सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का रास्ता किया साफ

नई दिल्ली :

सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का रास्ता साफ कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि हर उम्र वर्ग की महिलाएं अब मंदिर में प्रवेश कर सकेंगी। सबरीमाला मंदिर में प्रवेश के लिए 41 दिनों के ब्रह्मचर्य व्रत के पालन का नियम रहा है। इस व्रत के लिए महिलाओँ को होने वाले मासिक धर्म का हवाला देकर मंदिर प्रवेश से रोका जाता रहा है।

शुक्रवार को अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमारी संस्कृति में महिला का स्थान आदरणीय है। यहां महिलाओं को देवी की तरह पूजा जाता है और मंदिर में प्रवेश से रोका जा रहा है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने फैसला पढ़ते हुए कहा, ‘धर्म के नाम पर पुरुषवादी सोच ठीक नहीं है। उम्र के आधार पर मंदिर में प्रवेश से रोकना धर्म का अभिन्न हिस्सा नहीं है।’

फैसला पढ़ते हुए चीफ जस्टिस ने कहा कि भगवान अयप्पा के भक्त हिंदू हैं, ऐसे में एक अलग धार्मिक संप्रदाय न बनाएं। कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुछेद 26 के तहत प्रवेश पर बैन सही नहीं है। संविधान पूजा में भेदभाव नहीं करता है।

बोर्ड दाखिल करेगा पुनर्विचार याचिका 

फैसले से असंतुष्ट त्रावणकोर देवासम बोर्ड के अध्यक्ष ए. पद्मकुमार ने कहा है कि दूसरे धार्मिक प्रमुखों से समर्थन मिलने के बाद वह इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल करेंगे।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुआई में जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा – पांच जज बेंच में शामिल थे। हालांकि यह फैसला 4-1 के बहुमत से आया है। बेंच में शामिल जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने अलग फैसला दिया है। आपको बता दें कि शीर्ष कोर्ट में दाखिल की गई याचिका में उस प्रावधान को चुनौती दी गई है, जिसके तहत मंदिर में 10 से 50 वर्ष आयु की महिलाओं के प्रवेश पर अब तक रोक थी।

‘यह दलितों से छुआछूत की तरह’

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट सलाहकार राजू रामचंद्रन ने कहा था कि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर बैन ठीक उसी तरह है, जैसे दलितों के साथ छुआछूत का मामला। कोर्ट सलाहकार ने कहा कि छुआछूत के खिलाफ जो अधिकार हैं, उसमें अपवित्रता भी शामिल हैं। अगर महिलाओं का प्रवेश इस आधार पर रोका जाता है कि वे मासिक धर्म के समय अपवित्र हैं तो यह भी दलितों के साथ छुआछूत की तरह है।

हाई कोर्ट ने बैन को कहा था सही

संविधान में छुआछूत के खिलाफ सबको प्रोटेक्शन मिला हुआ है। धर्म, जाति, समुदाय और लिंग आदि के आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता। इससे पहले केरल हाई कोर्ट ने अपने फैसले में महिलाओं के प्रवेश के बैन को सही ठहराया था। हाई कोर्ट ने कहा था कि मंदिर में प्रवेश से पहले 41 दिन के ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है और मासिक धर्म के कारण महिलाएं इसका पालन नहीं कर पाती हैं।

सुनवाई के दौरान केरल त्रावणकोर देवासम बोर्ड की ओर से पेश सीनियर वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा था कि दुनियाभर में अयप्पा के हजारों मंदिर हैं, वहां कोई बैन नहीं है, लेकिन सबरीमाला में ब्रह्मचारी देव हैं और इसी कारण तय उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर बैन है, यह किसी के साथ भेदभाव नहीं है और न ही जेंडर विभेद का मामला है।

फैसले का रोचक पहलू : महिला जज ने दिखाई असहमति

फैसले का एक रोचक पहलू यह रहा है कि पांच जजों की बेंच के चार पुरुष सदस्यों ने जहां महिलाओं की एंट्री के पक्ष में फैसला सुनाया, वहीं महिला जज इंदू मल्होत्रा ने असहमति दिखाई।

जस्टिस इंदू मल्होत्रा:

महिला जज ने कहा कि इस मामला का सभी धर्मों पर व्यापक असर है। देश में धर्मनिरपेक्ष माहौल को बनाए रखने के लिए गहरे धार्मिक मामलों से छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने कहा कि यहां बराबरी का अधिकार, धर्म के पालन के अधिकार से कुछ टकराव के साथ सामने आ रहा है, जो कि खुद एक मूलभूत अधिकार है। जस्टिस मल्होत्रा ने तर्क दिया कि भारत में विविध धार्मिक प्रथाएं हैं। संविधान सभी को अपने धर्म के प्रचार करने और अभ्यास करने की अनुमति देता है। ऐसे में अदालतों को इस तरह की धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए भले ही यह भेदभावपूर्ण क्यों न हो।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस खानविलकर:

दोनों जजों ने महिलओं के एंट्री के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि भगवान अयप्पा के भक्त हिंदू हैं, ऐसे में एक अलग धार्मिक संप्रदाय न बनाएं। चीफ जस्टिस ने कहा कि धर्म जीवन जीने का तरीका है जो जीवन को आध्यात्म से जोड़ता है। सीजेआई ने कहा कि पितृसत्तात्मक धारणा को भक्ति में समानता को कम करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। चीफ जस्टिस और जस्टिस खानविलकर ने कहा कि पूजा में लैंगिक भेदभाव नहीं चल सकता।

जस्टिस नरीमन:

जज ने कहा कि सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल तक की महिलाओं के प्रवेश पर रोक की परंपरा संविधान के अनुच्छेद 26 के अनुकूल नहीं है। पूजापाठ में महिलाओं का भी बराबर का अधिकार है। जस्टिस नरीमन ने कहा कि सारे आयु वर्ग वाले भगवान अयप्पा के भक्त हैं और लिंग मंदिर में प्रवेश से रोकने का आधार नहीं हो सकता।

जस्टिस चंद्रचूड़:

जज ने कहा कि अगर किसी धार्मिक परंपरा शरीर की वजह से महिलाओं को प्रवेश से रोक उनकी गरिमा का उल्लंघन करती है तो वह असंवैधानिक है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि माहवारी की वजह से महिलाओं पर प्रतिबंध लगाना पूरी तरह से असंवैधानिक है। उन्होंने कहा कि अदालतों को उन धार्मिक प्रथाओं को वैधता प्रदान नहीं करनी चाहिए जो महिलाओं को अपमानित करती हैं।

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