ऋषि के रास्ते सिने सफ़र

रजनीश राज

जब ये जोकर बन पहली बार पर्दे पर आए तो बड़े पर्दे पर पहली बार एक स्कूली छात्र का अपनी शिक्षिका के प्रति क्रश को अभिव्यक्ति मिली । जब वह बॉबी का राज बने तो बॉलीवुड में पहली बार ‘टीन एज लव’ को बड़े पर्दे की अभिव्यक्ति मिली। ऋषि के माध्यम से ही गिटार पहली बार भारतीय संगीत और स्टाइल का लोकप्रिय हिस्सा बना। ऋषि कपूर ने सरगम में डफली पर जो रंग जमाया उसे देखते हुए आज भी कई लोग यह कहते हैं कि उनके जैसी डफली और कोई नहीं बजा सकता ।

कपूरों का ऋषि चला गया। अध्ययन में अधूरा लेकिन ज्ञान में गहन था वह ऋषि । विनम्र इतना कि कोई भी उनका मुरीद हो जाए और मुखर इतना कि किसी की भी खबर ले ले । उनके इस स्वभाव से ट्विटर पर उनके ३.५ मिलियन फोलोवर बेहतर तरीक़े से वाक़िफ़ है। अपने घर की बात हो या मन की बात ; ऋषि सहज भाव से इसे दुनिया के सामने रख देने के मामले में ऋषियों की ही तरह निर्लिप्त , निर्द्वंद्व और निर्भीक थे।’ उनकी जीवनी ‘खुल्लम खुल्ला’ में ऋषि कपूर ने जो भी लिखा वह मानो इस भाव से लिखा कि ‘कहना था सो कह दिया अब कुछ कहना नाहीं’। बॉलीवुड के शोमैन का लड़का जन्मना ही नहीं शौक़ और संस्कार से भी पंजाबी था। ३ सदस्यों के परिवार वाले ऋषि के घर की रसोई इतनी बड़ी है कि आप इसके अन्दर वॉलीबॉल खेल सकते हैं । खाने-खिलाने और पीने-पिलाने का इस शौक़ ने एक तरफ़ जहां ऋषि के जीवन को आलीशान बनाया वहीं अंत में यह उनके स्वास्थ्य का हंता भी बन गया। नामुराद कैंसर कपूर परिवार का तीसरा चिराग़ ले गया। ये आसमान में कैसी बिजली कौंधी कि दो दिन में ही दो सितारा लील गई।’

‘१०२ नोट आउट’ के रील लाइफ़ का ७६ साला बाबूलाल भले ही लगभग १० साल पहले ही आउट हो गया लेकिन ६७ साला आयु वाले ऋषि ने अपना ६४ साल रील लाइफ़ को दिया। इसलिए ऋषि की आयु भले ही कुछ कम पड़ गई पर बॉलीवुड में उनका योगदान पर्याप्त , उल्लेखनीय, स्पृहणीय, आदरणीय और अनुकरणीय है।

जब ये जोकर बन पहली बार पर्दे पर आए तो बड़े पर्दे पर पहली बार एक स्कूली छात्र का अपनी शिक्षिका के प्रति क्रश को अभिव्यक्ति मिली । कला मानव के अंतर्मन की अभिव्यक्ति मात्र नहीं होती , बल्कि इसके माध्यम से कलाकार अपना अनुभव साझा कर लोगों का सत्य से साक्षात्कार कराते है और जीने की राह भी बताते हैं । आगे चलकर बॉलीवुड में इस विषय पर कई फ़िल्में बनी। जब वह बॉबी का राज बने तो बॉलीवुड में पहली बार ‘टीन एज लव’ को बड़े पर्दे की अभिव्यक्ति मिली। २१ वर्षीय ऋषि अगले ३० वर्षों तक भारतीयों के लिए प्रेम की पाठशाला बने रहे। सन ७० के बाद बॉलीवुड ने एक तरफ़ जहां अमिताभ के माध्यम से युगीन मोहभंग और आक्रोश को अभिव्यक्त किया वहीं ऋषि आज़ादी के बाद जन्म लेने और युवा होने वाली पहली पीढ़ी के प्रेम और स्टाइल का आयकॉन बन गए । ऋषि के माध्यम से ही गिटार पहली बार भारतीय संगीत और स्टाइल का लोकप्रिय हिस्सा बना। वास्तव में यह कहा जा सकता है कि ऋषि ने क़र्ज़ फ़िल्म में जब अपने उमर के नौजवानों का आवाहन किया तो गिटार बैठकर परफ़ॉर्म करने की परम्परागत भारतीय पद्धति से अलग आज़ाद ख़्याल भारतीयों की प्रदर्शन कला का प्रतिनिधि उपकरण बन गया। यह भी कह सकते हैं १९०५ की कला की स्वदेशी धारा लगभग ७५ वर्षों के बाद पश्चिम के साथ तालमेल की ओर मुड़ी । संगीत के मामले में ऋषि राज कपूर का वास्तविक अंश थे। गिटार के साथ ही ‘दर्दे दिल दर्दे जिगर’ के माध्यम से वायलिन को भी ट्रेंडी बनाने में ऋषि का अहम योगदान रहा। ऋषि कपूर ने सरगम में डफली पर जो रंग जमाया उसे देखते हुए आज भी कई लोग यह कहते हैं कि उनके जैसी डफली और कोई नहीं बजा सकता । यह चर्चा तब फिर गर्म हो गई थी जब उन्होंने कोरोना वारियर्स के सम्मान में थाली बजाया था ।

