गांधी और कबीर के देश में दंगों की सियासत पर समाज की ख़ामोशी सबसे बड़ी साजिश है

विनोद मिश्र

संविधान और सेक्युलरिज्म और नए नागरिकता कानून के खिलाफ पिछले 2 महीनों से शाहीन बाग जैसे दर्जनों धरने और प्रदर्शन में जहरीले बयानों और नारे से माहौल को दुषित किया गया। दिल्ली चुनावी माहौल में शाहीनबाग़ को लेकर भड़काऊ भाषण दिए गए… जाहिर है सियासत के आगे संविधान , सेक्युलरिज़्म , समाज का अस्तित्व गौण हो गया था और यह सच बताने वाला कोई नहीं था कि यह धरना एक साजिश है जिसमें महज एक अफवाह ने मुसलमानो के अंदर असुरक्षा पैदा कर दी है। लेकिन असुरक्षा की यह भावना उन इलाकों में और उन राज्यों में ज्यादा थी जहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक थे और हिन्दू अल्पसंख्यक।

भारत पाकिस्तान के बीच बटवारे के 73 साल बाद भी राजधानी दिल्ली में सांप्रदायिक दंगो में वही पुरानी वीभत्स और नफरत वाली तस्वीर दिखी। वही नारे और तक़रीर सुनी तो यह कैसे यकीन करे कि धर्म और मजहब से ऊपर हम संविधान और आधुनिक शिक्षा की बदौलत एक नए समाज के साथ 21 वी सदी की ओर चल पड़े है? संविधान और सेकुलराजिम और नए नागरिकता कानून के खिलाफ पिछले 2 महीनों से शाहीनबाग जैसे दर्जनों धरने और प्रदर्शन में जिस तरह के जहरीले बयानों और नारे से माहौल को दुषित किया गया। दिल्ली चुनावी माहौल में शाहीनबाग़ को लेकर भड़काऊ भाषण दिए गए… जाहिर है सियासत के आगे संविधान ,सेक्युलरिज़्म ,समाज का अस्तित्व गौण हो गया था और यह सच बताने वाला कोई नहीं था कि यह धरना एक साजिश है जिसमें महज एक अफवाह ने मुसलमानो के अंदर असुरक्षा पैदा कर दी है। लेकिन असुरक्षा की यह भावना उन इलाकों में और उन राज्यों में ज्यादा थी जहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक थे और हिन्दू अल्पसंख्यक। इन धरनों से लोगों को परेशानी हो रही थी यह बताने वाला कोई नहीं था लेकिन लेके रहेंगे आज़ादी का नारा लगाते हुए नौजवान लड़कियों/लड़के की आवाज़ मीडिया में रात दिन सुनाई जा रही थी। इस दौर में कई क्रांतिकारी शायर एकबार फिर भूत से निकलकर वर्तमान हो चुके थे “हम देखेंगे ” कुछ लोगों के सियासी मनसूबे को घर की चौखट से निकलकर महिलाये इन धरनो पर ढो रही हैं तो कुछ लोगो की साजिश की भेंट दिल्ली की गरीब जनता दंगे में हुई।

मस्जिदों से आती अज़ान की आवाज़ से मुंबई हमले में जिन्दा पकड़ा गया फिदायीन अजमल कसाब चौंक उठा था। क्योंकि उसने अपने मुल्क के मदरसे में सुना था कि भारत में मुसलमानो को इबादत की मनाही है। वहां मुसलमानो के साथ अत्याचार हो रहा है….. मुंबई पुलिस के साबिक कमिश्नर राकेश मारिया ने हाथ में कलेवा बांधे और पॉकेट में एक हिन्दू आई कार्ड के साथ फिदायीन बने कसाब के बारे में लिखा है कि एक मासूम को जिन्दा बम और सियासत का मोहरा मजहब के नाम पर बना दिया गया और इस साजिश ने 150 से ज्यादा लोगों की जान ले ली। आज़ादी के बाद पकिस्तान के प्रांतो में मचे घमासान के बीच भुट्टो ने मुल्क में ब्लासफेमी कानून लाया। ईश निंदा के इस कानून के जरिये पाकिस्तान में शरिया और मजहब का रूतबा बढ़ाने की कोशिश की गयी। सूबे में इससे तो शांति नहीं आयी उल्टा इस कानून से पाकिस्तान के अल्पसंख्यक समुदाय उत्पीड़न के शिकार होने लगे। मजहब के नाम पर बना पाकिस्तान से बांग्ला देश क्यों अलग हो गया ,बलोचिस्तान से लेकर सिंधी ,सरायकी तक क्यों इस ब्लासफेमी वाले कट्टर मजहबी से ज्यादा अपनी भाषा और संस्कृति को लेकर अपने को अलग थलग पाते हैं इसका जवाब पाकिस्तान के पास नहीं है । भारत सहित किसी मुल्क ने जनरल जिया के इस कानून को अल्पसंख्यक के खिलाफ साजिश को लेकर प्रोटेस्ट नहीं किया। इस कानून के तहत किसी के महज एक शिकायत पर ईश की निंदा करने वाले को फांसी की सजा हो सकती है। सैकड़ो पीड़ित अल्पसंख्यको की वेदना को लेकर जब पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर {मशहूर पत्रकार तबलीन सिंह के पति} ने विरोध दर्ज किया तो उनके अंगरक्षक ने उन्हें गोलियों से छलनी कर दिया। हैरानी की बात यह थी कि पाकिस्तान में सलमान तासीर को याद करने वाला कोई नहीं है लेकिन उनके हत्यारा मुमताज़ कादरी की कब्र पर हर साल हज़ारो लोग जुटते हैं और उन्हें इस्लाम के झंडाबरदार के रूप में याद करते हैं ।

