तियानमेन के तीस साल

कर्ण भास्कर

लोकतंत्र के मजबूती और विश्व राजनीति में हुए तेज बदलाव के लिहाज से वर्ष 1989 बेहद महत्वपूर्ण है। थोड़ा फ्लैशबैक में जाते हुए विगत तीस साल पहले हुए घटनाक्रम पर नजर डालें तो सबसे पहले “वार्सा पैक्ट” नाटो के कुटिल नीति के आगे परास्त हुआ और शीत युद्धकालीन प्रतिद्वंदी सोवियत संघ का विघटन हो गया। वहां चुनाव हुए, जर्मनी का एकीकरण हुआ, बर्लिन की मजबूत दीवार ढह गई, पोलैंड में सोलेडीरिटी पार्टी ने लोकतंत्र का स्वाद चखा, इसी साल वैल्वेट क्रान्ति से हैवेल्स चेकोस्लोवाकिया के राष्ट्रपति बने, जापानी सम्राट हिरोहितो का निधन हुआ, अंगोला में चल रहे भीषण गृह युद्ध में संघर्ष विराम हुआ, दक्षिण अमेरिकी देश चिली में तानाशाही सैन्य शासन का अंत हुआ, राजनैतिक रंगभेद और छुआछूत के शिकार दक्षिण अफ्रिका में पहली बार इसी साल राजनीतिक बंदियों की रिहाई शुरू हुई जिसका अंत अफ्रीकी गांधी और “भारत रत्न” नेल्सन मंडेला की रिहाई पर जाकर समाप्त हुई, नोबेल का शांति पुरस्कार निर्वासित तिब्बती धर्म गुरु 14वें दलाई लामा को प्रदान किया गया।

इन तमाम बीते हुए घटनाक्रम पर सरसरी नजर डाले तो ऐसा प्रतीत होता है कि दुनिया में नवजात लोकतंत्र अपने यौवन को छोड़कर, आगे निकलकर मज़बूत और परिपक्व अवस्था को प्राप्त कर रहा था।

इन सब बातों के बीच विशालकाय एशियाई देश चीन में स्थिति सामान्य नहीं थी, यहां ऐसा कुछ घटित हो रहा जिससे ऐतिहासिक चीनी समाज की मनःस्थिति, शासन प्रणाली के तानाशाही स्वरूप, राज्यव्यवस्था में चीनी सेना का वीभत्स रूप , मानवाधिकार का दमन और प्रजातंत्र की उम्मीद की आस में चीनी नागरिकों की उम्मीद के विशाल वटवृक्ष पर वज्रपात कर उसे सदा के लिए ठूंठ बना दिया।

हम बात कर रहे हैं चार जून 1989 को चीन की राजधानी पीकिंग (बीजिंग) के तियानमेन चौक पर लोकतंत्र के समर्थन और लोकतांत्रिक सुधार के लिए हज़ारों छात्रों ने जोरदार प्रदर्शन किया। बीजिंग के मध्य में अवस्थित इस चौक पर छात्रों ने अपना कब्जा जमा कर चीन सरकार से अपनी लोकतांत्रिक, आर्थिक, राजीनीतिक सुधार की मांग को दोहराया जो उनसे वादा किया गया था। छात्रों ने अपनी एकता से डेंग जियापिंग शासन को बदलाव का स्पष्ट संकेत दिया और फिर प्रतिउत्तर में चीनी सेना ने अपना वीभत्स रूप दिखाते हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे अपने ही नागरिकों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाते हुए कम से कम दस हज़ार नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया जिसकी कल्पना वर्तमान सभ्य समाज कर ही नहीं सकता है। वर्ष 2019 के चार जून को इस अमानवीय घटना के तीस साल पूरे हो गए हैं।

चीनी भाषा में ‘तियानमेन” का अर्थ होता है गेट ऑफ हैवेनली पीस या “असीम शांति का अनुभव कराने वाला द्वार”

क्या कारण थे

15 अप्रैल 1989 में लोकप्रिय सुधारवादी नेता और कम्युनिस्ट पार्टी के उच्च पदस्थ नेता हू याओबांग ,जो देश राजनैतिक और आर्थिक सुधारों के धुर समर्थक थे,उनकी अचानक मौ के बाद दो दिन बाद हज़ारो की संख्या में लोकतंत्र समर्थक छात्र तियानमेन स्क्वायर पर जमा होने लगे और देश मे व्याप्त तमाम मुद्दों पर भाषणबाज़ी और अपने प्रिय नेता को श्रंद्धाजलि देते हुए प्रदर्शन करने लगे जिसकी तीव्रता दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही थी।

