सभ्यताओं की संरक्षक हैं नदियां

भागीरथी के स्वर, वर्ष 2, अंक:19, फरवरी 2017

नदियां, हमेशा पूरी धरती पर सभ्यताओं की पोषक रही हैं। नदियां खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक भी रही हैं। यकीनन ये जीवन रेखाएं थीं पर अब यही जीवन रेखाएं या तो विलीन हो रही हैं या गंभीर संकट से जूझ रही हैं। हमारी संस्कृति में नदियां वंदनीय रही हैं। उनकी पूजा हमारी परंपरा है। धरती पर गंगा के अवतरण की कथा युगों-युगों से हमें प्रेरित करती रही है और आगे भी भारत की पीढ़ियों को रोमांचित करती रहेंगी। नदियों के बारे में ठीक ही कहा है कि नदी और संत के उद्गम नहीं पूछना चाहिए क्योंकि दोनों ही कल्याणकारी होते हैं।

कावेरी नदी के उद्गम का उल्लेख पौराणिक आख्यानों में मिलता है। वह ऋृषि अगस्त्य के कमंडल से निकली थी। चोल साम्राज्य में कला, संगीत और साहित्य की ऊंची परंपराएं कावेरी के तटों पर फली और फूली। कावेरी के तट पर तंजावुर मैसूर में कर्नाटक संगीत का उद्भव और विकास हुआ। त्यागराज, श्यामा शास्त्री, मुथुस्वामी जैसे महान लोगों द्वारा उत्कृष्ट परंपराओं का जन्म हुआ। बंगाल की खाड़ी में गिरने से पहले कावेरी तटों पर ही मंदिरों, शिल्पों और संस्कारों की महान परंपराओं का सृजन हुआ और संरक्षण मिला।

भारत ही क्यों, विश्व के अनेक भागों में नदियां सभ्यताओं की सरंक्षक रही हैं। किसी भी देश के विकास में नदियों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। सतही जल की विशाल चलती-फिरती जलराशि ये नदियां अपने किनारे बसी आबादी, बस्तियों की सुरक्षा, संपन्नता और खुशहाली का भरोसा दिलाती हैं। ये संरक्षित सदानीरा नदी हमेशा जीवनदायिनी होती हैं। जहां भी जीवन में चमक, उत्साह और गति होगी, समझिए आस-पास नदी व्यवस्था होती है। जो वहां के भूगोल, भौगोलिक रचनाओं और परिवर्तन के साथ आसपास के जीवन और पारिस्थितिक तंत्र पर टिकी रहती हैं। कोई भी परिवर्तन या प्राकृतिक व्यवस्था से छेड़छात्र नए संकट पैदा करती है। वर्तमान दौर के विकास ने भी इस तरह के संकट पैदा किए हैं। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ने भी दुनिया में पानी की स्थिति को बहुत गंभीर माना है।

एशिया और अमेरिका के घनी आबादी वाले क्षेत्रों में होकर बहने वाली नदियों की एक तिहाई आबादी जीविका और पेयजल के लिए नदियों पर निर्भर हैं। सन 1999 तक 31 देशों के 45 करोड़ लोग पानी को तरसते थे, जल व्यवस्थाओं के प्रति लापरवाह रवैया 2035 तक 43 देशों की एक अरब आबादी के लिए नई मुसीबत बन कर आएगा। सन 2025 तक भारत सहित 48 देशों में पीने योग्य पानी नहीं होगा। पानी की प्रति व्यक्ति उपलब्धता जो 1950 में 6008 घनमीटर प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष थी, अब घटकर 1200-1400 घनमीटर नीचे जा चुकी है। यह क्रिटिकल स्थिति का संकेत है।

गंगा सिंचाई हेतु अतिदोहन के साथ-साथ भीषण प्रदूषण की भी शिकार है, वहीं दूसरी ओर अन्य नदियों पर जलवायु के खतरे हैं। आज गंगा और सिंधु सर्वाधिक दस खतरों में पड़ी नदियों में शामिल हैं। भारत, पाकिस्तान औऱ बांग्लादेश में इन नदियों के किनारे बसी आबादी पर अब आजीविका के संकट बढ़ रहे हैं। गंगा के पानी 40 प्रतिशत भाग हिमालय के उद्गम पर स्थित ग्लेशियरों के पिघलने से निकलता है, शेष साठ प्रतिशत जल सहायक नदियों सहित अन्य स्त्रोतों से मिलता है। सूखे मौसम में भी गंगा का बहाव ग्लेशियरों के पिघलने से ही रहता है। मौसम के बदलाव और तापक्रम में वृद्धि के कारण अब ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। आज इन ग्लेशियरों के पिघलने की दर 21 मीटर प्रति वर्ष हो चुकी है। खतरा तो ये भी है कि कुछ वर्षों के बाद संभव है, गंगा समुद्र तक ही न पहुंचे। कारण साफ है, जल का बेइंतहा दोहन और खौफनाक प्रदूषण। गंगा और अन्य बड़ी नदियों के किनारे बसे नगरों का करोड़ों लीटर सीवेज और औद्योगिक कचरे का इन नदियों में मिलना हालात को बिगाड़ रहे हैं। गर्मियों में ग्लेशियर के तेज गति से पिघलने से जल का प्रवाह तो रहेगा, पर प्रश्न है, कब तक ? यदि यही हालात रहे तो नदी रुपी जीवनरेखा विलीन न हो जाएं।

गंगा जैसी नदियों का 60 प्रतिशत हिस्सा व्यापक स्तर पर सिंचाई के लिए डायवर्ट हो रहा है। सतही जल तेजी से घट रहा है, भूमिगत जल पर निर्भरता बढ़ रही है। उद्योगों और कर्मकांडों में होने वाले प्रदूषण के कारण जल की गुणवत्ता भी समाप्त हो रही है। इसकी सीधा असर कृषि, पशुधन और मानव स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। जलजनित बीमारियों से प्रतिवर्ष एक लाख से अधिक मौत इसका सबूत हैं। गंगा में मौजूद जीवन नष्ट होने की कगार पर है। एक ओर नदियों पर प्रदूषण की मार है तो दूसरी ओर शहरीकरण, अतिक्रमण, भू-क्षरण जंगलों के विनाश से नई समस्याएं उपजी हैं।

गंगा जैसी नदियों का 60 प्रतिशत हिस्सा व्यापक स्तर पर सिंचाई के लिए डायवर्ट हो रहा है। सतही जल तेजी से घट रहा है, भूमिगत जल पर निर्भरता बढ़ रही है। उद्योगों और कर्मकांडों में होने वाले प्रदूषण के कारण जल की गुणवत्ता भी समाप्त हो रही है। इसकी सीधा असर कृषि, पशुधन और मानव स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। जलजनित बीमारियों से प्रतिवर्ष एक लाख से अधिक मौत इसका सबूत हैं। गंगा में मौजूद जीवन नष्ट होने की कगार पर है। एक ओर नदियों पर प्रदूषण की मार है तो दूसरी ओर शहरीकरण, अतिक्रमण, भू-क्षरण जंगलों के विनाश से नई समस्याएं उपजी हैं। नदियां भारी मात्रा में कचरा और सिल्ट पटने से उथली हो चुकी हैं, नतीजा वो पानी संजोने में नाकाम साबित हो रही हैं। थोड़ी वर्षा में बाढ़ और अल्प वर्षा में सूखा अब आम बात है। देश भर में आने वाले सूखे और बाढ़ इसके जीवंत प्रमाण हैं। गंगा में 109 प्रकार की मछलियां एवं अन्य प्रकार के जलीय जीव विनाश के कगार पर हैं। हिल्सा, पंधास, बाछा, धारी और सोल जैसी अनेक मछलियों की प्रजातियां खतरे में हैं। नदियों में बढ़ता प्रदूषण औऱ घटता पानी इसका मुख्य कारण है। सुंदरवन डेल्टा में प्रवेश करने के बाद गंगा का 90 प्रतिशत पानी निकाल लिया जाता है। सिंधु नदी पर आसन्न खथरा मौसम परिवर्तन से कहीं ज्यादा है।

नदियों की दुर्दशा के लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं। यह आधुनिक विकास के जरिये समूची प्राकृतिक प्रणालियों के तहस-नहस करने का परिणाम है कि ज्यादातर नदियां खतरे में हैं। गंगा का उद्गम पिछले दस वर्षों में 2000 मीटर पिघलकर सिकुढ़ रहा है। समूची धरती पर ग्लोबल वार्मिंग और मौसम बदलाव के असर गंगोत्री के पास ढाबों पर गहमागहमी और मौजमस्ती के लिए जमा होती भीड़ ठीक नहीं है। उद्गम से 40 मीटर के दायरे में जलती भट्ठियां, हजारों लीटर ईंधन का फूंका है जाना, धुआं, गरमी, हिमखण्डों को तेज गति से पिघलाने के लिए काफी है। गोमुख वास्तव में इन सभी क्रियाकलापों से मुक्त होना चाहिए।

चौखंभा का पच्चीस किमी लंबा क्षेत्र है। हिमालय की चौखंभा समूह की चोटियों से जुड़े हिमनद विश्व के सबसे बड़े हिमनद हैं। 7143 मीटर की ऊंचाई से ये हिमनद शुरु होते हैं और चौखंभा से गोमुख के नुकीले छोर पर समाप्त होते हैं। ये छोर 4000 मीटर की ऊंचाई पर हैं। यही भागीरथी नदी हिमनद के नथुने से निकलती हैं और यही देवप्रयाग में अलकनंदा से मिलकर गंगा का निर्माण करती हैं। भागीरथी गंगा का प्रमुख स्त्रोत है। हिमनदों पर अंतर्राष्ट्रीय आयोग द्वारा अध्ययन में चीन, भारत, पाकिस्तान, नेपाल और अफगानिस्तान के वैज्ञानिक शामिल हैं। उद्गम से लेकर समुद्र तक पहुंचने की नदी यात्राएं गंभीर निगरानी और तत्काल सुधार चाहती हैं। इस बात की संभावनाएं लगातार बढ़ रही हैं कि ये नदियां बद से बदतर होगी। छोटी और मौसमी नदियां तो लगभग समाप्त सी हैं, बड़ी नदियों पर आबादी, शहरीकरण, उद्योग और भीषण प्रदूषण का दबाव ऐसे ही रहा तो इनके भी बहुत दिन नहीं बचे दिखते।

शहरों द्वारा नदियों में सभी तरह के विसर्जन तत्काल बंद हों। नदियों के घोर प्रदूषण से जलहानि बंद हों। फॉर्म हाऊस उत्पादों की गुणवत्ता घटी है। आज इस बात की तत्काल आवश्यकता है कि प्रदूषित पानी को स्वच्छ करने के सस्ते तरीके ढूंढ़े जाएं। कम लागत की तकनीक विकसित हो। पानी रिसाइकिल होकर पुन: उपयोग लायक बन सके। कचरे के उपयोग भी खोजे जाएं। कम लागत की तकनीक विकसित हो। गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, सिंधु, नर्मदा के साथ प्रमुख नदियों में प्रदूषण रोककर उनकी सुरक्षा की जाए। गंगा और दूसरी नदियों के एक्शन प्लान का रिव्यू कर राष्ट्रीय नदी संरक्षण को नये सिरे से तैयार किया जाए।

नदी के विनाश से पर्यावरण विनाश के साथ सभ्यता और संस्कृति का विनाश होता है। यह गंभीर सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य समस्याओं के साथ भारी उथल-पुथल का कारण भी बनता है। नदियों के किनारे बसावट और शहरीकरण रुके। शहरों द्वारा नदियों में सभी तरह के विसर्जन तत्काल बंद हो। नदियों के घोर प्रदूषण से जलहानि बंद हों। फॉर्म हाऊस उत्पादों की गुणवत्ता घटी है। आज इस बात की तत्काल आवश्यकता है कि प्रदूषित पानी को स्वच्छ करने के सस्ते तरीके ढूंढ़े जाएं। कम लागत की तकनीक विकसित हो। पानी रिसाइकिल होकर पुन: उपयोग लायक बन सके। कचरे के उपयोग भी खोजे जाएं। कम लागत की तकनीक विकसित हो। गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, सिंधु, नर्मदा के साथ प्रमुख नदियों में प्रदूषण रोककर उनकी सुरक्षा की जाए। गंगा और दूसरी नदियों के एक्शन प्लान का रिव्यू कर राष्ट्रीय नदी संरक्षण को नये सिरे से तैयार किया जाए।

