रामभक्त या भीतरघाती : आसान नहीं है विभीषण होना

रजनीश राज

रामायण भारतीय मानस की सबसे सरल किन्तु गहन और उदात्त अभिव्यक्ति है। इतिहास राम को प्रायः कम जानता है लेकिन साहित्य ने लगभग ३०० तरह से राम का व्यक्तित्व गढ़ा है। महाकवि गुप्त ने ठीक ही कहा है …
“राम तुम्हारा वृत स्वयं ही काव्य है
कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है”
लेकिन राम कथा की लोकप्रिय स्वीकृति की विडंबना यह है कि लोग राम की वन्दना तो करते है लेकिन विभीषण पर भीतरघात का आरोप लगाते हैं। कई लोग तो मेघनाद और कुंभकर्ण की भी सराहना करते हैं क्योंकि वो अपने राजा के पक्ष में लड़े। इस मान्यता का मूलाधार देश और राष्ट्र के प्रति प्रेम में निहित है। लेकिन राम को सत्य का साकार मानने वाले भी यदि विभीषण की भर्त्सना करें तो यह एक असंगत और अन्त:विरोधी विचार है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह विचारहीन व्यवहार की जीवन दृष्टि है।

सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि विभीषण का विरोध वस्तुतः राम का ही विरोध है अन्यथा रामायण की तो मूल संकल्पना ही राम बनाम रावण यानि कि सत्य बनाम असत्य , न्याय बनाम अन्याय और सदाचार बनाम दुराचार की है। इसमें विभीषण यदि राम के साथ था तो वह सत्य के साथ था और उसे आरोपित करने वाली लोकप्रिय चेतना इतनी सतही है कि एक सच्चे राम मार्गी को हम रावण के द्वारा दिए शब्दकोश से से ही सम्बोधित करते हैं।

इस क्रम में यह भी स्मरणीय है कि उत्साही राष्ट्रवादियों ने राष्ट्र के बहुत ही एकांगी और अमंगलकारी रूप को समक्ष रखते हुए रावण और अन्य राक्षस योद्धाओं के साथ वृंदगान किया है।यदि राष्ट्र और रावण एक दूसरे का पर्याय है तो मानव और सभ्यता को राम एवं रावण के बीच के चयन के द्वंद्व से गुजरना ही होगा। यहाँ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि स्वयं राम भी राष्ट्रवादी थे जो “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरयसी” के आदर्श को मानते थे। यहाँ तक कि उन्होंने लंका के राजा को हरा कर भी उस राज्य को अपने अधीन नहीं किया क्योंकि राम की शक्ति लोकमंगल के पक्ष में थी। वो साम्राज्यवाद से प्रेरित नहीं थे इसीलिए उन्होंने सदाचारी विभीषण को लंका का सम्प्रभू शासक बनाया। पुनः यह भी स्मरणीय है कि विभीषण कभी भी सत्ता लोलुप नहीं दिखे थे। पहले उन्होंने रावण को सही का मार्ग दिखाया और जब अपने मत के कारण अपमानित किये गये तो वह राम की ओर मुड़े। यहॉं यह भी ध्यान रखना चाहिए कि विभीषण के विकल्प का कारण उसका अपमान भी नहीं था। वस्तुतः जब रावण ने उसे विकल्पहीन कर दिया तब जाकर वह राम के मार्ग पर चले गये। वस्तुतः विभीषण का पक्ष यह था कि राजा राष्ट्र का पर्याय नहीं होता है। वस्तुतः विभीषण भी राष्ट्रवादी थे और उनका राष्ट्रवाद लोकमंगल पर आधारित था जो अपनी प्रजा के हित में राम से युद्ध नहीं शांति का पक्षधर था। विभीषण जब राम से मिले थे तब भी लंका की प्रजा का हित राम से उसकी वार्ता के केन्द्र में था।

वस्तुतः राम और विभीषण का संयोग स्वतंत्र राज्यों के बीच सह अस्तित्व पर आधारित “वसुधैव कुटुम्बकम”की संकल्पना का साकार था। स्मरणीय है कि राम और रावण की लड़ाई न तो दो राष्ट्रों की लड़ाई थी और न ही दो संस्कृतियों की। इसीलिए लक्ष्मण ने देवी निकुम्बला की पूजा के पहले ही मेघनाद वध किया। शिव और ब्रह्मा, राम और रावण दोनों के लिए पूजनीय थे। राम नर रूप में नारायण थे जबकि रावण और मेघनाद को नारायण अस्त्र पर ही नाज था। गहराई से देखें तो राम पराक्रम और शक्ति की पराकाष्ठा के समक्ष नर की प्रतिष्ठा का प्रतीक थे। वो साधारण में असाधारण की सम्भावना का प्रतिनिधि थे। वास्तव में यह दो मूल्यों की लड़ाई थी जिसमें एक तरफ़ शक्ति का दर्प और दुरूपयोग था तो दूसरी तरफ़ दुष्ट दलन का भाव था। एक तरफ़ जहां अति को अनन्त समझने का अज्ञान था वहीं दूसरी ओर अनन्त को अंतिम इकाई तक ले जाने की सद्धबुद्धि थी।राष्ट्र और राम दोनों को मंगलमूर्ति बनाना है तो विभीषण को यथोचित सम्मान देना होगा।

विभीषण की कहानी का एक पक्ष कुलघातक से जुड़ा है। उन्होंने ही रावण और मेघनाद की मृत्यु का रहस्य बताया था। वस्तुतः विभीषण ने ऐसे प्रत्येक मामले में भावात्मक द्वंद्व से गुजरते हुए सत्य का संधान किया और सत्य के लिए अपने प्रिय और परिजन का मृत्यु शोक स्वीकार किया। वस्तुतः रामायण में सत्य के लिए विभीषण के द्वारा अनाचारी परिजनों के त्याग और पराभव में योगदान की कहानी अप्रतिम और आदरणीय है। रावण को परिजन मानकर यदि आप सीता हरण का साथ देने के लिए तैयार हैं तो आपका यह मूल्य द्रौपदियों के चीरहरण पर मौन रह कर हमेशा दुर्योधन का मनोबल बढ़ाएगा ।

व्यक्ति से बड़ा कुल होता है और कुल से बड़ा होता है देश। देश हित का पालन करते हुए यदि जगत कल्याण का मार्ग उपलब्ध हो तो यही मंगलकारी है। इस कसौटी पर देखें तो विभीषण का व्यक्तित्व भीष्म, द्रोण और कर्ण की तुलना में सत्य के ज़्यादा क़रीब था। भीष्म ने वचन निभाने के लिए कुल की मर्यादा और स्वयं के कुल दोनों का दम घुटने दिया। द्रोण की राजभक्ति ने उसे सत्य का प्रतिगामी बना दिया । कर्ण की मित्रता और अहसान ने हमेशा ही उसे सत्य से विमुख ही रखा। इन सभी विभूतियों की विशेषता यह थी कि ये महान पराक्रमी योद्धा और निजी जीवन में त्याग और बलिदान का प्रतीक पुरूष थे लेकिन सत्य के प्रति इनका परिप्रेक्ष्य ग़लत था। ये सत्य और धर्म के विरुद्ध ही धर्मयुद्ध में उतरे और अंततः भगवान को इनके विरुद्ध असाधारण उपाय कर इन्हें मार्ग से हटाना पड़ा जबकि विभीषण स्वयं भगवान के लिए सहायक सिद्ध हुए । विभीषण होना रामभक्त होने की चरम अवस्था है ।

(लेखक सिहन्ता आईएएस के निदेशक हैं)

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