जीवन की आवश्यकताओं को न्यूनतम की ओर ले जाना…यही आत्मनिर्भर भारत की पहली सीढ़ी होगी

✍वेद प्रकाश

हमारी संस्कृति ऋषि संस्कृति रही है। इसलिए सभी के गोत्र किसी न किसी ऋषि के साथ जुड़ें हुए हैं। महर्षि भारद्वाज, परासर, वाल्मिकी, आत्रेय, शांडिल्य, कात्यायन, कश्यप और भी न जाने कितने बहुविध असंख्य नाम है। हमने हर विपरीत विचारों को भी पर्याप्त मान दिया लेकिन समाज संचालन के आधार वही बने जिनमें इहलोक और परलोक दोनों के कल्याण के साथ मर्यादित जीवन की कामना की गई । जीवन को चार पुरुषार्थ-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में बांधा। अर्थ और काम वृत्ति हमारे धर्म और मोक्ष पर आज हावी हो गया। दुर्भाग्य से आजादी के बाद साम्यवादी संस्कारों में पले नीति-नियंताओं ने उपभोक्तावाद की जिस राक्षसी संस्कृति को गले लगाया उसके सूत्रधार महर्षि चार्वाक थे। आज पूरा महानगरीय जीवन (अब कुछ हिस्सों में ग्रामीण भी ) लगभग “यावत जीवेत सुखम जीवेत, ऋणम कृत्वा घृतं पीवेत” के दर्शन पर टिका है। यानी जब तक जियो सुख से जियो चाहो तो कर्ज लेकर भले ही घी पियो। लोन पर फ्लैट, गाड़ी आदि लेने की वृत्ति को इसी संदर्भ में देख सकते हैं।

जबकि ईशावास्य उपनिषद हमको जीवन सूत्र देते हैं – तेन त्यक्तेन भुंजीथा: ! अर्थात हमारे जीवन दर्शन में त्यागपूर्वक भोग को बल दिया गया है। महाभारत के यक्ष -युद्धिष्ठिर संवाद में यक्ष पूछता है – कौन व्यक्ति आनंदित या सुखी है? युधिष्ठिर कहते हैं –जो व्यक्ति पांचवें-छठे दिन ही सही, अपने घर में शाक (सब्जी) पकाकर खाता है, जिस पर किसी का ऋण नहीं है और जिसे परदेस में नहीं रहना पड़ता है, वही मुदित-सुखी है । शिकागो में स्वामी विवेकानंद के कपड़ों पर एक महिला द्वारा अजीब बताने पर स्वामी जी कहते हैं- मेरे इन कपड़ों को देखकर आश्चर्य मत करो। तुम्हारे देश में कपड़ों से व्यक्ति की परख होती है, लेकिन मैं जिस देश से आया हूं, वहां व्यक्ति की परख कपड़ों से नहीं, बल्कि उसके चरित्र से होती है। कपड़े तो ऊपरी दिखावा हैं। चरित्र ही व्यक्तित्व का आधार है।

लेकिन ऐसे न जाने कितने उद्दात दर्शन के बावजूद हमने जिस चार्वाक दर्शन को अपनाया वह भारत का आधार कभी नहीं हो सकता है । जैसे भले ही कुछ देर के लिए बादल सूर्य को ढक ले लेकिन सूर्य को आखिर जगत को प्रकाशित करने से वे रोक नहीं सकते हैं। यही नियति होनी है। अतृप्त कामनाओं से दुखी जगत को भारत दर्शन ही पथ दिखायेगा।

मोदी जी के आत्मनिर्भर भारत वाले आह्वान के बाद सोशल मीडिया असंख्य सवालों से पटा पड़ा है। कोई स्वदेशी की गुणवत्ता सुधारने की बात कर रहा है तो कोई पूछ रहा है की क्या भारत में बना विदेशी कंपनी का माल स्वदेशी की सूची में आयेगा ? चाइनीज वीवो की कीबोर्ड और जुकरबर्ग के फेसबुक से आत्मनिर्भरता से भरे लेखों के बीच हम कुछ और नजरिये पर आपको ले चलते हैं ?

अपनी आलमीरा में पिछले 2 महीने से बदन से दूर पड़े सिसक रहे उन 25/50/75 जोड़ी कपड़ों की ओर देखिये और विचार कीजिये क्या वाकई इतने वस्त्रों की हमें जरूरत है ?

फ्रेस होने के लिए बाथरूम स्लीपर, मॉर्निंग वॉक के स्पोर्ट्स जूते, लौटने के बाद रिलेक्स हेतु कांटों वाली चप्पलें, ऑफिस के लिए बाटा की चमचमाती लेदर शू और फिर नाइट मोड़ में मखमली चरण पादुका ही क्या हमारे विकसित व्यक्तिव का मापदंड है ?

