श्रीलंकाई राजनीति में राजपक्षे बंधु 2.0 का आगाज़

भाष्कर

गत सप्ताह भारत के निकटतम पड़ोसी देश श्रीलंका में सम्पन्न राष्ट्रपति चुनाव और उसके अंतिम नतीजों ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। वर्ष के शुरुआत में देश में ईस्टर पर चर्च में हुए जघन्य आतंकी हमले के बाद इस चुनाव में राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा को मुख्य चुनावी एजेंडा बना कर सत्ता में वापसी करने वाले पूर्व रक्षा सचिव और श्रीलंका पोडुजूना पार्टी (एसएलपीपी) के उम्मीदवार गोटाबया राजपक्षे की सत्ता में वापसी हुई है। उन्होने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी, पूर्व राष्ट्रपति रणसिंघे प्रेमदासा के पुत्र और न्यू डेमोक्रेटिक फ्रंट के उम्मीदवार साजित प्रेमदासा को 13 लाख मतों के प्रभावी अंतर से मात दिया।

श्रीलंका में एक सदनीय संसदीय प्रकिया का पालन होता है इसलिए यहां “Head of State और Head Of Government” की शक्तियां राष्ट्रपति में अंतर्निहित होती है। गोटाबया राजपक्षे ने पद और गोपनीयता के शपथ के फौरन बाद देश में संसदीय चुनाव कराने की घोषणा कर दी और प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को इस्तीफा देने के लिए बाध्य किया। विक्रमसिंघे के इस्तीफे के तुरंत ही राष्ट्रपति गोटाबया ने विपक्ष के नेता, अपने भाई और पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे को देश का अंतरिम प्रधानमंत्री नियुक्त किया । अब वह सम्भवतः आगामी अप्रैल 2020 में आम चुनाव होने तक कार्यवाहक मंत्रिमंडल में प्रधानमंत्री के रूप में टेम्पल ट्री में निवास करेंगे । महिंदा राजपक्षे को वित्त और रक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभाग का मुखिया बनाया गया है।

इस चुनाव में विपक्ष के खराब प्रदर्शन और जनता से मिले प्रचंड जनमत औऱ राजपक्षे बंधुओं की चौकड़ी के दम पर कुल मिलाकर राष्ट्रपति गोटाबया के पास सत्ता की एकछत्र बागडोर है।

जीवन वृत्ति :

सत्तर वर्षीय लेफ्टिनेंट कर्नल (सेवानिवृत) गोटबया राजपक्षे, श्रीलंका सेना के एक सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी हैं । उन्होंने 1971 में अपने कैरियर की शुरुआत कैडेट ऑफिसर के रूप में किया और सिग्नल रेजिमेंट में उन्हें प्रारंभिक कमीशन मिला। पाकिस्तान के रावलपिंडी और 1983 भारत में ऊटी के डिफेंस सर्विस कॉलेज वेलिंग्टन, जैसे प्रतिष्ठित सैन्य संस्थान से प्रशिक्षित गोटाबया ने 1974 में इन्फेंट्री को वरीयता दी और सिंहा रेजिमेंट में पदस्थापित हुए औऱ ग़ज़बा रेजिमेंट के गठन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने और प्रथम ग़ज़बा बटालियन के कमान अधिकारी के दायित्व का निर्वहन किया। पूर्व सेना प्रमुख फील्ड मार्शल शरथ फोंसेका (तब कमांडिंग ऑफिसर ,प्रथम सिंहा बटालियन ) औऱ लेफ्टिनेंट कर्नल गोटाबया (कमांडिंग ऑफिसर प्रथम ग़ज़बा बटालियन) के नेतृत्व में जाफना किले में लिट्टे के विरुद्ध की गई सैन्य कार्रवाई को श्रीलंका सेना की सबसे सफलतम सैन्य कार्रवाई माना जाता है।

लिट्टे के सफाये के सारा श्रेय लिए तत्कालीन सेनाध्यक्ष ले. जन शरथ फोंसेका ,रक्षा सचिव गोटाबया और राष्ट्रपति महिंदा की तिड़की को दिया जाता है। श्रीलंका सेना के वर्तमान प्रमुख ले.जन.शवेंद्र सिल्वा गोटाबया के अधीन प्रथम ग़ज़बा बटालियन में एक युवा अधिकारी के रूप में साथ कार्य कर चुके हैं।

