जीवन व संस्कृति के प्रवाह को संरक्षित करने के लिए देना होगा नदियों को संवैधानिक दर्ज़ा

हमारे इतिहास में ऐसे किसी नदी का उल्लेख नहीं मिलता जिसे इंसान ने बनाया है तो फिर उसे निर्जीव मान कर उसके मार्गों को तोड़ने और जोड़ने की बात कहना संरक्षण की बात करने वालों की नियत व नदी समझ दोनों पर प्रश्नचिह्न लगाती है।

विनोद तिवारी
संपादक
भागीरथी के स्वर

यूं तो नदियों के संरक्षण और उनके निरंतर प्रवाह को बनाये रखने के लिए देश में अलग-अलग समय पर कई जनान्दोलन खड़े हुए। विशेषकर सनातन आस्था को पोषित करने वाली गंगा के संरक्षण के लिए लेकिन सामाजिक उदासीनता, व्यापार जगत के एकजूट लालच और सरकारों के गैरजिम्मेदाराना रवैये के कारण सभी असफल हो गये और नदियों को समाप्त कर बड़े-बड़े कल-कारखाने स्थापित करने वाले लोग अपने काले मंसूबों में सफल हो गये। आखिर ऐसा क्यों ? क्यों नदियों के संरक्षण को चलाया गया बड़े से बड़ा आन्दोलन चंद लालची सत्तालोलुर और स्वार्थी लोगों के आगे टुटने को मजबूर हो गया? इन जनान्दोलनों का इस प्रकार असफल होना अन्य व्यवहारिक कारणों के साथ-साथ आन्दोलनकारियों की मंशा पर भी प्रश्नचिह्न खड़े करता है।

हमारे वेदों पुराणों व उपनिषदों समेत सभी धार्मिक ग्रंथों में जल को भगवान और जीवन कहा गया है। कहीं भी इसे पानी और H2O कह कर संबोधित नहीं किया गया। यदि यह अमृत तत्व सिर्फ हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के मिलने से बन जाता तो विज्ञान के इस युग में कई वैज्ञानिक इसे बनाने का काम आरंभ कर चुके होते लेकिन यह संभव ही नहीं है। एक जीवंत स्पंद के स्पर्श के बगैर H2 और O आपस में मिल ही नहीं सकते, पानी का स्वरूप बन ही नहीं सकते।

वर्तमान दौर में समाज में हो रहे नैतिक गिरावट के मद्देनज़र अब जीवन को पोषित करने वाली इन नदियों के अविरल और निर्मल प्रवाह को केवल संवैधानिक दर्ज़ा दिला कर ही सुनिश्चित किया जा सकता है और इसे व्यवहार में उतारने के लिए हमें सरकार व समाज दोनों को बाध्य करना होगा। भारत सरकार के राष्ट्रीय जल नीति के अंतर्गत भले ही नदियों को आर्थिक वस्तु के रुप में देखा जा रहा है, नदियों पर जल यातायात को बढ़ावा दे, अर्थव्यवस्था मजबूत करने की बात कही जा रही हो, नदी जोड़ो परियोजना के अनुसार उल्टी गंगा बहाने का सब्जबाग दिखाया जा रहा हो लेकिन भारतीय धार्मिक आस्था जल को आज भी देवी-देवता, इंद्र, वरुण आदि के रुप में पवित्र मानती है और इस मजबूत आस्था का व्यापक आधार भारत का परंपरागत ज्ञानतंत्र और उसका विज्ञान है। हमारे वेदों पुराणों व उपनिषदों समेत सभी धार्मिक ग्रंथों में जल को भगवान और जीवन कहा गया है। कहीं भी इसे पानी और H2O कह कर संबोधित नहीं किया गया। यदि यह अमृत तत्व सिर्फ हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के मिलने से बन जाता तो विज्ञान के इस युग में कई वैज्ञानिक इसे बनाने का काम आरंभ कर चुके होते लेकिन यह संभव ही नहीं है। एक जीवंत स्पंद के स्पर्श के बगैर H2 और O आपस में मिल ही नहीं सकते, पानी का स्वरूप बन ही नहीं सकते।

यही कारण है कि आधुनिक विज्ञान के धुरंधर भी पानी बनाने में अपने हाथ खड़े कर चुके हैं। इसी प्रकार जल अमूल्य धारा लेकर प्रवाहित होने वाली नदियां भी कुदरत बनाती है। हमारे इतिहास में ऐसे किसी नदी का उल्लेख नहीं मिलता जिसे इंसान ने बनाया है। तो फिर उसे निर्जीव मान कर उसके मार्गों को तोड़ने और जोड़ने की बात कहना संरक्षण की बात करने वालों की नियत व नदी समझ दोनों पर प्रश्नचिह्न लगाती है। भारतीय आस्था कभी भी ऐसी नीतियों का समर्थन नहीं करती क्योंकि वह जानती है कि नदी सिर्फ जल का भंडार नहीं बल्कि एक जीवंत प्रणाली है, जैसे हमारा शरीर और इस गहरे धार्मिक आस्था को अब आधुनिक विज्ञान भी स्वीकार कर चुका है। ऐसे में वक्त आ गया है कि हमारे सांस्कृतिक विरासत की प्रतीक इन नदियों के संरक्षण को संवैधानिक दर्जा मिले, ताकि कोई इन्हें प्रदूषित करने, इनका मार्ग बाधित करने, इनका अपमान करने के पूर्व सौ बार सोच विचार करे। इसके लिए हमें आपस की कड़वाहट को भूल कर पुन: एक बार संगठित होकर समाज व सरकार दोनों को इसे संवैधानिक दर्ज़ा दिलाने के लिए बाध्य करना होगा ताकि हमें जीवन व संस्कृति प्रदान करने वाली इन नदियों की अविरलता और निर्मलता सुनिश्चित हो सके। तब कहीं जाकर हम अपने जीवन के प्रवाह, चेतना के प्रवाह, संस्कृति के प्रवाह को संरक्षित करने में सफल होंगे।

भागीरथी के स्वर (फरवरी, 2017) के अंक से साभार

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