनकवाहिनी, कालोदका, मधुमति, विषोका आदि पवित्र नदियां और अक्षवाल, अच्छोदक, चंद्रपुर, अनंतह्नंद, गोपाद्री, जयवन, जयपुर (अंदरकोट), ज्येष्ठेश्वर, तक्षकनाग, नंदिकुण्ड, नंदिक्षेत्र, नन्दीष, मार्तण्ड, नरसिंहाश्रम, नीलानाग, वितस्तात्र आदि पवित्र जलस्त्रोत और उनसे जुड़े तीर्थ धर्मशास्त्रों में वर्णित हैं। यूं तो सम्पूर्ण कश्मीर ही उमा का देश कहा गया है और स्वर्गिक वितस्ता उनका सीमांत (सिर की मांग) है। प्रसंगवश यह भी स्मरणीय है कि कश्मीर के बारहवी शताब्दी के महान कवि कल्हण ने अपनी कृति राजतरंगिणी की तुलना दक्षिण की पवित्र सरिता गोदावरी की तीव्र धारा से की है।

इन नदियों और स्थलों को स्वच्छ, सुंदर और जीवंत रखने के उनके तटवासी, देशवासी सदा सजग-सक्रिय रहते थे। लेकिन जब स्वयं लोगों का ही जीवन आक्रमणों और पराजयों से जर्जर-विखंडित और करुण हो जाए, तब उनसे नदी की रक्षा की अपेक्षा तो क्रूरता ही होगी। तब भी इस दौर में भी वे जितना करते रहे हैं, वह आश्चर्यप्रद ही है।

ब्रह्मपुत्र, गंगा और यमुना के क्षेत्र की तो बात ही क्या की जाए। यहां की लगभग प्रत्येक छोटी-बड़ी नदी और हजारों पवित्र स्थलों का पुराणों, धर्मशास्त्रों में गौरवगान है। स्पष्ट है कि इन नदियों और स्थलों को स्वच्छ, सुंदर और जीवंत रखने के उनके तटवासी, देशवासी सदा सजग-सक्रिय रहते थे। लेकिन जब स्वयं लोगों का ही जीवन आक्रमणों और पराजयों से जर्जर-विखंडित और करुण हो जाए, तब उनसे नदी की रक्षा की अपेक्षा तो क्रूरता ही होगी। तब भी इस दौर में भी वे जितना करते रहे हैं, वह आश्चर्यप्रद ही है।

गंगा और यमुना तथा लोहित्य (ब्रह्मपुत्र) के प्रति पुराणों एवं महाभारत श्रद्धा-भाव है। महान कवियों ने इनकी महिमा कही है। गंगा-यमुना के संगम वेद-पुराण, ब्रह्माण-ग्रंथ, रामायण, महाभारत और समस्त धर्मशास्त्रों में बखान है। गंगा और यमुना की सभी प्रमुख सहायक, उपसहायक नदियों, सरयू यानी घाघरा, गोमती, सदानीरा, इक्षुमती, कोसी, गंडकी, चर्णवती (चम्बल), कालीसिंधु, महान सोणभद्र, तमसा, वेत्रवती (बेतवा), दशार्णा (बेतवा की सहायक धसान नदी) आदि की पवित्रता का जो गहरा बोध इस क्षेत्र के लोगों में रहा है, वही धर्मशास्त्रों में प्रतिसंवेदित है। असम, उत्तराखंड, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य-प्रदेश, पश्चिम बंगाल का क्षेत्र इस ब्रह्मपुत्र-गंगा-यमुना क्षेत्र में आता है। इसके साथ ही राजस्थान की पर्णासा (बनास), विंध्य क्षेत्र की पार्वती, सुरसा, माही, बिहार की पुनपुन, फल्गु, कनकंदा, उडीसा की सुवर्णरेखा जैसी नदियां भी धर्मशास्त्रों में परम पवित्र कही गई हैं। सरयू नदी का तो इतना महत्व रहा है कि उसके जल को एक विशेष नाम ही दिया गया ‘सारव’ । सरयू तट पर अनेक बौद्ध तीर्थ हैं। गंडकी के उद्गम स्थल शालिग्राम की महत्ता भी सुविदित है। यहां के शालिग्राम पत्थर, विष्णु की मूर्ति कहे गये हैं। मानसरोवर, गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रिकाश्रम, ब्रह्मकपाला, केदारधाम, देवप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग, विष्णुप्रयाग, ऋषिकेष, हरिद्वार, साकेत (अयोध्या), कुरुक्षेत्र, श्रृंगवेरपुर, मथुरा-वृंदावन-राजापुर, सुकरतीर्थ, नैमिष, प्रयाग, काशी आदि धर्मतीर्थ एवं मोक्षतीर्थ तथा देहरादून, प्रागज्योतिषपुर, पानीपत, इंद्रप्रस्थ, आगरा, कानपुर, इलाहाबाद (प्रयाग), पाटलिपुत्र एवं बनारस (काशी), हस्तीनापुर आदि कामतीर्थ एवं अर्थ तीर्थ इन नदियों के तट पर हैं। अर्थ, धर्म, काम एवं मोक्ष की सतत साधना देशवासी इन क्षेत्रों में करते रहे हैं।

