प्रधानमंत्री मोदी की व्लादिवोस्तक दौरा: भारत-रुस ‘टाइम टेस्टेड’ मित्रता की नई कहानी

भास्कर

भारत रूस के सम्बन्धों में और प्रगाढ़ता लाने की दिशा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 3 सितम्बर से सुदूर रूसी शहर व्लादिवोस्तक यात्रा करेंगे। भारत और रूस के संबंधों को सामान्यतया ऐतिहासिक, आपसी विश्वास और आपसी एवं पारस्परिक समझ पर आधारित है और बिना किसी “लाभ हानि” की चिंता किये ये दोनों देश समय के क्रूर पहिये पर पड़ोसी की “आल वेदर फ्रेंडशिप” के फ़र्ज़ी दावे से कहीं सुदूर “अपने आप मे अनूठी “(sui generis) दोस्ती को दर्शाती है।

भारत-रुस की दोस्ती : टाइम टेस्टेड फ्रेंडशिप

भारतीय विदेश मंत्री सुब्रह्मण्यम जयशंकर ने बीते बुधवार को अपनी मास्को दौरे में स्पष्ट किया कि “विश्व बदल रहा है लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनय में भारत और रूस के संबंध समय पर खरे, सदैव अचर, स्थिर और स्थाई रहें हैं।” इन दोनो देशों के इस अनूठे सम्बन्धो को बिगाड़ने, तोड़ने, मरोड़ने, खटास पैदा करने के साथ साथ धमकाने, आर्थिक प्रतिबन्ध लगाने, तक जैसी ओछी हरकत करने से ये महाशक्तियां और इनके पुछल्ले देश बाज़ नहीं आये लेकिन भारत रूस के ये संबध इन कुटिल चालों से सदा ऊपर उठकर रही।

यह संबंध तो 1468 से 1472 के बीच जब रूसी यात्री अफनसे निकितिन ने फारस और ओटोमन साम्राज्य के क्षेत्र से होते हुए भारत की यात्रा की और अपनी कृति khozheniye za tri morya (द जर्नी बियॉन्ड थ्री सी) लिखा तब से ही व्यापक हो चुके थे। मॉस्को, सेंट पीटर्सबर्ग, अस्त्रखान से हमारे बहुआयामी सम्बन्ध तो आदि काल से रहे है।

बहुआयामी संबंध:

जिसे हमने गंगा-मस्कवा, रुपये-रूबल, टैगोर-गोर्की, दिनकर-पुश्किन, राहुल-दोस्तव्स्की,
इसरो-रॉस्कोसमोस, बार्क-रॉसएटम, एचएएल-रोसोबोरोन एक्सपोर्ट, के जरिये सांस्कृतिक, तकनीकी और आर्थिक सम्बन्ध को मजबूत बनाया है। रांची, भिलाई, बोकारो, हल्दिया, मथुरा सहित कई अन्य औद्योगिक शहर के औद्योगिकीकरण में कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ेगी। बस आप नाम लेकर आप अपनी आंखें बंद कीजिए रूस का योगदान जेहन में तैरता नजर आएगा।

नेहरू, शास्त्री, इंदिरा, गुजराल, राजीव, राव, बाजपेयी, सुषमा, जयशंकर के साथ नरेंद्र मोदी इस अनन्य राजनीतिक और राजनयिक सम्बन्धों को आगे बढ़ा रहे हैं। मास्को के प्रसिद्ध सर्कस, लचीली जिम्नास्ट, राज कपूर की रूसी लाल टोपी, विश्वनाथन आनन्द और गैरी कास्पोरोव, मरात साफ़िन, दिनारा सफ़ीना, अन्ना कुर्निकोवा से मारिया शारापोवा और वर्तमान में एके 101 असॉल्ट राइफल, सुखोई 30, भीष्म,पिनाक, विक्रमादित्य, चक्र औऱ मिग बाइसन-अभिनंदन की जोड़ी भी दोनो देशों के सांस्कृतिक रणनीतिक संबंधों को बयां करती ।

