शाह फैज़ल को कश्मीर में सिक्योरिटी डेप्लॉयमेंट से क्यों डर लगता है ?

विनोद मिश्रा

प्रिय शाह फैज़ल साहब ,
कश्मीर को लेकर आपकी और इमरान खान की बढ़ी चिंता के बीच मेरे व्यक्तिगत सुझाव पर गौर फरमाया जा सकता है।

जनसंघ के संस्थापक नेता श्यामाप्रसाद मुख़र्जी की कश्मीर में रहस्मयी मौत पर दुःख व्यक्त करते हुए तत्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था जब बड़ी गलतियां की जाती हैं, तब इस उम्मीद में चुप रहना अपराध है कि एक-न-एक दिन कोई सच बोलेगा”। यह अपराध आपकी पीढ़ियों ने आपको झूठ बोलकर की है और हमारे सियासतदानो ने भी की है।

कश्मीर में भारत से गलती हुई है यह बात पंडित नेहरू जी को तब पता चला जब वे पाकिस्तानी फौज को लाहौर तक खदेड़ देने के बावजूद यू एन अमन बहाली के लिए चले गए। नतीजा डिक्सन और जनमत संग्रह जैसे प्रस्ताव आये जो भारत के मुँह पर झन्नाटेदार तमाचा था। कश्मीर पर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की हालिया मध्यस्तता की बात सामने आयी तो मुझे अपना गाल एक बार फिर सहलाना पड़ा।

हमने तीन जंगे लड़ी, दर्जन भर एग्रीमेंट पाकिस्तान से किया फिर भी कश्मीर का मसला बरकार है । वजह पिछले 70 वर्षो से हमने सच न बोलने की कसम लेकर सिर्फ कुछ लोगों की सियासत को कश्मीर का मसाला बना दिया और आर पार आम लोग इसके शिकार बनते रहे।

कांग्रेस के एक बड़े सेक्युलर नेता मोहम्मद अली जिन्ना थे जिन्हे सिर्फ मुसलमानों के लिए अलग पाक मुल्क चाहिए था। लाखों लोग एक मामूली सोच वाले इंसान की महत्वाकांक्षा की भेट चढ़ गए। एक सेक्युलर नेता जवाहर लाल नेहरू भी थे जिन्हे इस बात की चिंता थी कि हिन्दू बहुल भारत में शेख अब्दुल्लाह और कश्मीर को तरजीह मिलेगा तो देश विदेश उनकी सेक्युलर छवि प्रशस्त होगी । नतीजा सबसे बड़े इलाके लद्दाख में रहने वाले बौद्ध, कश्मीर के पंडित और जम्मू के डोगरी भाषी हिन्दू ,गुज्जर और बकरवाल अपने ही प्रदेश में दोयम दर्जे के नागरिक बन गए। सियासत और सत्ता कश्मीर के 18 फीसद सुन्नी मुस्लिम के हाथ में रही।

शेख अब्दुल्ला को भारत यानी नेहरू जी से मिला सपेशल स्टेट्स धारा 370 और 35A ने नेहरू की ही सेक्युलर छवि को सबसे ज्यादा आघात किया है। यह बात उनके वंशजो को अब तक समझ नहीं आयी है। कश्मीर का सबसे संपन्न तबका कश्मीरी पंडित अपने घर ,कारोबार ,तालीम और राजकीय व्यवस्था से निकाल बाहर कर दिए गए। आज अधिकांश पंडित आलिशान घरों को छोड़कर देश के अलग अलग हिस्से में शरणार्थी बन कर गुजारा कर रहे हैं।

भारत के खिलाफ प्रोटेस्ट और बन्दुक के नाम पर कश्मीर के कुछ लोगों ने अपनी अलग अलग दुकाने खोल ली, जिसका मकसद पैसा से है, कारोबार से है। अगर भारत से जम्मू कश्मीर को आजादी चाहिए तो अनंतनाग के बुरहान वानी को ही क्यों चाहिए ? कुपवाड़ा के सफी भट्ट को क्यों नहीं ,लदाख के जिग्मेट को क्यों नहीं ,कारगिल के मशरूफ अली को क्यों नहीं ,जम्मू के निशांत डोगरा को क्यों नहीं ,राजौरी और पूँछ के मोहम्मद इरफ़ान और तेजेन्द्र सिंह को क्यों नहीं ?