जो लोग इस भ्रम में पड़कर दुखी रहते हैं कि किसी पुण्य पर्व में पवित्र स्नान मात्र से कोई परंपरानिष्ट सचमुच मुक्ति का अंतिम आश्वासन मानता है, वे भारतीयता से अपरिचित ऐसे लोग हैं जिन्हें या तो अज्ञानी कहा जा सकता है या फिर फासिस्ट, क्योंकि वे जानबूझकर दूसरों के मत का अर्थक्षय करते हुए उन्हें इसी आड़ में दबाना-अनुशासित करना चाहते हैं, खुद उनसे किसी तरह अनुशासित होने को तैयार नहीं। पवित्रता की कोई ऐसी व्याख्या किसी भी हिन्दू के मन में संभव ही नहीं, जिसमें जीवन के शेष कर्म पवित्रता-अपवित्रता से निरपेक्ष यानी ‘सेकुलर’ हो और कोई एक या कुछेक कर्म ही पवित्र हों।

अत: जो लोग इस भ्रम में पड़कर दुखी रहते हैं कि किसी पुण्य पर्व में पवित्र स्नान मात्र से कोई परंपरानिष्ट सचमुच मुक्ति का अंतिम आश्वासन मानता है, वे भारतीयता से अपरिचित ऐसे लोग हैं जिन्हें या तो अज्ञानी कहा जा सकता है या फिर फासिस्ट, क्योंकि वे जानबूझकर दूसरों के मत का अर्थक्षय करते हुए उन्हें इसी आड़ में दबाना-अनुशासित करना चाहते हैं, खुद उनसे किसी तरह अनुशासित होने को तैयार नहीं। पवित्रता की कोई ऐसी व्याख्या किसी भी हिन्दू के मन में संभव ही नहीं, जिसमें जीवन के शेष कर्म पवित्रता-अपवित्रता से निरपेक्ष यानी ‘सेकुलर’ हो और कोई एक या कुछेक कर्म ही पवित्र हों। इस प्रकार गंगा-गोदावरी की चाहे जितनी महिमा गाई जाए, वह महिमा उस विश्व-दृष्टि का ही सहज अंग है, जिसके अनुसार ईश्वर या परम सत्ता कण-कण में सर्वत्र व्याप्त है। कोई भी परमनिष्ठ हिन्दू, वे साक्षर हो या निरक्षर, इस तथ्य से अपरिचित नहीं। अत: राजनीतिक कारणों अथवा अन्य विवशताओं से जब समाज का बहुलांश सदाचार के मार्ग पर न चल पा रहा हो, तब उसका कारण किसी परंपरागत हिन्दू मान्यताओं में खोजते फिरना भारत के शत्रुओं के साधन बनना भर है।

पवित्रता के प्रति भी भारतीय दृष्टि सुस्पष्ट है। नदियों और तीर्थों की पवित्रता, सामाजिक पवित्रता का अंग है। उसके पीछे कोई भौतिक-रहस्य नहीं है। जब तक हम नदियों और तीर्थों के प्रति पवित्रता की दृष्टि हैं, वहां पूजा-उपासना, धर्म-चर्चा, यज्ञ-अनुष्ठान, विद्या-विवेचना, धर्म-विमर्श, सदाचार-निरुपण एवं व्यवस्था करते हैं, तभी तक वे तीर्थ हैं। यदि उन्हें सैरगाह, ऐशगाह, मदिरालय, जघन्य कर्म आदि का केंद्र बनाते हैं तो वो उसी क्षण से वे तीर्थ नहीं रह जाएंगे।

