पाबन दा के बहाने शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के देवघर का मालंच

उदय शंकर

बांग्ला कथाओं के रचयिता शरत बाबू जब भी देवघर आए वे ‘मालंच’ में ठहरते थे। यह उनका घर था जिसमें बीमार अवस्था में उनकी सहूलियत के सारे समान थे। सभी सुविधाएं थीं।

‘मालंच’ देवघर के रामेश्वरलाल सर्राफ हाई स्कूल के पीछे था। एक पुराना मकान जिसे कुछ वर्षों पहले गिरा दिया गया। आधुनिकता का लब्बोलुआब और ज़मीन के दलालों ने इसकी भौगोलिक स्थिति बदल दी। स्थानीय कला-संस्कृति पसंद पाबन दा, उमेश कुमार जैसे कुछ लोगों ने बहुत कोशिश की किन्तु नतीजे पर नहीं पहुँच सके। मगर, जिसे युगों तक याद रखा जा सकेगा उसे पाबन दा ने कर दिखाया। इस कोठी की एक पेंटिंग इन्होंने बना ली और आनेवाली पीढ़ियों के लिए यादगार रख दिया। इसके लिए ये चिर काल तक धन्यवाद के पात्र रहेंगे।

इस बात में कोई शक नहीं कि शरतचंद्र चट्टोपाध्याय को अंग क्षेत्र अपने दामन से अलग नहीं कर सकता। अपने आवारा कहे गए इस बेटे को भूल नहीं सकता। भागलपुर हो या देवघर, बरारी हो या रिखिया या फिर लीला मंदिर में उन्होंने बहुत समय बिताए।

देवघर के इस प्रिय घर का नाम शरत बाबू ने ‘मालंच’ रखा था। मालंच का मतलब पानी के आसपास की एक वनस्पति होती है जिसे देवघर में ‘पुनका साग’ बोलते हैं। इसे साग बनाकर खाया भी जाता है जिसमें आयरन और साइट्रिक एसिड के अलावा कई लवण होते हैं जिसे पाचन की बीमारियों के लिए रामबाण माना जाता है। सनद रहे, शरत बाबू पेट की बीमारी से ग्रसित होकर हवा-पानी बदलने देवघर आते-जाते रहे थे।

मालंच शब्द को ‘फुलवारी’ के तौर पर भी प्रयुक्त करने की परंपरा बंगाली भद्रलोक में रही है। अतः इसका एक अर्थ अब फुलवारी भी है।

आपको याद होग कि कविगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ‘मालंच’ नाम से एक कथा अपने जीवन के अंतिम काल में लिखी थी। उनका ‘मालंच’ शरत बाबू के मालंच से अभिप्रेत था।

रवीन्द्र के ‘मालंच’ में शरत के ‘देवदास’ से आगे की बात है। एक विपदा है स्त्री की जो एक पुरुष और दो स्त्रियॉं के बीच की खींचतान है। घर के बहाने स्त्री अधिकार की जो पड़ताल इस कहानी में निहित है वह इसे भी प्रकट करती है कि शरत की देवदासी और अनुगामिनी का दूसरा पक्ष यह है।

यह सभी जानते हैं कि शरत बाबू और रवि बाबू के बीच पटरी नहीं थी जिस पर रिश्तों की रेल चलती। दिखावे की रीति चलती थी वो भी सुभाष चंद्र बोस के कारण।

मालंच के अलावा रिखिया (बैद्यनाथ धाम, देवघर) में उनके मामा रहते थे। वो घर भी अब शायद बिक गया।

जापान में एक कहावत है कि ‘बगीचे का काम कभी ख़त्म नहीं होता। इसका अंत होना इंसान की मृत्यु का परिचायक है।’

क्या हम इसे यूं नहीं परिभाषित कर सकते कि हमारे बगीचे का काम अब खत्म होता जा रहा है? हम अपनी विरासत (Heritage) को खत्म करते जा रहे हैं?

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