ये चंद उदाहरण है जिसे विदेश मंत्री के उपरोक्त वक्तव्य की पुष्टि होती है और दोनों देशों की रिश्ते से चिढ़ कर अपना सर नोचने वाले देशों के लिये सबक मिलता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक में राजनय और दोस्ती को कैसे साथ लेकर चला जाय। अंतरराष्ट्रीय राजनीति और राजनय की कॉपी बुक स्टाइल तो कहती है कि “जो आप कहते है उससे कहीं ज्यादा ध्यान उस पर दिया जाना चाहिए जो आप नहीं कहते है”भारत के साथ रूस की कमोबेश यही स्थिति बरकरार रही है।

भारत के लिए क्यों खास है व्लादिवोस्तक

रूस के रोमानोव वंश के महान योद्धा और शासक अलेक्जेंडर तृतीय जो रूस के सम्राट के साथ साथ ग्रैंड ड्यूक ऑफ फ़िनलैंड और किंग ऑफ पोलैंड भी थे। उनकी प्रसिद्ध उक्ति है

“Russia only has two allies which are the army and the fleet”. इसी कथन को चरितार्थ करते हुए करीब पांच दशक पहले दिसंबर 1971 के सर्दियों में जब अमेरिकी और ब्रिटिश नौसेना ने बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान भारत को धमकाते हुए अपने विमानवाहक पोत का रुख पाकिस्तान के समर्थन में बंगाल की खाड़ी की ओर मोड़ दिया था तब तत्कालीन सोवियत संघ ने अपने प्रशांत बेड़े को परमाणु आयुध से सुसज्जित पनडुब्बी भी थी उसे भारत की सहायता के लिए भेज दिया था।

तत्कालीन सोवियत संघ के इस कदम ने पूरे युद्ध की संरचना ही बदल दी। आक्रमक अमेरिकी प्रशासन ने अपने सातवें बेड़े ने युद्ध समाप्ति के फौरन बाद अपनी वापसी करना उचित समझा और ब्रिटिश नौसेना किसी भी सूरत में रूसी नौसेना के साथ कोई टकराव मोल लेना नहीं चाहती थी।इसलिए उन्होंने इस क्षेत्र से वापसी में ही अपनी भलाई समझी।

सोवियत संघ की नौसेना का यह प्रशांत बेड़ा रूस के सुदूर पूर्वी भाग व्लादिवोस्तक के गोल्डन हॉर्न खाड़ी में स्थित था । रूस के इस कदम ने 1971 की युद्ध की दशा और दिशा ही बदल दी,यह बेड़ा युद्ध समाप्त होने के बाद लम्बे अरसे तक इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी दर्ज कराता रहा ताकि इस क्षेत्र में अमेरिका प्रतिरोध को समाप्त किया जा सके।विश्व इतिहास में यह शायद पहला मौका था जब दो आण्विक महाशक्तियां एक दूसरे के खिलाफ आमने सामने किसी अन्य देश के लिए हुए थे फलस्वरूप आज मुक्त बांग्लादेश को हम नक़्शे पर देख पा रहे है।

इस घटना के बाद “व्लादिवोस्तक”के लिए भारतीयों के दिल और दिमाग मे अपना विशेष स्थान बना चुका है।

ग्लॉसनोस्त और पेरेस्त्रोइका से आगे निकलते हुए रूसी राष्ट्रपति पुतिन की वोस्तानॉवलेनये (रिस्टोरेशन) की पअभिनव नीति और अपने सुदूर पूर्व पूर्वी क्षेत्र के लिए प्रतिबद्ध कार्यक्रम ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम(ईईएफ)2019 के लिए इस साल राष्ट्रपति पुतिन ने जब भारतीय प्रधानमंत्री को मुख्य अतिथि के रूप मे आमन्त्रित किया तो बरबस ऐसा लग रहा है कि भारत को व्लादिवोस्तक के कर्ज़ को चुकाने के सुनहरे मौका मिला है जिसे चुकाया जाय।हालांकि इस रूसी कर्ज़ को,जिसे कभी चुकाया नहीं जा सकता है,पर,हां उसके संवृद्धि और विकास कार्य मे दिल से भागीदार बनकर उसके उन्नति में अपना योगदान तो दिया ही जा सकता है।