ध्यातव्य है कि ऋषि ने प्रेम के सिर्फ़ स्टाइलिश स्वरूप को अभिनीत नहीं किया। बॉबी भारतीय सिनेमा में वर्ग बनाम प्रेम के संघर्ष का ट्रेंड भी सेट किया। बॉबी आज भी रूस में सबसे ज़्यादा देखी गई २० फ़िल्मों में से एक है। लैला मजनू में इश्क़ मिज़ाजी इश्क़ हक़ीक़ी में तब्दील होते नज़र आती है। प्रेमरोग में प्रेम एक ही साथ वर्गीय ,सामन्ती एवं पुरूषवादी तीनों ही सत्ताओं से टकराता है। हिना में प्रेम खोने और पाने की तमाम सीमाओं से दूर घृणा की स्याही से खींची राजनीतिक लकीर को मिटाते हुए शहीद हो जाता है और अंत में शक्ति और सत्ता के विरुद्ध एक प्रश्नचिन्ह बन जाता है। सरगम मे प्रेम सादगी, सात्विकता और समर्पण का आदर्श लेकर आया था तो नगीना का प्रेम किट्स की ‘लाम्या’ की तरह स्वच्छंदतावादी है जिसमें पुरुष नागिन में भी अपनी प्रेमिका देखता है और भारतीय प्रेम का आदर्श अपने वैचारिक वितान का विस्तार करते हुए किट्स से आगे बढ जाता है , जिसमें नागिन भी प्रेम करने लगती है। प्यार की ऐसी ही कई और परतें छिपी हैं जिसका उद्घाटन इस संक्षिप्त आलेख में सम्भव नहीं है। मोटे तौर पर ऋषि कपूर को एक तरफ़ जहां अमिताभ के युग की वैकल्पिक धारा कह सकते हैं वहीं उन्हें बॉलीवुड की दीर्घ क़ालीन परम्परा के एक पड़ाव की तरह भी देख सकते हैं जिसकी पिछली कड़ी राजेश खन्ना से जुड़ती है और अगली कड़ी शाहरुख़ खान से।

पारिवारिक फ़िल्मों पर भी ऋषि कपूर की विशेष छाप रही । भाई -मित्र- पुत्र- पिता और पति सभी स्तरों पर ऋषि ने परिवार के मूल्य एवं ढाँचा और सत्ता की शक्ति के मामले में द्वन्द्व उपस्थित करने वाली फ़िल्मों में काम किया। सही अर्थों में कहें तो ऋषि कपूर की फ़िल्मों ने मध्य एवं निम्न मध्य वर्गीय भारतीय परिवार से जुड़े कई मूलभूत प्रश्नों को उठाया और इसका समाधान भी देने का प्रयास किया। इसमें नायिका प्रधान फ़िल्मों में ऋषि की भूमिका सशक्तिकरण की ओर बढ़ती भारतीय महिलाओं के प्रति पुरुषों की सहायक भूमिका का प्रतिनिधित्व करती है। दामिनी से लेकर घर-घर की कहानी या बड़े घर बेटी तक ऋषि ने ऐसी ही भूमिका निभाया। ऋषि ने इसी तरह की भूमिका ‘एक चादर मैली सी ‘से लेकर ‘मुल्क ‘तक में भी निभाया । इस दौर में एक तरफ़ अमिताभ ने जहां पिंक बनाया वही ऋषि कपूर ने मूल्क।