चीन के कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र “पीपुल्स डेली’ ने अपने आलेख में छात्रों के इस आंदोलन को “पहले से तयशुदा और संस्थागत अराजकता “फैलाने वाला कदम बताया जो न सिर्फ “पार्टी विरोधी” बल्कि “समाजवाद विरोधी” भी था। छात्रों ने इस आलेख की जम कर निंदा की और सरकार पर दवाब बनाने और सुधारात्मक उपचार की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर बैठ गए जो चीनी नेतृत्व को इन छात्रों का तरीका नागवार गुजरा।

बीजिंग की सड़कें छात्रमय हो चुकी थी जो एकबारगी यह बता रही थी कि माओ के देश मे लोकतंत्र की कोंपले खिल उठेंगी, छात्रों का प्रदर्शन बढ़ता गया, ठीक इसी समय रूस के तत्कालीन राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचोव चीन के राजकीय दौरे पर थे, वे अपने तयशुदा कार्यक्रम के साथ बीजिंग तो पहुंचे पर उत्साही और लोकतंत्र समर्थक छात्रों के आंदोलन के कारण उनका पारंपरिक रूप से रस्मी स्वागत नहीं हो सका। किसी राजकीय अथिति का स्वागत न हो पाना अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में आप में दुर्लभतम घटना है, इससे से भी तियानमेन चौक की स्थिति का सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता है। छात्रों के इस वर्ताव से और बिगड़ती स्थिति को देखते हुए आग बबूला प्रीमियर ली पेंग के आदेश पर 19 मई को राजधानी में “मार्शल लॉ” लगाते हुए प्रशासन सेना को सौंप दिया। इसके साथ मीडिया, खासकर पश्चिमी मीडिया पर जबदरस्त नकेल कसा और उन्हें चीनी सेना से जुड़े किसी भी पत्रकारीय कार्य के लिए प्रतिबंध लगाया।

छात्रों के साथ साथ उस वक्त बीजिंग में मौजूद पत्रकारों को भी चीनी सेना पर पूरा भरोसा था , वे इस बात को लेकर आश्वस्त थे कि चीनी सेना छात्रों के साथ कुछ भी अमानवीय हरकत नहीं करेगी। दरअसल चीन उस वक़्त विभिन्न घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर बुरी तरह उलझा हुआ था, रही सही कसर सोवियत संघ के विघटन ने पूरी कर दी। इस विघटन के पश्चात चीनी रणनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि विश्व व्यवस्था में रूस का स्थान नैसर्गिक रूप से चीन ही ले सकता है। छात्रों के इस प्रदर्शन को कठोर और संकुचित चीनी राजव्यवस्था के लिए गंभीर खतरा माना गया तथा केंद्रीय पोलित ब्यूरो ने सेना को इसपर कठोरतम कार्रवाई के आवश्यक दिशा निर्देश जारी किए जिसका परिणाम जग जाहिर है।

चीनी सेना का अमानवीय और वीभत्स रूप

सेना अपने कार्यप्रणालियों पर अपना काम करती रहीं , विरोध होता रहा, छात्र अपनी मांग रखते रहे, लेकिन 4 जून की अल सुबह सेना एकाएक हरकत में आई बख़्तरबंद गाड़ियों और टैंको के काफ़िला के साथ पूरे इलाके में चीनी सैनिकों के शार्पशूटर्स ने बीजिंग में पूर्वी और पश्चिमी छोर से इन निहत्थे और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को बिना किसी पूर्व चेतावनी दिए जम कर अपना निशाना बनाया और “काउंटर रेवोल्यूशनरी’ के आरोप लगाते हुए बड़े पैमाने देशव्यापी अवैध गिरफ्तारी किया।

हालाकिं सेना का जनविद्रोह को कुचलने के लिए इस्तेमाल किया जाना कोई नई बात नहीं है, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को देखा जाय तो औपनिवेशिक ब्रिटिश शासन का मुख्य आधार सेना ही थी जिसमे भारी संख्या में भारतीय शामिल थे जो “नाम ,नमक और निशान” की , भावना सर ओतप्रोत होकर भारतीय जनता पर अंग्रेजी आदेशो का पालन करते हुए अत्याचार करते थे, 1857 से पहले और बाद के तमाम आदिवासी विद्रोहों और अन्य क्षेत्रों में हुए विद्रोहों और क्रांतियों को सेना ने ही बुरी तरह कुचला और ब्रिटिश शासन को स्थायित्व प्रदान किया लेकिन इनसब के वावजूद एक नाम गढ़वाल रेजिमेंट के सैनिक चन्द्र सिंह गढ़वाली का भी है जिसने पेशावर में स्वतंत्रता सेनानीयों पर गोली चलाने के आदेश की अवहेलना कर दी थी। सैन्य परम्परा के हिसाब से चंद्र सिंह का यह कृत्य अक्षम्य था लेकिन एक भारतीय होने के नाते उसके इस कृत्य ने इतिहास में अमर बना दिया।

