जनगणना से पांथिक आधार पर तय हो राष्ट्र निर्माण में सबकी भूमिका

स्वामी जीतेंद्रानंद स्वामी
राष्ट्रीय महामंत्री
अखिल भारतीय संत समिति

राष्ट्रीय जनगणना रजिस्टर (NPR) को अद्यतन करने की मंजूरी के बीच प्रख्यात उर्दू शायर मुनव्वर राणा ने एक बेहद आपत्तिजनक बयान देते हुए ये कह दिया कि देश में अब तक की सारी सरकारें मुस्लिमों के साथ भेदभाव करने वाली, उन्हें उपेक्षित रखने वाली और उनका दमन करने वाली रही है और उन सबने मिलकर मुसलमानों को हाशिये पर धकेल दिया है। एक न्यूज चैनल के साथ बातचीत में उन्होंने कहा था कि मुसलमानों को इस देश ने आजादी के बाद से आज तक कुछ भी नहीं दिया बल्कि मुसलमान तो इस देश में लगातार डिटेंशन सेंटर में ही हैं। मुनव्वर राणा ने कांग्रेस पार्टी को भी निशाने पर लेते हुए कहा था कि उन्होंने भी मुसलमानों को कोई दूध नहीं पिलाया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल के द्वारा भारत की जनगणना-2021 की प्रक्रिया शुरू करने तथा राष्ट्रीय जनगणना रजिस्टर (NPR) को अद्यतन करने की मंजूरी के बीच प्रख्यात उर्दू शायर मुनव्वर राणा ने एक बेहद आपत्तिजनक बयान देते हुए ये कह दिया कि देश में अब तक की सारी सरकारें मुस्लिमों के साथ भेदभाव करने वाली, उन्हें उपेक्षित रखने वाली और उनका दमन करने वाली रही है और उन सबने मिलकर मुसलमानों को हाशिये पर धकेल दिया है। एक न्यूज चैनल के साथ बातचीत में उन्होंने कहा था कि मुसलमानों को इस देश ने आजादी के बाद से आज तक कुछ भी नहीं दिया बल्कि मुसलमान तो इस देश में लगातार डिटेंशन सेंटर में ही हैं। मुनव्वर राणा ने कांग्रेस पार्टी को भी निशाने पर लेते हुए कहा था कि उन्होंने भी मुसलमानों को कोई दूध नहीं पिलाया है। अबतक हम इस प्रख्यात शायर को एक बुद्धिजीवी एवं संवेदनशील शायर का दर्जा देकर उनको बहुत ही गंभीरता से सुनते रहे हैं। परंतु बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के विकास को लेकर जिस प्रकार की बहस शुरू हुई है, वह देश को सौ वर्ष पीछे ले जा रही है। उस काल खंड में भी तत्कालीन बुद्धिजीवियों ने इसी प्रकार की चर्चा को जन्म दिया था और परिणाम 1947 में स्वतंत्रता की प्रसन्नता अनुभूत करने के स्थान पर हम विभाजन की पीड़ा, लाखों लोगों की हत्या, हजारों के साथ बलात्कार और आज उसी के गर्भ से नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और सत्ताधारी राष्ट्रीय राजनैतिक दल भाजपा के घोषणा पत्र का हिस्सा राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) को लेकर भी विवाद की स्थिति बन रही है। यह अलग बात है कि NRC की मांग कांग्रेस ने शुरू की थी, असम में इस पर काम उन्हीं की सरकार में शुरू हुआ था, जो कि उच्चतम न्यायालय की देखरेख में चला।

जहाँ तक भारत राष्ट्र की बात है तो हमारे देश का संविधान देश के सभी नागरिकों की समानता सुनिश्चित करने तथा यहाँ के सभी अल्पसंख्यकों को संरक्षण, सुरक्षा व अधिकार देने का पूरा आश्वासन देता है और वर्तमान मोदी सरकार समेत सभी सरकारों ने अपने स्तर से अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया भी है लेकिन एक मुसलमान बुद्धिजीवी के रूप में अगर मुनव्वर राणा ने यह प्रश्न छेड़ ही दिये हैं तो उन्हें भी कुछ और प्रश्नों के उत्तर देने पड़ेंगे। फिर तो देश का आम नागरिक जिसने अपने खून-पसीने की कमाई से आयकर जमाकर देश के विकास में योगदान किया है, यहाँ के उद्योगपति, डॉक्टर, इंजीनियर, किसान, वैज्ञानिक जिन्होंने इस देश को बनाने में अपना सबकुछ गला दिया एक हिन्दू या मुसलमान के नाते नहीं, भारत के नागरिक के नाते। अब नागरिक कर्तव्य के नाते वे भी ये पूछे कि अगर देश ने मुसलमानों को कुछ नहीं दिया तो बदले में मुसलमानों ने देश को क्या दिया है?

देश का आम नागरिक जिसने अपने खून-पसीने की कमाई से आयकर जमाकर देश के विकास में योगदान किया है, यहाँ के उद्योगपति, डॉक्टर, इंजीनियर, किसान, वैज्ञानिक जिन्होंने इस देश को बनाने में अपना सबकुछ गला दिया एक हिन्दू या मुसलमान के नाते नहीं, भारत के नागरिक के नाते। अब नागरिक कर्तव्य के नाते वे भी ये पूछे कि अगर देश ने मुसलमानों को कुछ नहीं दिया तो बदले में मुसलमानों ने देश को क्या दिया है?

भारत की संवैधानिक व्यवस्था समानता के मूल सिद्धांत के आधार पर आचरण करने वाली है। धर्म के आधार पर भेदभाव हमारे संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं है परंतु हम यह कैसे भूलें कि इस देश के विभाजन का मूल आधार ही धर्म था। सिर्फ इस बात पर देश बंट गया कि हम मुसलमान-हिन्दुओं के साथ नहीं रह सकते। सच तो यह है कि रह तो वो किसी के साथ नहीं सकते। शिया-सुन्नी के साथ नहीं रह सकते, सुन्नी-देवबंदी के साथ नहीं रह सकते, देवबंदी-बरेलवी के साथ नहीं रह सकते और इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह था कि धर्म के नाम पर निर्मित देश पाकिस्तान अपने संसद में प्रस्ताव पारित कर अहमदिया और शिया को गैर-मुस्लिम करार दे देता है। क्या आप हिन्दुस्तान में यह सोच भी सकते हैं ? देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय से देश ने राष्ट्रपति चुना, उपराष्ट्रपति चुना, मुख्य चुनाव आयुक्त चुना, माननीय सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश चुना, राष्ट्रीय क्रिकेट टीम का कप्तान चुना और समाज जीवन के हरेक क्षेत्र यथा खेल, कला, राजनीति सबमें बराबर का प्रतिनिधित्व दिया और इतना ही नहीं मुसलमान अकेले अल्पसंख्यक समुदाय हैं जिनकी सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति के अध्ययन के लिए सरकारों के द्वारा समय-समय पर सच्चर समिति, रंगनाथ मिश्रा आयोग समेत न जाने कितने आयोग और समितियां बनाई गई और उस आयोग/समिति के सुझावों पर अमल भी किया गया।

मगर इन सबके बाबजूद अगर इस समुदाय से कोई जिम्मेदार व्यक्ति ऐसी पृथकतावादी मानसिकता के साथ बात करता है तो फिर देश को ये जानने का हक है कि इतनी सुविधा पाने वाला समाज बदले में देश को देता क्या है? देश की आर्थिक, सामाजिक व शैक्षणिक प्रगति में उसकी भूमिका कितनी है? सरकार अपने अधिकार क्षेत्र में रहने वाले लोगों और संस्थानों को जो नागरिक सेवा उपलब्ध कराती है, उन पर उसे काफी रकम खर्च करना पड़ता है, जिसमें सड़क, बिजली-पानी से लेकर सुरक्षा-प्रशासन पर आने वाले खर्च, किसानों और गरीब लोगों को विभिन्न सुविधा पर दी जाने वाली पूरक सुविधाएँ आदि शामिल होते हैं। ऐसे सारे इस व्यय को सरकार जनता के ऊपर अतिरिक्त कर लगाकर पूरा करने का प्रयास करती है।