पवित्रता के प्रति भी भारतीय दृष्टि सुस्पष्ट है। नदियों और तीर्थों की पवित्रता, सामाजिक पवित्रता का अंग है। उसके पीछे कोई भौतिक-रहस्य नहीं है। जब तक हम नदियों और तीर्थों के प्रति पवित्रता की दृष्टि हैं, वहां पूजा-उपासना, धर्म-चर्चा, यज्ञ-अनुष्ठान, विद्या-विवेचना, धर्म-विमर्श, सदाचार-निरुपण एवं व्यवस्था करते हैं, तभी तक वे तीर्थ हैं। यदि उन्हें सैरगाह, ऐशगाह, मदिरालय, जघन्य कर्म आदि का केंद्र बनाते हैं तो वो उसी क्षण से वे तीर्थ नहीं रह जाएंगे। उनकी पवित्रता विनष्ट। विभिन्न धर्मग्रंथों से यह स्पष्टत: विवेचित है कि विद्या एवं सदाचार को बढ़ाने वाले कार्य न होने पर तीर्थसार समाप्त हो जाते हैं और फिर ऐसी जगहें पवित्र नहीं रह जातीं। नदियों का प्रवाह तभी तक पवित्र है जब तक उनके प्रति लोगों में श्रद्धा और पवित्रता के भाव तथा व्यवहार जीवंत हैं। वे उन्हें स्वच्छ रखते हैं, उनके तट पर संस्कृति और सभ्यता का ऐसा विचार-विमर्श चलता है जो आदर्शों को लोकजीवन में गतिशील रखे, अन्याय के निवारण और न्याय की प्रतिष्ठा का प्रयास होता रहे। समाज के लिए जो अशुभ है, अन्यकारक है उसे विनष्ट करने की व्यवस्था के केंद्र जब तक नदी-तटों में हों, ऐसी व्यवस्था करने में समर्थ्यवीर साधु, नारी, नर, पुण्यात्माएं जब तक इन नदियों में अपनी श्रद्धापूर्ण बुद्धि से प्रेरित हो नहाती हैं अर्थात जबतक ब्रह्मयज्ञ, दैवयज्ञ, ज्ञानयज्ञ और जपयज्ञ से ये नदियां पवित्र हैं तभी वे समाज का कलुष और कल्मष, मल और दूषण भी धो पाने में समर्थ हैं।

जिन ऋृषियों-मनीषियों ने पवित्रता एवं सदाचार का विस्तृत विवेचन किया है, उनके प्रति अनादर रखते हुए, उनकी बातों को गुजरे जमाने की पिछड़ी चीजें बताते हुए तथा उनके आदर्शों को त्याज्य अर्थों में धार्मिक और अपने आचरण को वरैण्य अर्थ में धर्मनिरपेक्ष कहते हुए, फिर इन नदियों को पवित्र बताना-मानना मिथ्याचार है। गंगा तभी तक पवित्र है जब तक भारतीय समाज और राज्य पवित्रता की सतत इच्छा और प्रयास है और जिससे प्रमाद, भूल या वासना-ज्वर के कारण कोई पाप हो गया है, उसे ही गंगा पवित्र करती है। जो गंगा के प्रति, गांगेय संस्कृति के प्रति मिथ्याचारी हैं, उसे गंगा दंडित कर सके, तभी वह शक्ति प्रवाह है। गंगा की संस्कृति को नष्ट करने या करना चाहने वालों को गंगा पवित्र नहीं बनाती। उन्हें अशक्त बनाते जाने में ही गंगा की शक्ति है। जो गंगा के प्रति मातृभाव रखता है तो गंगा उसे क्षमा कर सकती हैं, सद्बुद्धि देकर सन्मार्ग पर लगा सकती हैं। पर जो गंगा या अन्य नदियों के प्रवाह में जानबूझकर औद्योगिक प्रदूषण, विषाक्त द्रव्य घोलता है या घोलने में सहायक बनता है वह गंगा का शत्रु है, गंगा पुत्रों व गंगा पुत्रियों का शत्रु है। ऐसा गंगाद्रोही यदि गंगा के प्रति आदर प्रदर्शित करे, तो यह मिथ्याचार है। मिथ्याचार दंडनीय है। यहां गंगा पवित्र नदी की प्रतिनिधि है। यानी सभी नदियों के लिए यही तथ्य है।

‘भागीरथी के स्वर’ फरवरी 2017 अंक से साभार

फोटो साभार : नमामि गंगे

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *