‘सबरीमला में महिलाओं का प्रवेश आंदोलन और चर्च का षड्यंत्र’ – मेधा कश्यप

मेधा कश्यप
मेधा कश्यप

इस मंदिर में प्रवेश के लिए किसी भी व्यक्ति को 42 दिन के”मंडल कालम” (जिसे साधना का व्रत भी कहा जाता है) के नियम से गुजरना होता है। इस नियम के अंतर्गत शरीर के मांसपेशियों का शुद्धिकरण या नवीनीकरण होता है। नवीनीकरण की प्रक्रिया में कुल 22 दिन का समय लगता है, इस प्रक्रिया को दोहराया जाता है जिसमे 42 दिन का समय लगता है।

 

कुछ दिन से सबरीमला मंदिर एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है, इस मुद्दे को लोग राजनीति का रूप दे रहे है किंतु यहाँ समझने वाली बात ये है कि सबरीमला कोई राजनीतिक अड्डा नहीं है ये सांस्कृतिक धरोहर है।

सर्वप्रथम इस मंदिर की विशेषता को देखने की आवश्यकता है। इस मंदिर में किसी जाति या धर्म का भेद नहीं है और न ही स्त्रियों का जाना वर्जित है, वर्जित है तो केवल 10 से 55 वर्ष की स्त्रियों का मंदिर में प्रवेश। इस मंदिर में प्रवेश के लिए किसी भी व्यक्ति को 42 दिन के”मंडल कालम” (जिसे साधना का व्रत भी कहा जाता है) के नियम से गुजरना होता है। इस नियम के अंतर्गत शरीर के मांसपेशियों का शुद्धिकरण या नवीनीकरण होता है। नवीनीकरण की प्रक्रिया में कुल 22 दिन का समय लगता है, इस प्रक्रिया को दोहराया जाता है जिसमे 42 दिन का समय लगता है।

इन विशेषताओं में कुछ लोगों को लगता है कि स्त्रियों के साथ दोहरा मापदंड अपनाया गया है। मैं यहाँ प्रत्येक आधुनिक स्त्रियों से कहना चाहूँगी कि किसी पर प्रश्न उठाने के पहले आत्मावलोकन अवश्य कर लें। जब बात आती है कि स्त्रियों का मंदिर में प्रवेश क्यों नहीं होना चाहिए? इस प्रश्न को प्रत्येक स्त्री को समझना होगा। सोचने की आवश्यकता है। जब हिन्दू (सनातन) धर्म इतना वैज्ञानिक है तो इसमें ऐसी (स्त्रियों के मंदिर में प्रवेश न करने) धारणा क्यों? जहाँ तक मेरा मानना है कि 42 दिन की “मंडल कालम” की प्रकिया से कोई स्त्री जो की 10 से 42 साल की है (अर्थात जो रजस्वला है) नहीं गुजर सकती। इसमें लोग ये भी सवाल कर सकते है कि रजस्वला होना तो प्राकृतिक क्रिया है तो फिर भेद क्यों? मेरा उत्तर यही होगा कि निश्चित रूप से रजस्वला होना एक प्राकृतिक क्रिया है जिसमे स्त्री शारीरिक रूप से कमजोर हो जाती है और वो धर्म साधना या कठोर साधना में अक्षम्य हो जाती हैं। स्त्रियों का मासिक चक्र 22 से 30 दिन का होता है तो वो 42 दिन के नियम का पालन कैसे कर सकती हैं?

 

रजस्वला होना एक प्राकृतिक क्रिया है जिसमे स्त्री शारीरिक रूप से कमजोर हो जाती है और वो धर्म साधना या कठोर साधना में अक्षम्य हो जाती हैं। स्त्रियों का मासिक चक्र 22 से 30 दिन का होता है तो वो 42 दिन के नियम का पालन कैसे कर सकती हैं?

 

चूंकि ये प्रश्न धर्म, संस्कार और समाज से जुडी हुई हैं तो इसमें अधिकार या समानता, असमानता की बात कैसे आ सकती है। जिस समाज में हम रहते है या जिस धर्म को मानते हैं उसके नियम को भी हमें स्वीकार करना होगा। समाज नियम से बंधा होता है, इसने स्त्री और पुरुष सभी के लिए नियम निर्धारित कर रखे है और सबरीमाला भी हिंदू समाज का एक अंग है।

अब बात आती है कि इस मंदिर पर ये प्रश्न क्यों उठाए गए? चूंकि ये मंदिर केरल में हैं जहाँ ईसाई मिशनरियाँ ईसाई धर्म को बढ़ाने के लिए तथा हिंदुत्व को नष्ट करने के लिए लगी हुई है। इन मिशनरियों ने बहुत से लोगों का धर्म परिवर्तन कराया किन्तु धर्म परिवर्तित लोगों ने अपनी आस्था सबरीमला के प्रति नहीं बदली तो मिशनरी के लोगों को लगा कि धर्म परिवर्तन का फायदा क्या हुआ हिंदुत्व तो वैसा ही है ! चूंकि यहाँ धर्म का धर्म के प्रति लड़ाई हैं तो इन्होंने ये रास्ता चुना। केरल में वामपंथी सरकार है जिसका पूरा फाइदा मिशनरी उठा रही है। हिंदू धर्म को कमजोर करना तथा इसके मूल को कमजोर करना ही इनका उद्द्देश्य है, इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए स्त्रियों को खड़ा कर उनके अधिकार के लिए उकसाया गया। इस अधिकार की लड़ाई लड़ रही प्रत्येक स्त्री से मेरा एक प्रश्न है कि आपने कभी अपने धर्म को समझने की कोशिश की?? मेरा मानना है कि हिंदू धर्म में व्यर्थ कुछ भी नहीं है इसे समझने की जरूरत है। खास कर हिंदुओ ने जितना सम्मान स्त्रियों को दिया है उतना किसी और धर्म में नहीं है। यही वह धर्म है जहाँ कहा जाता है “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते तत्र देवता”। इसी धर्म में काली, दुर्गा, सरस्वती आदि देवियों की पूजा की जाती है। फिर भी इस मंदिर पर प्रश्न उठाए गए,क्यों??

 

मेरा मानना है कि हिंदू धर्म में व्यर्थ कुछ भी नहीं है इसे समझने की जरूरत है। खास कर हिंदुओ ने जितना सम्मान स्त्रियों को दिया है उतना किसी और धर्म में नहीं है। यही वह धर्म है जहाँ कहा जाता है “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते तत्र देवता”

 

सोचने वाली बात है कि केरल के मंदिर पर क्यों सवाल उठाए गए, क्यों इस मंदिर पर कुछ महिलाएं लगी हुई हैं, क्यों वहाँ की सरकार इन महिलाओं के समर्थन में है, तृप्ति देसाई कौन है और ये हिन्दू मंदिर पर क्यों लगी हुई हैं? इन सारे प्रश्नों के उत्तर खोजने पर सिर्फ एक ही बात सामने आई है कि इन सब के पीछे मिशनरियों का हाथ है। तृप्ति देसाई धर्मपरिवर्तित क्रिश्चन है और कांग्रेस की कार्यकर्ता रही है और वो कांग्रेस के सीट से चुनाव भी लड़ चुकी है।

मिशनरियों को केरल की सरकार का संरक्षण प्राप्त है। वहाँ की सरकार मिशनरियों को बहुत सी सुविधा उपलब्ध कराती है। वामपंथी सरकार का एजेंडा ही हिंदुत्व को नष्ट करना है। इन सारी बातों को ध्यान में रखते हुए कहीं से भी ये लड़ाई अधिकार की नहीं दिखती है। क्योंकि अगर ये अधिकार की लड़ाई होती तो मस्जिद में भी महिलाओं के प्रवेश के लिए लड़ी जाती। ये धर्म की लड़ाई है जिसमें राजनीति की रणनीति है।

जब सबरीमाला विवाद मेरे सामने आया तो मैंने आस-पास की स्त्रियों (जिसमें वृद्ध महिला, किशोरी, युवा और प्रौढ़ सभी शामिल थे) से कुछ प्रश्न पूछे। मेरा मुख्य प्रश्न था माहवारी में पूजा करना या मंदिर जाना, मेरे प्रश्नों का मुझे उत्तर भी मिला। जो बूढी स्त्री थी उनका मानना था कि माहवारी के समय पूजा नहीं करनी चाहिए इससे देवता अशुद्ध हो जाते हैं और वे कुपित हो कर बाँझ होने का श्राप दे देते हैं। फिर बात आई प्रौढ़ स्त्रियों की उनका मानना भी बूढी स्त्रियों जैसा ही था। अब बात आती है किशोरी और युवा स्त्रियों की इनकी सोच थोड़ी अलग थी, इनका मानना था कि माहवारी के समय स्त्री कमजोर रहती है तो उसे उस समय खुद का ध्यान रखना चाहिए और कोई गन्दगी को लेकर मंदिर नहीं जा सकता, इसलिए भी मंदिर नहीं जाना चाहिए। लेकिन इनमें से किसी ने भी धर्म और विज्ञान को जोड़ कर उत्तर नहीं दिया।