इसी क्रम में भारत ने व्लादिवोस्तक के महत्व को बहुत पहले ही पहचान लिया था और भारत पहला ऐसा देश था जिसने 1992 में यहां अपना महावाणिज्य दूतावास को खोला था। इस क्षेत्र में इरकुटस्क क्षेत्र जहां भारत के लिए मिग और सुखोई श्रेणी के लड़ाकू विमानों विनिर्माण होता है। सखालिन क्षेत्र में प्राकृतिक गैस निगम लिमिटेड (ओ एन जी सी) के अनुषंगी कंपनी ओवीएल ने प्राकृतिक गैस उत्खनन के लिए भारी निवेश किया है।

ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम (ईईएफ) 2019

रूस के कुल छह औद्योगिक क्षेत्र है जिसमे छठा औरअंतिम “सुदूर पूर्व औद्योगिक केंद्र(The Russian Far East Industrial Centre) का मुख्यालय ” व्लादिवोस्तक है जिसे रूस के सैन फ्रांसिसको कहा जाता है। यह रूस के एशियाई भाग का क्षेत्र है जो यूरोपीय रूस की तुलना में कम विकसित है।

उत्तरी प्रशांत महासागर के जापान सागर के मुहाने पर स्थित व्लादिवोस्तक सामरिक और प्राकृतिक संसाधन से सम्पन्न क्षेत्र होने के वावजूद अपनी दुरूह भौगौलिक स्थिति के कारण इसका विकास नहीं हो पाया था,राष्ट्रपति पुतिन ने अपनी Pivot of Asia रणनीति के तहत इस समस्या से निपटने के लिए 2012 में एक अलग मंत्रालय, विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाया,और 2015 से इस क्षेत्र के विकास के लिए सालाना ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम(ईईएफ) का आयोजन व्लादिवोस्तक में होना सुनिश्चित किया।अब इस सम्मेलन में ईईएफ से इतर भी वैश्विक अर्थव्यवस्था,क्षेत्रीय एकता, नवीन औद्योगिक और तकनीकी क्षेत्र के नवाचार से जुड़े मुद्दों पर विचार विमर्श का एक बेहतरीन प्लेटफार्म माना जाता है जो पूरे यूरेशियन और आर्कटिक राजनय के लिए अति महत्वपूर्ण है।

द ग्रेट यूरेशियन गेम

व्लादिवोस्तक रणनीतिक रूप से कोरियाई प्रायद्वीप के पूर्वी भाग में स्थित है जो रूस को उत्तरी और दक्षिण कोरिया और जापान के मुख्य द्वीपों साथ जोड़ता है। यह क्षेत्र जिसे सुदूर पूर्व फेडरेल डिस्ट्रिक्ट कहा जाता है जो क्षेत्रफल में भारत से दोगुना है और जनसंख्या मात्र 6.3 मिलियन।इसमे कुल आठ डिस्ट्रिक्ट हैं जो बहुमूल्य खनिज और प्राकृतिक संसाधनों (कोयला डायमंड गोल्ड,प्लेटिनम टँगस्टन) से सम्पन्न है।

यह शहर उत्तरी प्रशान्त महासागर में होने के कारण सालों भर व्यापार के लिए खुला रहता है, जबकि रूस से अधिकतर बन्दरगाह आर्कटिक क्षेत्र में होने के कारण सर्दियों में बंद रहते है। व्लादिवोस्तक जो ट्रांस साइबेरियन रेल मार्ग का सबसे पूर्वी टर्मिनस है और क्यूराईल और सखलिन जैसे ऊर्जा संसाधन सम्पन्न क्षेत्र से घिरा हुआ है, यह शहर न सिर्फ पत्तन के दृष्टि से वरण सामरिक रूप से रूस चीन जापान और कोरिया के चतुष्कोणीय आर्थिक व्यापारिक और ऊर्जा सुरक्षा के लिए “संघर्ष”का मुख्यालय बनेगा।

भारत भी इस ग्रेट गेम का हिस्सा बनना चाहेगा, क्योंकि हमें भी अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करनी है और रूसी हाथों के साथ यह कार्य अन्य क्षेत्रों से ज्यादा सहज है। इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती भूमिका निश्चित रूप से राष्ट्रपति पुतिन और प्रधानमंत्री मोदी को चिंतित करती रही है,इसी क्रम में पुतिन द्वारा मोदी को इस सम्मलेन में गेस्ट ऑफ आनर दिये जाने के निहितार्थ को समझा जा सकता है।