मुनव्वर राणा के उस बयान के बाद अब सरकार को चाहिए कि जनगणना-2021 में इस तथ्य को भी शामिल किया जाये कि टैक्स देने वालों में किस समुदाय का प्रति-व्यक्ति प्रतिनिधित्व कितना है? देश के विकास में अन्य वर्गों की प्रतिव्यक्ति सहभागिता एक करदाता के रूप में कितनी है और इसकी तुलना में एक संवैधानिक रूप से अल्पसंख्यक का दर्जा प्राप्त मुसलमान, इसाई, पारसी, जैन, सिख और बौद्ध की कितनी है? ये आँकड़े स्पष्ट कर देंगे कि देश निर्माण में उनकी भूमिका कितनी है या यह लोग केवल लेना जानते हैं? मुसलमानों के साथ अन्य अल्पसंख्यकों का प्रतिशत के आधार पर राष्ट्र निर्माण में योगदान का अंश देश को पता चलना ही चाहिए।

मुनव्वर राणा के उस बयान के बाद अब सरकार को चाहिए कि जनगणना-2021 में इस तथ्य को भी शामिल किया जाये कि टैक्स देने वालों में किस समुदाय का प्रति-व्यक्ति प्रतिनिधित्व कितना है? देश के विकास में अन्य वर्गों की प्रतिव्यक्ति सहभागिता एक करदाता के रूप में कितनी है और इसकी तुलना में एक संवैधानिक रूप से अल्पसंख्यक का दर्जा प्राप्त मुसलमान, इसाई, पारसी, जैन, सिख और बौद्ध की कितनी है?

इसके साथ ही ये आँकड़े भी इकट्ठे किए जाए कि देश के बहुसंख्यक समाज के जो मठ-मंदिर सरकारी नियंत्रण में हैं, उससे सरकार को कितना राजस्व मिलता है और उस आमदनी को बहुसंख्यक समाज से प्राप्त राजस्व में दिखाया जाये। इसी तरह ये जानकारी भी सार्वजनिक हो कि सरकार अल्पसंख्यकों पर अलग-अलग मदों में, कल्याणकारी योजनाओं में, उनके शैक्षणिक संस्थानों के संचालन में, उनकी भाषा के संरक्षण में, उनके लिए कब्रिस्तान आदि निर्माण में कितना खर्च करती है और इस खर्च को अल्पसंख्यकों के ऊपर हुए खर्च में जोड़ा जाए और अंत में एक आँकड़ा प्रस्तुत किया जाए कि देश में पंथिक आधार पर अलग-अलग धर्म और पंथ के मानने वालों पर पर हो रहे खर्च और उनसे प्राप्त राजस्व का अनुपात कितना है। यानि हम मांग करते हैं कि देश के निर्माण में और देश पर बोझ बने लोगों के आँकड़े पांथिक आधार पर सार्वजनिक किए जाए।