राष्ट्रवाद्र, राष्ट्रीय सुरक्षा और श्रीलंका का राष्ट्रपति चुनाव

इस वर्ष ईस्टर के दिन श्रीलंका में चर्च पर हुए आत्मघाती हमले और 269 बेकसूरों की मौत तत्पश्चात वहाँ लगे आपातकाल के बाद हुए श्रीलंका के राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों से स्पष्ट हो जाता है कि सम्पूर्ण दक्षिण एशिया में राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा चुनाव का अहम मसला है। 2019 के मई में पहले भारत, फिर बांग्लादेश, भूटान और अब श्रीलंका के चुनावी नतीजों नतीजों ने स्पष्ट कर दिया कि राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा घरेलू राजनीति का अहम मसला बन चुका है।

श्रीलंका की राजनीति में आतंकवाद की समस्या एक अहम भूमिका निभाई है। राष्ट्रपति प्रेमदासा आत्मघाती हमले में मारे गए थे जबकि चंद्रिका कुमारतुंगा को अपनी एक आँख आत्मघाती हमले में गंवानी पड़ी । लगभग एक दशक से श्रीलंका में आतंकवादी हमलों में व्यापक गिरावट देखी गयी है लेकिन ईस्टर पर हुए बम हमले के बाद देश मे स्थिति चुनौतपूर्ण हो गयी थी। इस बार भी आतंकवाद फैक्टर ने गोटबया को जीत हासिल करने में अच्छी खासी मदद दी।

श्रीलंका चुनाव पर चीन की प्रतिक्रिया

गोटबया राजपक्षे को छीन की झुकाव वाले नेता के रूप में माना जाता है। श्रीलंका में लिट्टे टाइगर्स के सफाये के दौरान उनका चीनी प्रेम जग जाहिर है। महिंदा राजपक्षे सरकार में रक्षा सचिव रहते हुए उन्होंने उन्नत चीनी हथियारों और परिष्कृत राडारों और संचार सहायता श्रीलंकाई सेना को लैस किया और प्रभाकरन की अगुवाई वाले लिट्टे के सफाये के लिए निर्ममता के साथ आतंक के खिलाफ अभियान चलाया। चीन का यह कर्ज़ दोनो भाई (तत्कालीन राष्ट्रपति महिंदा और उनके रक्षा सचिव गोटाबया) आज भी चीन की “Debt Trap Diplomacy”के रूप में अपने क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर को चीन की सरकार प्रयोजित कंपनियों के हाथों गिरवी तथा बेच कर चुका रहे हैं।

चीन का “Game of Loans” और हम्बनटोटा : श्रीलंका की दुखती रग

इस कड़ी में सबसे पहला झटका दिसंबर 2017 में सामरिक रूप से महत्वपूर्ण हम्बनटोटा बन्दरगाह के अधिकतर (71फीसद) इक्विटी हिस्सेदारी 99 साल के लीज पर चीनी कम्पनी को दे दी गयी। सेंटर फॉर ग्लोबल डेवेलपमेंट के आंकड़ो पर ध्यान दें तो श्रीलंका पर चीन का कर्ज $3.85 बिलियन हो चुका है।

चीन श्रीलंका को “Concessional Financing” और “Commercial Loans” के तरीकों से ऋण उपलब्ध कराता है जबकि श्रीलंका को विकास सहायता (Developing Assistance) के लिए ExIm Bank, China Development Bank, और Industrial & Commercial Bank of China के माध्यम से विकासात्मक ऋण, वहीं चीनी वाणिज्य मंत्रालय के माध्यम से अनुदान(Grants) ब्याज मुक्त ऋण (interest Free Loan) मुहैय्या कराता है।

ऋण अनुदान और ब्याज मुक्त ऋण के माध्यम से चीन श्रीलंका की आर्थिक और वाणिज्यिक संप्रभुता को पूरी तरह अपने कब्जे में ले चुका है।

श्रीलंका के विस्तृत दंतुरित और प्रचुर सामुद्रिक संसाधन पर चीन का “अनकहा” कब्जा हो चुका है, श्रीलंकाई शीर्ष नेतृत्व चीन के साथ अपने संबंधों और उसके आर्थिक मॉडल पर भारत सहित अन्य देशों और मंचो पर कितनी भी सफाई क्यों न दें लेकिन जमीनी हक़ीक़त कुछ अलग ही बयां करती है। श्रीलंका के पास फिलहाल और आने वाले वर्षों में उतनी आर्थिक संवृद्धि नहीं हो पाएगी कि वह ड्रैगन के भीमकाय कर्जे को चुका सके इसलिए चीन प्रयोजित एवं निर्मित सभी परियोजनाओं को या तो चीन को सौंपना पड़ेगा या फिर चीनी शर्तो पर क्रियान्वित करना पड़ेगा,जैसा कि हम्बनटोटा मामले में हुआ।