बॉलकनी के किसी कोने में उपेक्षित पड़ी उन 2/4 साईकिल (कुछ और भी अन्य वस्तु ) से जरा बात करके देखिये न जिसे आप अपने बच्चों की बढ़ती उम्र के हिसाब से हर साल दो साल पर इसलिए ले आये थे की इससे बचवा हमारा चलाकर मजबूत बनेगा ।

चमचमाते बुक सेल्फ से सलीके से क्रमबद्ध बुकों में से जरा निकालिये किसी पर्सनैलिटी डेवलेपमेंट वाली स्वेट माडेर्न की किताब को अथवा साधक संजीवनी के मोटे ग्रंथ को और आत्मावलोकन कीजिये की आखिरी बार इसको कब पढ़े थे ?

सुबह-सुबह अंकुरित चना, मूंग, बादाम, फिर नाना प्रकार के जूस और फल की वैराइटी, जलपान में मक्खन लगे पराठे , दोपहर, शाम और रात्रि के विविध प्रकार व्यंजनों के बीच खुद से पूछिये क्या वाकई इतनी प्रोटीन और कैलोरी की जरूरत एक स्वस्थ व्यक्ति को है ?

आपके मन में स्वाभाविक यह सवाल आ सकता है कि हम अपने मेहनत से कमाते हैं तो दूसरों को क्या परेशानी है ? बिल्कुल सही सवाल हो सकता है लेकिन आप जिस देवता और शास्त्रों की रोज आरती करते हैं ,वही क्या कह रहे हैं जरा देखिये-

यावदभृयते जठरं तावत्स्वत्वं हि देहिनाम।

श्रीमद्भागवत- 7/14/8

अर्थात अपना पेट पालने के लिए जितनी वस्तु की आवश्यकता है उस पर ही आपका अधिकार है। इससे आगे अथर्ववेद (3/24/5) कहता है-

शतहस्त समाहर सहस्त्रहस्त संकिर ।

अथर्ववेद (3/24/5)

अर्थात, हे मनुष्य ! तू सौ हाथों से धन अर्जन कर और हजार हाथों से बाँट दो।

खुद से पूछना हो, तो सवाल कम हो जाते हैं। लेकिन सवाल तो होते ही हैं और वे तैरते रहते हैं। अभी हम कपड़ों के कलर के हिसाब से शूट करते सैंडल,घड़ी, पेन,चश्मा और मोबाइल कवर आदि पर नहीं जा रहे हैं। समृद्धि का मापदंड बने इंचों में बढ़ रही टीवी और फ्रिज की हम बिल्कुल चर्चा नहीं कर रहे हैं।

श्रेष्ठ और इंटलेक्चुल दिखने की होड़ में हमने जिस उपभोक्ता संस्कृति को अपना जीवन का आधार बना लिया है , कई समस्या की जड़ में यह भोगवादी जीवन दर्शन भी एक प्रमुख कारक है। जो किसान के जी तोड़ परिश्रम को हिकारत भरी दृष्टि से देखता है और श्रम की महत्ता नकारकर जिम में पसीना बहाने को फिटनेश का मापदंड मानता है। इसी सोच की वजह से प्रकृति के सबसे बड़े संरक्षक वनवासी और ग्रामीण समाज को हमारी व्यवस्था पिछड़ा मानती है और “पेटा” वाला पर्यावरण प्रेमी का अवार्ड हासिल कर जाता है। फटे कपड़े वाले ग्रामीण गरीब हो जाता है और फाड़कर जीन्स-टीशर्ट पहनना फैशन।

तो समस्या के जड़ों की विस्तृत विवेचना की बजाय यदि हम किसी देशी दुकानों में स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की तलाश करेंगे तो हमें निराशा ही हाथ लगेगी।

इसलिए अपनी आवश्यकता को न्यूनतम की और जिस दिन ले जाने की शुरुआत कर लेंगे न उस दिन वाकई आत्मनिर्भर भारत की पहली सीढ़ी पर आप पैर रखेंगे। हां पहली सीढ़ी पर। मार्ग लंबा है और लक्ष्य अभी दूर है लेकिन पहले कदम से हम शुरुआत करके तो देखें। इससे आपको सच्ची संतुष्टि और आनंद की प्राप्ति होगी।

आखिर पानी की जरूरत पत्तों को नहीं जड़ों को होती है। आप जड़ में पानी डालकर देखिये पत्ते खुद ही लहलहायेंगे।

उपर लगी तस्वीर के बारे में : भोगवादी जीवन को दर्शाती यह तस्वीर तीर्थभूमि उत्तराखंड की है। हम देवभूमि को पर्यटन भूमि में परिणत होती इस वृत्ति का तिरस्कार करते हैं।

(पत्रकार एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में कार्यरत लेखक, वर्तमान में संस्कार भारती, बिहार प्रदेश के संगठन मंत्री की जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे हैं)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *