‘जलसंकट : दृष्टि बदलेगी तभी सृष्टि बदलेगी..’ – स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती

हमें यह बात समझना होगा कि हम पानी, मिट्टी व हवा दुनिया के किसी भी प्रयोगशाला में नहीं बना सकते हैं और ना ही इसके अभाव में जीवित रह सकते हैं। कुल मिलाकर हमें आने वाले जल संकट को देखना और उसकी भयावहता को समझना होगा ताकि समय रहते इस समस्या का समाधान निकाला जा सके। हमें प्रकृति के प्रति अपनी दृष्टि बदलनी होगी तभी प्रकृति पुन: जीवन को समृद्ध करेगी। दृष्टि बदलेगी, तभी सृष्टि बदलेगी।

स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती

जल संकट देश ही नहीं समूचे विश्व की गंभीर समस्या है। लातूर और बुंदेलखंड की समस्या ने एक बार फिर पूरे देश के सामने जलसंकट का भयानक सच लाकर रख दिया है जिसके कारण चारों ओर फिर से जल संकट के कारण व समाधान पर चर्चा आरंभ हो गई है। दुनिया भर के विशेषज्ञों की अगर राय माने तो जल संकट को वर्षा जल संरक्षण से ही रोका जा सकता है। इसमें कोई शक नहीं की जलसंकट आने वाले समय में पूरे विश्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी जिस पर अगर हम आज नहीं चेते तो स्थिति इतनी भयावह होगी कि उसका समाधान निकालना असंभव होगा।

यूं तो प्रकृति ने जीवन की पूर्ति के लिए कई प्रकार के जल स्त्रोतों जैसे नदियां, भूजल स्त्रोत व वर्षा जल की सौगातें हम मनुष्यों को दी है परन्तु जल को संसाधन के रुप में देखने वाले मनुष्यों ने इसका इतना दोहन किया कि गंगा, यमुना, कावेरी जैसे कई बड़ी नदियां व सैकड़ों सहायक नदियों वाले इस कृषि प्रधान देश में भी जल संकट की स्थिति उत्पन्न हो गई। विकास की चकाचौंध में अंधा होकर मनुष्यों ने नदियों को प्रदूषित करना, तालाब-कुंडों को पाटकर इमारतें बनवाना व वर्षा में सहायक वनों को साफ करना जैसे दुस्साहसपूर्ण कार्यों को अंजाम देना आरंभ कर दिया। फलस्वरूप आज हमारे सामने भयानक जलसंकट की समस्या आ खड़ी हुई है। हालत यहां तक खराब हो रहे है कि जल के अभाव में धरती फट रही है। वैज्ञानिक एवं भूजल विशेषज्ञों का मानना है कि बुंदेलखंड, अवध, कानपुर, हमीरपुर व इटावा की ये घटनाएं भूजल के अत्यधिक दोहन का परिणाम है। जलसंकट का समाधान तभी सुनिश्चित होगा जब भूजल से बाहर निकलने वाले जल की मात्रा के बराबर ही वर्षा जल का संरक्षण व भंडारण हो।

योजना आयोग के अनुसार भूजल का आठ प्रतिशत उपयोग कृषि क्षेत्र के द्वारा होता है। आज वोट बैंक की लालच में सरकारों द्वारा किसानों को बिजली पर दी जाने वाली सब्सिडी भी जल संकट में अपनी भूमिका निभा रही है। चूंकि किसान को बिजली का मूल्य या तो नहीं चुकाना होता है या कम चुकाना होता है, इसलिए वह थोड़े से पैसों के लिए मौसम के विपरीत व भौगोलिक रुप से अक्षम फसलों को भी उगाने के लिए भरपूर भूजल का दोहन करता है जिसका खामियाजा हम सभी देशवासियों को उठाना पड़ता है। हालांकि यह स्थिति देश के सभी राज्यों में न होकर किसी-किसी राज्य की है। सरकारों को बिजली सब्सिडी के बदले किसान को निश्चित धनराशि नकद दी जानी चाहिए जिसकी सिफारिश आयोग के रिपोर्ट में भी की गई है। इससे भूजल का संरक्षण होगा तथा विधुत क्षेत्र में भी आर्थिक बोझ कम होगा। विश्व बैंक की मानें तो भूजल का सार्वजनिक 92 प्रतिशत उपयोग और सतही जल का 89 प्रतिशत उपयोग कृषि में होता है। पांच प्रतिशत भूजल व दो प्रतिशत सतही जल का उपयोग उद्योग धंधों में होता है तथा तीन प्रतिशत भूजल व नौ प्रतिशत सतही जल का उपयोग घरेलू कार्यों में लाया जाता है।

हालांकि एक हकीकत यह भी है कि उद्योग धंधों, फैक्ट्रियों द्वारा कहीं-कहीं एक ही बार में इतना पानी जमीन से खींच लिया जाता है जितना एक गांव पूरे महीने में नहीं खींच पाता। कुल मिलाकर हमें आने वाले जल संकट को देखना और उसकी भयावहता को समझना होगा ताकि समय रहते इस समस्या का समाधान निकाला जा सके। हमें प्रकृति के प्रति अपनी दृष्टि बदलनी होगी तभी प्रकृति पुन: जीवन को समृद्ध करेगी। दृष्टि बदलेगी, तभी सृष्टि बदलेगी। हमें यह बात समझना होगा कि हम पानी, मिट्टी व हवा दुनिया के किसी भी प्रयोगशाला में नहीं बना सकते हैं और ना ही इसके अभाव में जीवित रह सकते हैं। एकमात्र रास्ता यही है कि हम सावधान होकर जल के संरक्षण में लग जाएं और आने वाले भयानक जल संकट के समाधान में अपना हाथ बटायें।

(स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती, गंगा महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री हैं। लेख ‘भागीरथी के स्वर’ के मई 2016 के अंक से साभार)

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