जीवन कई परतों के आवरण में छुपी हुई मृत्यु ही तो है । मनुष्य प्रति पल उसी दिशा में जाता रहता है। इसी क्रम में बचपन के बाद जवानी आती है और इसके बाद बुढ़ापा द्वार खटखटाता है। बॉलीवुड पर इसकी मार प्रायः ज़्यादा चोट करने वाली रही है क्योंकि ५० की अवस्था के बाद ज़्यादातर स्टार रिटायर्ड या लगभग रिटायर्ड की भूमिका में चले गए । लेकिन इस मोर्चे पर भी ऋषि कपूर अमिताभ बच्चन की ही तरह उल्लेखनीय हैं। इस दौरान ऋषि ने अपनी भूमिकाओें के प्रति प्रयोगधर्मिता का विशेष परिचय दिया जिसमें से ‘दो दूनी चार ‘का द्वंद्व ग्रस्त मध्य वर्गीय पिता और शिक्षक से” होकर’स्टूडेंट् ऑफ ईयर ‘का समलैंगिक और प्रतिबद्ध शिक्षक आदि के साथ ही औरंगजेब और डी-डे में दाउद इब्राहीम की भूमिका उल्लेखनीय है। २००८ में उन्हें फ़िल्म फ़ेयर लाइफ़ टाइम अचिवमेंट अवार्ड दिया गया। २००९ में रूसी सरकार ने सिनेमा में योगदान के लिए उन्हें सम्मानित किया। लेकिन ऋषि की यात्रा इसके बाद भी चलती रही। २०१० में उन्हें लव आजकल के लिए सम्मानित किया गया। दो दूनी चार के लिए उन्हें २०११ का फ़िल्मफ़ेयर क्रिटिक्स अवार्ड फ़ोर बेस्ट एक्टिंग दिया गया। २०१३ में टोइफा ने ऋषि कपूर को अग्निपथ में उनकी निगेटिव भूमिका के लिए बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड दिया । इसके बाद २०१७ में कपूर एंड सन्स में उनकी भूमिका के लिए भी फ़िल्म फ़ेयर नें इन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का अवॉर्ड दिया। जी सिने अवार्ड ने इसी भूमिका के लिए ऋषि कपूर को बेस्ट कॉमिक एक्टर का अवार्ड दिया। सही अर्थों में ऋषि महान और विलक्षण अभिनेता थे । राज (बॉबी) से रउफ लाला (अग्निपथ) तक की यात्रा वास्तव में अभिनय का पूरा का पूरा पाठ्यक्रम है । इस लोमहर्षक यात्रा के बारे में अंत में बस इतना ही कह सकते है कि :-

‘बड़े शौक़ से सुन रहा था ज़माना
तुम्हीं सो गए दास्ताँ कहते कहते’

ऋषि स्टारडम की चकाचौंध वाली दुनिया के उन दुर्लभ लोगों में से एक थे जो सामाजिक -राजनीतिक विषयों पर भी अपनी बेबाक़ राय रखते थे। उनका विचार इसलिए भी उल्लेखनीय है कि उनकी बातें न तो किताबी थी और न ही राजनीतिक या तिजारती। उम्मीद है कि बॉलीवुड की यह दबी हुई प्रवृत्ति हॉलीवुड की तरह परिपक्वता हासिल कर सके। यदि ऐसा हो सका तो कला सार्थक हो जाएगी । वस्तुतः यह एक विडंबना है कि मुझे हॉलीवुड प्रेरित कर रहा है जबकि परम्परा को देखें तो पश्चिमी कला प्रायः मनोरंजन प्रधान थी और भारतीय कला लोकमंगल की भावना से प्रेरित थी। हे ऋषि! ईश्वर करे कि सब के सब’प्रेमग्रंथ ‘पढ़ें और ‘प्रेमरोगी’ हो जाएँ । यही ‘तहज़ीब ‘हमारे ‘मुल्क’ को सच्चा ‘घर परिवार ‘बना सकता है।

‘द बॉडी ‘चला भी गया तो क्या ! पंचतत्व से मेल ही उसकी अंतिम गति है। आत्मा अमर है और अमर है वह कर्ता जिसकी कीर्ति अमर है। सद्गति की मंगलकामना के साथ भावभीनी श्रद्धांजली!!

(लेखक सिहंता आईएएस के निदेशक हैं)

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