चीनी फैक्टर

भारत और रूस विस्तृत इंडो पैसेफिक क्षेत्र में बढ़ता चीनी दबदबा, आक्रमक नौसैनिक नीति और एम्बुश और डेब्ट डिप्लोमेसी, आर्कटिक क्षेत्र में ऊर्जा दोहन के लिए महत्वाकांक्षी रणनीति और चीन और अमेरिका बदलते व्यापारिक रिश्ते और तथाकथित ट्रेड वॉर से उत्पन्न हालात से चिंतित है। यहाँ यह देखना दिलचस्प है कि चीन रूस का सबसे बड़ा व्यापारिक और रणनीतिक सझीदार है चीन की निर्बाध पूरी ऊर्जा सुरक्षा की आपूर्ति का दायित्व रूस के उपर है जो अपने सुदूर पूर्व में अकूत ऊर्जा संसाधन से सम्पन्न है,रूस के इस क्षेत्र में कुटिल ड्रेगन की नजर गड़ी है और वह इस क्षेत्र में कई अवसंरचनात्मक विकास के लिए जोर शोर से खर्च कर रहा है। चीन इस क्षेत्र में पूरे जनसँख्या पैटर्न को बदलने पर उतारू है,इसी कड़ी चीन अपने नागरिकों को इस इस क्षेत्र में पहले पर्यटन,फिर कामागार के रूप के बसाना शुरू करता है और पूरी जनसंख्या लाभांश को बदल देता है । रूस चीनी चाल को भली भांति समझता है,उसे बेहतर समझ है कि यह वही चीन है जो उससे उसरी नदी पर लड़ चुका है,और यह अपनी पीसफुल राइज की नीति से कहीं आगे निकल चुका है और इसकी नजर रूस से होते हुए पूरे यूरेशिया पर है। चीन की अरबों डॉलर की न्यू सिल्क रोड,और मेरीटाइम सिल्क रोड की अवधारणा और इनसे होने वाले सम्भावित परिणाम से रूस समेत सभी देश वाक़िफ़ है।

भारत चीन से पहले स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स और वन बेल्ट वन रोड, न्यू सिल्क रोड और मेरीटाइम सिल्क रोड की चतुष्कोणीय चीनी चुनौती से जूझ रहा है और उसकी काट ढूंढ रहा है। इसी कड़ी में भारत के लिए इंटरनेशनल नार्थ साउथ कॉरिडोर और चेन्नई -व्लादिवोस्तक समुद्री मार्ग की संकल्पना को रूस के साथ मिलकर मूर्त रूप देने से निश्चित रूप से ड्रेगन के अवसंरचनात्मक जहर की काट सिद्ध होगा। इस समुद्री मार्ग के जरिये जहां रूस के सुदूर पूर्व व्लादिवोस्तक में भारत महज 24 दिन में पहुंच सकेगा,जो अभी 42 दिन लगता है। इस रास्ते से भारत न सिर्फ कोरियाई प्रायद्वीपीय,जापान सागर में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा सकेगा ।

यह समुद्री मार्ग पूर्वी चीन सागर और दक्षिणी चीन सागर से होकर गुजरता है जहां चीन अपनी ऐतिहासिक दावा कूटनीति के जरिये सम्पूर्ण क्षेत्र पर अपना अधिकार जताते हुए अपने सभी पड़ोसियों के साथ आक्रमकता के साथ पेश आता है,चीन के आक्रमकता से त्रस्त इन सभी देशों के साथ भारत के बेहतर राजनयिक और नौसिनिक सम्बन्ध है। इस क्षेत्र में भारत वियतनाम के साथ मिलकर चीन के इन मंसूबो पर मजबूती से लगाम लगा सकता है।