“Industrialization and further development of Hambantota Air Sea Hub in southern Sri Lanka. Hambantota is a smaller harbor than Colombo and Trincomalee, built using a loan from China’s EXIM Bank. Due to our debt-situation we have decided to lease Hambantota to a Joint Venture Company comprising China Merchants Company and Sri Lanka Ports Authority”

हर्ष डि सिल्वा, श्रीलंका के उप विदेश मंत्री, तिरुवनंतपुरम में आयोजित ओशन डायलॉग-2017 के अपने व्याख्यान के दौरान। उपरोक्त बयान से चीनी कर्ज़ को न चुका पाने की श्रीलंकाई सरकार की मजबूरी स्पष्ट हो जाती है।

चीन-श्रीलंका द्विपक्षीय सम्बन्ध

21वीं शताब्दी में चीन श्रीलंका के उत्तरोत्तर विकसित होते संबंधों को हम क्षेत्रीय और वैश्विक परिदृश्य में देखें और दोनो देशों के समझौते के आधिकारिक शब्दों पर गौर करें तो मामला और इनकी मंशा पूरी तरह साफ हो जाती है। 2005 में तत्कालीन चीन के राष्ट्रपति वेन जियाबाओ की श्रीलंका दौरे कोदोनो देशों ने” China Srilanka All Round Cooperation Partnership of Sincere Mutual Support and Ever Lasting Friendship” का नाम दिया तो मई 2013 में तत्कालीन श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे की चीन यात्रा का दौरान दोनों देशों ने इस संबंध में सामरिक और रणनीतिक महत्व का तड़का लगाते हुए इसे’ ” China SriLanka relationship to the Strategic Cooperative Partnership of Sincere Mutual Support and Ever Lasting Friendship” का नाम दिया।

वन बेल्ट वन रोड और श्रीलंका

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का ग्रेट चाइनीज ड्रीम चार ट्रिलियन डॉलर वाली वन बेल्ट वन रोड और उससे सम्बद्ध परियोजना में श्रीलंका का अति महत्वपूर्ण स्थान है। हिन्द महासागर क्षेत्र में बीचों बीच मौजूदगी और अपने भू रणनीतिक और सामरिक महत्व के कारण श्रीलंका चीन की ऊर्जा और खनिज सुरक्षा में सबसे अहम भूमिका निभाता है।

विशाल, दंतुरित और गहरे समुद्री तट वाले श्रीलंका के तटों को पोर्ट ऑफ कॉल, हब और लॉजिस्टिक फैसिलिटी केंद्र, दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों से आने वाले माल के लिए ट्रांज़िट गुड्स केंद्र के रूप में विकसित किये जाने की असीम रणनीतिक संभावना है जिसे चीन विकसित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहता है। चीन के श्रीलंका ओबीओआर परियोजना हार्ड और सॉफ्ट पावर डिप्लोमसी के कुल पांच मुख्य लक्ष्य हैं:

1 पॉलिसी कोऑर्डिनेशन

2 कनेक्टिविटी

3 निर्बाध व्यापार

4 फाइनेंशियल इंटेग्रेशन

5 पीपुल टू पीपुल कॉन्टेक्ट जिसके तहत सांस्कृतिक, साहित्यक, अकादमिक क्षेत्र को बढ़ावा देना

इसके तहत चीन श्रीलंका की निम्न विकास दर, से उच्च विकास दर पाने की चाह, आधुनिक अवसंरचनात्मक विकास की आकांक्षा और तथाकथित आधुनिकतम जीवन शैली निर्माण के झांसा देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। इसी कड़ी में चीन पूरे आक्रमकता के साथ ओबीओआर के घटक बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव बीआरआई के तहत आठ बिलियन डॉलर वहीं एशियाई अवसंरचनात्मक बैंक से 32 बिलियन डॉलर की राशि श्रीलंका के अवसंरचनात्मक विकास में खर्च करेगा जिसमे 269 हेक्टयर में निर्मित कोलंबो इंटरनेशनल फाइनेंशिल सिटी में 13 बिलियन डॉलर का निवेश करेगा,जो श्रीलंका ने अब तक का सबसे बड़ा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) है। चीन के ऊर्जा और खनिज सुरक्षा के लिए हम्बनटोटा का एक महत्वपूर्ण स्थान है,

