अमेरिका-ईरान के बीच संघर्ष की नई ज़मीन तैयार कर रहा स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज़

भास्कर की कलम से

संयुक्त अरब अमीरात के पोर्ट फ़ुजैरा में हुए संदेहास्पद चार ऑयल टैंकर में तोड़ फोड़ या हमला सम्भवतः विश्व का पहला इस प्रकार का हमला होगा, जिसमे हमलावर ने अपने दुश्मन को किसी तरह की क्षति न पहुँचाने के लिए हमला किया हो। हमले में “जान माल की क्षति का अभाव” और हमले के बाद समुद्र में “अत्यधिक कीमती एक बूंद भी तेल का रिसाव न होना ” इस हमले की प्रकृति बताने के लिए काफी है। इस रहस्मय, अनूठे और बचकाने “हमले” के पीड़ित सऊदी अरब और न ही संयुक्त अरब अमीरात ने ही हमले की “प्रकृति” के विवरण साझा किए। इस घटना के बाद जिस तरह अमेरिकी प्रशासन हरकत में आया और अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने अपनी तयशुदा मॉस्को यात्रा रदद् की और अमेरिका ने जिस आक्रमकता के साथ सभी कार्य संपादित किये उससे तो पूरी दाल ही काली दिखती है।

अमेरिका ने इस तोड़ फोड़ के लिए सीधे तौर पर ईरान को जिम्मेदार ठहराया है । जबकि ईरान ने इस तरह के तोड़फोड़ औऱ किसी हमले में शामिल होने से साफ इन्‍कार करते हुए मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। इससे पूर्व तेजी से बदलते घटनाक्रम और खाड़ी क्षेत्र में आक्रामक अमेरिकी सैन्य समन्वय और हमलावर मंशा के बीच ईरान ने अपने प्रतिद्वंदी देशों को चेतावनी दी थी कि अगर अमरीका ने उसे रणनीतिक जलमार्ग का उपयोग करने से रोका तो वह स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज़ को अवरुद्ध कर देगा।

क्यों महत्वपूर्ण है हॉरमुज की खाड़ी

यहां यह जानना आवश्यक है कि विश्व की आर्थिक ,राजनीति और भू सामरिकी और तेल राजनय में हॉरमुज़ की खाड़ी का आखिर क्यों इतना महत्व है । जिसे ईरान इतना महत्व दे रहा है और अमेरिका की रणनीतिक प्रतिष्ठा दांव पर लगी दिख रही है। स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज़ एक 21 मील या 33 किलोमीटर चौड़ी जलसंधि है जो ईरान को ओमान के मुख्य भूमि से अलग करती है जबकि ओमान की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ती है। लेकिन इसका नौवहन मार्ग मात्र दो मील या तीन किलोमीटर चौड़ा है। विश्व स्तर पर खपत होने वाले तेल का लगभग पांचवां हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर गुजरता है। होर्मुज एक अंतरराष्ट्रीय पारगमन मार्ग है जहां विभिन्न एशियाई देशों के साथ साथ यूरोप सहित अन्य महाशक्तियों की निर्बाध ऊर्जा सुरक्षा को यह जलसंधि सुरक्षित करता है।

यहां दो बातें मुख्य रूप से सामने आती है । ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए उच्च गुणवत्ता तथा क्षमता वाले ऑयल टैंकर अमूमन विकसित देशों के होते है और दूसरा चूंकि इन ऑयल टैंकर का बीमा अत्यधिक महंगा होता है, जो साधारणतया अमेरिकी बहुराष्ट्रीय बीमा कंपनियां करती है, यानि हर हाल में ये वैश्विक महाशक्तियां अपने राष्ट्रीय, व्यापारिक एवं भू-सामरिक हितों को सुरक्षित रखने के लिए किसी स्तर तक जा सकती है। इसलिए हॉरमुज़ सहित अन्य कोई भी नौवहन मार्ग जहां से यतायात सुनिश्चित होता है वहां किसी भी तरह की परेशानी अमेरिका के कान खड़े कर देती है और उनके रातों की नींद हराम हो जाती है । हॉरमुज़ जलसंधि का बन्द या आबाध नौवहन में थोड़ी सी भी रुकावट का सीधा मतलब है करोड़ो डॉलर का प्रतिदिन नुकसान जो ये बहुराष्ट्रीय कंपनियां कभी नहीं चाहेंगी। उर्जा सुरक्षा किसी देश की सकल घरेलू उत्पाद और उसकी आर्थिक समृद्धि का मेरूदंड होता है जिसे कोई देश किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता। इसके लिए वह देश विभिन्न मोर्चों पर थोड़े बहुत समझौते भी करने से नहीं चूकता है। भारत ,चीन, सहित अन्य एशियाई देशों की यही सबसे बड़ी परेशानी है। ऊर्जा सुरक्षा निर्बाध गति से इन देशों को निरन्तर मुहैय्या होती रहे इसके लिए सभी राष्ट्रों की नौसेना अपने टैंकरों के साथ साथ इस पूरे “सी लाइन ऑफ कम्युनिकेशन” या SLOC की सुरक्षा और एंटी पायरेसी के आड़ लेकर समुद्र के भीतर और सतह पर पूरे क्षेत्र में गश्त लगाती और आपनी ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करती है।

इसमे अमरीकी सेना नियमित गश्त से गुजरने में अव्वल है। इसी क्रम में खाड़ी के कई हिस्सों में अमेरिका ने सैन्य अड्डे बना रखे हैं। इसमें सबसे अड्डा बड़ा कतर में है जहां पर उसके लगभग 10,000 हजार सैनिक हैं। क़तर के अल उदीद एयर बेस अमरीकी सैन्य बेस पर भी स्ट्रेटोस्फेरिक बमवर्षक बी-52 विराजते हैं । अतीत में अमेरिकी सेना संयुक्त अरब अमीरात में अल धफ्रा एयर बेस और अल उदीद दोनों में अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराते रही है।

इस क्षेत्र में अमेरिकी दिलचस्पी यूँ ही नहीं बढ़ी है, क्यूंकि खाड़ी के अमेरिकी सहयोगी देशों की पूरी ऊर्जा सुरक्षा इस मार्ग से ही तय होता है। इस क्षेत्र के देशों सऊदी अरब, इराक, यूएई, कुवैत, कतर और ईरान के भी ज्यादातर तेल का निर्यात इसी हॉर्मूज जलसंधि से होता है और यह आंकड़ा कम से कम 1.5 करोड़ बैरल्स प्रतिदिन है। स्ट्रेट ऑफ हौरमुज पर प्रत्यक्ष रूप से ईरान की संप्रभुता है जो अमेरिका को फूटी आंख नहीं सुहाता है,जिसको लेकर दोनों देशों के बीच के संबंधों तनावपूर्ण रहे हैं जहां “अमेरिका फ्रीडम ऑफ नेवीगेशन”(आबाध और सुरक्षित नौवहन ) कि वक़ालत करता है वहीँ ईरान का मानना है कि हॉरमुज़ जलसंधि उसका अभिन्न अंग है इसलिए ईरानी नौसैनिक अधिकारियों का मानना है कि इसे ठप्प करना “बस एक गिलास पानी पीने जैसा होगा” ।

शिया बहुल राष्ट्र ईरान सुन्नी शासित खाड़ी मुल्कों के साथ तनाव के चलते अक्सर इस जलडमरू मध्य पर नाकेबंदी की धमकी देता है और अपनी शक्ति प्रदर्शन के लिए हॉरमुज़ जलसंधि उसका पसंदीदा रणक्षेत्र बनता है। बीते मार्च के शुरूआती सप्ताह में आई मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ईरान की ओर से ईरान की खाड़ी और हिंद महासागर के एक विशाल क्षेत्र में तीन दिवसीय वार्षिक नौसेना ड्रिल की शुरुआत हुई । ईरान के नौसैनिक कमांडर रियर एडमिरल होसैन खानजादी के अनुसार ड्रिल हॉर्मुज जलसंधि मकरान तट, ओमान सागर और हिंद महासागर के उत्तर में जलडमरूमध्य में संपन्न हुआ।

