कश्मीर गुस्से में क्यों है ?

आज़ादी के 30 वर्षों तक रियासत में जम्हूरियत और असेंबली का मतलब सिर्फ शेख अब्दुल्लाह का सेलेक्शन होता था। 80 के दशक तक कांग्रेस पार्टी ने कश्मीर में अपना एक दफ्तर भी नहीं खोला था। भारत जैसे सेक्युलर मुल्क में यह मजाक ही था कि 5 लाख से ज्यादा कश्मीरी पंडितो को वादी से घर बार छोड़ कर भागना पड़ा लेकिन कश्मीर के किसी चुनाव में यह मुद्दा नहीं बना।

क्या कश्मीरी वाक़ई नाराज़ हैं ? चाचा अब्दुल गनई कहते हैं, हाँ ! क्योंकि सबने अबतक इसके भरोसे को तोडा है। अब अगर आप ये कहो कि चावल धान से ही आता है ,इस पर भी कोई यकीन नहीं करेगा। तुम्हारा मोदी क्या करता है ? कश्मीर को लूटने वाले को गेस्ट हाउस में बैठाकर उसे वाज़वान परोस रहा है। फ़ारूक़ अब्दुल्लाह ने लुटा है उसके सम्पति जप्त करो , मेहबूबा ने जो लूटा है उसे बंद करो। झीले डल पर पिछले 50 दिनों से टूरिस्ट की राह देखते मायूश कुछ शिकारा वाले और जमा हो गए। गुस्से से तमतमाया फ़िरोज़ बताते हैं फ़ारूक़ साहब ,मेहबूबा सभी को मोदी ने गिरफ्तार किया हुआ है लेकिन एक बच्चा भी घर से प्रोटेस्ट के लिए नहीं निकला। मैंने पूछा क्यों ? एक बुजुर्ग मुझे इसकी सियासत समझाते हुए बताया। “पिछले सारे चुनाव में एन सी और पी डी पी का यही मुद्दा था धारा 370 और 35A को किसी को टच नहीं करने देंगे।” फ़ारूक़ साहब ने ऑटोनोमी वापस लाने का वादा किया था वो 1952 वाला। मेहबूबा मुफ़्ती सेल्फ रूल बेच कर मुख्यमंत्री बन गयी। वजीरे आजम मोदी ने कश्मीर को 1947 में ले गया ,अब कश्मीर में मकामी लीडरों के लिए इलेक्शन में कोई मुद्दा नहीं है।” अब इसे कौन नेता मानेगा !

कश्मीर में लोगों का गुस्सा जायज है। प्राइवेट वेहिकल सड़क पर दौड़ रही है। पब्लिक ट्रांसपोर्ट बंद है। जिनके पास पैसा है उनका कुछ भी नहीं रुकता। एयरपोर्ट पर लोगों की भीड़ दिल्ली के किसी बस अड्डे जैसा लगता है। बड़े लोगों की सियासत ऐसी कि लाल चौक की भी सारी दुकाने सुबह 9 बजे तक खुली होती है लेकिन पैदल घर से निकलने वाले लोगों के लिए दुकाने बंद हो जाती है। ऐसा क्यों है ? सेव के काश्तकार ,अखरोट ,बादाम,ज़ाफ़रान और चावल के काश्तकार कारोबारी के बाट जोह रहे हैं। सरकार किसानों से सीधे फसल खरीदने को तैयार है लेकिन बन्दूक बरदार इसकी इजाज़त नहीं देता। एक अदृश्य खौफ की सियासत ने धारा 370 को अपना सियासी कबच बना लिया है। जबकि 90 फीसद कश्मीर की आवादी को धारा 370 और 35A से कोई लेना देना नहीं है। राजभवन के ग्रीवांस सेल में फरियादियों की भीड़ में मैंने कश्मीर के गुस्से को तलाशने की कोशिश की। चाचा ,आदाब ! क्या शिकायत है आपकी ? चाचा ने जैसे ही बोलना शुरू किया था , दूसरे बुजुर्ग ने उनके हाथों से पेपर झटक लिया था , देखो 2017 में आर्डर हो गया मार्च , 2019 में सुपरिन्टेन्डेन्ट को पेमेंट के लिए कहा अबतक नहीं हुआ। तीसरा बुजुर्ग बीच में रोकते हुए कमान अपने हाथ में ले लिया। चाचा ने अबतक मुझे समस्या समझाने की कोशिशे छोड़ी नहीं थी लेकिन दूसरे चार साथियों को यह लग रहा था कि चाचा मैन पॉइंट पर नहीं आ रहा है और मैं अपने विदेश मंत्री एस जयशंकर के शब्दों को याद करके भीड़ से बाहर निकलना बेहतर समझा कि 5 अगस्त से पहले का कश्मीर गड़बड़ झाला है। जनता दरबार में एक बुजुर्ग होमगार्ड ने बताया आप गलत लोगों से बात कर रहे हैं। इन लोगों ने सिर्फ लूटा है और अब भी लूटने की फ़िराक में है। कुछ गरीबो को पूछो जो दूर दूर से चलकर यहाँ आते हैं।