वहीं दूसरी ओर भारत की संप्रभुता के लिए श्रीलंका में चीनी निवेश “बेहद खतरनाक” है।

लंका को अपने निकटतम पड़ोसी और हिन्द महासागर में भारतीय हितों का ख्याल रखना भी वर्तमान सरकार की “जिम्मेदारी” है। गोटाबया यह मानते हैं कि तत्कालीन सरकार का चीन को हंबनटोटा बंदरगाह का नियंत्रण देने को फैसला एक गलत नीतिगत कदम था लेकिन इस बन्दरगाह निर्माण के लिए चीन को आमंत्रण तत्कालीन राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने दिया था।

गोटबया चीनी श्रीलंका के आपसी संबंध पर चाहे जितनी भी सफाई दें कि उनके चीनी संबध “पिछले कुछ वर्षों में चीन के साथ भागीदारी को विशुद्ध रूप से वाणिज्यिक “है लेकिन चीन की हिंदमहासागर में कैट फिश जैसे खुराफ़ात किसी से छुपी नहीं है। तमाम भू-रणनीतिक विश्लेषकों ने चीनी स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स के लगातार आक्रामक होते चीनी रुख को भारतीय हित के लिए बेहद खतरनाक बताया है।

श्रीलंकाई परिवारवाद की राजनीति पर भारत की पैनी नजर:

गोटबया और उनके परिवार की श्रीलंका की राजनीति में मजबूत पकड़ है, बड़े भाई महिंदा को रक्षा और वित्त मंत्रालय की कमान, जबकि चामल को कृषि,सिंचाई, आंतरिक व्यापार,और उपभोक्ता कल्याण मंत्रालय, और बासिल राजपक्षे को पर्दे के पीछे पार्टी का मुख्य रणनीतिकार माना जाता है। महिंदा राजपक्षे को प्रधानमंत्री के अतिरिक्त वित्त और रक्षा मंत्रालय का कार्यभार देकर गोटाबया ने पहला अपने भाई का कर्ज़ चुकाया वहीं चीन को भी मनचाहा व्यक्ति प्रदान कर अपने दोनों हित साध लिया, प्रखर मार्क्सवादी नेता गुणवर्धने को विदेश मंत्रालय सौंपकर राष्ट्रपति ने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बढ़त हासिल कर ली है।

महिंदा का चीनी प्रेम किसी से छुपा नहीं है लेकिन राजपक्षे 2.0 सरकार को पिछली गलतियों को दुरुस्त करना होगा जो हिन्द महासागर क्षेत्र में वक़्त का तकाजा है। श्रीलंका को यह मानना होगा कि सम्पूर्ण हिन्द महासागर क्षेत्र में भारत एक नैसर्गिक और निर्विवाद महाशक्ति के साथ साथ फर्स्ट रेस्पांडर है जिसकी तुलना किसी से न कि जाय तो बेहतर होगा।

गोटबया की जीत के फौरन बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ट्विटर पर उन्हें सर्वप्रथम बधाई देना और जीत के 16 घण्टे के भीतर सबको चौंकाते हुए विदेश मंत्री सुब्रह्मयनम जयशंकर का राष्ट्रपति सहित अन्य लोगों से मिलना तथा आगामी 29 नवम्बर को गोटबया राजपक्षे की अपनी पहली राजकीय यात्रा के रूप में भारत को चुनना महज एक संयोग नहीं कहा जा सकता।

गोटबया राजपक्षे ने 25 नवम्बर को ही अपना पहला साक्षात्कार भारत के ऑनलाइन समाचार पोर्टल को दिया। इस साक्षात्कार में उन्होंने विस्तार से भारत चीन के साथ अपने बेहतर संबंध और भारतीय हितों की प्राथमिकता की मुखालफत की हम्बनटोटा बंदरगाह लीज की समीक्षा की बात की लेकिन इनकी कथनी औऱ करनी से भारत को पूरी तरह सतर्क रहने की आवश्यकता है।