इस तरह के नौसैनिक अभ्यास से सबसे ज्यादा नींद हराम अमेरिकी प्रशासन की होती है। वर्तमान के हालात में अमेरिकी प्रशासन इस क़दर घबराया और आक्रोशित है कि उसने अपने मध्यपूर्व (भारत के लिए पश्चिम एशिया) में अपना “पेट्रियॉट मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम” बैटरी की तैनाती कर दी है, दूसरी तरफ उसने खाड़ी में अपना विमानवाहक युद्धपोत यूएसएस अर्लिंगटन भेज दिया है जिसपर आधुनिक एंफीबियस वारफेयर में माहिर साजो सामान और लड़ाकू उपकरण तैनात हैं । ये युद्धपोत यूएसएस अब्राहम लिंकन के साथ खाड़ी में तैनात रहेगा। अमरीकी रक्षा विभाग पेंटागन का कहना है कि कतर के एक सैन्य ठिकाने पर बम बरसाने वाले US B-52 विमान भी भेजे जा चुके हैं। अमरीका ने ईरान को एक ‘स्पष्ट और सीधा’ संदेश देने के लिए मध्य पूर्व में अपना एक यद्धपोत तैनात किया है।

अमरीका क्या कर रहा है।

जब बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति थे तो उन्होंने 2015 में संयुक्त राष्ट्र के पांच स्थायी सदस्य और जर्मनी के साथ मिलकर ईरान से समझौता किया था जिसे P5+1 समझौता कहा गया । इसमें तय किया गया था ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाएगा और ईरान के सभी नाभिकीय प्रसंस्करण फैसिलिटी को आईएईए के निगरानी में रखेगा। यह समझौता विश्वव्यापी राजनीतिक और राजनयिक मोर्चे पर बेहतरीन कामयाबी थी, लेकिन सत्ता में आते ही डोनाल्ड ट्रम्प ने सबसे पहले इस समझौते को रद्द कर दिया और यहीं से ताजा समस्या की शुरूआत हुई है। यह मामला इतनी आसानी से सुलझने का सवाल ही पैदा नहीं होता। ईरान भी चुपचाप बैठने वाला नहीं है क्योंकि उसके लिए तो यह “वजूद “का मसला बन गया है वह अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा अखंडता और संप्रभुता को हवाला देते हुए किसी भी रूप में झुकने को तैयार नहीं है।

ट्रंप प्रशासन, ईरान को जार्ज बुश सीनियर द्वार प्रतिपादित “एक्सिस ऑफ एविल ” यानी “शैतान की धुरी” में एक बार फिर से ईरान को शामिल कर लिया। अमेरिका ने पहले एकतरफा पहल करते हुए ईरान के साथ P5+1 परमाणु संधि से खुद को अलग किया फिर ईरान पर तरह तरह के प्रतिबन्ध लगाए, उसके वाणिज्य और व्यापार को छिन्न भिन्न किया। अगर चीन को छोड़ दें तो ज्यादातर देशों ने चुप्पी साध रखी है। अमेरिका का कोई विरोध नहीं कर रहा है। रूस की चुप्पी भी सब कुछ अच्छा नहीं होने के संकेत दे रहे हैं। आम तौर पर राष्ट्रपति पुतिन काफी मुखर रहते है। ज़ाहिर ही उनके दिमाग मे कोई दूसरा काट चल रहा होगा। रूसी आम तौर पर दिलदार और मददगार दोस्त की भूमिका निभाते आये हैं। चाहे क्यूबा संकट हो या बांग्लादेश की मुक्ति या फिर हालिया सीरिया को अमेरिकी काले साये से बचाना। इसलिए ईरान को रूसी उम्मीद तो बिल्कुल नहीं छोड़नी चाहिए। दोनो देशो के बीच बेहतर संबंध है जिसका लाभ ईरान को मिलना चाहिए और भूराजनीतिक रूप से निश्चित रूप से मिलेगा। इतना तय है कि यदि जंग का कोई भी स्वरूप सामने आया तो यह पूरी दुनिया के लिए बेहद खतरनाक साबित होगा।