औपनिवेशिक शासन व्यवस्था के समाप्ति के पूरे विश्व मे सेना के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव आया, अब सेना उत्पीड़क नही मित्र और संकटमोचन की भूमिका निभाती है,चीन में भी अपनी सेना से प्रदर्शनकारी छात्र संभवतः यही उम्मीद कर रहे थे।

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Posted by News Chrome on Monday, June 3, 2019

टैंक मैन

इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक कालजयी तस्वीर सामने आती है जिसमे एक साधारण सा दिखने वाला चीनी व्यक्ति जिसके हाथ में घरेलू सामान को थैला लिए चीनी सेना के टैंको के काफिले के सामने तन कर खड़ा हो गया, हालाँकि इस व्यक्ति की पहचान कभी नही हो पाई। लेकिन इस तस्वीर ने बिना कहे पूरे कहानी बयां कर देती है। सरकार की इस सैन्य कदम ने पूरे आंदोलन की कमर तोड़ दी,प्रदर्शनकारियों को देश मे रहना दूभर हो गया, बहुतों ने पश्चिमी देशों में तो अनेकों ने हांगकांग में शरण लिया।

ब्रिटिश डिप्लोमेटिक केबल की रिपोर्ट

अगर गुप्त ब्रिटिश डिप्लोमेटिक केबल की माने तो चीन की सेना की इस कार्रवाई में कम से कम दस हज़ार लोग मारे गए।यह केबल ब्रिटेन के चरण में राजदूत सर एलन डोनाल्ड ने चार जून 1989 को लंदन प्रेषित अपने कूट संदेश में इस घटना का पूरा ब्यौरा भेजा।

चीनी सरकार ने तीस साल बीत जाने के बाद आज तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है। इस घटना कोई आंतरिक मसला बताते हुए डेंग जियपिंग से मौजूदा शी शिनपिंग के शासन ने इसपर किसी तरह के बयान देने से सदा परहेज किया। द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद किसी सेना द्वारा अपने नागरिकों पर किया गया संभवतः सबसे वीभत्स और अमानुषिक कार्रवाई थी।

चीन के इस कदम की चहुँ ओर निंदा की गई,लेकिन चीन पर इसका कोई असर नहीं हुआ साथ ही चीन में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की दिशा में उठाये गए कदम को फौजी बूटों द्वारा बेरहमी के साथ कुचल दिया गया। सरकार चौकन्नी हो गयी और उस आंदोलन से जुड़े एक एक लोगों पर कठोर कार्रवाई पर उतारू होते हुए तमाम लोगों को सज़ा देने का कार्य युद्धस्तर पर किया जाने लगा।

सबूतों को मिटाना

चीन की जनवादी सरकार के कर्मचारियों ने इस घटना से जुड़े 20 लाख से अधिक ऑनलाइन सेंसर किये,इस घटना से जुड़े तमाम शब्द, को हटा दिया गया ऑनलाइन तथा ऑफ़लाइन कड़ी निगरानी रखी जाने लगी ।

इस घटना के 25 साल बाद 2014 में चीन प्रशासित हांगकांग में हांगकांग फेडरेशन ऑफ स्टूडेंट्स और लोकतंत्र समर्थक छात्र संगठन “स्कॉलरिज्म” के बैनर तले “येलो अम्ब्रेला” मूवमेंट को आगाज़ किया गया, लेकिन इसे भी फौरी तौर पर शांत कर दिया गया।इस आंदोलन की कमान छात्रों ने ही संभाली और सूचना प्रौद्योगिकी का सहारा लिया प्रशासन द्वारा इनरनेट को ठप्प किये जाने की स्थिति में उन्होंने “फायर चैट” नामक एक ऑफलाइन मोड में चलने वाला ऐप विकसित किया जिससे डाउनलोड करके आंदोलनकारी एकदूसरे से संपर्क में रह सकते हैं।

गांधी फैक्टर

तियानमेन चौक औऱ हांगकांग कर घटना में बस इतनी समानता है कि ये दोनों आंदोलन छात्रों की दिमाग की उपज थी, दोनो आंदोलन में चीन के विरुद्ध कोई युद्ध नहीं छेड़ा जा रहा था, उनकी बस एक ही मांग की “संस्थागत सुधार की उस प्रक्रिया को अपनाया जाय जो उनसे वादा किया गया था”। छात्र वही कर रहे थे जो 79 साल पहले गांधी ने किया था,”सविनय अवज्ञा”(सरकार के आदेश को विन्रमतापूर्वक न मानने की पहल) जो उन्होंने दांडी मार्च के दौरान दिया था, माओ के चीन की कम्युनिस्ट धरती पर गांधी के प्रभावी विचारों का पदार्पण कम्युनिस्टों की सोच से कहीं परे है ।