रूसी चाहत

रूस को हिन्द महासागर का गर्म पानी सदा लुभाता रहा है।चेन्नई -व्लादिवोस्तक मार्ग के संचालित होने के बाद प्रशांत महासागर का हिन्द महासागर में मिलन हो सकेगा और चीन रूस के आगोश में शांति से रह सकेगा।इस समुद्री मार्ग के जरिये ही भारत-वियतनाम-रूस की त्रिपक्षीय नवीन संकल्पना को मूर्त प्रदान किया जा सकेगा। इससे आसियान देशों के लिए भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी और एक्सटेंडेड ईस्ट पॉलिसी में रूसी सहयोग बढ़ेगा। ये दोनों देश ब्रिक्स, एससीओ, आरआईसी आदि सहयोगी मंचो पर विद्यमान है।

सम्बन्ध सुधारने की और जरूरत

रूस के साथ द्विपक्षीय संबंध को गति देने के लिए भारत को रणनीतिक आण्विक और सामरिक सम्बन्ध के साथ साथ अन्य आर्थिक व्यापारिक गतिविधि को और बढ़ावा देना पड़ेगा।दोनो देशों के बीच कई मुद्दों पर अभी और भी सक्रियता के साथ इन मुद्दों पर गंभीरता से विचार से कहीं ऊपर उठकर क्रियान्वयन करने की जरूरत है। इन मुद्दों में सबसे प्रमुख हैं व्यापारिक कनेक्टिविटी , भौगोलिक दूरी, विदेशी निवेश संबंधी कानून, कमजोर बैंकिंग व्यवस्था,नीतिगत विषमता,रूस की वीजा रेस्ट्रिक्ट नीति आदि मसलों पर ध्यान देने की जरूरत है।

साभार – इकोनॉमिक टाइम्स

भौगौलिक दूरी दोनो देशों के बीच व्यापार और व्यापार असंतुलन की सबसे बड़ी बाधा है,जिसे इंटरनेशनल नार्थ साउथ कॉरिडोर और चेन्नई-व्लादिवोस्तक समुद्री मार्ग पर तीव्रता से व्यापारिक रूप से व्यवहारिक बनाना होगा जिससे स्वेज नहर पर निर्भरता कम हो सके और दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौता, मुक्त व्यापार मंच जैसे यूरेशियन इकनोमिक यूनियन आदि मसलों पर बेहद संजीदगी के साथ पेश आना होगा।

ट्रेड वॉर, अमेरिकी कड़े होते वीजा नीति, अमेरिकी डिग्लोबलाइजेशन नीति, अमेरिका की रूस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध और संरक्षणवाद, चीन की ग्लोबलाइजेशन 2.0 विथ चाइनीज करेक्टर के इस दौर भारत और रूस को चाहिए कि बदलते भू राजनीतिक परिदृश्य में साथ मिलकर आगे आते हुए इन आर्थिक अवसरों लाभ उठाने की आवश्यकता है। हिन्द प्रशान्त क्षेत्र की बदलती जरूरत, अफगानिस्तान में कमजोर होती अमेरिकी पकड़ और बढ़ता रूसी वर्चस्व,

पश्चिम एशिया में सीरिया पर प्रभावी रूसी करवाई, ईरान के साथ अमेरिकी टकराहट आदि मसलों पर रूस को भारत की सख्त जरूरत होगी ।

रसियन रोमांस

ग्रेट पैसिफिक रिम की संकल्पना के बाद “पाइवोट ऑफ एशिया/यूरेशिया” चीन की आक्रमक मेरीटाइम नीति,और बदले हुए ‘इंडो पैसिफिक अवधारणा “और रूस अमेरिका के बीच आईएएफ संधि के बाद खटास होते रिश्ते के ,भारत पर रूसी सैन्य हार्डवेयर न खरीदने का अमेरिकी दवाब के बीच प्रधानमंत्री की यह यात्रा और रूस के कम विकसित सुदूर पूर्व क्षेत्र और व्लादिवोस्तक के विकास के लिए गहरी भारतीय प्रतिबद्धता को को “व्यापक अर्थों “में देखा जाना चाहिए।

(अंतर्राष्ट्रीय राजनय और रक्षा मामलों के अध्येता भास्कर टीवी पत्रकार हैं। फिलहाल डीडी न्यूज़ से संबद्ध हैं)

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