मैंने खोज की और कुछ सामग्री मिली जिसमें ये समझ में आया कि आखिर क्यों नहीं रजस्वला स्त्री मंदिर में जा सकती है। हिंदू मंदिर एक चुंबकीय क्षेत्र में बना होता है जो ऊर्जा को ऊपर की तरफ खींचती हैं (इसलिए मंदिर जाने पर लोग ऊर्जावान महसूस करते हैं)। प्रत्येक मनुष्य के शरीर में पाँच प्रकार के वायु होते हैं। एक वायु जो की प्रसूति वायु कहलाती है बच्चे के जन्म के लिए जानी जाती है, वो गर्भ में स्थिर होती है। इसे बल स्वरूप माना जाता है जो की एक नकारात्म बल है। नकारात्मक बल इसलिए क्योंकि इसमें वायु रक्त को नीचे की और फेंकता है। इसी बल के कारण गर्भ के आठवें महीने में शिशु का सर नीचे की ओर आ जाता है। जब कोई स्त्री उस चुम्बकीय क्षेत्र में जाती है तो प्रसूति वायु ऊपर की तरफ बढ़ने लगती है। जिससे स्त्री को शारीरिक क्षति होती है और बाँझपन आ सकता है। यहाँ उस बूढी स्त्री का तर्क सार्थक प्रतीत होता है कि “भगवान नाराज हो कर बाँझ होने का श्राप दे देते हैं।”

 

हिंदू मंदिर एक चुंबकीय क्षेत्र में बना होता है जो ऊर्जा को ऊपर की तरफ खींचती हैं (इसलिए मंदिर जाने पर लोग ऊर्जावान महसूस करते हैं)।

 

माहवारी के समय क्यों नहीं मंदिर जाना चाहिए इसे वैज्ञानिक ढंग से भारतीय अमेरिकी डॉक्टर ह्रदय रोग विशेषज्ञ निशा पीलै ने अपनी वीडियो में वैज्ञानिक ढंग से समझाया है। ऊपर मैंने जो वैज्ञानिक कारण बताया है वो इसी वीडियो का कुछ अंश है।

सन् 1983 में ब्रिटेन के इंजीनियर चार्ल्स बुकर ने लंबे अध्ययन के बाद बताया कि पत्थर के स्तंभों (मोनोलिथ) से निर्मित पुरातन पवित्र स्थानों में चुम्बकीय शक्ति पाई गई। उन्होंने अपने मैगनेटोमीटर को जब ऐसी साइटों के बीच से गुजारा तब इसमें अद्भुत विचलन (डेविएशन) देखा गया। इसका स्पष्ट मतलब था कि ये चुम्बकीय शक्तियों से युक्त हैं।

आप सभी चुंबकीय चिकित्सा से वाकिफ होंगे। इसे वैकल्पिक इलाज़ के तौर पर भी जाना जाता है। इसका नियम कहता है कि महिलाओं को महवारी के दरम्यान इसे नहीं अपनाना चाहिए। इसके पीछे इस चिकित्सा का अपना वैज्ञानिक तर्क है।

सामान्य तौर पर चार्ल्स बुकर और चुंबकीय चिकित्सा शास्त्र को मिला दिया जाए तो परिणाम वही आता है जो सबरीमाला में नियम बना दिया गया है। यह मुद्दा स्त्रियों को सहज स्वीकारना चाहिए।

धर्म और समाज के नियम सुसंगठित है। इस पर प्रश्न उठाने से पहले कुछ प्रश्नों पर विचार अवश्य कर लें। जैसे कि धर्म क्यों बने है? और नियम का पालन करना क्यों आकाश्यक है? क्योंकि बिना कारण कुछ भी संभव नहीं है। हमे खुद के विषय में सोचना होगा और समझना होगा। नियम और धर्म सब पर विचार करना होगा। नहीं तो कोई भी हमें बरगला सकता है और हमें मुर्ख बना सकता है।

धर्म हमारी सुविधा औऱ हमारी रक्षा के लिए है। धर्म पर प्रश्न उठाने से पहले मूल्यांकन अवश्य करें क्योंकि हिन्दू धर्म में बिना कारण कुछ नहीं दिया गया है। इसे समझ कर ही प्रश्न करें,क्योंकि ये धर्म पूर्णतया वैज्ञानिक है। हाँ इसके अर्थ को समझने की कला आपको आनी चाहिए तभी आप इस धर्म को समझ सकते हैं। इसे लोक व्यवहार में लाने के लिए पाप औऱ पुण्य से जोड़ दिया गया है ताकि निरक्षर व्यक्ति भी इसका सख्ती से पालन करे।

 

धर्म हमारी सुविधा औऱ हमारी रक्षा के लिए है। धर्म पर प्रश्न उठाने से पहले मूल्यांकन अवश्य करें क्योंकि हिन्दू धर्म में बिना कारण कुछ नहीं दिया गया है। इसे समझ कर ही प्रश्न करें,क्योंकि ये धर्म पूर्णतया वैज्ञानिक है।

 

धर्म और संस्कृति ही हमारा सबसे पहला संविधान है इसके नियम ही अनुच्छेद हैं। धर्म और संस्कृति ने ही हमें अपना अधिकार बताया है। जिस धर्म में स्त्री को बराबर (अर्धनारीश्वर) का अधिकार दिया ही नहीं है बल्कि बराबर माना है, उस धर्म पर बिना सोचे-समझे प्रश्न उठाना सही नहीं है।

– मेधा कश्यप

(स्तंभकार फिलहाल बिहार के भागलपुर स्थित तिलकामांझी विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर (हिन्दी) की छात्रा हैं)
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