राम मंदिर को लेकर निर्णायक दिशा में आगे बढ़ चुका है संत समाज : स्वामी जीतेन्द्रानंद सरस्वती

स्वामी जीतेन्द्रानंद सरस्वती
स्वामी जीतेन्द्रानंद सरस्वती

स्वतंत्र भारत के इतिहास में अपने तरह से भारतीय राजनीति को प्रभावित करने वाली घटना जो हिन्दू और मुसलमानों के बीच में एक गहरी खाई के निर्माण का कारण बनी श्रीराम जन्मभूमि – बाबरी मस्जिद विवाद जिसमें जिसके एक हिस्से की बहस पर चीर प्रतिक्षित फैसला आया और हिन्दुओं ने इस बात की प्रसन्नता जाहिर की। श्रीराम जन्मभूमि के प्रश्न पर न्यायालय फैसला देने की दिशा में आगे बढ़ चली है। प्रश्न यह उठता है कि स्वर्गीय अटल जी की प्रसिद्ध कविता “मन हार कर मैदान नहीं जीते जाते”, कि अगर किसी न किसी के पक्ष में फैसला आ ही जाए तो दूसरे समाज को संतुष्ट करना इतना सरल होगा ? अथवा जिस खाई का निर्माण 1528 से तथाकथित बाबर के आदेश और उसके सिपाहसलार मीर बाकि की जिद के कारण प्रारंभ हुआ वह न्यायालयी फैसले से रिक्तता भर जाएगी ?

जहां मुसलमान अभी भी इस दिवास्वप्न में जी रहा हो कि चूकि सत्ता हमारे हाथ से अंग्रेजों ने ली थी, हम शासकवर्ग थे, इस देश के न्याय की भाषा उर्दू थी अर्थात यह साबित करने की कोशिश की कि देश के अंदर न्याय की भाषा वही होगी जो शासक वर्ग समझता है, जो शासक  वर्ग बोलता है। शासक वर्ग की भाषा ही न्याय की भाषा मानी जाएगी। इस सिद्धांत के फलस्वरूप कभी भी मुसलमानों में सामान्य नागरिक की तरह से कानूनों का पालन करते हैं ऐसा व्यवहार ही नहीं किया। वह विशिष्ट है, उनके नियम कानून सब कुछ विशिष्ट हैं, जो भारतीय संविधान की मूल धारा से संचालित नहीं होंगे। एक ओर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड प्रत्येक जिले में शरिया अदालतों के गठन की बात कर रहा हो तो दूसरी तरफ राम जन्मभूमि के मुकदमे को सुप्रीम कोर्ट में लड़ने की बात कर रहा है। इससे हिन्दु समाज के लिए यह विश्वास करना मुश्किल है कि कोर्ट के द्वारा दिए गए निर्णय को मुसलमान स्वीकार ही कर लेगा।

राम जन्मभूमि का मुकदमा सुप्रीम कोर्ट के अंदर पिछले आठ वर्षों से लंबित है। अगर उत्तर प्रदेश में सरकार न बदलती तो साक्ष्यों के अनुवाद पर खर्च होने वाले करोड़ों रुपये की व्यवस्था शायद कोई गैर भाजपा शासित सरकार नहीं करती और यह मुकदमा सुप्रीम कोर्ट के अंदर प्रारंभ भी न हो पाता। जब सुप्रीम कोर्ट में बहस प्रारंभ हुई तो जो परिस्थिति उत्पन्न हुई और मुस्लिम पक्षकारों की तरफ से दिए जाने वाले तर्क ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि यह मुकदमा किसी मंदिर मस्जिद का विवाद न हो कर हिन्दु समाज के उपर अपनी श्रेष्ठता को सिद्ध करने के लिए कि हम विजयी थे, बलशाली थे, हमने आप पर शासन किया है। इसी को बार बार याद दिलाने के लिए कभी श्रीराम जन्मभूमि के वाद का निपटारा न होने दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट में तर्क कानून से प्रभावित नहीं राजनीति से प्रभावित दिए जा रहे थे। मुस्लिम पक्षकारों के वकील कपिल सिब्बल और राजीव कुमार धवन का पहले तो अनुवाद के मसले पर, इसके पश्चात यह तर्क की चूंकि भारतीय जनता पार्टी ने अपनी घोषणा पत्र में राम मंदिर बनवाने का वायदा किया है इसलिए 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद इस पर फैसला सुनाया जाए। यह तर्क ही यह बताने के लिए पर्याप्त है कि कांग्रेस श्रीराम जन्मभूमि के प्रश्न को किस नजरिए से देखती है। प्रथम राम एक काल्पनिक पुरूष है, राम इतिहास नहीं हैं, राम मिथक हैं, रामसेतु नाम की कोई चीज नहीं है… यहां से कहानी शुरू होकर फैसला 2019 में किया जाए क्योंकि यह चुनाव और राजनीतिका प्रश्न है। इससे देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी की मानसिक स्तर का पता चलता है।

