‘अपनी ही राजनीति में उलझ गए उपेंद्र कुशवाहा’ – मनोज मुकुल

मनोज मुकुल
   मनोज मुकुल

राजनीति के जितने बड़े अविश्वासी हैं उपेंद्र कुशवाहा उतने ही बड़े अपरिपक्व भी। एक दौर था जब नीतीश कुमार के बाद समता पार्टी में कुशवाहा की गिनती नंबर दो नेता की होने लगी थी। साल 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद जब बिहार विधानसभा में बीजेपी से बड़ी पार्टी जेडीयू बन गई तो नीतीश ने कुशवाहा को नेता विरोधी दल बना दिया।

उस वक्त कुशवाहा की न तो कोई राजनीतिक हैसियत थी और ना ही राजनीतिक जमीन। 2000 में पहली बार वैशाली के जंदाहा से विधायक बने थे। और विधायकी के पहले टर्म में ही नेता विपक्ष बना दिया। जबकि उमाशंकर सिंह इससे पहले तक विधायक दल के नेता हुआ करते थे । यानी इस तरह की कुर्सी अमूमन दो तीन टर्म के अनुभवी विधायकों को मिलती है। लेकिन नीतीश ने तब अनुभव की परवाह नहीं की और 30-35 विधायकों पर एक अनुभवहीन विधायक को नेता के तौर पर थोप दिया।

ये नीतीश कुमार की भूल थी या फिर उपेंद्र कुशवाहा की राजनीति का टर्निंग प्वाइंट, मैं कह नहीं सकता। लेकिन इसके बाद कुशवाहा की महत्वकांक्षा हिलोरे मारने लगी। नतीजा हुआ कि साल 2005 के चुनाव में जब बिहार में नीतीश के नाम की आंधी चली तो उपेंद्र कुशवाहा उस आंधी को झेल नहीं पाए और एनडीए का उम्मीदवार रहते हुए चुनाव हार गए।

इसके बाद से नीतीश और कुशवाहा की दूरी बढ़ने लगी। कुशवाहा चाहते थे कि उन्हें नीतीश मंत्रिमंडल में जगह दें लेकिन पार्टी ने प्रदेश का प्रधान महासचिव बनाकर उन्हें संगठन में सेट कर दिया। इस दौरान ललन सिंह से उनकी पटरी नहीं बैठी और 2006 में ही जेडीयू से अलग होकर एनसीपी में शामिल हो गए।

कुशवाहा राजनीति में कितने अपरिपक्व हैं इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि बिना विधायक रहते हुए इन्होंने तीन साल तक पटना में नेता विरोधी दल के तौर पर जो फ्लैट मिला था उस पर कब्जा रखा। बाद में 2008 में इन्हें जबरन उस बंगले से निकाला गया। जिसके विरोध में इनकी तब की पार्टी एनसीपी ने बिहार में धरना प्रदर्शन किया था। उस वक्त भी नीतीश पर कुशवाहा समाज के अपमान का आरोप इन्होंने लगाया था।

2008 में जब लोकसभा चुनाव की तैयारी चल रही थी उस वक्त शरद पवार ने कुशवाहा के कामकाज को देखते हुए इनके पद से बर्खास्त कर दिया और एनसीपी की बिहार यूनिट भंग कर दी। इसके बाद कुशवाहा ने 2009 के लोकसभा चुनाव के लिए एक नई पार्टी बनाई। लेकिन ये पार्टी चुनाव में पानी तक नहीं मांग पाई और कुशवाहा हाशिये पर चले गए। इसी दौरान 2010 के विधानसभा चुनाव से पहले बिहार में जेडीयू के मौजूदा अध्यक्ष ललन सिंह और नीतीश कुमार में तकरार हुई। ललन सिंह पार्टी छोड़कर चले गये। कुशवाहा के लिए अच्छा मौका मिला और उन्होंने नीतीश के यहां शरण ले ली। नीतीश ने कुशवाहा को दोबारा सम्मानित किया। इतना सम्मान दिया कि सीधे राज्यसभा का सांसद बना दिया। लेकिन साल 2012 में जब ललन सिंह और नीतीश की दोस्ती हुई तो कुशवाहा के कलेजे पर सांप लोट गया। कुशवाहा को लगा कि नीतीश कुमार के यहां उनकी हैसियत अब पहले वाली नहीं रहेगी। लिहाजा 2012 के दिसंबर में उन्होंने राज्यसभा और पार्टी दोनों से इस्तीफा दे दिया। यानी नीतीश को दोबारा धोखा।

इसके बाद साल 2013 में जब देश लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुटा था। कुशवाहा ने समता पार्टी नाम की पुरानी पार्टी के आगे नया नाम देकर राष्ट्रीय लोक समता पार्टी का गठन किया । सांसद अरुण कुमार इकलौते ऐसे नेता थे जो नीतीश से नाराज रहते थे और कुशवाहा की पार्टी बनाने में सहयोगी रहे। 2014 के चुनाव के लिए बिहार में नीतीश बीजेपी से अलग हो चुके थे। बिहार जीतने के लिए बीजेपी को छोटी पार्टियों का साथ लेना पड़ा और यहां किस्मत ने कुशवाहा का साथ दिया। मोदी की लहर थी, एनडीए ने लड़ने के लिए तीन सीटें दी और पार्टी तीनों जीत गई। माना जा रहा था कि सीतामढ़ी सीट से कुशवाहा की पार्टी रवींद्र शाही को चुनाव लड़ाएगी। रवींद्र शाही तैयारी करने लगे थे। लेकिन टिकट दे दिया राम कुमार शर्मा को जिन्हें सीतामढ़ी में कोई जानता नहीं था। एक मुखिया को सीधे सांसद का टिकट दे देना सियासी रहस्य का विषय आज भी माना जाता है।