अमेरिका द्वारा आरोपित ये प्रतिबंध अमरीकी कंपनियों को ईरान और इसके साथ सीधे व्यापार करने वाली कंपनियों से व्यापार करने से रोकते हैं। विश्व मुद्रा कोष यानी आईएमएफ़ के हालिया अनुमान में कहा है कि 2019 में ईरान की अर्थव्यवस्था छः फीसदी सिकुड़ जाएगी। हालांकि अमरीका की ओर से प्रतिबंधों को और कड़ा करने के कारण ये अनुमान और बड़ा हो सकता है। उदाहरण के लिए अमरीका ने चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और तुर्की को ईरान से तेल खरीदने की छूट दे रखी थी, जिसे ख़त्म कर दिया गया। अमरीकी प्रतिबंधों के जवाब में ईरान बार-बार हॉरमुज़ समुद्री रास्ते के जरिये व्यापार रोकने की धमकी देता रहा है,जहां से दुनिया की ज़रूरत के 20 प्रतिशत तेल की आवाजाही होती है।

अमेरिका ने हालिया पूरे तोड़ फोड़ प्रकरण के लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराया है जबकि ईरान ने इस तरह के तोड़फोड़ औऱ किसी हमले में शामिल होने से साफ इन्‍कार करते हुए मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। ईरान ने अपने बयान में इसे “कुछ बुरा चाहनेवालों की साजिश “और “कुछ विदेशी ताकतों के “दुस्साहसी रोमांस” और “रोमांच”की कोशिश” भी करार दिया है जो वाज़िब प्रतीत होता है। अमेरिका की दिली इच्छा है कि ईरान पर एक नये समझौते का दबाव बनाया जाए जिसमें केवल परमाणु कार्यक्रम ही नहीं बल्कि उसके बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को भी शामिल किया जाए, जिसे अमरीका मध्यपूर्व में तनाव का कारण मानता है। अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन का मानना है कि ट्रंप प्रशासन ने ये फ़ैसला ‘कई परेशान करने वाले और उकसाने वाले संकेतों और चेतावनियों के जवाब में’ लिया है ।

अमेरिकी, ईरानी हमले के भय से इस कदर सशंकित है कि अब उन्हे खुफिया जानकारी है कि मध्यपूर्व में मौजूद अमरीकी सुरक्षाबलों के ठिकानों पर हमले की आशंका जताई जा रही थी इस कारण अमरीका ने ये क़दम उठाया है और जॉन बोल्टन ने कहा कि वे किसी भी तरह के हमले का जवाब ‘पूरे ज़ोर-शोर’ से देंगे। बोल्टन ने अपने एक बयान में कहा, “अमरीका यूएसएस अब्राहम लिंकन कैरियर स्ट्राइक ग्रुप और एक बॉम्बर टास्क फ़ोर्स को अमरीका के ‘सेंट्रल कमांड’ क्षेत्र में भेज रहा है, हम ऐसा ईरानी शासन को एक स्पष्ट और सीधा संदेश देने के लिए कर रहे हैं। संदेश यह है कि अगर अमरीका या उसके सहयोगियों पर किसी तरह का हमला हुआ तो अमेरिकी वायु सेना इसका माकूल जबाब देगी ।

