‘भारतीय परम्परा का मेरुदंड है नदी, नारी और संस्कृति’ : स्वामी जीतेन्द्रानंद सरस्वती

नदी, नारी और संस्कृति भारतीय परम्परा एवं पहचान का मेरुदंड है। ज्ञात हो कि नदी, नारी और संस्कृति तीनों स्त्रीलिंग शब्द हैं। भारतीय संस्कृति में नदी और नारी को उपनिषदों ने इस भाव से जोड़ा है कि रजसा शुद्धयेत नारी, नदी वेगेन शुद्ध्यते। नदी हमारे जीवन में सभ्यता भी है, संस्कृति भी है, जीवन भी है और प्रकृति भी । उसी प्रकार नारी, पुरुष के लिए मां के रुप में, बहन के रुप में, पत्नी के रुप में और बेटी के रुप में पूज्या है। नदी और नारी का प्रवाहमान होना, सुतंत्र होना ही संस्कृति को आधार प्रदान करता है।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी कहते हैं, “भारतीय संस्कृति और गंगा, नदी के दो किनारे हैं, जिस प्रकार गंगा विभिन्न कोणों, विभिन्न मोड़ों से होकर नगर-नगर, डगर-डगर प्रवाहित होने के बाद भी अपनी पवित्रता को बनाये रखती है उसी प्रकार विभिन्न कालखण्डों में, विभिन्न झंझावातों के बावजूद भी भारतीय संस्कृति ने अपनी पवित्रता को अक्षुण्ण रखा”। जहां तक इतिहास का प्रश्न है, सिकंदर से उसके गुरु ने विजय अभियान के समय गंगाजल, गीता और एक गुरू, हो सके तो लाने की बात कही थी। स्वभाविक है कि जहां गंगा हमारी संस्कृति की मेरुदंड है वहीं गीता ज्ञान का आधार स्तंभ है और इन दोनों की विशद व्याख्या मातृ स्वरुपा संदर्भों में कोई भारतीय गुरु ही कर सकता है। इसलिए इन तीनों की मांग सिकंदर के गुरू ने की थी।

भारतीय संस्कृति में नदी और नारी को उपनिषदों ने इस भाव से जोड़ा है कि रजसा शुद्धयेत नारी, नदी वेगेन शुद्ध्यते। नदी हमारे जीवन में सभ्यता भी है, संस्कृति भी है, जीवन भी है और प्रकृति भी । उसी प्रकार नारी, पुरुष के लिए मां के रुप में, बहन के रुप में, पत्नी के रुप में और बेटी के रुप में पूज्या है। नदी और नारी का प्रवाहमान होना, सुतंत्र होना ही संस्कृति को आधार प्रदान करता है।

स्वामी जीतेन्द्रानंद सरस्वती

नदियों का सम्बंध पूरे विश्व के सभ्यता से है। उसका प्रवाह जीवन संस्कृति को आधार प्रदान करता है। पूरे विश्व में भारतीय संस्कृति इस बात के लिए श्रेष्ठ मानी जाती है कि यहां विमर्श के पर्याप्त अवसर उपलब्ध हैं। यह अवसर हिन्दू संस्कृति के अलावा किसी अन्य भी संस्कृति में उपलब्ध नहीं है। जब हम नदी को संस्कृति से जोड़कर देखते हैं तो तीर्थराज प्रयाग में सती अनुसुईया द्वारा माँ जानकी को पातिव्रत्य धर्म की शिक्षा देना तो कहीं याज्ञवल्क्य मुनि द्वारा भारद्वाज को उपदेश देना तो कहीं किसी सरोवर तट पर काकभुशुण्डी द्वारा पक्षीराज गरुड़ को ज्ञान प्रदान करना, विश्वामित्र मुनि द्वारा राम-लक्ष्मण को गंगा के तट पर बक्सर में युद्ध कौशल की शिक्षा देना तो कहीं महर्षि सांदीपनि द्वारा शिप्रा नदी के तट पर कृष्ण को ज्ञान प्रदान करना, ये सभी विमर्श के पवित्र स्थल हैं।

याद रखने की बात यह है कि पूर्व के तीन युगों में, सतयुग में पुष्कर, त्रेता में नैमिषारण्य, द्वापर में कुरुक्षेत्र, ये स्थान सरोवर के तट पर हैं जो तीर्थ क्षेत्र के रुप में मान्य हैं और यह सभी भारतीय संस्कृति की चिंतनधारा के रुप में विख्यात हैं। गोमुख से लेकर गंगा सागर तक माँ गंगा का तट तपोवन से लेकर आनंदवन (काशी) होते हुए सुंदरवन तक भारतीय विमर्श के केंद्र के रुप में जाना जाता है। इसी कारण संस्कृति के विकास के लिए जननीस्वरुपा माँ गंगा जो भारत की समस्त नदियों की प्रतिनिधि है, उनके क्षेत्र से सभ्यता के संरक्षण एवं संस्कृति के संवर्धन के लिए ‘भागीरथी के स्वर’ का यह अंक ‘संस्कृति-संसद, नारी-मर्यादा और नदी-संरक्षण’ को समर्पित है। आशा है आपको संस्कृति संसद के अंदर काशी के वरुणा तट पर हुआ विमर्श अवश्य पसंद आयेगा और भारतीय संस्कृति के विमर्श के इस अध्याय को आपका आशीर्वाद प्राप्त होगा।

(‘भागीरथी के स्वर’ के फरवरी 2017 के अंक से साभार)
#गंगामहासभा

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