क्या ड्रेगेन के जहर की काट खोज पाएगा भारत

भारत के लिए श्रीलंका में राजपक्षे बंधु की वापसी को एक अच्छे संकेत के रूप में नहीं माना जा सकता है। इस मन्तव्य के पीछे महिंदा राजपक्षे नेतृत्व की पिछली सरकार ने भारत की एकता अखण्डता और संप्रभुता को तार तार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।हिन्द महासागर क्षेत्र में अचानक चीनी नौसेना की बढ़ती गतिविधि और श्रीलंका को अपना शरणस्थली बनने की चीनी मंशा और महिंदा के साथ गोटाबया का साथ को भारत को कभी नही भूलना चाहिये क्योंकि तत्कालीन रक्षामंत्री ही आज श्रीलंका के वर्तमान राष्ट्रपति है।

श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे इस सप्ताह के अंत में भारत दौरे पर आने वाले हैं। एक साक्षात्कार में राजपक्षे ने कहा है कि

1.” उनका देश किसी भी ऐसी गतिविधि में शामिल नहीं हो सकता जिससे भारत की सुरक्षा को खतरा हो।”
2 उन्होंने भारत सरकार से ” निवेश, शिक्षा और प्रौद्योगिकी के विकास में मदद करने का अनुरोध करते हुए कहा कि वे निवेश और मदद चाहते हैं लेकिन किसी सैन्य और भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में शामिल नहीं होना चाहते।”
3 “भारत, सिंगापुर, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को अपने यहां निवेश करने के लिए आमंत्रित किया।”
4 वहीं उन्होने तत्कालीन महिंदा राजपक्षे सरकार की पिछले कुछ वर्षों में चीन के साथ भागीदारी को विशुद्ध रूप से वाणिज्यिक बतलाया”
5 गोटबाया राजपक्षे ने श्रीलंका द्वारा चीन को हंबनटोटा बंदरगाह का नियंत्रण देने को एक नीतिगत गलती बताया।”
पर गोटबया भारत और अन्य इंडो पैसिफ़िक देशों के साथ के साथ सॉफ्ट पावर राजनय की वकालत करते है लेकिन चीन के साथ अपने हार्ड पावर राजनय, चीनी ऋण कर मसले पर पूरी चतुरायी के साथ बच निकलते है।

भारत को राजपक्षे 2.0 की हर एक राजनय और नीतिगत नीतियों का गहन और सूक्ष्मतम विश्लेषण और प्रभावी कार्रवाई करने की आवश्यकता है। भारत को श्रीलंकाई राष्ट्रपति के ऐसे विशुद्ध राजनयिक बयान के झांसे में न आने की आवश्यकता है क्योंकि श्रीलंका में जमीनी सच्चाई क्या है ? यह सबको मालूम है कि चीनी किस कदर ख़ुराफ़ात हैं और राजनय में राष्ट्रीय हित की सर्वोच्चता ही सर्वश्रेष्ठ राजनीति कहलाती है इत्तेफाक से चीन श्रीलंका और भारत ये तीनो अपनी राष्ट्रीय हितों की बात करते है क्योंकि चीन की खनिज और ऊर्जा सुरक्षा के लिए श्रीलंका एक अहम स्थान है दूसरी तरफ तीव्र विकास और दोनों हाथों से खाना खाने की भूख लिए श्रीलंका के चीनी निवेश स्वप्न सरीखा अलादिन का चिराग और बिन मांगे मोती समान है तो भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ हमारे भू आर्थिक, सामरिक, रणनीतिक और संभरिकी हितों में श्रीलंका का अहम स्थान है।

इसलिए भारत को श्रीलंका के मुद्दे पर केवल अपना ध्यान विशुद्ध रूप से अपने राष्ट्रीय हितों की निर्बाध पूर्ति होंने की दिशा में लगाना चाहिए क्योंकि चीन जिस कदर स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स की नीति से ऊपर निकल कर भारत को हिन्द महासागर में जिस तरह भारत के गर्दन में मोतियों की माला की कसावट के रूप में गर्दन कस रही है वह किसी भी सूरत में अच्छे संकेत नहीं है।

आगामी भारत की यात्रा पर आ रहे राष्ट्रपति राजपक्षे के बयानों पर पूरी निगाहें बनी रहेगी और उम्मीद रहेगी कि वे अपने भाई महिंदा की गलतियों को न दोहराएं तथा दोनो देश आपसी समझ, विश्वास, भाईचारा तथा एक दूसरे की संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों का खयाल रखते हुए हिन्द महासागर की नैसर्गिकता और शांति के क्षेत्र की अवधारणाओं का निश्चित रूप से खयाल रखेंगे क्योंकि स्थाई औए शांतिपूर्ण भारत में ही श्रीलंका की समृद्धि और संवृद्धि का बीज छिपा हुआ है।

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