पिछले दिनों दुनिया के सबसे बड़ा सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत ने तीन दिवसीय विमर्श में एक पत्रकार द्वारा पूछे गए प्रश्न के जबाव में जब यह कहा कि श्रीराम जन्मभूमि राष्ट्रीय अस्मिता का प्रश्न है और इसके बारे में संतों के उच्चाधिकार समिति के द्वारा लिए जाने वाले निर्णय से हम बंधे हैं तो स्वभाविक पिछले पच्चीस छब्बीस वर्षों में पैदा हुए नई पीढ़ी ने श्रीरामजन्मभूमि आंदोलन के स्वरूप, इतिहास एवं भारतीय राजनीति पर इसके पड़े हुए प्रभावों का अध्ययन नहीं किया होगा। सरसंघचालक डॉ मोहनराव भागवत जी के इस वक्तव्य ने इतिहास के आइने में राम मंदिर आंदोलन को देखने के लिए मजबूर कर दिया।

भारतीय जनता पार्टी ने 1989 के पालनपुर प्रस्ताव के जरिए राम जन्मभूमि के विषय को अपनी घोषणापत्र में शामिल किया था। आज यह विषय इस  कारण से बहुत ज्वलंत स्थिति में है कि 5 अक्टूबर को उस उच्चाधिकार समिति की बैठक है जिसने अक्टूबर1990 में इस दिल्ली के अंदर बैठक कर पहली बार कारसेवा करने का निर्णय लिया था। तब भी बैठक आर के पुरम हुई थी। उसके बाद 5 दिसंबर 1992 को अयोध्या में ही बैठक कर कारसेवा का निर्णय लिया था फलस्वरूप ढांचा ध्वस्त हो गया। इसके बाद ऐसी परिस्थितियों में जब मुकदमे के एक हिस्से इस्माइल फारुखी केस में इस्लाम में इबादत के लिए मस्जिद की अनिवार्यता जैसे गैर जरूरी मुद्दों को उठाकर सुप्रीम कोर्ट का समय खराब करने के अलावा कांग्रेसी वकीलों ने और कोई काम नहीं किया। इसके बाद 29 अक्टुबर से सुनवाई प्रारंभ करना और 3-4 नवंबर को दिल्ली के अंदर हिन्दु संतों की बड़ी बैठक का होना स्वभाविक है इस विषय में आग ही भरेगा। मानसिक रूप से मुसलमानों ने कानून की दृष्टि से तो पराजय स्वीकार कर ली, लेकिन व्यवहार में यह विषय जितनी ही देर होगा और सरकार बदल जाने की स्थिति में सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित है यह कहकर ठीक उसी प्रकार फैसले में देरी कराएंगे जैसे की पिछले आठ वर्षों में किया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ द्वारा 2010 में ही यह निर्णय दिया जा चुका था कि वह भूमि जिसे श्रीराम जन्मभूमि कहते हैं, उसका स्वामित्व भगवान रामलला के पास है और किसी भी पक्ष ने यह मांग नहीं की थी कि इस भूमि का बंटवारा कर दियाजाए। तो किसके इशारे और आदेश पर एक माननीय जज साहब ने राम जन्मभूमि के तीन टूकड़े करने के आदेश दिए और उसमें से एक टूकड़ा सुन्नी वक्फ बोर्ड को पकड़ा दिया। यह सारे प्रश्न मन में यह संशय पैदा करते हैं कि कहीं न कहीं श्रीराम जन्मभूमि के मुकदमें पर राष्ट्र और हिन्दु हितों के आगे दलीय हितों की प्रतिबद्धता ने इस मसले को इतना लंबा लटकाए रखा। इस्माइल फारूखी के केस में पांच जजों की बेंच का फैसला था। दुबारा इस विषय को खड़ा करना यह कहते हुए कि इस केस में हम इसलिए हार रहे हैं कि पिछले फैसले में मस्जिद को इस्लाम का अनिवार्य अंग नहीं माना गया था। अगर उच्चतम न्यायालय यह स्वीकार कर लेता तो सात जजों की संवैधानिक पीठ जब तक फैसला नहीं दे देती तब तक रामजन्मभूमि के मामले पर सुनवाई भी शुरू नहीं हो पाती और राजीव धवन और कपिल सिब्बल के नेतृत्व में कांग्रेस का षड्यंत्र सफल हो जाता।