बीते रविवार को व्हाइट हाउस ने घोषणा की कि वह तेहरान का मुकाबला करने के लिए यूएसएस अब्राहम लिंकन एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप और फारस की खाड़ी में हमलावरों दस्ते और विध्वंसक पोत को भेजेगा। अमेरिका अपने शत्रुओं पर पूर्व नियोजित हमलो के लिए विश्व प्रसिद्ध है वह पहले इस तरह का माहौल बनाता है और फिर उसी अनुरूप कार्रवाई करते हुए अपने राष्ट्र हित को सुरक्षित रखता है। उदाहरण के तौर पर इराक में जैव रासायनिक हथियारों का हौव्वा खड़ा किया ,पूरी दुनिया में विभिन्न मंचों से यह शोर मचाया कि इराक के पास भारी मात्र में रासायनिक हथियार हैं अगर समय रहते इराक को नहीं रोका गया तो दुनिया में अनर्थ हो जाएगा , इस भूमिका के बाद उसने सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाने की नीयत से इराक पर हमला बोल दिया। जैवरासायनिक हथियारों के इस्तेमाल की खबर पूरी तरह झूठी अफवाह निकली। प्रमुख जांच कर्ता हैन्स ब्लिंक्स को कहीं भी ऐसे हथियार के इस्तेमाल के सुराग नहीं मिले लेकिन इराक पर हमला हुआ और बाद में सद्दाम हुसैन की पूरे परिवार को समाप्त कर दिया गया । यहां भी एक दफ़े फिर से ऐसा लग रहा है कि अमेरिका वही कहानी ईरान के साथ दोहराने जा रहा है जिस तरह उसने सबसे पहले उसने ईरान की सेना की विशेष बल ईस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) को आतंकी संगठन घोषित कर दिया है। यह पहली बार है जब अमरीका ने किसी और देश की सेना को आतंकी संगठन क़रार दिया वहीं व्हाइट हाउस का कहना है कि आईआरजीसी का मतलब है ‘इंप्लिमेंटिंग इट्स ग्लोबल टेररिस्ट कैंपेन’। ट्रंप ने जब से ईरान के साथ अंतरराष्ट्रीय परमाणु क़रार तोड़ा है तब से दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा हुआ है।

इस्लामिक रिवॉल्युशनरी गार्ड कोर

सन 1979 की ईरानी क्रांति के बाद सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला खुमैनी के दिमाग की उपज थी रिवॉल्युशनरी गार्ड । रिवोल्यूशनरी गार्ड का गठन नई हुकूमत की हिफ़ाज़त और ईरानी सेना के साथ सत्ता संतुलन बनाना था ईरान में शाह के पतन के बाद हुकूमत में आई सरकार को ये लगा कि उन्हें एक ऐसी फ़ौज की ज़रूरत है जो नए निजाम और क्रांति के मक़सद की हिफाज़त कर सके। ईरान के कानून में जिसमें नियमित सेना को देश की सरहद और आंतरिक सुरक्षा का जिम्मा दिया गया जबकि रिवॉल्यूशनरी गार्ड को निज़ाम की हिफाज़त का काम दिया गया। उदाहरण के लिए रिवॉल्युशनरी गार्ड क़ानून और व्यवस्था लागू करने में भी सेना को मदद करती हैं और आर्मी, नौसेना और वायुसेना को लगातार उसका सहारा मिलता रहा है। वक़्त के साथ-साथ रिवॉल्युशनरी गार्ड ईरान की फ़ौजी, सियासी और आर्थिक ताक़त बन गई। रेवोल्यूशनरी गार्ड्स में ज़मीनी जंग लड़ने वाले सैनिक, नौसैना, हवाई दस्ते हैं और ईरान के रणनीतिक हथियारों की निगरानी का काम भी इन्हीं के जिम्मे हैं। रिवॉल्युशनरी गार्ड के मौजूदा कमांडर-इन-चीफ़ मोहम्मद अली जाफ़री ने हर उस काम को बख़ूबी अंजाम दिया है जो ईरानी के सुप्रीम लीडर ने उन्हें सौंपा गया है। रिवॉल्यूशनरी गार्ड की स्पेशल आर्मी है बासिज फ़ोर्स जो क़ानून लागू करने का भी काम करता है और अपने कैडर को भी तैयार रखता है। वहीं क़ुड्स फ़ोर्स विदेशी ज़मीन पर संवेदनशील मिशन को अंजाम देता है। हिज़्बुल्लाह और इराक़ के शिया लड़ाकों जैसे ईरान के करीबी सशस्त्र गुटों हथियार और ट्रेनिंग देने का काम भी क़ुड्स फोर्स के ही जिम्मे है। क़ुड्स फोर्स के कमांडर जनरल क़सीम सुलेमानी को ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामनेई ने ‘अमर शहीद’ का खिताब दिया है। जनरल क़सीम सुलेमानी ने यमन से लेकर सीरिया तक और इराक़ से लेकर दूसरे मुल्कों तक रिश्तों का एक मज़बूत नेटवर्क तैयार किया है ताकि इन देशों में ईरान का असर बढ़ाया जा सके। सीरिया में शिया लड़ाकों ने मोर्चा खोल रखा है तो दूसरी तरफ इराक़ में वे इस्लामिक स्टेट (आईएस) के खिलाफ लड़ रहे हैं। रिवॉल्युशनरी गार्ड की कमान ईरान के सुप्रीम लीडर के हाथ में है। सुप्रीम लीडर देश के सशस्त्र बलों के सुप्रीम कमांडर भी हैं। ऐसा आकलन है कि रिवॉल्युशनरी गार्ड ईरान की अर्थव्यवस्था के एक तिहाई हिस्से को नियंत्रित करता है। अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रही कई चैरिटी संस्थानों और कंपनियों पर उसका नियंत्रण है। ईरानी तेल निगम और इमाम रज़ा की दरगाह के बाद रिवॉल्युशनरी गार्ड मुल्क का तीसरा सबसे धनी संगठन है।