जब प्रश्न उठ खड़ा ही हुआ है तो एक प्रतिष्ठित पत्रिका की लगभग चार महीने की पड़ताल, सूचना के अधिकार कानून के तहत 30 से ज्यादा जेलों से जुटाए गए आंकड़े और केंद्रीय गृह मंत्रालय के सीधे अधीन काम करने वाली संस्था/राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों पर भी बात की जाएगी जो कहती है कि जम्मू-कश्मीर, पुडुचेरी और सिक्किम के अलावा देश के प्रायः प्रत्येक सूबे में मुसलमानों की जितनी आबादी है, उससे अधिक अनुपात में मुसलमान जेल में हैं। 2001 की जनगणना के मुताबिक, देश में मुस्लिम आबादी 13.4 प्रतिशत थी और दिसंबर, 2011 के एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, जेल में मुसलमानों की संख्या करीब 21 प्रतिशत है। ये अध्ययन यह भी बताती है कि पश्चिम बंगाल में हर चौथा व्यक्ति मुसलमान है, पर वहाँ भी जेलों में लगभग आधे कैदी मुसलमान हैं, महाराष्ट्र में हर तीसरा तो उत्तर प्रदेश में हर चौथा कैदी मुसलमान है। अगर आपको याद हो तो इस अध्ययन रिपोर्ट के बाद तृणमूल कांग्रेस के नेता और यूपीए सरकार में राज्यमंत्री रहे सांसद सुल्तान अहमद ने कहा था कि हम लोग खुद को अल्पसंख्यक कहते हैं लेकिन जेल में हम बहुसंख्यक हैं। यानि कैदियों पर व्यय होने वाले सरकारी मद का एक बड़ा हिस्सा उन मुस्लिमों पर खर्च होता है जो अपराधी हैं। अगर बैंकों की बात करें तो सच्चर समिति ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि औसतन मुस्लिमों की प्रति खाता बकाया राशि अन्य अल्पसंख्यकों की तुलना में करीब आधी है। इसके बावजूद सरकार ने बैंको को निर्देश दिया हुआ है कि अल्पसंख्यक बहुल जिलों में ऋणों का प्रवाह बैंकों के द्वारा तीव्र किया जाए।

‘सच्चर कमेटी’ ने अपनी रिपोर्ट ने कहा था कि 2001 की जनगणना के अनुसार मुसलमानों में साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से काफी कम थी, जबकि सरकार शिक्षा प्रदान करने में कभी कोई भेदभाव नहीं करती तो फिर अपनी बदहाली का जिम्मेदार मुसलमान सरकार को क्यों मानते हैं इसका उत्तर भी मुस्लिम बुद्धिजीवियों से पूछा जाना चाहिए? और तो और न्यायमूर्ति राजेंद्र सच्चर ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि मुसलमान अपनी शैक्षणिक हालत को सुधारने की बाधा पर प्रतिक्रिया देने में भी विफल रहे। ’यानि आप अपराध में भी सिरमौर रहो, अवसर होते हुए भी शिक्षा प्राप्त न करो, टैक्स देने में सबसे पीछे रहो, बैंको में जमा धन का प्रतिशत आपका सबसे कम हो और देश के विकास में अपनी कमतरी के चलते आपकी सहभागिता भी सबसे न्यून रहे और आप बजाए अपनी बदहाली पर आत्ममंथन करने के आप सरकार को कोस रहे हैं कि उसने आपको बदहाल रखा।’

आप अपराध में भी सिरमौर रहो, अवसर होते हुए भी शिक्षा प्राप्त न करो, टैक्स देने में सबसे पीछे रहो, बैंको में जमा धन का प्रतिशत आपका सबसे कम हो और देश के विकास में अपनी कमतरी के चलते आपकी सहभागिता भी सबसे न्यून रहे और आप बजाए अपनी बदहाली पर आत्ममंथन करने के आप सरकार को कोस रहे हैं कि उसने आपको बदहाल रखा।

ये मेरा पूर्ण विश्वास है कि देश के सभी ‘वास्तविक अल्पसंख्यक’ राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका का निर्वहन अच्छे से कर रहे हैं, देश के आर्थिक, सामाजिक प्रगति में भी उनकी अग्रणी भूमिका है सिवाए एक समुदाय के है जो वास्तविक अर्थों में अल्पसंख्यक है ही नहीं।

इसलिए अब ये बिलकुल आवश्यक है कि जनगणना-2021 की प्रक्रिया शुरू होने से पहले इन सभी बिन्दुओं पर सरकार विचार करे, आँकड़े जुटाए और उसे सार्वजनिक करे क्योंकि राष्ट्र-निर्माण सभी की जिम्मेदारी है और विशेषकर उस समुदाय की जो संयुक्त राष्ट्र संघ के अल्पसंख्यक तय करने की किसी भी परिभाषा में फिट नहीं होता पर अल्पसंख्यकों को मिलने वाले हर लाभ का हितग्राही है और उसके बाबजूद अलगाववाद और विघटन की भाषा बोलता है।

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