शनि … शंका और सच …

अतुल सहाय की कलम से

क्या शनि एक ख़राब ग्रह है ?

क्या शनि हमेशा कुप्रभाव डालते हैं ?

सबसे पहले यह समझना जरूरी है

पहली बात

किसी भी जातक के जीवन में ग्रहों का योगदान सिर्फ इतना है की जातक को ग्रह अपनी दशा में जातक की कुंडली में अपने स्थान / बल / दृष्टि / दूसरे ग्रहों से संबंध के अनुरूप शुभ /अशुभ फल देता है।

दूसरी बात

किसी भी जातक के जीवन में सिर्फ एक ग्रह के आधार पर आंकलन नहीं हो सकता और जब तक पूरी कुंडली का विश्लेषण ना किया जाए।

तीसरी बात

जातक के जीवन का घटना क्रम तात्कालिक ग्रह की महादशा / अन्तर्दशा का विश्लेषण किये बिना किसी भी नतीजे पर पहुंचना तर्क संगत नहीं है। फिर जातक की कुंडली में शनि की साढ़े साती या ढैया का विचार किया जाता है !

पर यहां अभी शनि को चर्चा का केंद्रबिंदु मानते हुए अगर इसकी विवेचना करते हैं और यह समझने का प्रयास करते हैं की शनि की भूमिका क्या है ? वैसे हर ग्रह की एक निश्चित और निर्धारित भूमिका है और उनके प्रभाव और कारकतत्व भी निर्धारित है – विभिन्न ग्रहों का फल निश्चित है…वैसे ही शनि की भूमिका और फल भी निर्धारित है – शनि को ग्रहों में “न्यायधीश” का स्थान प्राप्त है ! शनि – जातकों के जीविका / नौकरी / पद / सत्ता / प्रगति / रोग का कारक है !

यह एक अकाट्य सत्य है की जातक की कुंडली में स्थित ग्रह ही मनुष्य के व्यवहार को संचालित करते हैं।

मजबूत ग्रह की दशा में मनुष्य को पद / सत्ता / शक्ति / धन और कभी कभी असीमित अधिकार भी मिलते हैं ! अब इसका उपयोग या प्रयोग मनुष्य न्यायोचित ढंग से करता है या अनुचित ढंग से – उसका फल – शनि की ढैया या साढ़े साती में – मनुष्य को मिलना निश्चित है ! एक उदाहरण स्वरुप – अगर किसी भी जातक की कुंडली में राहु प्रबल है और अपनी दशा में असीमित/ सत्ता या पद जातक को दिलाता है , तो यह जातक पर निर्भर करता है की उस मजबूत दशा का उपयोग वो कैसे करता है !

और सच यह है की कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है जिसको “उचित या अनुचित” का ज्ञान नहीं है ! ईश्वर ने हर मनुष्य को जन्म के साथ ही “विवेक” भी दिया ! ज्योतिष शास्त्र में यह कहा गया है हर मनुष्य किसी भी काम / कर्म करने से पहले – हमेशा ही अपने अंदर से दो आवाजें सुनता है – एक – “मन” की दूसरी अपनी “आत्मा” की !

सत्ता / शक्ति के प्रभाव से चंचल मन जो सरल लगती है ( इंद्रिय और भौतिक सुख, काम – क्रोध – मद और असत्य से लिप्त) – उसे करने के लिए प्रेरित होती है (हो सकता है की वो काम या कर्म उचित ना भी हो ) – दूसरी आवाज जो अपने “अंतरमन” की होती है..जो “विवेक” से प्रेरित होती है और “कर्म” को करने से पहले सचेत करती है और अगर “कर्म” या काम सही नहीं हो तो उसको करने से रोकती है “सही” या “गलत” के फर्क का संकेत देती है !

अब यह निर्भर करता है की – मनुष्य अपने विवेक की सुनता है या फिर इन्द्रिय सुख के अभिभूत हो – अनुचित को ही अपनाता है – रावण का अंत किसको पता नहीं है रावण जैसा शक्तिशाली-विद्वान्-पराक्रमी राजा को भी अनुचित कर्मों को सुधारने का अवसर मिला

जातक के व्यहार के अनुसार “शनि” अपने ढैया – या साढ़े साती चक्र /दशा में, जातक को उनके द्वारा किये गए सारे “उचित/अनुचित कार्यों का उचित फल – से या तो पुरष्कृत करता है या वो जातक दण्ड पाता है !

शनि का प्रभाव अच्छा या बुरा – जातक के कर्मों पर ही आधारित होता है !

इसी “साढ़े साती” काल में ही विश्व के बहुत बड़े बड़े नेता -बुद्धिजीवी – कलाकार -लेखक और अविष्कारक सर्वोच्च शिखर पर पहुंचे है – यहां तक की माननीय श्री मोदी जी भी इसी साढ़े साती में ही हिन्दुस्तान के प्रधान मंत्री चुने गए – – श्रीमती इंदिरा गाँधी भी इसी साढ़े साती काल में ही सबसे शक्तिशाली प्रभाव में थीं… ऐसे हज़ारों उदाहरण है।