हर तरह से कामयाब अनुराग क्यों हुआ ब्रेन स्ट्रोक का शिकार, क्यों ‘बर्नआउट’ को हम समय से नहीं पहचान पाते?

रिमझिम वर्मा

अनुराग को लंदन पहुँचे 2 महीने हो चुके थे। कंपनी ने एक प्रोजेक्ट पर उसे 3 साल के लिये भेजा था। मध्यम वर्गीय परिवार में पले बढ़े अनुराग के लिये लंदन पहुँचना किसी सपने के सच होने से कम नहीं था। उसने ऑफिस से 15 मिनट की दूरी पर एक छोटा सा घर ले लिया था, घर ऐसी जगह कि जहाँ नज़र जाये वहाँ हरियाली ही हरियाली। और घर को अंदर से स्वर्ग बना रखा था उसकी पत्नी मीरा ने। उनका एक 2 साल का बेटा भी था- ‘लक्ष्य’।

रोज़मर्रा की ज़िंदगी में सुबह ऑफिस जाने की हड़बड़ी और शाम को घर आने की जल्दी और ऊपर से इतनी सारी ‘क्लाइंट मीटिंग्स’, अनुराग को एक दिन में जाने कितनी बार ‘पैनिक अटैक’ दे देती थी!

“ये वही सब तो है जिसका मैं हमेशा से सपना देखा करता था! तो क्यूँ इस सबसे मुझे चिढ़ मचने लगी है! ऑफिस में भी लगता है जैसे सब के सब मुझे काटने को बैठे हैं! मन करता है सब छोड़ छाड़ कर भाग जाऊँ जो होगा सो देखा जायेगा” शाम को घर वापस आते वक्त अनुराग रोज़ इन ख्यालों में खोया रहता था। अपने इर्दगिर्द उसे सारी बातें विपरीत ही मालूम पड़ती थी, लेकिन घर पहुँच के मीरा और लक्ष्य का चेहरा देखने के बाद वो खुद को अगले दिन के लिये राज़ी कर ही लेता था। जैसे तैसे जीवन का पहिया चल ही रहा था।

शाम का वक़्त था, सूरज लगभग आधा पौना डूब चुका था। घर में मेहमान एक-एक करके दाख़िल होते जा रहे थे और नन्हे लक्ष्य को ‘हैप्पी बर्थडे’ बोल कर गिफ्ट हाथ में थमाते जा रहे थे।

“जाने और कितनी देर चलेगी ये पार्टी! प्रोजेक्ट का डिप्लॉयमेंट है कल, अभी लैपटॉप नहीं खोला तो कल लंका लग जानीं है मेरी! परसों ही मैनेजर प्रोजेक्ट से निकालने की धमकी दे रहा था और इस ‘बर्थडे’ नाम की बला को भी आज ही आना था!” जश्न के माहौल में बार-बार ये सोचते हुये अनुराग की बेचैनी बार-बार घड़ी को ताक रही थी। मीरा को उसकी बेचैन नज़रों को पढ़ने में ज़्यादा देर न लगी, पास आई बोली- “नहीं मानोगे न आप! बात हुयी थी इस बारे में हमारी,फिर भी..!!” “यार तुम अपना काम देखो चुपचाप, मुझे मत सिखाओ क्या करना है क्या नहीं!” गुस्से में दाँत पीसते हुये अनुराग किचन की तरफ चला गया।

घर में पॉप म्यूज़िक बज रहा था लेकिन उसके कान के पर्दों पर सन्नाटे की सीटी बज रही थी। मीरा की नज़रों से छुपता-छुपाता वो व्हिस्की की बोतल और एक गिलास लेकर अपार्टमेंट की छत पर चला गया। मीरा मेहमानों की मेजबानी और बच्चों के शोरगुल में इतना व्यस्त थी कि अनुराग कहाँ है उसका ध्यान ही नहीं गया!

रात के लगभग 10 बजे होंगे, 3-4 दोस्तों के अलावा बाकी सब मेहमान जा चुके थे। मीरा की दोस्त शिप्रा और अनन्या को सिगरेट पीनी थी, मध्यम वर्गीय परिवारों के कुछ सिद्धान्तों के नाते घर में छोटे बच्चे होने की वजह से वो दोनों छत की तरफ बढ़ गयीं।

“तेरा सही है यार मीरा, न सुबह जल्दी उठने का प्रेशर, न बॉस की झिकझिक का चक्कर, नौकरी-वॉकरी सब चोंचले होते हैं…” अनुराग का सहकर्मी गौरव इससे आगे कुछ कह पाता कि तभी अचानक से छत से शिप्रा और अनन्या के चीखने की आवाज़ आयी! सब घबरा गये कि क्या हुआ, वो भागते हुये जैसे ही ऊपर पहुँचे देखा कि अनुराग बेहोशी की हालत में ज़मीन पर पड़ा है और उसकी नाक से खून बह रहा है!

“बॉटल सील्ड थी! व्हिस्की उसने पी ही नहीं, उससे पहले ही वो बेहोश गया है, आय एम 100% श्योर!” हॉस्पिटल के एक कोने में गौरव शिप्रा को ये बात बता ही रहा था कि तभी ऑपरेशन थिएटर से एक डॉक्टर बाहर निकला, मीरा तुरन्त आँसू पोंछते हुये उसकी तरफ बढ़ी।

“आपके पति को ब्रेन स्ट्रोक हुआ था, अभी हालत काफ़ी नाज़ुक है लेकिन भाग्यवश खतरे से बाहर हैं। ट्रीटमेंट हमनें शुरू कर दिया है।” हड़बड़ी में मीरा को ये बोल कर डॉक्टर वापस अन्दर चला गया। मीरा सदमे में धक्क से बैंच पर बैठ गयी, परिस्थिति से अनभिज्ञ..अन्जान!

काम का दबाव अनुराग पर इतना हावी हो गया था कि उसके मस्तिष्क की नसें भी उस दबाव को सहन करने के लिये कमज़ोर पड़ गयीं। जब मनोस्थिति के उतार-चढ़ाव पर लम्बी अवधि तक नियंत्रण नहीं हो पाता, तो निश्चित रूप से शारीरिक तौर पर भी उसके हानिकारक प्रभाव देखने को मिलते हैं। इसी तरह हर रोज़ न जाने कितने लोग अपने व्यवसायिक जीवन में भावनात्मक रूप से कमज़ोर पड़ जाते हैं और ‘बर्नआउट’ का शिकार हो जाते हैं।

जी हाँ, ‘बर्नआउट’!

जीवन की भाग-दौड़, चिंता, ज़्यादा काम अक़्सर हमें शारीरिक और मानसिक रूप से थका देती हैं। जब यह थकावट काफी ऊँचे स्तर पर पहुँच जाती है तब ऐसा लगने लगता है जैसे जीवन की साधारण परेशानियों को सुलझाना भी कितना कठिन हो गया है। ‘बर्नआउट’ में व्यक्ति खुद को असहाय व ऊर्जा-विहीन महसूस करता है।

कहीं आप तो नहीं हैं ‘बर्नआउट’ के शिकार?

◆ घर या दफ़्तर पर कोई भी कार्य बेकार की कवायद दिखता हो.
◆ ऐसा लगता है जैसे किसी ने शरीर से सारी ऊर्जा निकाल ली हो.
◆ आप अपनी ज़िम्मेदारियों और काम से लगातार भागने की कोशिश कर रहें हों.
◆ काम में फोकस की कमी के साथ-साथ आपका आत्मविश्वास भी गिर रहा हो.
◆ लोगों की सफलता देख कर आपको चैन की नींद नसीब न हो पा रही हों
◆ दफ़्तर और सहकर्मियों के नाम से चिड़चिड़ापन होना और हर वक़्त उनकी आलोचना करते रहना.
◆ यदि आप पर काम करने के दौरान लगातार नकारात्मकता हावी हो रही है तो आप ‘बर्न आउट’ के शिकार हैं.
◆ शरीर में हर वक़्त थकावट महसूस करना.
◆ भूख कम लगना भी इसका एक लक्षण है.