ट्रंप ने जब से ईरान के साथ अंतरराष्ट्रीय परमाणु क़रार तोड़ा है तब से दोनों देशों के बीच तनाव काफी बढ़ा हुआ है लेकिन अमेरिका को समझना चाहिए कि उसका पाला ईरान से पड़ा है और वह इराक नहीं है। दूसरी बात विश्व व्यवस्था में अब रूस, चीन, भी खासे मुखर हो गए है। और दोनों देशों से ईरान के संबंध काफी अच्छे हैं । सीरिया में ट्रम्प प्रशासन अपना हाथ जला चुका है। इसलिये यहां भी वो कोई भी कदम फूंक फूंक कर ही रखेंगे। इस मसले पर भारत का शिया फैक्टर भी काफी अहम हो जाता है।

अमेरिकी रणनीति

चूंकि अगले साल (2020 में) डोनाल्ड ट्रंप को फिर से चुनाव में उतरना है। इसलिये वे अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रपति कि तरह इस मसले पर कोई कोर कसर तो नहीं छोडेंगे, हालांकि, अमेरिका द्वारा ईरान के खिलाफ और प्रतिबंध एवं सीमित तथा प्रॉक्सी वॉर की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। अमेरिका ने आगाह किया था कि ईरान क्षेत्र में समुद्री यातायात को निशाना बना सकता है। इससे पहले भारत सहित कुछ अन्य देशों को तेहरान से व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा के लिए व्यापार में थोड़ी रियायतें मुहैया कराई गई लेकिन अब वह भी खत्म हो गई है। ईरान वाकई परेशानी में है लेकिन उसने अमेरिकी दवाब में झुकने से इनकार कर दिया है। जैसा कि ईरान ने स्पष्ट रूप से कहा है कि यदि संकट नहीं सुलझा तो वह हॉरमुज़ जलसंधि मार्ग को बंद कर देगा। अगर ईरान के तेल के जहाज जलसंधि मार्ग से नहीं जाएंगे तो बाकी देशों के तेल के जहाज भी जलसंधि को पार नहीं कर पाएंगे। जाहिर सी बात है कि इससे अमेरिका बौखला गया है। यदि किसी जहाज पर ईरान ने वाकई हमला कर दिया तो जंग छिड़ सकती है। इसका असर निश्चय ही पूरी दुनिया पर पड़ेगा