सिर्फ 2020 में पाकिस्तान से भाग कर आये 65 मुस्लिम परिवारों को भारत की नागरिकता मिली है लेकिन अफवाह के जरिये जिन्हें दिल्ली में दंगा कराना था वे अपनी चाल में कामयाब रहे। भारत की लोकतान्त्रिक सियासत में मुसलमानो के बीच असुरक्षा का भाव बनाना चुनाव का सबसे बड़ा एजेंडा बनता रहा है।

सी ए ए के विरोध में बड़ी बड़ी बात करने वाली तबलीन सिंह और दूसरी पत्रकार कभी अपने समाज को यह नहीं बताई होगी कि भारत में नागरिकता कानून पाकिस्तान में जुल्मो सितम और ब्लासफेमी कानून से सताए लोगों के लिए ही है। जिन गरीब के पास हिन्दुस्तान के अलावा कोई विकल्प नहीं है। हैरानी तो तब होती है जब इमरान खान अपने मुल्क में कट्टरवाद को बढ़ाने वाले कानून का विरोध करने के बजाय भारत को सेक्युलरिज़्म की नसीहत दे रहा है और हमारे सेक्युलर नेता/पत्रकार पूछ रहे हैं कि पाकिस्तान के मुसलमानों को नागरिकता क्यों नहीं दी ? सिर्फ 2020 में पाकिस्तान से भाग कर आये 65 मुस्लिम परिवारों को भारत की नागरिकता मिली है लेकिन अफवाह के जरिये जिन्हें दिल्ली में दंगा कराना था वे अपनी चाल में कामयाब रहे। भारत की लोकतान्त्रिक सियासत में मुसलमानो के बीच असुरक्षा का भाव बनाना चुनाव का सबसे बड़ा एजेंडा बनता रहा है। अबतक देश में 2000 से ज्यादा साम्प्रदायिक दंगे हुए हैं जिसमे हर बार दंगा रोकने से ज्यादा राहत की चिंता की गयी है। हर बार पीस कमिटी से ज्यादा रिहैबिलिटेशन के लिए कमिटी बनी है और असुरक्षा की भावना को जिन्दा रखा गया है।

सोशल मीडिया के दौर में और टीवी के बढे वर्चस्व के बीच ज्ञानियों की तादाद बढ़ी है। व्हाट्सएप्प के दौर में अपनी अपनी आज़ादी ने लोगों को ज्यादा मुखर बनाया है। लेकिन इन तमाम ध्वनि प्रदुषण के बीच कोई कबीर नहीं बन रहा है। साधन और सम्पन्नता ने लोगों को समाज पर निर्भरता कम कर दिया है लेकिन सोच के दायरे में हम भीड़ से अलग नहीं होते हैं। जब बिजनौर के जोगीरामपुरा के लोगों ने गांव छोड़ने की धमकी दी तो उनसे उसकी वजह पूछी गयी। लोगों ने बताया कि स्थानीय मंदिर पर लाउडस्पीकर बजाना अखिलेश हुकूमत ने मना कर दिया है। क्योंकि बहुसंख्यक मुस्लिम गाँव में हिन्दू मंदिर पर लाउडस्पीकर बजने पर कुछ लोग खून खराबे पर उतर आते हैं लेकिन ,स्थानीय मस्जिदों के ऊँचे गुम्बद पर बंधे लाउडस्पीकरों से स्थानीय प्रशासन को कोई परेशानी नहीं होती है। यह उस कबीर के देश में हो रहा जिसने कठ्ठमुल्लाओं को चुनौती देते हुए वे कहा करते थे “कंकर पत्थर जोड़ी के मस्जिद लई बनाई ,तो चढ़ी मुल्ला बांग दे ,क्या बहरे हुए खुदाय। कबीर हिन्दुओ को भी कहते थे पत्थर पूजे हरी मिले तो मैं पुजू पहाड़ ….भक्ति और आस्था ,जाति और मजहब में बटे समाज को आईना दिखाकर कबीर ने भारतीय संस्कृति में भक्ति और मोक्ष के लिए सबको आसान रास्ता बताया था

ये धार्मिक उन्माद इसलिए बढ़े है कि समाज ने सच बोलने और सुनने का साहस छोड़ दिया है। दिल्ली दंगे से सबक लेने के बजाय अगर हम सिर्फ राहत पर ध्यान देंगे और समस्या की जड़ को नहीं तलाशते हैं तो यकीन मानिये हम अपनी अगली पीढ़ी को 21 वीं सदी के भारत उन्हें नहीं दे रहे हैं।

क्यों बिहार, उत्तर प्रदेश ,पश्चिम बंगाल ,झारखंड जैसे राज्यों में कई जगहों पर पर किसी पर्व त्योहारों में शोभा यात्रा निकालने और पूजा करने से इलाके की शांति व्यवस्था खतरे में पड़ जाती है ? ये धार्मिक उन्माद इसलिए बढ़े है कि समाज ने सच बोलने और सुनने का साहस छोड़ दिया है। दिल्ली दंगे से सबक लेने के बजाय अगर हम सिर्फ राहत पर ध्यान देंगे और समस्या की जड़ को नहीं तलाशते हैं तो यकीन मानिये हम अपनी अगली पीढ़ी को 21 वीं सदी के भारत उन्हें नहीं दे रहे हैं। आज इस देश को कबीर जैसे लेखक /पत्रकार की जरूरत है।

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