उच्चतम न्यायालय में सुनवाई के दौरान जिस तरीके की रणनीति न्यायालय के अंदर अपनाई गई कि पहले तो यह तर्क कि भाजपा के घोषणापत्र में है इसलिए 2019 तक मुकदमा न सुना जाए उसके बाद राजीव कुमार धवन द्वारा सुप्रीम कोर्ट के उस महत्वपूर्ण समय जहां पांच से सात मिनट में एक मुकदमें का फैसला हो जाता है वहां प्रत्येक सुनवाई में औसतन दो घंटे में से एक घंटा पचास मिनट मस्जिद की अनिवार्यता के लिए बहस करना दूसरी कपिल सिब्बल द्वारा चीफ जस्टीस के विरूद्ध महाभियोग लाने की प्रक्रिया का नेतृत्व करना, राम जन्मभूमि की विषय को लटकाने की गहरी साजिश की तरफ इशारा करता है।

पहले यह मुकदमा राम जन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता था लेकिन जब मुसलमानों को यह अहसास हुआ कि मस्जिद खुदा के अलावा और किसी के नाम पर बन ही नहीं सकती और इस्लाम के अंदर मस्जिद बनाने की कुछ निश्चित शर्तें हैं, जिस जमीन पर मस्जिद बनी है वह जमीन किसी ने दान में दी हो, अथवा वह जमीन अपने हक और हलाल के पैसे से खरीदी गई हो। फसादी जमीन पर मस्जिद नहीं बनाई जा सकती। फर्ज नमाज है न कि मस्जिद। इन तर्कों के सामने आने के बाद मुसलमानों ने खुद ही मुकदमें की टाइटल बदलने का फैसला किया। सुप्रीम कोर्ट में चल रही मुकदमें की टाइटिल राम जन्मभूमि बनाम विवादित ढांचा है। जब मुस्लिम पक्षकार ने उसे विवादित ढांचा मान लिया मस्जिद मानने से इंकार कर दिया तो राजीव धवन और कपिल सिब्बल किसके पक्ष में बहस कर रहे थे? दूसरी तरफ यह कहना कि एक बार जो मस्जिद बन जाती है वह जगह मस्जिद की ही रहती है यह कोर्ट और इस्लाम को बरगलाने जैसी बात है। सूर-ए-तौबा आयत 119 में मस्जिदे जरार का जिक्र है, रशुल मोहम्मद साहब ने स्वयं खड़े होकर मस्जिद तुड़वाई थी यह कहते हुए कि जब मस्जिद साजिशों का अड्डा बन जाए तो इबादतगाह नहीं बचती है इसलिए उसको गिरा ही देना चाहिए।

अगर 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या के अंदर कारसेवकों ने एक क्षण के लिए हम मान भी लें कि यह मस्जिद थी और गिरा दिया तो मोहम्मद साहब के वसुलों का ही तो पालन किया। अगर हम इतिहास, धर्म, और धार्मिक ग्रंथों के आइने से देखें तो श्रीराम जन्मभूमि को विवादित करने के पीछे इस देश में धर्म के आधार पर विभाजन के बाद भी मुसलमानों को रोक कर रखना, फिर हिन्दुओं का भय दिखाकर उनको वोट बैंक में बदल देना फिर देश के बहुसंख्यक समाज पर यह आरोप लगाना कि वह रामजन्मभूमि के बहाने बहुसंख्यक सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति कर रहे हैं और तथाकथित वामपंथी कुतर्कियों के द्वारा यह तर्क देना कि अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता से बहुसंख्यक सांप्रदायिकता ज्यादा खतरनाक होती है और इन्हीं तर्कों के आधार पर भगवा आतंकवाद जैसी एक नई थ्योरी गढ़ना और बार बार बहुसंख्यक हिन्दु समाज को अपमानित करने के लिए रोज नए तर्कों के साथ प्रस्तुति देश को किस दिशा में ले जा कर खड़ा करेगा?

यह महज संयोग नहीं है कि पांच अक्टुबर को दिल्ली में श्रीरामजन्मभूमि उच्चाधिकार समिति की बैठक, 29 अक्टूबर से उच्चतम न्यायालय में सुनवाई और तीन चार नवंबर को भारत भूमि पर जन्में सभी संप्रदाय के संतों के द्वारा धर्मादेश का उद्घोष, यह देश नए कलेवर, नए धार्मिक आंदोलन की तरफ तेजी से बढ़ रहा है। जिन पीढियों ने उच्च संस्कार आधारित धार्मिक आंदोलनों को नहीं देखा है, आज तकनीकी युग में तकनीक से लैस पीढी के दौर में भारत के अंदर धार्मिक आंदोलन देश समाज की दिशा तय करेगा|

स्वामी जीतेन्द्रानंद सरस्वती

(लेखक अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय महामंत्री हैं)

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