नदियां, सिंचाई योजनाएं से जुडी हैं पर क्या इन नदियों का सिंचाई हेतु समुचित उपयोग हो पाता है। ‘मोर क्रॉप मोर ड्रॉप’ की नीति तस्वीर बदल सकती है। नदी व्यवस्था हजारो साल में बनती है। यह एक कुदरती व्यवस्था है। जरुरी है कि जब भी जल समस्याओं के तर्कपूर्ण हल ढूंढ़े जाएं तब स्थानीय कारकों को अवश्य ध्यान में रखा जाए। किसी नगर की खुशहाली, विकास और समग्र स्वास्थ्य नदी (जिसके किनारे वह बसा है) से ही होती है। नदियों की दुर्दशा है, सो शहरों और उसके किनारे आबाद बस्तियों का भविष्य आंकना कठिन नहीं। अरबों रुपये खर्च करने के बाद भी वे जस की तस हैं। पर्याप्त पानी न होने से गंदगी स्वत: फ्लश नहीं हो पाती। केवल मानसूनी बहाव से ही फ्लश होती हैं। ऐसे में यदि मानसून धोखा दे जाए तब क्या होगा ?

समूची दुनियां के साथ भारतीय उपमहाद्वीप में कहीं वर्षा, कहीं घनघोर वर्षा, अब बदल चुके मौसम चक्र के रुप में सामने है। हम प्रकृति और उसकी व्यवस्थाओं को बिगाड़कर भला क्या पाएंगे? हमारी कोई तैयारी प्रकृति के साथ नहीं है। नतीजे के रुप में कभी प्रलंयकारी बाढ़ तो कहीं सूखा आना तय है। हम हैं, क्योंकि धरती पर पानी है, तो जीवन की संभावनाएं दिखती हैं। हमें चाहिए कि अब प्रकृति की विविधताओं के अनुरुप हल ढूंढ़े जाएं। गलतियों से सीखें। नदियां हों या भूमिगत जल, उपयोग के पहले सतर्कता और प्रत्येक संभावित खतरे का अध्ययन और आकलन जरुरी है। यूनीसेफ ने पहले हैंडपंपों को प्रोत्साहन दिया, बाद में इसे बड़ी भूल माना। गंगा-यमुना की सफाई पर 2000 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, पर हालात नहीं सुधरे। पिछले बीस वर्षों में प्रदूषण और अधिक बढ़ा है। सरकार भी मानती है कि अब सफाई के लिए नये सिरे से प्रयास हों। गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी के साथ बेसिन मैनेजमेंट प्लान हेतु नया काम शुरु करने की योजना है।

कुल मिलाकर नदियां घोर संकट में हैं। कटते जंघल, घटती बारिश, अतिक्रमण और तेजी से बन रहे बांधों ने हालात बिगाड़े हैं। नदियों का कैचमैंट क्षेत्र घट रहा है। जलस्तर नीचे गिर रहा है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर की 227 बड़ी नदियों में से 136 नदियों में पानी का बहाव थम रहा है। इसका मुख्य कारण इन नदियों पर बनने वाले बड़े-बड़े बांध तथा दूसरे निर्माण हैं। नदियों के बहाव में चिंतनीय गिरावट का कारण बहाव मार्ग में भारी मात्रा में गाद का पटाव तथा ढेरों गतिविधियां हैं। इससे पानी की गुणवत्ता घटने के साथ नदियों का इकोसिस्टम चौपट हो रहा है।