कश्मीर में धारा 370 ने अबतक गरीब और अमीर के बीच एक बड़ी रेखा खींच दी है। जिसने इस स्पेशल स्टेटस से लूट में हाथ धोया है और वो जो सिर्फ मिहनत मजदूरी करके अपना जीवन चलाया है। एक अघोषित बंद काल पर श्रीनगर पिछले 52 दिनों से बंद है लेकिन जिंदगी चल रही है वजह यहाँ का अर्थशास्त्र ही है। देश के अन्य राज्यों से कश्मीर में सरकारी नौकरियों की तादाद सबसे ज्यादा है। यहाँ अमूमन हर पढ़े लिखे परिवार में एक या दो नौकरी पक्की है जिनके अकाउंट में बगैर कुछ किये पैसा पहुंचना निश्चित है लेकिन वो जिनकी रोजी रोटी टूरिज्म और काश्तकारी पर निर्भर है वे पिछले कई वर्षों से सियासत के फैसले का इंतज़ार करते हैं क्योंकि उन्हें बताया गया है कि कश्मीर की मुस्लिम पहचान खो जाने का खतरा है?

दरअसल इसी मुस्लिम पहचान के नाम पर शेख अब्दुल्लाह ने नेहरू जी से जम्मू कश्मीर का स्पेशल स्टेटस हासिल किया था। शेख यह बात जनता था कि पाकिस्तान के साथ जाने से कश्मीरी पहचान ख़त्म होना निश्चित है। लेकिन शायद पंडित नेहरू यह नहीं जान पाए कि शेख के कश्मीरी पहचान में सिर्फ कश्मीरी बोलने वाले मुस्लिम हैं इसमें पंडित सिख ,बौद्ध ,पहाड़ी और डोगरा सहित दूसरे मुस्लिम तबके के लोग सेकंड क्लास सिटीजन बन कर रह जाएंगे। आज़ादी के 30 वर्षों तक रियासत में जम्हूरियत और असेंबली का मतलब सिर्फ शेख अब्दुल्लाह का सेलेक्शन होता था। 80 के दशक तक कांग्रेस पार्टी ने कश्मीर में अपना एक दफ्तर भी नहीं खोला था। भारत जैसे सेक्युलर मुल्क में यह मजाक ही था कि 5 लाख से ज्यादा कश्मीरी पंडितो को वादी से घर बार छोड़ कर भागना पड़ा लेकिन कश्मीर के किसी चुनाव में यह मुद्दा नहीं बना। कश्मीर के सबसे बड़े अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी ने मुझे कहा था कि धारा 370 फ़ारूक़ अब्दुल्लाह और मुफ़्ती के लिए मुद्दा है। हुर्रियत जब भारत के संविधान को नहीं मानती है ,कश्मीर विलय को नहीं नहीं मानती फिर उसे भारत के आईन में क्या लिखा है उसे क्या लेना देना ? लेकिन आज हुर्रियत धारा 370 ख़तम होने के बाद फ़ारूक़अब्दुल्लाह ,गुलाम नबी आज़ाद और मेहबूबा मुफ़्ती के साथ खड़ी है ,फिर कश्मीर के गुस्से को समझना थोड़ा मुश्किल है।

(वरिष्ठ पत्रकार विनोद मिश्र फिलहाल डीडी न्यूज से संबंद्ध हैं)

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