2015 के चुनाव में भारी उठापटक के बाद एनडीए में सीटों का बंटवारा हुआ था। कुशवाहा की पार्टी जिन 20-22 सीटों पर चुनाव लड़ी उनमें से 2 ही जीत पाई। अधिकांश उम्मीदवार कुशवाहा जाति के थे। लेकिन कुशवाहा समाज का वोट उपेंद्र कुशवाहा एनडीए को ट्रांसफर नहीं करा पाए ।

अब उपेंद्र कुशवाहा एनडीए पर सीटों के लिए दबाव बना रहे हैं। मुश्किल ये है कि कुशवाहा जिन सीटों की मांग कर रहे हैं वो सीट उनको नहीं मिलने वाली। संख्या भी 3 तक जा सकती थी लेकिन जिस तरीके से नीतीश कुमार के खिलाफ उन्होंने जिस तरह से मोर्चा खोला है उससे एनडीए नेतृत्व नाराज है। और रास्ता ये तैयार किया जा रहा है कि कुशवाहा खुद ब खुद बोलकर चले जाएं। एनडीए का नेतृत्व मान रहा है कि कुशवाहा जिस तरीके से नीतीश पर हमला कर रहे हैं उससे वो अपना ही नुकसान कर रहे हैं। कुशवाहा की मंशा नीच वाले बयान को उठाकर नीतीश के हाथ से शहीद होने की है। लेकिन माना ये जा रहा है कि नीतीश कुमार कुशवाहा समाज को जैसे पहले मैनेज करते थे वैसे आगे कर लेंगे।

इसकी वजह भी साफ है । क्योंकि कुशवाहा अगर एनडीए छोड़ते हैं तो महागठबंधन में सीएम की कोई वैकेंसी नहीं है। जबकि कुशवाहा की मंशा सीएम बनने की है। यानी वहां तेजस्वी के अंडर में राजनीति करनी होगी। बाद में कोई भसड़ न हो इसलिए राबडी देवी ने नून रोटी खाएंगे तेजस्वी को सीएम बनाएंगे वाला नारा दे दिया है। यानी कुशवाहा की न तो एनडीए में सीएम की ख्वाहिश पूरी होने वाली है और ना ही महागठबंधन में। इस बात को नीतीश लव-कुश यानी कुर्मी-कोइरी वोटरों के सामने प्रमुखता से रखेंगे। नीतीश दोनों समाज को ये संदेश देना चाहेंगे कि उपेंद्र कुशवाहा की वजह से सीएम की कुर्सी समाज के हाथ से जा सकती है। और कुर्मी-कोइरी वोटर किसी हाल में ये नहीं चाहेगा कि सीएम की कुर्सी यादव के हाथ में जाए ।

ऐसे में सीएम पद के दावेदार उपेंद्र कुशवाहा सिर्फ अपनी पार्टी से हो सकते हैं। और इसपर आगे बढ़ने के लिए उन्हें तीसरा फ्रंट बनाकर मैदान में जाना होगा। हो सकता है बाद में कर्नाटक वाले कुमारस्वामी की तरह इनकी लॉटरी निकल आए। लेकिन तीसरे फ्रंट यानी अपने दम पर चुनाव लड़ने में दिक्कत है। क्योंकि पार्टी कुशवाहा को बेस वोट मानकर चल रही है। इसके अलावा कोई वोट नहीं है। नेता भी नागमणि, भगवान सिंह, राम कुमार शर्मा कोइरी ही हैं। प्रदेश अध्यक्ष भूदेव चौधरी दलित बिरादरी से हैं लेकिन कोई मास जनाधार नहीं है। जो पहली बार सांसद नीतीश के दम पर ही बने थे। यानी तीसरे फ्रंट से चुनाव लड़ते हैं तो पार्टी टूट जाएगी। भगवान सिंह कुशवाहा एनडीए में भी एडजस्ट हो सकते हैं। राम कुमार शर्मा सीतामढ़ी में नित्यानंद राय के लिए सेफ पैसेज देने में मदद करेंगे तो उन्हें उजियारपुर या झंझारपुर से बीजेपी, जेडीयू टिकट भी दे देगी। यानी कुशवाहा के लिए एक बार फिर बुरी स्थिति हो चुकी है। हो सकता है कि एनडीए में होते या नीतीश के साथ रहते तो भविष्य में नीतीश उत्तराधिकारी भी बना देते।

(मूलत बिहार के रहने वाले मनोज मुकुल टीवी पत्रकार हैं और फिलहाल एबीपी न्यूज से संबंद्ध हैं)

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