मध्यप्रदेश की बात हो और नदियों की बात हो तो नर्मदा की बात होना लाजिमी है। नर्मदा नदी पर अनेक अध्ययनों के नतीजे चौंकाने और चिंता में डालने वाले हैं। नर्मदा के लगातार प्रवाह में ठहराव आ रहा है। कठोरता के साथ प्रदूषण बढ़ रहा है। इसके जल का पीएच कुछ स्थानों पर नौ से ऊपर हो चुका है। वहीं क्षारीयता 400 मिग्रा. प्रति लीटर पाई गई है। घुलनशील ऑक्सीजन की मात्रा घट रही है। अन्य नदियों की तरह इसमें भी बड़ी मात्रा में सीवेज और फैक्ट्रीयों के अवशिष्ट मिलकर इसे जहरीला बना रहे हैं। इसका जलीय जीवन खतरे में है। कई जलीय जीव लुप्त हो चुके हैं। शेष पर खतरे बढ़े हैं। इन जीवों द्वारा पानी के प्राकृतिक शुद्धीकरण में बड़ी भूमिका होती है। मछलियों की 146 प्रजातियों में 106 बची हैं। नदियों के पारिस्थितिकी व्यवस्था तथा संतुलन के खतरे बढ़े हैं। नर्मदा पर बंधे बांधों द्वारा बिजली और सिंचाई के जरिए विकास की बातें होती हैं पर नदी के मूल अस्तित्व और प्राकृतिक स्वरुप में बिगाड़ से उपजे दुष्परिणामों पर भी चिंता और अध्ययन होना चाहिए। नर्मदा का पौराणिक महत्व है, नर्मदा पर सैंकड़ों जनश्रुतियां, किवदंतियां और लोककथाएं प्रचलित है। गंगा, यमुना के साथ नर्मदा हमेशा वंदनीय रही हैं। अमरकंटक में मैकाल पर्वत के उद्गम से लेकर अरब सागर में खम्भात की खाड़ी तक की यात्रा में यह 41 नदियों के साथ मिलकर प्रवाहित होती हैं। मध्यप्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र से बहते हुए इसकी यात्रा पूरी होती है। इसके तट नि:संदेह सुंदर हैं। इसके किनारे जंगल, पहाड़, प्राचीन दर्शनीय स्थल, धार्मिक स्थल मनोहारी हैं। यह सबसे अलग पूर्व से पश्चिम की ओर बहती हैं।

कुल मिलाकर नदियां घोर संकट में हैं। कटते जंघल, घटती बारिश, अतिक्रमण और तेजी से बन रहे बांधों ने हालात बिगाड़े हैं। नदियों का कैचमैंट क्षेत्र घट रहा है। जलस्तर नीचे गिर रहा है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर की 227 बड़ी नदियों में से 136 नदियों में पानी का बहाव थम रहा है। इसका मुख्य कारण इन नदियों पर बनने वाले बड़े-बड़े बांध तथा दूसरे निर्माण हैं। नदियों के बहाव में चिंतनीय गिरावट का कारण बहाव मार्ग में भारी मात्रा में गाद का पटाव तथा ढेरों गतिविधियां हैं। इससे पानी की गुणवत्ता घटने के साथ नदियों का इकोसिस्टम चौपट हो रहा है। भारत की लगभग सभी प्रमुख नदियां इसका शिकार हैं। मौसमी छोटी नदियां तो कब की खत्म हो चुकी हैं, बड़ी नदियों में भी पानी नहीं है। नर्मदा का जलस्तर 2006 में 323 मीटर था जो लगातार नीचे गिर रहा है। बेतवा, केन, चंबल भी खतरे में है। बांधों के कारण डाउन स्ट्रीम में पानी की कमी होती जा रही है। बांधों के आसपास 10-15 किमी. नदी क्षेत्र में शुद्धीकरण तंत्र नष्ट हो रहा है। कम वर्षा में जमा अशुद्धियां और शहरों के ड्रेनेज का गंदा पानी भी अब स्वत: फ्लश नहीं होता है।

नदियां कचराघर तो नहीं। सबके साझा प्रयास उनको जीवन और सुरक्षा दे सकती हैं। लंदन की टेम्स और वाडले अगर जी सकती हैं, तो भारत की नदियां भी बचाई जा सकती हैं। नदियों का भी एक इकोसिस्टम होता है। बहाव के बिना नदियां मर जाती हैं। हमारी नदियां भी जलभराव और बहाव के बिना मर रही हैं। जल का सतत् प्रवाह नदीं में ऑक्सीजन बनाए रखता है। यदि नदी जीवित रही तो वह आबाद बस्तियों को भी जीवन देंगी। सुरक्षित भविष्य की आशा जिंदा रखेगी।

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