अमेरिकी षड्यंत्र

तियानमेन चौक की घटना पर सभी देशों में चीन का आंतरिक मामला बता कर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश की वहीं चीन ने इसे अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए की कारस्तानी बताते हुए उसे अस्थिर करने की साज़िश बताया लेकिन इन सब मे मूल मुद्दा गौण हो गया,जो आज तक कायम है।

विश्वव्यापी अन्य लोकतांत्रिक क्रांतियां

1989 से 2019 के वर्षो में राजशाही,सीमित और नवजात लोकतंत्र वाले देश मे अनेकों प्रदर्शन हुए जिसमे ट्यूनीसिया में 2011 की चमेली क्रान्ति (जैस्मिन रेवोल्यूशन), मलेशिया में गुड़हल क्रांति (हिबिस्कस रेवोल्यूशन), जॉर्जिया में 2003 में हुए गुलाब (रोज़) क्रांति, यूक्रेन में 2004 में हुए नारंगी/चेस्टनट क्रांति (ऑरेंज/चेस्टनट रेवोल्यूशन), किर्गिस्तान में 2005 में हुए ट्यूलिप /पिंक/लेमन/सिल्क/डाफोडिल्स क्रांति, इराक में 2005 में ही हुए बैंगनी (पर्पल) क्रांति, इसी साल लेबनॉन में हुए देवदार क्रांति, कुवैत में हुए नीली (ब्लू) क्रांति, म्यांमार में 2007 में हुए केसर (सैफरन) क्रान्ति, ईरान में हुए 2009 की हरी (ग्रीन) क्रांति, मिस्र के तहरीर चौक पर हुए 2011की (ट्विटर /लोटस रेवोल्यूशन) जिसे पश्चिमी मीडिया ने अरब स्प्रिंग का नाम दिया था जिसका दायरा अमेरिका के “ऑक्युपाई वालस्ट्रीट” से बढ़ता हुआ एमानुएल मैक्रॉन के फ्रांस में ‘येलो वेस्ट क्रांति तक जा पहुंचा है।

अगर सभी क्रांति की समीक्षा करें तो एक बात सामने आती जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सुचारू रूप से निर्वहन की बात करती है, उपरोक्त तमाम रंगीन क्रांति को या तो येन केन प्रकारेण कुचल दिया गया या फिर ‘गबन के तरीके है चालीस और हर किसी का मूल्य होता है’ के तर्ज पर तत्काल शांत कर कठोर निगरानी सूची में शामिल कर लिया गया।

30वीं वर्षगांठ पर कार्यक्रम

अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डी सी के कैपिटल हिल के सामने 23 मानवाधिकार संगठनों ने चार जून को इस घटना के पीड़ित परिजनों के साथ तियानमेन स्क्वायर कि घटना के विरोध में रैली निकाली,जिसमे लोकतंत्र की सुनहरे सपनो को संजोये उन तमाम युवा छात्रों के बलिदान को याद किया गया।

ट्रेड वॉर के बीच अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने कल जारी किए वक्तव्य में तियानमेन के चीनी प्रदर्शनकारियों को “हीरो” बताया और उनकी माताओं को सलाम किया। उन्होंने उन चीनी लोगों को भी सलाम किया जो अपने अधिकारों को लेकर आज भी भी डट कर खड़े है। पोम्पियो को भरोसा है कि तियानमेन चौक से प्रेरणा लेकर आने वाली पीढ़ियां लोकतंत्र और स्वतंत्रता के लिए अपना संघर्ष जारी रखेगी, जैसे बर्लिन की दीवार ढही और पूर्वी यूरोप में कम्युनिज्म का पतन हुआ। विदेश मंत्री पोम्पियो के इस बयान कि चीनी विदेश मंत्रालय ने तीखी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए बयान को पूरी गैर जिंम्मेदार, मनगढंत और बेतुका और पूर्वाग्रह से ग्रस्त क़रार दिया और चीन के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने से बाज़ आने को कहा ।

तियानमेन की यह घटना लोकतंत्र के हालात, उसकी बेहतरी, उन्नयन, उसमे नवोन्मेष, उसकी शुचिता, गरिमा को बरकरार रखने की दिशा ने उठाया जाने वाले कदम की दिशा में संजो कर रखने वाली चिर अविस्मरणीय घटना है। जब भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के सुदृढ़ीकरण की बात आएगी निश्चित रूप सर तियानमेन चौक की घटना बरबस हमारे जेहन को झंकृत करेगी और उन तथाकथित वैश्विक चौधरियों की चुप्पी औऱ तटस्थता को जी भर के कोसेगी।

(लेखक अंतर्राष्ट्रीय मामलों के अध्येता हैं, फिलहाल डीडी न्यूज़ से संबंद्ध हैं)

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