अमेरिकी चिढ़ और उसकी दुखती रग

अमेरिका ईरान से यूँ ही नही चिढ़े रहता है उसे लगातार वह 444 दिनों का तेहरान में अमेरिकी दूतावास का बंधक प्रकरण याद आता है जो अभी भी महाशक्तियों में सर्वश्रेष्ठ अमेरिका को सालता है। जब रोनाल्ड रीगन अमेरिका के राष्ट्रपति बने तभी बंधकों की रिहाई संभव हो पाई। उसे यह पूरा प्रकरण कचोटता है और उसकी दुखती रगों को हर साल दर्द देता है। उस पूरे बंधक प्रकरणों को आप आस्कर विजेता सिनेमा”आर्गो” में देख सकते हैं। संभवतः एक यह भी कारण है कि अमेरिका किसी भी सूरत में ईरान को या तो तबाह कर देना चाहता है या फिर वह चाहता है कि ईरान में सत्ता उसकी मर्जी से चले जबकि ईरान पर काबू पाने की चाहत का रणनीतिक कारण इजराइल और सऊदी अरब भी हैं जो अमेरिका के “ब्लू बॉय” (चहेते हैं) और ईरान उन्हें फूटी आंखों नहीं सुहाता है।

भारत की राजनयिक दुविधा और कूटनीतिक चुनौती

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अभी अमरीका के ख़िलाफ़ नहीं जा सकता है। हाल ही में अमरीका ने आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मसूद अज़हर को संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद से वैश्विक आतंकवादी घोषित कराने में खुलकर मदद की थी। ईरानी तेल का भारत, चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा ख़रीदार है। अमरीकी प्रतिबंधों के बाद भारत ने इसमें कटौती कर दी थी और हर महीने 1.25 मिलियन टन की सीमा तय कर दी थी। वर्ष 2017-18 में भारत ईरान से प्रतिवर्ष 22.6 मिलियन टन तेल ख़रीद रहा था। भारत की ऊर्जा ज़रूरतें और शिया कनेक्शन भारत और ईरान के बीच दोस्ती के अन्य बातों के अतिरिक्त मुख्य रूप से दो आधार बताए जाते हैं। एक भारत की ऊर्जा ज़रूरतें हैं और दूसरा ईरान के बाद दुनिया में सबसे ज़्यादा शिया मुसलमानों का भारत में होना। उधर गल्फ़ को-ऑपरेशन काउंसिल से आर्थिक संबंध और भारतीय कामगारों के साथ प्रबंधन के क्षेत्र से जुड़ी प्रतिभाओं के कारण अरब देशों से भारत के मज़बूत संबंध कायम हुए हैं। भारत की ज़रूरतों के हिसाब से ईरान से तेल आपूर्ति कभी उत्साहजनक नहीं रही। इसके मुख्य कारण इस्लामिक क्रांति और इराक़-ईरान युद्ध रहे।

भारतीय राजनयिकों के लिए वर्तमान ईरानी संकट से सफलतापूर्वक समाधान करना एक जबरदस्त चुनौती होगी जहां एक ओर ईरानी विदेशमंत्री की संकटकालीन भारत यात्रा और उनकी भारत से अपेक्षाएं और दूसरी तरफ विभिन्न मोर्चे पर अमेरिकी दवाब के बीच अपने ऊर्जा सुरक्षा की भरोसेमंद आपूर्ति के इस त्रिकोणात्मक परेशानी से पार पाना बेहद चुनौती भरा कदम होगा। भारत को जहां इस मसले पर दो तरफा मुक़ाबला करना होगा एक जो पर्दे के भीतर होगा वहीं दूसरे तरफ भारत को लगातार अमरिकी हथियार लॉबी से लगातार मिल रहे गाहे बगाहे लुभावन ऑफर (जैसे S-400 के बदले THAAD मिसाइल सिस्टम खरीदने का ऑफर और लॉकहीड मार्टिन द्वारा सिर्फ भारत के लिये F 21 लड़ाकू विमान मुहैया कराने जैसे मसले) से भी दो चार होना होगा जिसका असर आपके बारगेनिंग कैपेसिटी पर निश्चित रूपसे पड़ता है, अंतरराष्ट्रीय राजनीति के बिसात पर शह और मात के खेल में आज जरूरत इस बात की होगी कि आप अपनी बाजी कब,कहाँ और कैसे चलते हैं।

(भास्कर रक्षा और अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर पैनी नज़र बनाए रखते हैं। फिलहाल डीडी न्यूज़ से संबंद्ध हैं।)

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