जानकारों के अनुसार, ‘बर्नआउट’ में व्यक्ति के ब्लड प्रेशर में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है तथा कुछ मामलों में गैस्ट्रिक समस्यायें भी उत्पन्न हो जाती हैं।

मेट्रो सिटीज़ और छोटे शहरों में लोगों की इस समस्या को लेकर क्या प्रतिक्रिया रहती है, हमने उनसे बात करके जानने की कोशिश की…

कानपुर शहर के पास ही एक देहात में कार्यरत अध्यापिका श्रीमती प्रियंका कहती हैं कि जब हम कार्यालय में ‘टीम वर्क’ में काम न करके केवल खुद को तवज्जो देते हैं तो आगे जाकर समस्याओं का सामना करना ही पड़ता है।

चंडीगढ़ की एक मल्टी नेशनल कंपनी में काम कर रहे प्रशान्त चौहान का मानना है कि दबाव जीवन के सभी पहलुओं में देखने को मिलता है लेकिन जब हम दफ़्तर के उस तनाव और परेशानियों को अपने साथ घर लेकर चल देते हैं तो वो निश्चित रूप से ‘मेन्टल बर्न आउट’ होता है जोकि शारीरिक ‘बर्न आउट जैसा ही खतरनाक है।

मिर्ज़ापुर में कार्यरत एक उच्च अधिकारी श्री संदीप कहते हैं कि यदि व्यक्ति अपने असाइनमेंट(कार्य) को टाल रहा है और समय से पूरा नहीं कर रहा है तो न चाहते हुये भी उसे नकारात्मकता का सामना करना ही पड़ेगा, जिससे ‘बर्न आउट’ होगा।

वहीं बैंगलोर की एक कंपनी में काम करने वाली ऋचा भार्गव ने कहा-“भाग्यवश, एक माँ होने के नाते मैं ऑफिस के स्ट्रेस, वर्क लोड पर ज़्यादा ध्यान नहीं दे पाती हूँ, जॉब के दौरान हमारा विज़न(दूरदर्शिता) क्लियर होना चाहिये कि हम ये क्यों कर रहें हैं। उससे अनावश्यक चीज़ों पर हमारा ध्यान भटकने से बच जाता है।”

ज़्यादातर जगहों पर लोगों का मानना था कि इस समस्या से काफी सरलता से उबरा जा सकता है लेकिन कठिनाई आती है तो उसके अभ्यास में।

जानिये कैसे निपटें ‘बर्नआउट’ से

जानकार बताते हैं कि ‘बर्नआउट’ से निपटना बहुत ही आसान है, बस इसके लिये आपको अपनी दिनचर्या में कुछ ज़रूरी बदलाव लाने होंगें-

◆ लक्षण दिखाई दें तो सबसे पहले इस बारे में अपने विश्वसनीय वरिष्ठ सहकर्मियों से बात करें, उनका सहयोग और सुझाव आपके लिये मददगार होगा।
◆ यह समस्या अक्सर काम को लत बना लेने वाले लोगों में ज़्यादा पायी जाती है। इसलिए काम के साथ-साथ मनोरंजन, मित्रों और परिवार के साथ समय बिताना भी आवश्यक है।
◆ दफ़्तर को समय पर छोड़ दे और बेहतर होगा काम की परेशानियों और महत्वाकांक्षाओं को घर लेकर न जायें।
◆ कार्य-स्थल पर टीम में काम करना, अपनी समस्याओं को साझा करना तथा नयी ज़िम्मेदारियों को सीखना भी सहायक होता है।
◆ ‘ना’ कहना सीखिये, कुछ लोग औपचारिकतावश ‘ना’ नहीं बोल पाते हैं जिससे वह खुद को काम के बोझ तले दबा लेते हैं।
◆ तनाव दूर करने के लिये अपनी दिनचर्या में खाने-पीने, सोने-जागने, काम-काज और घूमने-फिरने का समय निर्धारण रखें जिससे फ़ालतू के तत्वों के लिये आपके पास वक़्त ही न बचे।

हर काम का उद्देश्य सिर्फ हार-जीत, जल्दबाजी या लक्ष्य-प्राप्ति नहीं होना चाहिये, सकारात्मक विचार और दूसरों को जानने का प्रयत्न भी आवश्यक होता है। समस्याओं से बचने के बदले उनका सामना करना आपके लिये ज़्यादा बेहतर विकल्प साबित हो सकता है। काल्पनिक दुनिया से निकल कर वास्तविक जीवन में जीते हुये कठिनाइयों का समाधान निकालना चाहिये।

रिमझिम वर्मा

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