जाहिर है भारतीय सिविल सेवा में टॉप करने वाले और कश्मीर के आई ए एस अधिकारी शाह फैज़ल जी आप को अगर कश्मीर में सिक्योरिटी डेप्लॉयमेंट से डर लगता है तो आप भी उसी संस्कृति में पले बढे हैं जो मजहब से आगे और कश्मीर को एक दुकान से आगे कुछ नहीं देखता। पूर्व सी एम महबूबा मुफ़्ती को यह कश्मीरियों के ऊपर मनोवैज्ञानिक दवाब लगता है। कश्मीर की मशहूर फिल्म अदाकारा ज़ायरा वसिम अगर फिल्मो से तौबा करके अचानक मजहबी बन जाती है तो माना जाएगा इनलोगों ने नेहरू और शेख अब्दुल्लाह के तथाकथित सेक्युलर छवि से ऊपर अपने रिलिजन को रखा है और इसे कश्मीर में अपनी अलग पहचान माना है। जबकि हमने अपने सेक्युलर छवि के लिए सबसे ज्यादा त्याग अपनी पहचान मिटाने पर ही जोर दिया है।

यह बात अपनी जगह दुरुस्त है कि धर्म व्यक्तिगत रूचि और व्यवहार का मामला है लेकिन कश्मीर में इसे कुछ अतिवादियों ने जिहाद का नाम देकर अपना कब्ज़ा बनाना चाहा , कुछ आतंकवादियों का संघर्ष उम्मा के लिए है। लेकिन सबसे दिलचस्प यह है की दिल्ली से बातचीत के पैरवी और पाकिस्तान की पैरवी करने वाले टीवी में जरूर दिखाई देते हैं लेकिन कश्मीर में आज कोई नेता नहीं है।

पंचायती राज निज़ाम से धारा 370 की समाप्ति के बाद देश के दूसरे पंचायतों की तरह वर्षो बाद कश्मीर के पंचायत भी सुदृढ़ हो रहे हैं। पञ्च ,सरपंच अपने गाँव के विकास का रोडमैप खुद बना रहे हैं। गांव अपने विकास में व्यस्त है ,शहरो के लोकल बाड़ी व्यस्त है। क्या आज कोई यह पूछने वाला है कि यासीन मल्लीक किस जेल में है ,हुर्रियत के कितने नेता ब्लड मनी के मामले में जेल में है? कुपवाड़ा ,पुलवामा के ग्रामीण इलाके में सचिवालय के अफसर लोगों के सवाल का जवाब दे रहे हैं और उनकी समस्या का हल लोगों के दरबाजे पर कर रहे हैं। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी ट्रम्प के मेडिएशन के ऑफर को लेकर संसद में उठे बवाल के बीच उसी संसद परिसर में अपने एक नन्हे साथी के साथ खेल रहे थे और इस बहस से दूर मैं अपने प्रिय फल आम का स्वाद लेने में व्यस्त था।

सिर्फ़ लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता ही कश्मीर मसले का हल है और इसके लिए पाकिस्तान से भी बात करने की जरूरत नहीं है क्योकि 1947 के पाकिस्तानी आकम्रण से लोहा इन्ही कश्मीरियों ने कुर्बानी देकर लिया था उन्हें मुख्यधारा में लाना जरुरी है। उन्हें सत्ता में भागीदारी देना जरुरी है। वे अपना मजहब और ईमान बेहतर समझते हैं इसके लिए नेहरू जी से सेक्युलर समझना जरुरी नहीं है। जम्हूरियत में लीडरशिप मजहब और अफवाहों के सहारे नहीं भरोसे से बनता है।

सादर

(विनोद मिश्र वरिष्ठ टीवी पत्रकार हैं, फिलहाल डीडी न्यूज़ से संबंद्ध हैं)

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